Saturday, August 13, 2016

देश भक्ति के गीतों पर स्कूली छात्रों संग झूमें राज्य मंत्री मदन लाल बग्गा

Sat, Aug 13, 2016 at 4:21 PM
स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य आयोजित हुई फैंसी ड्रैस प्रतियोगिता
लुधियाना: 13 अगस्त 2016: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो):  
एवरशाइन पब्लिक हाई स्कूल अशोक नगर में स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में फैंसी ड्रैस प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। देश भक्ति पर आधारित गीतों की धुनों पर राष्ट्र भक्ति के रंग में रंगे विद्यार्थीयों ने महात्मा गांधी, शहीद भगत सिंह, झांसी की रानी, जवाहर लाल नेहरु, सुभाष चंद्र बोस, अब्दुल कलाम, लाला लाजपत राय जैसे स्वतंत्रता सेनानियों की वेशभूषा धारण कर स्वंतत्रता संग्राम पर आधारित घटनाओं का मंचन कर तिंरगे को सलाम किया। राष्ट्रगान के साथ आरम्भ हुआ कार्यक्रम जैसे जैसे आगे बढ़ता गया वैसे वैसे बच्चों की तरफ से तिंरगे हाथों में लेकर प्रस्तुत गीतों मेरे देश की धरती उगले-उगले हीरे मोती..., वतन कर चले तुम्हारे हवाले साथियो..., मेरा रंग दे बंसती चोला माए मेरा रंग दे चोला... के स्वरों पर मस्त हुए समारोह के मुख्य मेहमान अकाली दल अध्यक्ष व राज्य मंत्री मदन लाल बगगा भी दर्शक दीर्घा में अध्यक्षीय भाषण में बचपन की यादों को ताजा करते हुए कहा कि मंच पर बच्चों को देश भक्ति के रंग में सरोकार देख उन्हें अपने बचपन के दिन याद आ गए। जब वह स्कूल में तिंरगे के साथ झूमते हुए इसी तरह कार्यक्रम में भाग लेते थे। इस दौरान बगगा ने प्रतियोगिता में अच्छा प्रर्दशन करने वाले विद्यार्थीयों को पुरस्कार भेंट कर प्रोस्ताहित कर बच्चों में देश भक्ति के जज्बें की भावना उजागर करने के लिए स्कूल प्रिंसीपल भरत दुआ सहित समूह स्टाफ की प्रंशसा करते हुए कहा कि बचपन में ही अगर बच्चों में देश भक्ति का जज्बा कायम हो जाए तो वह जिंदगी भर बरकरार रहता है। स्कूल प्रिंसीपल भरत दुआ और एवरशाइन ग्रुप आफ स्कूल के महासचिव मीनाक्षी आहुजा ने स्कूल के मेधावी छात्रों से मुख्यतिथि मदन लाल बगगा का परिचय करवा कर स्कूल की उपलब्धियों की जानकारी दी। एवरशाइन ग्रुप के आफ स्कूल के अध्यक्ष जे.पी.आहुजा, महासचिव मीनाक्षी आहुजा प्रिंंसीपल भरत दुआ, बिजली बोर्ड एक्सियन राम पाल, मोहित भूटानी, विवेक मनोचा, ललित, अशोक भूटानी, पंकज कौशल, रमेश लाल, स्कूल की प्रौजैक्ट डायरैक्टर सुखपाल कौर, सुरेश कुमारी, गीता, अचला शर्मा ने विद्यार्थीयों को स्वतंत्रता दिवस की बधाई दी।

Friday, August 12, 2016

जारी है पत्रकारों के साथ गुंडागर्दी का सिलसिला

Thu, Aug 11, 2016 at 7:47 PM 
नई वारदात हुई भदौड़ में-डीसी व डीएसपी ने कहा होगी कड़ी कार्रवाई
भदौड़ 07 अगस्त 2016(विजय जिंदल//पंजाब स्क्रीन):
गत दिनों डिप्टी कमीशनर बरनाला भुपिंदर सिंह राय ने एक बैठक के दौरान स्थानीय नगर कौसिल के अधिकारियों को नगर कौंसिल की हदूद के बाजारों व सड़कों में दिन व दिन हो रहे नाजायज कबजों को हटाने के लिए कड़े आदेश जारी किए थे। 

बरनाला के डीसी साहिब के आदेश का पालन करते हुए एसडीएम तपा राजपाल सिंह व स्थानीय नगर कौसिल के कार्यकारी अधिकारी राकेश कुमार ने कार्रवाई करते हुए वार्ड नं 11 की सरकारी खाई वाली जगह पर चल रही उसारी को अवैध बताते हुए रुकवाने की कोशिश की थी परंतु वार्ड के मौजूदा पार्षद परमजीत सिंह सेखों ने उक्त आधिकारियों को कहा कि हमारे पास नई उसारी करने के लिए अदालती आर्डर हैं जब एसडीएम तपा ने उनसे उक्त आर्डर की कापियां दिखाने के लिए कहा तो पार्षद प्रमजीत सिंह ने शाम को उपरोक्त अदालती आर्डर दिखाना का वादा कर लिया। इसके बाद सभी अधिकारी बिना कोई कार्रवाई किए वापस लौट गए। उपरोक्त सारे मामले की भदौड़ के पत्रकारों व्दारा की कवरेज अगले दिन जब समाचार पत्रों में छपी खबरों से ख़फ़ा एक पूर्व एमसी जो अब आम आदमी पार्टी का नेता है और विस क्षेत्र भदौड़ से एसएलए के टिक्ट के लिए अपनी दावेदारी भी जता रहा है ने अपने 25-30 के करीब व्यक्तियों को साथ लेकर पत्रकारों के घरों व दफ्तरों में जाकर विभिंन्न प्रकार की धमकीयां देना शुरू कर दिया।इसी सिलसिले में एक पंजाबी अख़बार के पत्रकार सुखविंद्र सिंह पलाहा पुत्र हरभजन सिंह के घर पहुँचे और उसकी खबर को गलत करार देते हुए गाली गलौच शुरू कर दिया जब सामने पत्रकार ने विरोध किया तो वे सभी मारपीट पर उतर आए पत्रकार सुखविंद्र सिंह इस मारपीट में गंभीर घायल हो गया और इधर उधर भाग कर अपनी जान बचाई। और हमलावरों के जाने के बाद पत्रकार को सिविल अस्पताल भदौड़ में भर्ती कराया गया और जांच के बाद गंभीर अवस्था को देखते हुए सिविल अस्पताल के डाक्टरों ने सुखविंद्र को आगे रफर कर दिया।
इकठ्ठा हुआ पत्रकार भाईचारा
पत्रकार पर हुए कातिलाना हमले का पता चलते ही समूचा पत्रकार भाईचारा इकठ्ठे होकर पुलिस थाना भदौड़ के प्रभारी अजायब सिंह व डीएसपी तपा राज कपूर से इंसाफ के लिए मिला तो पुलिस प्रसाशन ने भरोसा तदिया है कि पत्रकार पर हमला करने वाले आरोपीयों को जल्द से जल्द काबू कर लिया जाएगा। 
चार नामजद व्यक्तियों के नाम
सिविल अस्पताल में ईलाज के लिए भर्ती पत्रकार सुखविंद्र सिंह पलाहा ने पुलिस थाना भदौड़ के एएसआई परमजीत सिंह को दिए गए ब्यान में आम आदमी पार्टी के स्थानीय नेता व पूर्व पार्षद के अलावा बीस अन्य अज्ञात व्यक्तियों के नाम लिखवाए हैं।
आप पार्टी दिखा सकती है बाहर का रासता  
आम आदमी पार्टी के सर्कल भदौड़ के अध्यक्ष व राज्य सत्रीय लीगल सेल टीम के सदस्य कीर्त सिंगला से जब उनकी पार्टी के स्थानीय नेता व्दारा पत्रकार से की गई मारपीट के बारे में जब बातचीत की गई तो उन्होंने कहा कि मैं दो तीन दिनों से भदौड़ से बाहर था अभी ही भदौड़ आया हूं। और सारे मामले की पड़ताल कर पार्टी के उच्च नेताओं को रिर्पोट देकर कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

Tuesday, August 09, 2016

बेलन ब्रिगेड के साथ अब ई रिक्शा "ब्रिगेड"

Tue, Aug 9, 2016 at 12:30 PM
पहली महिला ई रिक्शा ड्राइवर यूनियन का गठन 
लुधियाना: 9 अगस्त 2016 :: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो):
जब लुधियाना सहित पूरा देश आज 9 अगस्त को भारत छोडो आंदोलन दिवस की याद में जगह जगह आयोजन आकर रहा था उस समय जानीमानी आर्किटेक्ट अनीता शर्मा समाज को एक नए स्वरूप में ढालने के मकसद से बनाये अपने ही नक्शों को पूरा करने के प्रयासों में जुटी थी। गौरतलब है कि 9 अगस्त देश की जनता की उस इच्छा की अभिव्यक्ति थी जिसमें उसने यह ठान लिया था कि हमें आजादी चाहिए और हम आजादी ले कर रहेंगे। इस भावना को आज के हालात से जोड़ते हुए आगे बढ़ाया बेलन ब्रिगेड ने। इस अवसर पर नैरा दिया गया---हमें आज़ादी चाहिए महिला सशक्तिकरण के खिलाफ साज़िशें रचने वालों से, हमें आज़ादी चाहिए इन नारो को खोखला बनाने वाले धोखेबाजों से, हमें आजादी चाहिए महिलायों का शोषण करने वालों से।   
उल्लेखनीय है कि हाल ही में शहर में शुरू की गई ई रिक्शा जो महिलाओ के द्वारा चलाई जा रही है और इन ई रिक्शा में महिला सवारियां ही बैठती है शुरू होते ही साज़िश का शिकार होने लगी। दो वर्ष पहले सामाजिक संस्था बेलन ब्रिगेड ने एक निजी ऑटो कम्पनी के साथ मिलकर लुधियाना के लिए यह योजना तैयार की थी और  फिर अगस्त महीने में लुधियाना प्रशासन के सहयोग से महिलाओ ने शहर में ई रिक्शा चलानी शरू की। इसका विधिवत उद्धघाटन 2 अगस्त की सुबह सर्कट हाऊस से हुआ था। 
इस प्रोजेक्ट के बारे में जानकारी देते हुए बेलन ब्रिगेड की अध्यक्ष अनीता शर्मा जो खुद आर्किटेक्ट व इंजीनियर है ने बताया कि महिलाओ का मनोबल बढ़ाने के लिए उन्होंने खुद पहले ऑटो रिक्शा चलाने की ट्रेनिंग ली ताकि अन्य महिलाये भी लोक लाज त्याग कर इस पुरुष प्रधान काम में आगे आये और जिससे  समाज में महिलाओ के प्रति बढ़ती असमाजिक सुरक्षा को दूर किया जा सके। 
महिलाओं की शक्ति व एकता को बढ़ाने की  लिए आज लुधियाना में बेलन ब्रिगेड  ई रिक्शा यूनियन का गठन किया गया  जिसमे अनीता शर्मा प्रधान, सीनियर प्रधान संजना सिंह, उपप्रधान नेहा किरण, सचिव कैशियर शशी सिंह, प्रोपोगंडा सेक्रेटरी माया,  कांता चंपा रीटा मीना व परवीन को कार्यकारी कमेटी में लिया गया। 
इस अवसर पर यूनियन की प्रधान अनीता शर्मा ने कहा उनका सपना था कि महिलाएं पुरुष प्रधान समाज में हर काम में पुरुषों के बराबर हिस्सा ले तभी नारी सशक्तिकरण होगा उन्होंने कहा कि नारी जब तक अपने पैरो पर खुद स्टैंड नहीं करेगी तब तक समाज में नारी का रुतबा नहीं बढ़ेगा।  महिलाओ के कार्य में पुरुषो की दखलअंदाज़ी नहीं होनी चाहिए और महिलाए अपने कार्य का खुद निर्णय करे क्या सही है क्या गलत है  इसलिए ई रिक्शा में पुरुषो की दखलअंदाज़ी रोकने, महिलाओ को ई रिक्शा चलाने में आने वाली परेशानियो को रोकने के लिए महिला ई रिक्शा यूनियन का गठन किया गया है। बेलन ब्रिगेड ई रिक्शा यूनियन महिलाओ को ई रिक्शा चलाने के लिए लुधियाना में फ्री ट्रेनिंग देंगी जो महिलाये ई रिक्शा सीखना चाहती है वे इस हेल्प लाइन नंबर 9814370369 पर फ़ोन करे। 
अनीता शर्मा, उनकी सहयोगी संजना और अन्य महिलायों ने स्पष्ट किया है कि हम अपने काम में पुरुषों  की साज़िशें और दख़लन्दाज़ी सहन नहीं करेंगी। उन्हने कहा कि स्वयम्भू पुरुष नेतायों से हमारा हाथ जोड़कर विनम्र निवेदन है कि महिला सशक्तिकरण के सपने को साकार होने दें। इस ऐतिहासिक परियोजना की पीठ में छुरा न घोंपे। यदि उन्हें हमारा यह विनम्र निवेदन समझ नहीं आया तो हम बेलन उठाने से गुरेज़ नहीं करेंगी। मां दुर्गा की पूजा हमें अपने अधिकारों की जंग के लिए लगातार शक्ति देती है। 

Monday, August 08, 2016

विशेष लेख//गज़लो-गीतों ने दिलाई आजादी//*अनिल चमड़िया


08-अगस्त-2016 13:50 IST
ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ आंदोलनों के लिए न मालूम कितने गीत लिखें गए
दुनिया में जब भी ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ आंदोलनों के लिए न मालूम कितने गीत लिखें गएकिसी ऐसे आंदोलन को याद करते हैं जिन आंदोलनों में मनुष्य अपने ऊपर थोपे गए कई बंधनों से मुक्ति के लिए एकजूट होता है तो उस आंदोलन का कोई न कोई गीत याद आने लगता है। यही वास्तविकता है कि कोई भी आंदोलन गीतों के बिना पूरा नहीं होता है। काव्य धारा के कई रूप हैं और वे कविता, नज्म़, गज़ल, गीत आदि के रूप में जाने जाते हैं। बल्कि यूं भी कहा जाए कि नारे भी अपनी काव्यत्मकता से ही यादगार बन पाते हैं। ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ आंदोलनों के लिए न मालूम कितने गीत लिखें गए। इस विषय पर कई शोध हुए हैं लेकिन तमाम तरह के शोधों के बावजूद ये लगता है कि वे उस दौरान लिखे गए सभी गीतों को समेट नहीं पाए।
लेखक-अनिल चमड़िया 
आमतौर पर दो चार गीतों को हम दोहराते हैं। उनमें उर्दू के प्रसिद्ध शायर इक़बाल का वह गीत जिसमें वे कहते हैं कि सारे जहां से अच्छा , हिन्दोस्तां हमारा। हम बुलबुले है इसकी , ये गुलसितां हमारा। इसी हिन्दोस्तां को हिन्दुस्तान के रूप में प्रचारित किया गया है। इक़बाल 1938 में ऐसे ही जोश खरोश से भरे गीत लिखकर दुनियां से विदा हो गए। दरअसल ब्रिटिश सत्ता के विरोध में आजादी के संग्राम के गीतों की ये विशेषताएं थी कि उनमें सात समंदर पार के शासकों की ज्यादतियों का एहसास कराया जाए। लेकिन इसके साथ ये भी जरूरी था कि अपने भीतर की अच्छाई और सुदंरता के विभिन्न पहलूओं की तस्वीर लोगों के सामने खींची जाए। इक़बाल हिन्दोस्तां हमारा गीत में ही लिखते हैं कि गोदी में खेलती है उसकी हजारों नदियां, गुलशन है जिनके दम से रश्के –जिनां हमारा।

गुलामी का एहसास कराना, स्वतंत्रता की चाहत पैदा करना, स्वतंत्रता के लिए सामूहिकता की भावना पैदा करना, उस सामूहिकता की ताकत का एहसास कराना और सबसे महत्वपूर्ण कि आपस की दूरियों को दूर करना और उन दूरियों को विविधता के रूप में पहचान कराकर उन्हें अपनी ताकत बताना, ये सब एक साथ जब कोई रचनाकार करता है तो उसकी राष्ट्रीय़ गीतकार के रूप में स्वीकार्यता हो जाती है। केवल इकबाल अपनी रचनाओं में ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ संघर्ष और अपने लोगों के बीच एकता विकसित करने की चुनौती से नहीं जूझ रहे थे बल्कि हर वह रचनाकार ऐसी चुनौती से जुझ रहा था जो कि भारत को एक लेकिन सभी भारतवासियों के राष्ट्र के रूप में निखारने के सपने देख रहा था। वंशीधर शुक्ल लिखते हैं कि

बिस्मिल , रोशन , लहरी, मौं.अशपाक अली से वीर

आजादी लेने निकले थे, फांसी चढ़े अखीर

शक्ति अनतोली निकली। सिर बांधे कफनवा।

कैप्टन राम सिंह लिखते है- कदम कदम बढाए जा

खुशी के गीत गाए जा

यह जिंदगी है कौम की

तू कौम पर लुटाए जा, बढ़ाए जा।

भारतीय समाज जातियों, धर्मों और दूसरे तरह के आपसी विभाजनों से जूझता रहा है। इन विभाजनों को दूर करने की लड़ाई सदियों से होती रही है। भक्तिकालीन साहित्य में भी यह चुनौती देखने को मिलती है। ब्रिटिश सत्ता विरोधी आंदोलनों के लिए लोगों को घरों से निकालना था और उन्हें यह एहसास कराना था कि इंसानी जिदंगी समाज को जीवंत बनाए रखने की शर्त के साथ जुड़ी है। इसीलिए उस आंदोलन में शामिल होने वाला सैनानी फांसी पर चढ़ते हुए भी लोगों के भीतर मौत का भय नहीं पैदा करता था बल्कि लड़ने के लिए प्रेरित करता था। इस तरह की प्रेरणा केवल और केवल साहित्य ही कर सकता है। कल्पना करें कि स्वंतत्रता की लड़ाई की अगुवाई करने वालों के साथ इन गीतों का साथ नहीं होता तो लोगों को नींद से जगाना और सक्रिय करना लगभग असंभव होता।

वंशीधर शुक्ल खूनी पर्या गीत में कहते हैं कि-

तुम्हीं हिंद में सौदागर आए थे टुकड़े खाने, मेरी दौलत देख देख के, लगे दिलों में ललचाने, लगा फूट का पेड़ हिंद में अग्नी ईष्या बरसाने, राजाओं के मंत्री फोड़े , लगे फौज को भड़काने. तेरी काली करतूतों का भंडा फोड़ कराऊंगा, जब तक तुझको ......

स्वतंत्रता संग्राम की खास बात यह देखी जाती है कि इसने घर-घर में गीत-सैन्य तैयार किए। यानी हर घर में गीत लिखने वाले सैनिक तैय़ार किए। इसीलिए बहुत सारे गीत ऐसे मिलते हैं जिनके रचनाकार के बारे में शोधकर्ताओं को जानकारी नहीं मिलती। दरअसल यहां सैनिक के रूप गीतकार का अर्थ इसी रूप में लेना चाहिए कि जैसे सैकड़ों सैनिक हथियारों से लड़ते-लड़ते शहीद हो जाते हैं और उनके नाम सबकी जुबां तक नहीं पहुंच पाते हैं। दरअसल यही भावना होती है जो कि समाज में परिवर्तन की लड़ाई को अंजाम देने और उनमें सफलता की भावना को सुनिश्चित करती है। एक अज्ञात रचना में गीतकार कहता है कि उठो नौजवानों न रहने कसर दो , विदेशी का अब तो बहिष्कार कर दो, मुअस्सर जहां नहीं पेटभर है दाना . गुलामी में मुश्किल हुआ सर उठाना । रंग दे बसंती चोला , मायी नी रंग दे बसंती चोला वाला जो गीत अक्सर जन भागीदारी वाले कार्यक्रमों में सुनाई देता है उस गीत के भी रचनाकार के बारे में शायद ही कोई जानता हो। वास्तव में उस रचना का रचनाकार अज्ञात है।

दरअसल स्वतंत्रता आंदोलन के कुछ गीत लोगों के बीच लोकप्रिय है लेकिन बहुत बड़ी संख्य़ा में गीत हैं जिन्हें आमतौर पर सुना व पढ़ा नहीं जाता है। आंदोलन के गीतों की खासियत यह भी होती है कि एक गीत कोई लोकप्रिय होता है तो उसकी तर्ज पर कई-कई गीतों की रचना आम लोग करने लगते हैं। मसलन जन गण मन गीत की तरह ही एक अज्ञात रचनाकार लिखते हैं कि शुभ सुख चैन की वर्षा बरसे , भारत भाग है जागा , पंजाब, सिंध , गुजरात, मराठा,द्रविड़,उत्कल-बंग/चंचल सागर , विंध्य हिमालय नीला यमुना गंगा.....। इसी तरह वंदे मातरम शीर्षक वाले अज्ञात गीतकार लिखते हैं कि सरचढ़ो के सिर में चक्कर उस समय आता जरूर, काम में पहुंची जहां झनकार वंदे मातरम। एक ही गीत से कई-कई गीत निकलते रहे हैं। इन गीतों में एक और विशेषता यह देखी जाती है कि हर तरह के काम धंधे करने वाले लोगों के अनुकूल गीत तैयार करने की कोशिश की जाती थी। चकोर लिखते है कि दुखिया किसान हम है, भारत के रहने वाले. बेदम हुए, न दम है , बेमौत मरने वाले । आखिर पंक्ति में लिखते है – ए मौज करने वालो, कर देंगे हश्र बरपा, उभरे चकोर जब भी, हम आह भरने वाले।

गीतों को ब्रिटिश सत्ता अपना सबसे बड़ा शत्रु मानती थी। वह लड़ने वालों के खिलाफ जेल,लाठी गोली का तो इस्तेमाल करती ही थी वह गीतों को भी सलाखों में डालने का इंतजाम करती थी। गीत यानी कलात्मक तरीके से जमीनी हकीकत को बयां करने और उसे लड़ने के लिए प्रेरित करने वाली अभिव्यक्ति  से घबराकर ही सरकार ने एक कानून बनाया था जो कि आज भी बरकरार है, जिसके तहत गीतकारों, नाटककारों और दूसरे तरह की साहित्यिक गतिविधियों में शामिल होने वाले वाले रचनाकारों को जेल के अंदर डाला जाता था और गीतों को जब्त कर लिया जाता था। ब्रिटिश सत्ता ने जिस अनुपात में लोगों को जेलों के भीतर डाला उसी अनुपात में गीत भी जब्त किए। इनमें एक गीत राम सिंह का है- मेरे पुत्रों को यह पैगाम दे देना ज़रा बेटा, मर मिटो देश की खातिर, मेरे लख़्ते-जिगर बेटा। दूसरा गीत कुंवर प्रतापचन्द्र आजाद का है -बांध ले बिस्तर , फिरंगी, राज अब जाने को है, ज़ुल्म काफ़ी कर चुके, पब्लिक बिगड़ जाने को है।  

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं एवं वे महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के जन संचार विभाग में प्रोफेसर व भारतीय जन संचार संस्थान में हिन्दी पत्रकारिता के प्रशिक्षक रहे हैं।)

***