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Tuesday, February 01, 2022

कुंवर रंजन का भाजपा में शामिल होना बहुत गहरी बात

Posted on 1st February 2022 at 08:43 PM                                     Updated on 2nd February at 11:07 AM

चुनावी सियासत में दूरगामी परिणामों पर पड़ेगा महत्वपूर्ण प्रभाव 

लुधियाना: 1 फरवरी 2022: (लुधियाना स्क्रीन//पंजाब स्क्रीन डेस्क)::

बुद्धं शरणं गच्छामि से संघं शरणं गच्छामि तक
कुछ भी कह लो-कुछ भी कर लो-कुछ भी समझ लो लेकिन दीवार पर लिखी सच्चाई यही है कि भारतीय जनता पार्टी पंजाब में लगातार छायी जा रही है। भाजपा हाई कमान ने जो नया नारा दिया है--नवां पंजाब भाजपा दे नाल वह नारा सही साबित हो रहा है। लोग उमड़े चले आ रहे हैं भाजपा की तरफ। कांग्रेस के साथ साथ अब वाम से प्रभावित लोग भी भाजपा का दामन थाम रहे हैं। भाजपा के आकर्षण की शायद एक बड़ी वजह है अन्य दलों के केडर में बढ़ रही निराशा। न उन्हें अपने कैरियर में कुछ अच्छा होता दिखता है और न ही कोई इंकलाब आता नज़र आता है। सुबह घर से निकले, रैलियों में नारे लगते रहे जब थके हारे शाम को घर पहुंचते हैं तो बच्चे पूछते हैं पापा आज क्या किया? आज कुछ कमाया? पूरा साल भर धरना मार कर दिल्ली में बैठे लोग भी चुनावों के ज़रिए सत्ता तक पहुंचने की ललक छोड़ नहीं पा रहे। इसी निराशा के दौर में भाजपा के केंद्रीय मंत्री भी भाजपा को मज़बूत बनाने के लिए पंजाब में पूरी तरह से लगे हुए हैं। 

आज भी केंद्रीय मंत्री मीनाक्षी लेखी लुधियाना में थी। उनकी मौजूदगी में जन मंचों पर छाए रहने वाले कुंवर रंजन सिंह और उनकी पत्नी नीतू ने भारतीय जनता पार्टी ज्वाइन कर ली। कुंवर रंजन सिंह अन्ना हज़ारे आंदोलन में सक्रिय रहे और मेधा पाटकर के आंदोलनों में भी। इस से भी बहुत पहले जब रंगमंच/स्टेज/थियेटर पर इप्टा का जादू सिर चढ़ कर बोल रहा था तो कुंवर रंजन थियेटर की इस हवा में पूरी तरह सक्रिय भी रहा। ऊंचे ऊंचे नामों वाले कलाकार एक छत के नीचे रहते रहे। स्ट्रगल का दौर था। आज भी उनकी बातें सुनने वाली होती हैं। बड़े कलाकारों की छोटी मोती सभी खूबियां और आदतें उन्हें ज़ुबानी याद हैं। अन्ना हज़ारे के आंदोलन से उन्हें लगा कि शायद अब सम्पूर्ण क्रांति आ ही जाएगी। अन्ना हज़ारे वाली इस हवा में कुछ वाम लीडर भी कुंवर रंजन के साथ रहे और कुछ कांग्रेस के लोग भी। ये सभी लोग कुछ बदलाव चाह रहे थे। लाख कोशिशों के बावजूद बदलाव आ नहीं पा रहा था। 

इसी बीच भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूरी शक्ति के साथ सत्ता में आए। न सिर्फ आए बल्कि छा  भी गए। उन्होंने जो जो सोच रखा था उसे लागू करना भी शुरू किया। राम मंदिर से लेकर कृषि कानूनों तक भाजपा ने अपनी मनमानी की और अपना लोहा मनवाया। कांग्रेस, वाम और यहाँ तक कि अकाली दल द्वारा विरोध भी भाजपा के जादू को कम न कर सका। महंगाई, बेरोज़गारी, जीएसटी और नोटबंदी से ही भाजपा की लोकप्रियता कम न हुई। अब कुंवर रंजन  एक भाजपा में शामिल होना गहरा संकेत है। भले ही इसके अर्थ तुरंत सभी को समझ न आएं लेकिन इसके दूरगामी परिणाम होंगें। 

इक बाग़ नहीं, इक खेत नहीं-
हम सारी दुनिया मांगेंगे 

आज बाद दोपहर मिली खबरों के मुताबिक जो लेग आज भाजपा में शामिल हुए उनमें हल्का पूर्वी से कांग्रेस के ब्लॉक प्रधान पतंजलि शर्मा और संजय कुमार भाजपा में शामिल हुए। पंजाब फ्रंट पार्टी से कुंवर रंजन सिंह व नीतू सिंह, हल्का केंद्रीय से आज़ाद उम्मीदवार प्रेम कुमार लल्लू भाजपा के हो गए। 

भाजपा लुधियाना के अध्यक्ष श्री पुष्पेंदर सिंगल की अध्यक्ष्ता में भाजपा जिला चुनाव कार्यलय बसंत रोड में केंद्रीय विदेश और संस्कृति राज्य मंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेत्री मीनाक्षी लेखी ने  की मौजूदगी में पूर्वी हल्के से कांग्रेस के ब्लॉक प्रधान पतंजलि शर्मा, संजय कुमार, कुंवार रंजन सिंह, नीतू सिंह जो की हल्का साऊथ से पंजाब फ्रंट पार्टी की तरफ से 2017 में  विधान सभा चुनाव लड़ चुके है, प्रेम कुमार लल्लू हल्का केंद्रीय से जो आज़ाद उम्मीदवार के तौर से चुनाव मैदान में थे वह अब भाजपा में शामिल हो गए है। 

भाजपा में शामिल हुए इन सभी नेताओं ने कहा कि वो भारत के प्रधान मंत्री श्री नरेंदर मोदी की नीतियों से प्रभावित होकर उन्होंने भाजपा को चुना। इन लोगों ने इन नीतियों को बाकायदा  लोक हितेषी नीतियां बताते हुए इनका समर्थन किया। 

इस मौके पर भाजपा के महामंत्री कांतेन्दु शर्मा,जिला उपाध्यक्ष सुनील मौदगिल, मीडिया सचिव डा.सतीश कुमार, कैशियर बॉबी जिंदल, पार्षद यशपाल चौधरी, भाजपा के सीनियर नेता अशोक लूम्बा, विनोद कालिया,अरुणेश मिश्रा, आईटी व सोशल मीडिया के जिला सह संयोजक हर्ष सरीन, नितिन बत्रा, रमेश मिश्रा आदि मौजूद थे।

ज़ाहिर है कि अब भाजपा की तैयारी केवल आधार मज़बूत करने तक सीमित नहीं। अब भाजपा में स्ट्रीम मीडिया  सोशल मीडिया पर भी पूरी तरह से सक्षम बन कर सामने आ रही है। इस मकसद के लिए युवाओं को विशेष तौर पर सक्रिय किया गया है। इन में लड़कियों और महिलाओं के संख्या भी काफी है। विपक्ष में कांग्रेस पार्टी, वाम दल, बसपा और अकाली दल सहित किसके पास है इस तरह का सुनियोजित मीडिया और आईटी विंग? जीत हो या पराजय अब इसी विंग ने लम्बे समय तक लड़नी है लड़ाई। आज भाजपा में शामिल कुंवर रंजन सिंह और उनकी पत्नी नीतू इस मामले में पूरी तरह अनुभवी हैं। प्रिंट मीडिया से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तक वह इस काम की हर बाजरीकी समझते हैं।  इसका फायदा अब भाजपा को ही होने वाला है। 

छोड़ आए हम वो गलियां

नए रास्तों पर मंज़िलें भी नई हैं
और लोग भी नए हैं। अतीत फिर भी पीछा तो नहीं छोड़ता। यह याद दिलाता रहता है। कुंवर साहिब का कहना है मेरे दिल में रहंगे मेरे सभी साथी।  सभी मित्र बहुत अच्छे भी हैं। उन्हें भूलना मुमकिन भी नहीं इसकी कोई ज़रूरत भी नहीं। हम सभी देश के सिस्टम में बदलाव लाना चाहते हैं इसके लिए हमारे ढंग तरीके और रास्ते अलग अलग हो सकते हैं। किस को कौन सा रास्ता सही लगे उसकी मर्ज़ी-उसका चुनाव। सभी को अपना चुनाव करने की स्वतंत्रता है।  लेकिन याद आ रहा है माचिस फिल्म का वो गीत-छोड़ आए हम वो गलियां---! बस  किसी का मोह जल्दी भंग हो जाता है--किसी का देर से और किसी का होता ही नहीं। बस असली बात तो मोह भंग होने की ही है। 

Tuesday, January 24, 2017

नशा माफिया के आतंक को बेलन ब्रिगेड की चुनौती

नशे के खिलाफ बोलने से डरे लोगों को दी अनीता शर्मा ने दी नई हिम्मत 
लुधियाना:: 23 जनवरी 2017::(पंजाब स्क्रीन ब्यूरो)::और तस्वीरें देखने के लिए यहाँ क्लिक करें

ग्यासपुरा की साईड पर एक कलोनी की गली। अजीब सा आतंक था वहां। बेलन ब्रिगेड की अनीता शर्मा को देखते ही छुपने शुरू हो गए वहां के लोग। शायद डर था कि कहीं बेलन ब्रिगेड वाले उनको नशे के खिलाफ रखे कार्यक्रम में न बुला लें। इस सहम  और आतंक को देख कर ही बेलन ब्रिगेड प्रमुख अनीता शर्मा ने यहाँ आने का मन बनाया था। कार्यक्रम के आयोजन की ज़िम्मेदारी ली थी मानवता संगठन की स्वीटी बत्रा और उनके परिवार ने। और तस्वीरें देखने के लिए यहाँ क्लिक करें
इस आयोजन के शुरू होने के बाद भी इलाके के लोग वहां नहीं आये। इस आतंक को एक चुनौती मानते हुए अनीता शर्मा ने गिनेचुने लोगों के दरम्यान अपना कार्यक्रम शुरू किया। कुछ देर में ही वहां पंजाब फ्रंट के जोशीले नेता कुंवर रंजन सिंह पहुँच गए। इससे माहौल में कुछ गर्मजोशी आयी। कांग्रेस के प्रत्याशी भूपिंदर सिंह सिद्धू, वरिष्ठ कांग्रेसी नेता जगमोहन शर्मा और कुछ अन्य लोग वहां पहुंचे तो सभा में मौजूद लोगों को कुछ हौंसला हुआ। भूपिंदर सिंह सिद्धू ने वहां आते ही खुल कर ऐलान किया कि कांग्रेस की सरकार बनने के चार सप्ताह के भीतर ही नशे के कारोबार को अतीत की बात बना दिया जायेगा। उन्होंने इस सम्बन्ध में कैप्टन अमरेंद्र सिंह के चुनावी वायदों का भी ज़िक्र किया। इस अभियान की प्रशंसा करते हुए उन्होंने हर सहयोग का आश्वासन भी दिया। अनीता शर्मा ने उनके इस कदम का स्वागत किया।  

इसी बीच बेलन ब्रिगेड ने वहां मौजूद लोगों को नशे के खिलाफ संघर्ष की सौगन्ध भी उठवायी। संगठन ने ग्यासपुरा इलाके के विभिन्न स्थानों पर भी गरीब व मजदूर जनता को चुनावों में किसी भी तरह का नशा किसी भी पार्टी से न लेने का प्रचार किया।और तस्वीरें देखने के लिए यहाँ क्लिक करें

बेलन ब्रिगेड की राष्ट्रीय अध्यक्ष अनीता शर्मा ने कहा कि पंजाब में कोई भी नेता गरीब व मजदूर जनता का भला व विकास नहीं चाहता। सभी राजनैतिक पार्टियां के धोखेबाज नेता चुनावों में गरीब जनता को नोट व नशे का लालच देकर उनसे अपने हक़ में वोट डलवा लेते हैं। आजादी से लेकर आज तक मतदाता यह नहीं समझ पाया कि राजनैतिक नेता उन्हें शराब व नोट का लालच देकर हर बार उनके वोट ले लेते हैं और पांच साल तक यही नेता गरीब जनता का शोषण करते है।और तस्वीरें देखने के लिए यहाँ क्लिक करें
अनीता शर्मा ने कहा कि केवल कांग्रेस पार्टी ने ही अभी तक पंजाब में चुनाव जीतने के बाद 5% शराब के ठेके गरीब बस्तियों से हटाने का ऐलान किया है। अकाली, भाजपा व आप पार्टी ने अभी तक पंजाब से शराब का नशा खत्म करने का कोई एलान नही किया। जिससे जाहिर होता है कि यह राजनैतिक पार्टियां नशे के नाम पर गरीब लोगों को बेवकूफ बनाकर उनके वोट हासिल करना चाहती है। अनीता शर्मा ने कहा कि चुनावों में जीतकर कोई भी राजनैतिक पार्टी अपनी सरकार बनाए लेकिन बेलन ब्रिगेड का शराब व नशों के खिलाफ आंदोलन जारी रहेगा। मानवता संगठन की पंजाब अध्यक्ष स्वीटी बत्रा ने सभी का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि अब अनीता शर्मा हमारे साथ हैं इस लिए हम दबने वाले नहीं।  हम नशे के खिलाफ अपना आंदोलन और तेज़ करेंगे। और तस्वीरें देखने के लिए यहाँ क्लिक करें

Thursday, November 10, 2016

स्वराज इंडिया ने किया नोट परिवर्तन का समर्थन

काला धन तो नहीं लेकिन जाली नोट तो जरूर रुकेंगे
*500 और 1000 के नोट को बदलना एक आवश्यक, उचित और कठिन फैसला-सब समर्थन करें
    *काले धन की पूर्णतः समाप्ति के सरकारी दावे भ्रामक और काल्पनिक
    *नोट परिवर्तन में आम जनता को कष्ट न हो यह सुनिश्चित करना सरकार का दायित्व
सरकार द्वारा 500 और 1000 रूपये के नोट बदलने के फैसले का स्वराज इंडिया समर्थन करती है। पिछले काफी समय से जाली नोटों की समस्या विकराल रूप धारण कर रही थी इसलिए 500 और 1000 के प्रचलित नोटों को रद्द कर उसकी जगह नए नोट जारी करना जरुरी हो गया था। सरकार ने इस जरुरी लेकिन कठिन फैसले को समय रहते लिया और इसे जिस स्फूर्ति से लागू किया यह स्वागत योग्य है। 
इस घोषणा से जाली नोटों पर नियंत्रण तो लगेगा, लेकिन काले धन को पूर्णतः समाप्त करने के सरकारी दावे बेबुनयादी हैं। अधिकांश काला धन कैश नहीं है बल्कि बेनामी सम्पति, शेयर और हवाला या पी नोट के जरिये विदेशी पुंजी की शक्ल में पड़ा है उन पर इस घोषणा से कोई असर नहीं पड़ेगा। बड़े नोट बंद करने से काले धन के उस छोटे से अंश पर ही असर पड़ेगा जो नोटों की गड्डियों में रखा हुआ है। इस काले धन को भी अगले 50 दिन में अनेक चोर दरवाज़ों से सफ़ेद बना दिया जा सकता है, इसलिए फ़िलहाल तो प्रधानमंत्री और बीजेपी के "काले धन पर ऐतिहासिक हमले" जैसी घोषणा काल्पनिक जान पड़ते हैं। 
जब भी नोटों में परिवर्तन होता है उससे जनता को परेशानी और घबराहट होना स्वाभाविक है। सरकार की जिम्मेवारी है कि वह इस परिवर्तन के दौर में आम जनता को नुकसान होने से बचाए। हमारे देश में आज भी अधिकांश लेन देन कैश में होता है और बहुत लोग अपने जीवन भर की कमाई बैंक में नहीं कैश में रखते हैं। यूँ भी आजकल फसल बेचने और फिर शादी का अवसर है जब कैश का व्यवहार सामान्य से भी ज़्यादा होता है। ऐसे में अचानक 500 और 1000 रूपये के नोट का प्रचलन रोकने से शहरी गरीबों और देहात के लोगों को बहुत असुविधा हो सकती है। अगर ऐसे में सरकार ने ठीक इंतजाम नहीं किये तो ये पूरी योजना खटाई में पड़ सकती है। लेकिन केवल इस असुविधा के आधार पर नोट परिवर्तन का विरोध करना देश हित में नहीं है। हम विपक्षी दलों से अपील करते हैं कि वे इस घोषणा का विरोध करने के बजाए सरकार को यह कठिन कदम उठाने में सहयोग करें।

Tuesday, August 04, 2015

क्यूं गलत थी याकूब को फांसी//कुंवर रंजन सिंह

एक मुस्लिम की सोच और प्रोपेगंडा  
सोचने को मजबूर करती कुंवर रंजन सिंह की यह प्रस्तुति तथ्यों और दलीलों के साथ बात करती है। सोशल मीडिया पर लोकप्रिय हुआ यह आलेख कुंवर साहिब का है या किसी और का इस संबंध में हमारी बात नहीं हो पाई। मंगलवार 4 अगस्त 2015 की दोपहर को 1:22 पर पोस्ट हुआ यह आलेख आपको कैसा लगा अवश्य बताएं। -रेकटर कथूरिया 
कल से कई पोस्ट आये जो मेरे गैर मुस्लिंम भाइयों ने किए थे, उनके पोस्ट को पढ़ के लगा की वो कुछ गलतफेहमी में है, कुछ तो सियासी मेढंक थे जो की टर्र टर्र कररहे थे। खैर इनकी कोई बात ही नही इनकी फितरत ही है लाशो पे अपनी रोटी सेकना।
लेकिन मै कुछ बाते साफ़ करना चाहूँगा कि और अपने भाइयों की गलतफहमी दूर करना चाहूँगा...-----
जैसा कि लोग कह रहे है कि देश के मुसलमान याक़ूब मेनन का समर्थन इसलिए कररहे है क्यूकि वो एक मुस्लमान था। ये सरासर गलत है। हाँ मै कुछ फीसदी इस बात पे सहमत हूँ लेकिन ये बात गलत है। अगर बात सिर्फ मुस्लमान की ही है तो

मो0 आमिर अजमल कसाब कौन था????

अफजल गुरु कौन था???

क्या ये मुसलमान नही थे???

क्या इनको फांसी नही दी गयी???

कितने मुसलमान इनके समर्थन में खड़े हुए थे???

40 तो दूर 4 लोगो ने भी इनकी शिफारिश राष्ट्रपति से नही की थी।

फिर ये याक़ूब में इतनी दिलचस्पी क्यू हो गयी लोगो की???
क्या इनके सुर्खाब के पंख लगे थे???
नही....------
फिर????

तो सुनिए
पहली बात-- देश का कोई भी मुसलमान धर्म के नाम पे याक़ूब के समर्थन में नही उतरा।
दूसरी बात--अभी तक किसी भी मुस्लिम ने ये नही कहा कि याक़ूब मेनन बेकसूर था।और न ही किसी ने ये मांग की कि याक़ूब को रिहा किया जाए।
यहां समर्थन इस बात के लिए था कि ये फांसी का हकदार नही है। यदि इसकी फांसी में इतनी देरी न होती तो इतना बवाल न होता।

तीसरी बात--धर्म की वजह से याक़ूब का समर्थन नही  किया जा रहा था ज़्यादातर समर्थक हिन्दू और दूसरे धर्म के थे। लिहाजा यहां धर्म की बात करना महज़ सियासी हथकंडे है।
चौथी बात--हम अदालत के फैसले का सम्मान करते है। उसका हर फैसला हमे क़ाबिले क़ुबूल है।

मै बताता हूँ कि क्यू इतने लोग याक़ूब मेनन के समर्थन में उतरे******
ज़रा ये बताईये कि आत्मसमर्पण का मतलब क्या हुआ????
एक आदमी किस आधार पे सिरेन्डर करता है???
अगर एक आदमी को ये पता हो कि उसे आत्मसमर्पण करने पर भी मार दिया जायेगा तो वो कभी भी अपने आपको पुलिस के हवाले नही करेगा। वो यही सोचेगा कि मरना वहां भी मरना यहाँ भी है तो क्यू न यही आराम से मरा जाये। क्या फायदा आत्मसमर्पण का जब जेल में सड़ के आखिर में फांसी मिलनी है।
इतिहास के पन्ने पलटिये एक नही हजारो ऐसी घटनाये मिल जाएँगी जिसमे खुद को सिरेंडर करने वालो की जान बख्श दी गयी।
मै दूर की बात नही करता खुद हमारे मुल्क में ही हज़ारो बेगुनाहो और सैनिको का खून बहाने वाले नक्सलियों की जान तो बख्शी ही गयी साथ में उन्हें लाखो रुपये दे कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाया गया।
नक्सली तो इंडिया में ही रहते है जब उन्हें गिरिफ्तार करना इतना मुश्किल  है तो फिर जो बाहर मुल्क में है उन्हें गिरफ्तार करना कितना मुश्किल होगा????

ऐसे हालात में कोई पाकिस्तान से आकर खुद को इंडिया में सिरेन्डर करता है तो ये उसकी अच्छी सोच है और अधिकारियो पे किया गया एक अहसान है क्यूंकि उसने खुद को फसा कर इन अधिकारीयों की जान बचाई।

एक आदमी जोकि अपने परिवार के साथ पाकिस्तान मे हो वो इस मुल्क के कानून पे भरोसा करता है अपनी जान जोखिम में डालता है अपनी किये की सज़ा भुगतने के लिए इंडिया आता है, अपने भाई टाइगर मेनन और दाऊद से पंगा लेकर उनके और ISI के खिलाफ सारे सुबूत indian agencies को सौंपता है।  22 साल जेल में रह कर अपनी सज़ा काटता है।
ऐसे में क्या इसे फांसी दी जानी चाहिए???
ये बात मै नही RAW के पूर्व चीफ स्व0 श्री रमन जी ने अपनी डायरी में कही है जोकि मुस्लिम नही है।

जिस आधार पे याक़ूब को फांसी की सज़ा हुई है वो दलीले और सुबूत कमज़ोर है। न तो याक़ूब ने अपना ज़ुर्म कबूला, न ही इस बात के सुबूत मिले कि याक़ूब मेनन ने बम प्लांट किया या बनाया। कोई चश्मदीद गवाह भी नही मिले। 
जिस गवाह के बयान को आधार माना गया वो अपने बयान से 2 बार पलट चुका है। पहले कुछ और बोला था और बाद में याक़ूब के खिलाफ बोला। इंडिया में पुलिस थर्ड डीगरी देकर तमाम यातना देकर कैसे बयान लेती है ये सब जानते है। लिहाज़ा याक़ूब को फाँसी नही दी जानी चाहिए।
ये बात भी मै नही सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज और प्रेस कौंसिल ऑफ़ इंडिया के president श्री काटजू जी ने कही है। को की मुस्लिम नही है।

pm का कातिल माफ़

cm का क़ातिल माफ़

गुजरात के क़ातिल घूम रहे, 
सिख दँगो के क़ातिल घूम रहे, 
मक्का मस्जिद, मालेगाव, अजमेर, अच्चरधाम ब्लास्ट के क़ातिल घूम रहे है।
आरोप भी तय है जुर्म भी साबित हो चूका है फिर भी जांनबुझ के देरी की जा रही है???
क्या ये सही है???
ये भेदभाव नही तो और क्या है???

यही वो बात थी जिसके बुनियाद पे मुस्लिम के साथ साथ इस मुल्क के ज़िम्मेदार लोग, पढ़े लिखे लोग और खुली सोच रखने वालो ने याक़ूब का समर्थन किया।

क्या ये समर्थन गलत था??

जिन 40 लोगो ने दया याचिका भेजी थी उसमे भी सब मुस्लिम नही थे। और आज जिस सलमान खान को जो लोग भला बुरा कह रहे है यही वो लोग है जब सलमान ने मोदी के साथ पतंग उड़ाई थी तो सलामन के गुड़गान करते फिर रहे थे। आज इनलोगो को क्या हो गया है???
सलामन इतना बुरा कैसे हो गया??
न वक़्त बदला है न सलमान।  बदल तो ये लोग गए है।

और आखिरी बात हमारी देशभक्ति पे शक मत करो।  इतिहास गवाह है हमने कहीं-  बहादुर शाह ज़फ़र, टीपू सुलतान, बेगम हज़रत महल और अशफ़ाक़ुल्ला खान, बनके दुश्मनो के छक्के छुड़ाए है तो कहीं-वीर अब्दुल हमीद बनके सीमा में घुस के पकिस्तानियो की नाक काटी है। तो कहीं अब्बदुल कलाम बन के भारत को परमाणु बम और दर्जनों मिसाइल दे कर दुनिया के नक्शे में जगह दिलाई है।

आज भी हम वही है बदले नही है। बदली है तो आपकी सोच,  हमे देखने का नज़रिया बदला है।
हम नही बदले है***