Wednesday, April 11, 2012

202 महत्वपूर्ण रेलवे स्टेशनों पर एकीकृत सुरक्षा प्रणाली का प्रस्ताव

भारतीय रेल की एकीकृत सुरक्षा प्रणाली का क्रियान्वयन
फीचर:रेलवे                                                                     -एच. सी. कुंवर*
भारतीय रेल के उन्नयन और मज़बूतीकरण के लिए सुरक्षा की पहचान हमेशा प्रमुख क्षेत्र के रुप में की गई है। रेल मंत्रालय के तहत कार्यरत रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) को यात्रियों, यात्री क्षेत्र और इससे संबंधित मामलों की रक्षा और सुरक्षा का दायित्व सौंपा गया है।
     रेलवे सुरक्षा की समस्याओं का अध्ययन करने के बाद समूचे रेलवे नेटवर्क के 202 महत्वपूर्ण रेलवे स्टेशनों पर एकीकृत सुरक्षा प्रणाली का प्रस्ताव किया गया। एक जन यातायात प्रणाली के रुप में भारतीय रेलवे की अपनी कुछ विशिष्टताएं हैं। भारतीय रेलवे द्वारा प्रतिवर्ष लगभग 8,000 मिलियन लोग यात्रा करते हैं और दिल्ली तथा मुंबई जैसे महत्वपूर्ण स्टेशनों पर दैनिक आधार पर लाखों लोग पहुंचते हैं। महत्वपूर्ण घंटों के दौरान स्थिति विशिष्ट और नियंत्रण से परे हो जाती है। इन पहलुओं को ध्यान में रखते हुए एक सुरक्षा प्रणाली का प्रस्ताव किया गया जिसमें यात्रियों और उनके सामानों की बहुस्तरीय जांच में सहायक और साथ ही यात्रियों की निगरानी जैसी विविध विशिष्टताओं से परिपूर्ण सुरक्षा प्रणाली का प्रस्ताव किया गया। इसके पीछे जांच/निगरानी के विभिन्न स्तरों को लागू करने का उद्देश्य है ताकि किसी भी प्रकार की गलत गतिविधि की पहचान तत्काल की जा सके और ‘स्वर्णिम घंटे’ के भीतर कार्यवाई की जा सके।


इसके अनुसार रेल मंत्रालय ने व्यापक चर्चाओं के बाद महत्वपूर्ण स्टेशनों पर ‘एकीकृत सुरक्षा प्रणाली’ की स्थापना की मंजूरी दी है। इस प्रणाली में निम्नलिखित घटक होंगे-


इंटरनेट प्रोटोकॉल आधारित सीसीटीवी प्रणाली


     स्टेशन क्षेत्र में क्लोज सर्किट टीवी प्रणाली इस प्रकार स्थापित की जाएगी जिसमें स्टेशन की भीड़, प्रतीक्षा हॉल, प्लेटफॉर्म, पुल आदि सहित समूचा स्टेशन परिसर समाविष्ट हो जाए। सीसीटीवी प्रणाली इंटरनेट प्रोटोकॉल आधारित होगी और इसमें महत्वपूर्ण वीडियो विश्लेषण होगा जो स्वतः ही संदेहास्पद सामान, अत्याधिक भीड़, अनाधिकृत व्यक्ति द्वारा अनुचित प्रवेश आदि के संकेत प्रदान करेगा। 


 पहुंच नियंत्रित करना


चारदीवारी की इस प्रकार कंटीली घेराबंदी जिससे स्टेशन क्षेत्र में अनाधिकृत प्रवेश/निकास संभव न हो। जहां से वाहन स्टेशन परिसर में प्रवेश करते हैं वहां प्रवेश द्वारों पर स्वचालित वाहन स्कैनर लगाए जाएंगे। निगरानी के लिए बनाए गए नियंत्रण कक्ष में एक स्कैनर लगाया जाएगा।


व्यक्तियों और सामानों की जांच प्रणाली


     व्यक्तियों के जांच के लिए हाथ से पकड़े जाने वाले मेटल डिटेक्टर, डोर फ्रेम मेटल डिटेक्टर और संदेहास्पद मामलों में तलाशी का प्रयोग किया जाएगा। बड़े आकार की एक्स-रे मशीनों के द्वारा सामानों की जांच की जाएगी।


बम खोज तथा निराकरण प्रणाली (बीडीडीएस)


बीडीडीएस महत्‍वपूर्ण स्‍टेशनों पर आधुनिक उपकरणों के साथ उपलब्‍ध रहेगी। यह प्रणाली प्रथम चरण में देश के 202 महत्‍वपूर्ण और संवेदनशील स्‍टेशनों पर कार्यान्वित की जा रही है। सीसीटीवी आधारित निरीक्षण प्रणाली के जरिए रात-दिन निगरानी के लिए महत्‍वपूर्ण स्‍थानों पर समर्पित नियंत्रण कक्ष होंगे। ‘एकीकृत सुरक्षा प्रणाली’ को महत्‍वपूर्ण तरीके से संचालित करने के लिए प्रशिक्षित आरपीएफ कर्मी तैनात होंगे। मशीन तथा साफ्टवेयर को सही तरीके से संचालित करना इस अनुबंध का एक महत्‍वपूर्ण हिस्‍सा होगा।


ऊपर उल्‍लेखित 202 स्‍टेशनों को मौजूदा वित्‍तीय वर्ष के दौरान संचालित करने की योजना है।


अत: इस प्रणाली के तहत प्रवेश के साथ ही यात्रियों की विभिन्‍न तरीकों से जांच की जाएगी। आधुनिक मशीनों तथा सॉफ्टवेयर से लैस ‘एकीकृत सुरक्षा प्रणाली’ में सुरक्षा के पारंपरिक उपायों का भी इस्‍तेमाल होगा, जिसे और मजबूत किया जा रहा है। पारंपरिक तरीकों तथा आधुनिक तकनीकों के संयुक्‍त प्रयास से भारतीय रेलवे के सुरक्षा परिदृश्‍य में महत्‍वपूर्ण सुधार होगा।


इसके अलावा वर्तमान में 1275 महत्‍वपूर्ण मेल तथा एक्‍सप्रेस ट्रेनों की सुरक्षा, महत्‍वपूर्ण रेलवे स्‍टेशनों तक पहुंच नियंत्रण , दोषियों पर मुकदमा (रेलवे अधिनियम के 29 धाराओं के अंतर्गत) जिसमें ट्रेन, स्‍टेशन परिसर में अनाधिकृत गतिविधियां यानी अलार्म चेन खींचना, अनाधिकृत रूप से समान बेचना, अनाधिकृत रूप से महिलाओं तथा आरक्षित कोच आदि में प्रवेश करना सम्मिलित है, के लिए आरपीएफ तैनात है तथा रेलवे संपत्ति अधिनियम (अनलॉफुल पसेशन) 1966 के अंतर्गत रेलवे की सं‍पत्ति चोरी करने पर पकड़े गए अपराधियों के खिलाफ मुकदमा चलाना भी शामिल है।


यात्रियों की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए सभी जोनल रेलवे में आरपीएफ की 22 कमांडों टुकडियों को तैनात किया जा रहा है। यह 12 आरपीएफ कमांडों की टुकडि़यों के अतिरिक्‍त होगी। एक महिला बटालियन सहित देश के विभिन्‍न भागों में स्‍थापित आरपीएफ के अंतर्गत रेलवे सुरक्षा विशेष बल (आरपीएफ) की 12 बटालियन तथा तीन अतिरिक्त बटालियनों को आरपीएफ के विशेष बल को मजबूत करने के लिए स्‍वीकृत किया गया है। यात्रियों की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए आरपीएफ को एके 47 राइफल्‍स, इनसांस, नौ मिलिमीटर पिस्तौल जैसे आधुनिक हथियारों से लैस किया गया है।


आरपीएफ में मौजूदा रिक्तियों तथा नए पदों को भरने के लिए हवलदार के 11952 पदों तथा सबइंस्‍पेक्‍टर के 511 पदों को अधिसूचित करके एक विशेष भर्ती अभियान चलाया गया है। इन रिक्तियों में से दस प्रतिशत रिक्तियां योग्य महिला उम्‍मीदवारों के लिए आरक्षित की गई हैं।


आरपीएफ के अतिरिक्‍त जिला पुलिस, ट्रैक तथा पुल की सुरक्षा के लिए जिम्‍मेदार है। राज्‍य पुलिस की इकाई सरकारी रेलवे पुलिस, स्‍टेशन परिसर तथा ट्रेन में अपराधों को रोकने तथा उसकी जांच एवं कानून और व्‍यवस्‍था बनाए रखने के लिए जिम्‍मेदार है। सरकारी रेलवे पुलिस के 50 प्रतिशत व्यय का वहन रेलवे करती है तथा शेष का भुगतान संबंधित राज्‍य सरकार द्वारा किया जाता है। (पीआईबी)  10-अप्रैल-2012 19:45 IST


*उपनिदेशक (‍मीडिया तथा संचार), रेल मंत्रालय


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Tuesday, April 10, 2012

जीवन को दो महत्‍वपूर्ण घटक प्रभावित करते हैं.....!

बढ़ती आयु एवं स्‍वास्‍थ्‍य वि‍शेष लेख                           ए.एन. खान *
मानवीय विकास एवं ह्रास के कुछ प्राकृतिक बदलावों को व्‍यक्‍त करने के लिए शरीर विज्ञानी ''आयु'' शब्‍द का इस्‍तेमाल करते हैं। मानवीय विकास और ह्रास को हम शैशवकाल, बाल्‍यकाल, युवावस्‍था, प्रौढ़ावस्‍था और वृद्धावस्‍था के रूप में जानते हैं। शैशवकाल सात वर्षों का, बाल्‍यकाल 14 वर्षों का, युवावस्‍था 21, प्रौढ़ावस्‍था 50 वर्ष तक होती है। इसके बाद वृद्धावस्‍था का आगमन होता है। जीवन को दो महत्‍वपूर्ण घटक प्रभावित करते हैं, जिनमें आनुवांशिकता और पर्यावरण शामिल हैं। पर्यावरण की परिस्थितियां जीवन को रोगों आदि के रूप में प्रभावित करती हैं। 

इस वर्ष 7 अप्रैल को विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य दिवस मनाया गया, जो बढ़़ती आयु एवं स्‍वास्‍थ्‍य पर आधारित था। इसकी विषयवस्‍तु गुड हैल्‍थ ऐड्स लाइफ टू इयर्स थी। अधिकतर देशों में जीवन बढ़ रहा है। इसका मतलब यह है कि वहां लोग अब ज्‍यादा दिनों तक जिंदा रहते हैं और वह एक ऐसी उम्र में पहुंच रहे हैं, जहां उन्‍हें स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाओं की सर्वाधिक आवश्‍यकता होती है। 

स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाओं में रोगों, बीमारी, चोटों और अन्‍य शारीरिक एवं मानसिक कमजोरी संबंधित बीमारियों का निदान, उपचार एवं रोकथाम शामिल है। स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाएं, दवाइयों, परिचर्या, फार्मेसी, संबंधित स्‍वास्‍थ्‍य सेवा, दांतों का उपचार एवं अन्‍य तरह की सेवाओं द्वारा प्रदान की जाती हैं। विभिन्‍न देशों, समूहों और समाजों में स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं की सुविधाएं भिन्‍न-भिन्‍न प्रकार की हैं, जो संबंधित देश की सामाजिक, आर्थिक एवं नीतिगत परिस्थितियों पर निर्भर करती हैं। विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन के अनुसार एक बेहतर स्‍वास्‍थ्‍य प्रणाली के लिए यह आवश्‍यक है कि वह ठोस निर्णयों एवं नीतियों पर आधारित हो, उसकी वित्‍तीय व्‍यवस्‍था मजबूत हो और बेहतरीन चिकित्‍सकीय व्‍यवस्‍था बनाई गई हो। 

देश की अर्थव्‍यवस्‍था में स्‍वास्‍थ्‍य सुविधा का महत्‍वपूर्ण स्‍थान है। 2008 में तमाम विकसित देशों में सकल घरेलू उत्‍पाद का औसतन नौ प्रतिशत स्‍वास्‍थ्‍य सुविधा उद्योग पर खर्च किया गया था। अमरीका में इस मद में सकल घरेलू उत्‍पाद का 16 प्रतिशत, फ्रांस में 11.2 प्रतिशत और स्विट्जरलैंड में 10.7 प्रतिशत खर्च किए जाते हैं। 

एक स्‍वस्‍थ और सामान्‍य वृद्धावस्‍था प्राकृतिक रूप से अंगों के ह्रास के द्वारा आती है। थकान बहुत जल्‍दी होती है, स्‍मृति कमजोर होती जाती है और आत्‍मशक्ति धीरे-धीरे कम होती जाती है। वृद्धावस्‍था में मानसिक स्थिति इस बात पर निर्भर होती है कि व्‍यक्ति विशेष अतीत में कितना प्रसन्‍न, कितना दयालु रहा। 

सामान्‍य वृद्धावस्‍था को तय करना बहुत कठिन काम है, क्‍योंकि एक तरफ जहां शारीरिक बदलाव होते रहते हैं, तो दूसरी तरफ बुढ़ापे की वजह से पुराने रोग सिर उठाने लगते हैं। रोगों से मुक्‍त वृद्धावस्‍था की कल्‍पना करना बहुत कठिन है और इसीलिए यह कहा जाता है कि ''वृद्धावस्‍था स्‍वयं एक रोग है''। 

कुछ बीमारियां ऐसी हैं, जो वृद्धावस्‍था में ज्‍यादा पैदा होती हैं, जैसे मधुमेह, कैंसर, हृदय रोग और किडनी संबंधी रोग। यह बीमारियां शरीर के विभिन्‍न भागों जैसे किडनी, मस्तिष्‍क और हृदय को प्रभावित करती हैं। 

विकासशील देशों में वृद्धों की संख्‍या तेजी के साथ बढ़ती जा रही है। वर्ष 1990 में विकासशील देशों में 60 वर्ष के आयु वाले लोगों की संख्‍या विकसित देशों की तुलना में बहुत बढ़ गई थी। वर्तमान संकेतकों के अनुसार एशिया में वृद्धों की संख्‍या विश्‍व की आधी से अधिक हो जाएगी और इसमें भारत और चीन का बड़ा हिस्‍सा होगा। 

2001 की जनगणना के अनुसार भारत में वृद्धों की संख्या सात करोड़ सत्तर लाख है जबकि 1961 में उनकी संख्या केवल दो करोड़ चालीस लाख थी। 1981 में यह बढ़कर चार करोड़ तीस लाख हो गई और सन् 91 में ये पाँच करोड़ सत्तर लाख तक पहुंच गई। भारत की आबादी में वृद्ध लोगों का अनुपात 1961 में 5.63 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2001 तक 7.5 प्रतिशत हो गया और 2025 तक यह 12 प्रतिशत तक हो जाने की संभावना है। सत्तर साल से अधिक आयु के वृद्ध जनों की संख्या जहां 1961 में अस्सी लाख थी वहीं वर्ष 2001 में यह बढ़कर दो करोड़ नब्बे लाख हो गई। भारतीय जनसंख्या के आंकड़े के अनुसार 1961 में शताब्दी पूरा करने वालों की संख्या 99 हज़ार दर्ज की गई, वहां 1991 में ये बढ़कर एक लाख अड़तीस हज़ार हो गई। 

भारत में 21 शताब्दी के पहले मध्य में आयु संबंधी परिदृश्य के आकलन के लिए अगले पचास वर्षों में वृद्धों की संख्या अनुमानित की गयी है। भारत के साठ और उससे अधिक आयु के वृद्धों की संख्या 2001 में 7 करोड़ 70 लाख से बढ़कर वर्ष 2031 में एक अरब 7 करोड़ 90 लाख पहुंच जाने की संभावना है और वर्ष 2051 तक 3 अरब 10 लाख तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया है। 70 साल से अधिक आयु के लोगों की संख्या में वर्ष 2001 से 2051 के बीच पाँच गुणा वृद्धि का अनुमान लगाया गया है। 

समाज में स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं चिंता की वजह है क्योंकि वृद्ध लोगों को युवाओं की अपेक्षा खराब स्वास्थ्य का सामना करना पड़ता है। शारीरिक बीमारी के अलावा अधिक आयु के लोगों को मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से पीड़ित होने की भी संभावना रहती है। अध्ययन से पता चला है कि अधिक आयु के लोग ज्यादातर खांसी से पीड़ित रहते हैं। (बीमारियों के अंतर्राष्ट्रीय वर्गीकरण के अनुसार ये टीबी, फेफड़े की सूजन, दमा, काली खांसी इत्यादि से जुड़ी खांसी होती है)। कमजोर दृष्टि, शरीर में रक्त की अल्पता और दाँत संबंधी समस्याओं से भी वे जूझते हैं। अधिक आयु होने से वृद्ध लोगों में बीमारी बढ़़ने और बिस्तर पकड़ लेने का अनुपात बढ़ता पाया गया है। शारीरिक अक्षमताओं में दृष्टि दोष और श्रवण शक्ति खत्म होना प्रमुख है। 

पहले राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण में 45 प्रतिशत वृद्ध किसी पुरानी बीमारी जैसे जोड़ों का दर्द और खांसी से पीड़ित पाये गये हैं। अन्य बीमारियों में रक्तचाप बढ़ना, हृद्य संबंधी बीमारी , मूत्र संबंधी रोग और मधुमेह है। वृद्धजनों की मृत्यु का ग्रामीण क्षेत्रों में एक प्रमुख कारण श्वास संबंधी गड़बड़ियां हैं जबकि शहरी क्षेत्रों में परिसंचार संबंधी गड़बड़ी का होना है। ग्रामीण सर्वेक्षण में बताया गया है कि लगभग पाँच प्रतिशत वृद्ध लोग बिस्तर से बिल्कुल हिल नहीं सकते जबकि अन्य 18.5 प्रतिशत लोग की सीमित गतिशीलता है। खराब स्वास्थ्य और अक्षमता की व्यापकता को देखते हुए वृद्ध लोगों में चिकित्सा सहायता संबंधी प्रावधानों के प्रति असंतोष पाया गया है। बीमार वृद्धजन पारिवारिक देखभाल से वंचित रहते हैं जबकि सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा भी उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपर्याप्त है। 

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण द्वारा प्रचारित आठ दीर्धकालीन बीमारियों में एक तिहाई वृद्ध जोड़ों के दर्द से पीड़ित हैं जबकि 20 प्रतिशत लोग खांसी और दस प्रतिशत लोग रक्तचाप से परेशान हैं। पाँच प्रतिशत से कम वृद्ध बवासीर, मधुमेह और कैंसर से पीड़ित बताये गये हैं। 

भारत में दो में से एक वृद्ध किसी न किसी एक पुरानी बीमारी से ग्रस्त हैं जिसके लिए दीर्धकालीन चिकित्सा की आवश्यकता है। 

(इस फीचर में व्यक्त उपरोक्त विचार लेखक के अपने हैं और आवश्यक नहीं किया है पत्र सूचना कार्यालय के विचार को परिलक्षित करे।) 

लेखक- नागपुर के एनईईआरआई संस्थान के वैज्ञानिक और पूर्व सहायक निदेशक हैं। (पीआईबी) 
09-अप्रैल-2012 18:57 IST

Monday, April 09, 2012

मांगन गया सो मर गया....!

पर मिलिए श्री जगदीश बजाब से जिन्होंने दूसरों के लिए यह मौत भी स्वीकारी 
माननीय श्री विजय चोपड़ा जी के साथ एक कार्यक्रम में जनाब जगदीश बजाज व अन्य 
रेल गाडी तेज़ी से अपनी मंजिल की तरफ बढ़ रही थी. रात गहराने लगी तो थके टूटे मुसाफिर भी सोने की तैयारी करने लगे.  उस डिब्बे में एक जोड़ी भी थी जिसमें पुरुष को बहुत ही जल्द गहरी नींद आ गयी थी. उसके साथ सफ़र कर रही महिला यात्री की आँखों में भी नींद अपना रंग दिखाने लगी. इतने में ही एक टिकट चैकर आया और उसने उस महिला से टिकट माँगा. महिला यात्री पुरुष के कंधे को झंक्झौरते हुए जोर से बोली जीजा जी जीजा जी. पुरुष हडबडा कर उठा और बोला क्या बात है. महिला ने चैकर की तरफ इशारा किया और कहा टिकट..! पुरुष कोई रेलवे मुलाजिम था, उसने झट से अपनी जेब में से एक पास निकाला और चैकर के हवाले कर दिया. पास देख कर चैकर बोला श्रीमान इस पास पर आप अपनी पत्नी के साथ तो सफ़र कर सकते हैं लेकिन साली के साथ नहीं. पुरुष यात्री ने टिकट चैकर की ने सारी बात समझ कर उसे पूरे विस्तार से समझाया कि जब उसकी पहली पत्नी का देहांत हुआ तो परिवार वालों ने मेरी दूसरी  शादी  उसीकी बहन के साथ कर साथ कर दी जो रिश्ते में मेरी साली ही लगती थी. इस तरह मेरी यह प्यारी सी साली मेरी पत्नी बन गयी पर मुझे जीजा जी कहने की आदत इसे अब तक पड़ी हुयी है सो यह अब भी मुझे जीजा जी ही कहती है. यह कहानी सुनाते हुए उस बुज़ुर्ग के चेहरे पर एक नयी चमक, होठों पर कुछ  रूमानी सी मुस्कान और आँखों में हल्की सी शरारत आ गयी. कहने लगे मुझे भी बस आदत सी पड़ी हुयी है....छूटती ही नहीं...मैंने पूछा कैसी आदत...तो कहने लगे...यही...मांगने की आदत....बस मुझे पता चल जाये कि इसकी जेब में पैसे हैं...फिर मैं उन्हें निकलवा ही लेता हूँ.... कई बार इस आदत को छोड़ना चाहा छोड़ना चाहा पर यह आदत जाती ही नहीं. साथ ही वह ये भी बताते हैं कि मांगना आसान नहीं होता. सब कि औरत बन के रहना पड़ता है. हजारों झमेले सामने आते हैं. कई बार ऐसा होता है कि लोग सब के सामने रसीद बुक से पर्ची तो कटवा लेते हैं पर पैसे दिए बिना चले जाते हैं. उस हिसाब को सम्भालना, फिर उनके चक्कर लगाना और उनसे पैसे निकलवाना...सब बहुत मुश्किल है पर मैं करता हूँ.गौर तलब है कि अब तो इस आदत के कारण ही उनके बहुत से किस्से कहानियां भी अख़बारों में भी छप चुके. टीवी चैनलों पर उनके प्रोग्राम भी दिखाए जा चुके लेकिन यह आदत कभी कम नहीं हुयी. वह इस वृद्ध अवस्था में भी सक्रिय हैं.
एक बार यह बुज़ुर्ग एक विशेष आग्रह पर महाराष्ट्र में रोटरी क्लब के एक कार्यक्रम में गए. बहुत जोर देने पर जब बोलने लगे तो वहां भी कहने लगे देखिये मुझे सब अनपढ़ समझते हैं लेकिन मैंने पीएचडी की हुयी है. वास्तव में यह एक ऐसा कार्यक्रम थ जिसमें सवाल जवाब भी साथ साथ हो रहे थे. सो इस वृद्ध व्यक्ति से भी सम्मान सहित सवाल किया गया कि आपने किस विषय में पीएचडी की है. वहां भी जनाब बिना किसी झिझक के जवाब देते हुए बोले जी मांगने में. मैं मांगने में एक्सपर्ट हूँ.  इसके बाद जैसे ही उन्होंने मांगने का कारण और लम्बे समय से चल रहा अपना  मिशन बताया तो वहां नोटों की बरसात होने लागिओ और देखते ही देखते  इस वृद्ध की झोली भर गयी. 
मेरी मुराद है लुधियाना के जानेमाने धार्मिक व्यक्ति जनाब जगदीश बजाज से जो गरीब बच्चों को पढाने के साथ साथ गरीब विधवा महिलायों को हर महीने राशन भी वितरित करते हैं.  गरीब लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कम्प्यूटर, सिलाई, कढाई और ब्यूटी पार्लर चलाने जैसे कई और प्रोजेक्ट भी चलाते हैं. यह सब होता है लुधियाना के सुभानी बिल्डिंग चोंक में स्थित ज्ञान स्थल मन्दिर में. इस चौंक  की कई इमारतों में फैले इस मन्दिर को इस तरह की मजबूती देने में जगदीश बजाज ने अपनी उम्र का एक बहुत सा हिस्सा इस तरफ लगा दिया.
मैंने एक बार पूछा बजाज साहिब लोग इस उम्र में आराम करते हैं और आप सारा सारा दिन काम. सुबह 9 नजे से लेकर मन्दिर के कार्यालय में बैठना दुखी लोगों के दुःख सुननाऔर फिर उनके कष्ट हरने के लिए मांगने के लिए निकल पड़ना. इस मिशन को लेकर फेसबुक जैसे मंच का इस्तेमाल भी बाखूबी करना...आखिर यह लगन आपको कहाँ से लगी. बजाज साहिब का चेहरा कुछ गंम्भीर हो गया.उनकी आँखें कहीं दूर अतीत में झाँकने लगीं. बस कुछ ही पलों का अंतराल और फिर बोले बात बहुत पुरानी है. हमने एक जागरण रखा था. मैं पंजाब केसरी पत्र समूह के मुख्य सम्पादक विजय चोपड़ा जी के पास गया और उन्हें निवेदन किया कि आप इस जागरण में मुख्य मेहमान बन कर आने की कृपा करें. उनके पास वक्त नहीं था और मैं उन्हें बार बार वक्त निकलने  के लिए विनती कर रहा था. इतने में ही दो महिलाएं वहां आयीं और विजय जी ने अपने किसी कर्मचारी को इशारा किया की इन्हें आटे की दो थैलियाँ  दे दो. इसके साथ ही विजय जी मुझे मुखातिब हो कर बोले अगर आप इस तरह का कोई काम करें तो मैं सुरक्षा का खतरा उठा कर भी वक्त ज़रूर निकालूँगा. मैंने उन औरतों का दर्द सुना तो मुझे अहसास हुआ कि यह काम कितना आवश्यक है.  मैंने तुरंत हाँ कर दी. इस तरह सितम्बर 1991 से केवल 51  विधवा महिलायों को राशन की राहत देने से शुरू हुआ यह सिलसिला आज भी जारी है. आज  यहाँ से राहत पाने वाली महिलायों की संख्या 51 से बढ़ कर 900 के आंकड़े को भी पार कर चुकी है.बहुत से नाम अभी प्रतीक्षा सूची में हैं.सन 2000 में यहाँ लडकियों को कम्प्यूटर सिखाने, सिलाई-कढाई सिखाने और ब्यूटी पार्लर चलाने जैसे काम भी सिखाये जा रहे हैं तांकि वे आत्म निर्भर हो सकें. 
अपने इस मिशन के लिए कई बार उन्हें इम्तिहान की घड़ियाँ  भी देखनी पड़ी. सन 2006 की 26  अप्रैल को उनकी धर्म पत्नी शांति देवी का हार्ट अटैक के कारण देहांत हो गया. रस्म क्रिया की तारीख भी आठ मई की निकली और विधवा महिलायों को राशन वितरित करने की तारीख भी पहले से ही आठ मई घोषित थी.दुःख और संकट की इस घड़ी में भी जगदीश बजाज ने कर्तव्य को नहीं भुलाया. क्रिया आठ की जगह छह मई को ही करली गई पर राहत के इस कार्यक्रम में कोई तबदीली नहीं की गयी. फिर सन 2010 में३० दिसम्बर के दिन उनकी एक बहू का देहांत हो गया. उस समय भी रस्म क्रिया  ८ जनवरी को आती थी लेकिन इस रस्म को भी दो दिन पूर्व अर्थात ६ जनवरी को ही पोर कर लिया गया ता कि आठ जनवरी को होने वाले र्स्शन वितरण कार्यक्रम में कोई भी तबदीली न हो.  मैंने कहा आप कैसे इंसान हैं...अपने परिवारिक सदस्य को अंतिम विदा कहने के लिए एक आध कार्यक्रम भी इध उधर नहीं कर सकते....मेरी बात सुन कर उन्होंने एक लम्बा सांस लिया और बोले मैं नहीं चाहता था कि जो इंसान इस दुनिय से चला गया उसका दिन मनाते समय कोई बद दुया दे या फिर यह कहे कि इस मौत ने तो हमारा काम चौपट कर दिया.
दुनियादारी  का इतना लिहाज़  और दुखी लोगों से इतनी गहरी सम्वेदना रखने वाले जगदीश बजाज का जन्म हुआ था १० अक्टूबर १९३५ को कामरेड राम किशन के पडोस में पड़ते एक मकान में. यह मकान कोट ईसे शाह में था. झंग का यह इलाका अब पाकिस्तान में है. सं 1947 में जब हालात बिगड़े तो इस परिवार को भी पाकिस्तान छोड़ना पड़ा. कभी अमृतसर, कभी जालंधर और कभी कहीं. गर्दिश के दिन थे. आखिर 1950 में लुधियाना में आ गये. तब से लेकर यहीं पर कर्म योग की साधना  में लगे हुए हैं. सरकारी नौकरी से अपना काम और फिर अपने काम से जन सेवा का यज्ञ. आज इस यज्ञ में योगदान देने वालों की संख्या भी बहुत बड़ी है और इससे राहत लेने वालों की संख्या भी. ज्ञान स्थल मन्दिर अब मानव सेवा संस्थान के तौर पर स्थापित हो चूका है. यहाँ सभी धर्मों के लोग बिना किसी भेद भाव के आते हैं.  अगर आप भी यहाँ आना चाहें तो आपका स्वागत है. आप कभी यहाँ आ सकते हैं.  --रेक्टर कथूरिया

ਬੇਬਸ ਜਿੰਦਗੀਆਂ ਨੂੰ ਨਵੀਂ ਸ਼ਕਤੀ ਦੇਣ ਵਿੱਚ ਸਰਗਰਮ ਜਗਦੀਸ਼ ਬਜਾਜ



दूसरों के लिए बार बार मरने वाला महान इन्सान: जगदीश बजाज


मांगना और दुःख के मारे ज़रूरतमंद लोगों में बाँट देना


Sunday, April 08, 2012

कचरा से बिजली बनाने के ज़हरीले कारखाने को हिमायत

भाजपा और कांग्रेस का समर्थ पूरी तरह जन विरोधी 
स्वास्थय, मजदूर और पर्यावरण विरोधी कदम के खिलाफ लोगों में रोष 
नई दिल्ली//गोपाल कृष्ण//Fri, Apr 6, 2012 at 8:04 PM
कचरा से बिजली बनाने वाली जानलेवा व प्रदूषणकारी कारखाने से ऐसे रसायन का उत्पादन होता है जिसे अमेरिका ने विअतनाम के खिलाफ इस्तेमाल रासायनिक हथियार के रूप में किया था. दिल्ली नगर निगम के चुनाव के दौरान जारी घोषणा पत्र में भारतीय जनता पार्टी ने कचरा से बिजली बनाने का वायदा किया है जो स्वास्थय, मजदूर और पर्यावरण विरोधी है जिसे भारतीय कांग्रेस पार्टी का समर्थन प्राप्त है. कचरा जलाने की तकनीकि की बदौलत यह बिजली का कूड़ा घर डाईआक्सीन का उत्सर्जन करेगी. डाईआक्सीन कैंसर के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक घोषित गंधक है. खतरनाक रसायनों को यह तकनीकि ने ठोस रूप प्रदान कर कई-कई रूपों में वायु प्रदुषण का हिस्सा बन जाता है. अब यह जहर केवल धरती या पानी में ही नहीं बल्कि हवा में भी तैरने लगता है. शहर के कूड़े में प्लास्टिक के अलावा पारा जैसे गंधक भी बहुतायत में निकलते हैं. वैज्ञानिक और व्यावसायिक बुद्धि को किनारे रख दें तो भी क्या हमें यह समझने में दिक्कत है कि प्लास्टिक और पारा के जलने से जो धुंआ निकलता है वह हमारे लिए लाभदायक है या हानिकारक?1997 में पर्यावरण मंत्रालय के अपने श्वेत पत्र में यह बात स्वीकार की गयी थी कि जिस तरीके से शहरी कूड़े को ट्रीट किया जा रहा था वह तकनीकि सही नहीं थी. अब वह सही कैसे हो गया.
भारतीय जनता पार्टी के दिल्ली विधान सभा के विपक्ष के नेता विजय कुमार मल्होत्रा ने लेफ्टिनेंट गवर्नर को एक पत्र में इस कारखाने को प्रदूषणकारी बताया था अब उन्ही की पार्टी इसी कारखाने को लाने का वायदा कर रही है.
दिल्ली के ओखला में २०५० मेट्रिक टन कूड़े से बिजली का कारखाना के अलावा नरेला-बवाना में ४००० मेट्रिक टन का और गाजीपुर में १३०० मेट्रिक टन के कारखाने का निर्माण जारी है. सरकार दिल्ली में ३ कचरा से बिजली बनाने के परियोजना को लागु कर रही है जिससे पर्यावरण को भारी मात्रा में नुकसान होता है.

ऐसे बिजलीघर न तो कूड़ा निपटाने के लिए बनते हैं और न ही बिजली पैदा करने के लिए. कारण कुछ और हैं. इन कारणों में एक कारण यह भी है कि प्रति मेगावाट की दर से सरकार दो स्तरों पर अनुदान देती है. यह एक करोड़ से डेढ़ करोड़ तक होता है. जिस काम को सरकार के अधिकारी ज्यादा रूचि लेकर प्रमोट करते हैं उसके कारण सबको समझ में आ जाते हैं. इस तकनीकि के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है. लेकिन जनता को इससे क्या मिलेगा? लोगों को बिजली तो मिलने से रही लेकिन जहां भी ऐसे प्लांट लगेंगे उनके आस पास के लोगों को कैंसर सौगात में मिलेगा.
आज दिली के लगभग 80% एरिया के काम को प्राइवेट कम्पनी के हाथों बेच दिया गया है लेकिन उसके बावजूद भी समस्या का हल नहीं हो पा रहा है दिल्ली में कचरे क़ि छंटाई के काम में असंगठित क्षेत्र के लगभग 3.5 लाख मजदूर शामिल है. कचरे का लगभग 20 से 25 प्रतिशत क़ि छंटाई हो जाती है. इनके द्वारा 30% कचरे क़ि छंटाई हो जाएगी जो कच्चे माल के रूप में दुबारा इस्तेमाल होगा और साथ ही 50% वैसा कचरा है जिसको जैविक कूड़ा कहते है उससे खाद बनाया जा सकता है. 80% भाग को समुदाय स्तर पर ही निपटारा हो सकता है.
सभी विकसित देशों ने ऐसी परियोजना को बंद कर चुकि है इसके मूल कारण रहे है क़ि इससे जहरीली गैस निकलती है जो जीवन व पर्यावरण के लिए काफी खतरनाक है और कचरे में वैसी जलने क़ि क्षमता नहीं है जिससे बिजली का उत्पादन किया जा सकता है भारत में पहली बार दिल्ली के तिमारपुर में कचरा से बिजली बनाने क़ि परियोजना 1990 में लगाया गया जो असफल रहा. ऐसे में भाजपा और कांग्रेस दोनों को बहिष्कार करना ही एक मात्र रास्ता दिख रहा है.