Monday, March 25, 2013

मास्को और बीजिंग: सदा मित्र, शत्रु कभी नहीं !

दुनिया को दिया गया है एक स्पष्ट संदेश 
                                                      © Photo: «The Voice of Russia»
"मेरी रूस यात्रा के परिणाम मेरी सारी उम्मीदों से भी कहीं अच्छे निकले हैं"। यह बात चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अपनी मास्को यात्रा के दौरान कही। वास्तव में, चीनी नेता द्वारा की गई रूसी राजधानी की यात्रा फलदायक रही है। अपनी इस यात्रा के दौरान उन्होंने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पूतिन, प्रधानमंत्री दिमित्री मेदवेदेव, संसद के दोनों सदनों के स्पीकरों- सेर्गेय नरीश्किन और वलेन्तिना मत्वेयेन्का से बैठकें कीं जो अति कामयाब रहीं। अपनी रूस यात्रा के दौरान शी जिनपिंग रूस के रक्षामंत्री सेर्गेय शोइगू से भी मिले जिन्होंने अपने चीनी मेहमान को रूसी सेना का संचालन नियंत्रण केंद्र देखने के लिए आमंत्रित किया। शी जिनपिंग ऐसे पहले विदेशी नेता हैं जिनके लिए रूसी सेना की इस मुख्य कमान पोस्ट के दरवाज़े खोले गए। चीनी नेता रूस के युवा लोगों से मिले और उन्होंने मास्को के अंतर्राष्ट्रीय संबंध संस्थान के छात्रों को एक व्याख्यान भी दिया।

रूस दुनिया का पहला देश है जिसकी चीनी राष्ट्रपति के रूप में शी जिनपिंग ने राजकीय यात्रा की है। इस प्रकार, दुनिया को एक स्पष्ट संदेश दिया गया है कि बीजिंग रूस के साथ अपने संबंधों के विकास को प्राथमिकता देता है। मास्को ने चीनी नेता के इस क़दम का ऊँचा मूल्याँकन किया है। रूसी-चीनी वार्ता का उद्घाटन करते हुए रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पूतिन ने कहा कि यह यात्रा दोनों देशों के बीच संबंधों के इतिहास में एक नए अध्याय की शुरूआत है। चीनी नेता को संबोधित करते हुए व्लादिमीर पूतिन ने कहा-

चीन के राष्ट्रपति पद के लिए चुने जाने पर मैं आपको हार्दिक बधाई देता हूँ। आपने अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए हमारे देश को चुना है। इसके लिए हम आपको धन्यवाद देते हैं। यह इस बात का एक स्पष्ट सबूत है कि चीन और रूस एक दूसरे के साथ संबंधों के विकास पर कितना ध्यान दे रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में हमने इन संबंधों के विकास के लिए बहुत कुछ किया है। और आज ये संबंध दुनिया की राजनीति में एक प्रमुख कारक बन गए हैं। आदरणीय राष्ट्रपति जी, मेरा विश्वास है कि आपकी यह यात्रा रूसी-चीनी संबंधों के विकास को एक नया मोड़ प्रदान करेगी।

चीनी नेता की इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच सभी क्षेत्रों में सहयोग से संबंधित दस्तावेज़ों के एक बड़े पैकेज पर हस्ताक्षर किए। रूस के सबसे बड़े विदेश व्यापार बैंक वी.ई.बी, प्रत्यक्ष निवेश कोष, रूसी-चीनी निवेश कोष और चीनी निवेश निगम के बीच एक बड़े समझौते पर हस्ताक्षर किए गए हैं, जिसके अंतर्गत रूस के सुदूर-पूर्व में मूलभूत सुविधाओं के निर्माण से संबंधित परियोजनाओं और अन्य परियोजनाओं को कार्यरूप देने के लिए अरबों डॉलर का निवेश किया जाएगा। ऊर्जा का क्षेत्र- दो देशों के बीच सहयोग की एक रणनीतिक दिशा है। रूस की गैस कंपनी “गाज़प्रोम” और चीनी पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन के बीच हुए एक ज्ञापन-समझौते के तहत चीन को रूसी प्राकृतिक गैस की आपूर्ति की जाएगी। इस सिलसिले में “गाज़प्रोम” के प्रमुख अलेक्सेय मीलर ने कहा-

इस दस्तावेज़ का एक रणनीतिक महत्त्व है। दोनों पक्षों ने तय किया है कि रूस से चीन को गैस की आपूर्ति के लिए "साइबेरिया की शक्ति" नामक गैस पाइपलाइन के पूर्वी मार्ग को प्राथमिकता दी जाएगी। इस समझौते की अवधि 30 साल होगी। इसके अंतर्गत चीन को रूसी गैस की सप्लाई वर्ष 2018 में शुरू की जाएगी। चीन के लिए रूसी गैस की वार्षिक आपूर्ति की मात्रा फ़िलहाल 38 अरब घन मीटर निर्धारित की गई है। लेकिन इस मात्रा को 60 अरब घन मीटर तक बढ़ाने का भी प्रावधान किया गया है। दोनों पक्ष आगामी जून माह में कानूनी रूप से बाध्यकारी शर्तों संबंधी एक अनुबंध पर हस्ताक्षर करेंगे और इस वर्ष के अंत तक लंबी अवधि के एक मूलभूत अनुबंध पर हस्ताक्षर करने की हमारी योजना है।

रूस के प्रधानमंत्री दिमित्री मेदवेदेव के साथ शी जिनपिंग की बैठक का अधिकांश समय बंद दरवाज़े के पीछे ही गुज़रा। चीनी नेता ने पत्रकारों की उपस्थिति में यह भी कहा कि वह अपनी रूस यात्रा के परिणामों से बेहद खुश हैं। मास्को के अंतर्राष्ट्रीय संबंध संस्थान के छात्रों को संबोधित करते हुए चीनी नेता ने कहा-

आजकल चीनी राष्ट्र का महान कायाकल्प किया जा रहा है। यह इतिहास के आधुनिक चरण में चीनी जनता का एक सबसे महत्वाकांक्षी सपना है। हम इसे "चीनी सपना" कहते हैं। यह चीन को एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाने, राष्ट्रीय पुनरुद्धार करने और जनता का कल्याण करने का सपना है। पिछली सदी में चीनी जनता को बहुत दुख झेलने पड़े हैं, बाहरी हमलों तथा घरेलू उथल-पुथल का सामना करना पड़ा है। इसलिए चीनी जनता को पता है कि शांति का कितना बड़ा महत्त्व होता है। हमें अपने लोगों का जीवन स्तर ऊँचा करने के लिए शांतिपूर्ण माहौल की ज़रूरत है।

मास्को और बीजिंग के बीच वर्तमान संबंधों का उल्लेख करते हुए शी जिनपिंग ने कहा कि आज की दुनिया में रूस और चीन के बीच सबसे घनिष्ठ संबंध मौजूद हैं। चीनी नेता ने इन संबंधों का सार बताते हुए कहा- "हम सदा के लिए एक दूसरे के मित्र हैं और शत्रु कभी नहीं बनेंगे।"


मास्को और बीजिंग: सदा मित्र, शत्रु कभी नहीं !

.........ऐसे थे हमारे अहिंसावादी गांधी

भारत की आजादी का सेहरा गांधी के सिर बांधना सच्चाई से मजाक ?
From: Harpreet Singh ਹਰਪ੍ਰੀਤ ਸਿੰਘ
मार्च 1931 को शहीद-ए-आजम भगतसिंह
को फांसी के तख्ते पर ले जाने
वाला पहला जिम्मेवार सोहनलाल वोहरा हिन्दू
की गवाही थी ।
यही गवाह बाद में इंग्लैण्ड भाग गया और वहीं पर
मरा । शहीदे आजम भगतसिंह को फांसी दिए जाने
पर अहिंसा के महान पुजारी गांधी ने कहा था, ‘‘हमें
ब्रिटेन के विनाश के बदले
अपनी आजादी नहीं चाहिए ।’’ और आगे कहा,
‘‘भगतसिंह की पूजा से देश को बहुत हानि हुई और
हो रही है । वहीं इसका परिणाम
गुंडागर्दी का पतन है । फांसी शीघ्र दे दी जाए
ताकि 30 मार्च से करांची में होने वाले कांग्रेस
अधिवेशन में कोई बाधा न आवे । ” अर्थात्
गांधी की परिभाषा में
किसी को फांसी देना हिंसा नहीं थी ।
इसी प्रकार एक ओर महान्
क्रान्तिकारी जतिनदास को जो आगरा में
अंग्रेजों ने शहीद किया तो गांधी आगरा में ही थे
और जब गांधी को उनके पार्थिक शरीर पर
माला चढ़ाने को कहा गया तो उन्होंने साफ इनकार
कर दिया अर्थात् उस नौजवान द्वारा खुद को देश
के लिए कुर्बान करने पर भी गांधी के दिल में
किसी प्रकार की दया और सहानुभूति नहीं उपजी,
ऐसे थे हमारे अहिंसावादी गांधी ।
जब सन् 1937 में कांग्रेस अध्यक्ष के लिए
नेताजी सुभाष और गांधी द्वारा मनोनीत
सीताभिरमैया के मध्य मुकाबला हुआ तो गांधी ने
कहा यदि रमैया चुनाव हार गया तो वे
राजनीति छोड़ देंगे लेकिन उन्होंने अपने मरने तक
राजनीति नहीं छोड़ी जबकि रमैया चुनाव हार गए
थे। इसी प्रकार गांधी ने कहा था, “पाकिस्तान
उनकी लाश पर बनेगा” लेकिन पाकिस्तान उनके
समर्थन से ही बना । ऐसे थे हमारे सत्यवादी गांधी ।
इससे भी बढ़कर गांधी और कांग्रेस ने दूसरे विश्वयुद्ध
में अंग्रेजों का समर्थन किया तो फिर क्या लड़ाई में
हिंसा थी या लड्डू बंट रहे थे ? पाठक स्वयं
बतलाएं ? गांधी ने अपने जीवन में तीन आन्दोलन
(सत्याग्रहद्) चलाए और तीनों को ही बीच में
वापिस ले लिया गया फिर भी लोग कहते हैं
कि आजादी गांधी ने दिलवाई ।
इससे भी बढ़कर जब देश के महान सपूत उधमसिंह ने
इंग्लैण्ड में माईकल डायर को मारा तो गांधी ने
उन्हें पागल कहा इसलिए नीरद चौ० ने
गांधी को दुनियां का सबसे बड़ा सफल
पाखण्डी लिखा है । इस आजादी के बारे में
इतिहासकार सी. आर. मजूमदार लिखते हैं – “भारत
की आजादी का सेहरा गांधी के सिर
बांधना सच्चाई से मजाक होगा । यह कहना उसने
सत्याग्रह व चरखे से आजादी दिलाई बहुत
बड़ी मूर्खता होगी । इसलिए
गांधी को आजादी का ‘हीरो’ कहना उन
सभी क्रान्तिकारियों का अपमान है जिन्होंने देश
की आजादी के लिए अपना खून बहाया ।”
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शहादत दिवस पर लुधियाना में भी हुआ जलसे का आयोजन

समाजवादी भारत के निर्माण  से ही गरीबों की जिन्दगी बेहतर बन सकेगी
इंकलाबी शहीदों के सपनों को साकार कर के हो होगा समाजवादी भारत का निर्माण 
लुधियाना: 24 मार्च। (रेक्टर कथूरिया)  शहीदों के विचारों को उलझाने और शहीदों के सपनों को धुंधलाने की अनगिनत कुचेष्टायों के बावजूद आम जनता पर शहीदों के विचारों का रंग जोर पकड़ रहा है। अश्लीलता की आंधी, गुंडागर्दी का ज़ोर और साम्प्रदायिकता के बहकावे शहीदों के विचारों का तूफ़ान रोक नहीं सके। इस बार शहीदों को याद करने के आयोजन केवल 23 मार्च तक सीमित नहीं रहे बल्कि बहुत पहले से शुरू होकर बाद तक भी जारी रहे। लुधियाना की पुडा ग्राऊंड में हुआ आयोजन भी इसी  सिलसिले की ही एक कड़ी था। जलसे के रूप में हुए इस आयोजन के ज़रिये स्पष्ट कहा गया कि ‘‘जिस आज़ादी की जंग में हिस्सा लेते हुए शहीद भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरू ने भरी जवानी में फाँसी का फन्दा चूमा था वह आज़ादी अभी नहीं आई है। भगतसिंह और उनके साथियों का मकसद एक ऐसे भारत का निर्माण था जिसमें हर व्यक्ति सम्मानजनक जीवन जी सके, जहाँ रोटी-कपड़ा-मकान से लेकर स्वास्थ्य, आराम, मनोरंजन आदि सभी बुनियादी जरूरतें पूरी हो सकें। जहाँ हर किसी को शिक्षा हासिल हो सके, हर हाथ को रोजगार मिल सके।’’
यह शब्द आज पुडा मैदान में भारत के महान क्रान्तिकारी शहीदों को समर्पित शहादत दिवस जलसे में टेक्सटाइल हौजरी कामगार यूनियन के नेता राजविन्दर ने कही। उन्होंने कहा कि भगतसिंह और उनके साथियों ने बार बार यह चेतावनी दी थी कि सिर्फ अंग्रेजी गुलामी से छुटकारा हासिल कर लेने से ही भारत के करोड़ों श्रमिकों की जिन्दगी में बुनियादी तबदीली आने वाली नहीं है। उन्होंने अनेकों बार यह स्पष्ट किया था कि सामन्ती-पूँजीवादी व्यवस्था की जगह जब तक समाजवादी आर्थिक-राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था स्थापित नहीं हो जाती तब तक साधारण जनता की आजादी नहीं आ सकेगी। 
नौजवान भारत सभा के कनवीनर छिन्दरपाल ने इस विशाल जन जलसे को संबोधित करते हुए कहा कि आज नौजवान गन्दी, अश्लील संस्कृति व नशों में डुबो दिए गए हैं। यह इतिहास का बेहद अन्धकारमय दौर है। हमें भगतसिंह के कहे अनुसार आज के गतिरोधित दौर में इन्सानियत की रूह में नयी स्पीरिट पैदा करने के लिए जोरदार कोशिशें करनी होंगी। उन्होंने सभी इंकलाबपसंद, तबदीली पसंद युवाओं-श्रमिकों को शहीद भगतसिंह और उनके साथियों के सपनों के भारत के निर्माण के लिए आगे आने का आह्वान किया।
जलसे को सम्बोधित करते हुए कारखाना मकादूर यूनियन के कनवीनर लखविन्दर ने कहा कि आज विश्व पूँजीवादी व्यवस्था अतिरिक्त उत्पादन के अटल और असाध्य संकट में बुरी तरह से घिरा हुआ है। मुनाफे की अन्धी दौड़ की वजह से पैदा हुए इस संकट का सारा बोझ जिस तरह पिछले समय में हुक्मरान मेहनतकश जनता पर डालते आए हैं, वही अब भी हो रहा है और भविष्य में यह हमला और बड़े स्तर पर होगा। इसकी वजह से आने वाले दिनों में महँगाई, छँटनियाँ, तालाबन्दियाँ, बेरोजगारी, गरीबी, भुखमरी तेकाी से बढ़ेगी। उन्होंने कहा कि पूँजीवादी हुक्मरान जनता के सम्भावित प्रतिरोध आन्दोलनों को कुचलने के लिए धर्म, जाति, इलाके, राष्ट्र, देश आादि के जरिए जनता में फूट डालने, ध्यान असल मुद्दों से भटकाने आदि साजिशें तेका कर चुके हैं। जनता को इन सभी साजिशों को नाकाम करते हुए विशाल व जुझारू आन्दोलन संगठित करने होंगे।
तर्कशील शमशेर नूरपुरी ने जादू के ट्रिक पेश किए और लोगों के सामने यह बात स्पष्ट की कि विभिन्न पाखण्डियों द्वारा दैवी शक्तियों के मालिक होने के किए जाते दावे पूरी तरह झूठ हैं। उन्होंने सिद्ध किया कि दैवी शक्तियाँ हाथ की सफाई से अधिक और कुछ नहीं होतीं। लोगों को इनके झाँसों में नहीं आना चाहिए और विज्ञान से अगुवाई लेनी चाहिए।
राजविन्दर और साथियों ने क्रान्तिकारी गीतों के जरिए इंकलाबी शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की। टेक्सटाइल हौजरी कामगार यूनियन के ताज मुहम्मद ने क्रान्तिकारी कविताएँ पेश कीं।
मंच संचालन लखविन्दर ने किया। अमर शहीदों का संग्राम जारी रखने का संकल्प लेते हुए गगनभेदी नारों के साथ शहादत दिवस जलसे का समापन हुआ।   

कारखाना मकादूर यूनियन, के संयोजक लखविन्दर से सम्पर्क करने के लिए मोबाईल नम्बर-9646150249 

मऊ फिल्म उत्सव: सफ़र का पांचवां पड़ाव

Sun, Mar 24, 2013 at 11:04 PM
चले चलो कि वोह मंजिल अभी नहीं आई---

एक वक्त था जब नया दौर, मदर इण्डिया, जागते रहो, मजदूर, नमक हराम जैसी फिल्मों ने एक नी चेतना के प्रचार प्रसार में अपना योगदान दिया था। यह सिलसिला अधिक समय तक नहीं चला था की जन विरोधी शक्तियों ने सिनेमा को अपना हथियार बना कर जनता पर वार किया। इसके परिणाम बहुत घातक भी निकले पर जल्द ही जन शक्तियां सम्भल गई। सफदर हाशमी की शहादत ने इसमें एक नी जान डाली। पंजाब में भाई मन्ना सिंह के नाम से जाने जाते गुरशरण सिंह जी ने मोर्चा सम्भाला---जो उनका देहांत होने के बाद भी जोर शोर से जारी है। अब एक अच्छी खबर आई है अयोध्या से जहाँ मऊ फिल्म उत्सव:जरी है। जन सिनेमा के सफ़र का पांचवां पड़ाव जारी है। आज इस आयोजन का अंतिम दिन है।

गौरतलब है कि अयोध्या फिल सोसायटी के बाद मऊ फिल्म सोसायटी का गठन 2008 के एक सम्मेलन के दौरान हुई बातचीत के चलते हुआ, जब साथी अरविन्द ने इस दिशा में सक्रिय कदम उठाते हुए 23 मार्च 2009 को अन्य साथियों के साथ मिलकर अपने गांव साहूपुर में पहला मऊ फिल्म उत्सव आयोजित किया। इस तरीके से मऊ फिल्म उत्सव की शुरुआत हुई। यह आयोजन शाम को शुरू होकर देर रात तक चलता है जिसमें सार्थक फिल्मों के जरिये आम लोगों से संवाद कायम करने की कोशिश की जाती है। पहले फिल्म उत्सव के दौरान आनंद पटवर्धन की फिल्म 'जंग और अमन' के प्रदर्शन के दौरान साझी विरासत के दुश्मनों ने पत्थरबाज़ी की थी जिससे हमें और ताकत मिली व अपने अभियान में हमारा विश्वास मज़बूत होता गया।
मऊ का अपनी साझी विरासत का शानदार इतिहास रहा है, लेकिन साम्प्ररदायिक ताकतें यहां की आबोहवा में मज़हबी ज़हर घोलने की साजिश में लगातार लगी रहती हैं। इन तमाम अवरोधों के बावजूद गांवों से शुरू हुआ यह सफर लगातार आगे बढ़ता जा रहा है और आज यह अपने पांचवें साल में प्रवेश कर गया है। गांव में उत्सव की पुरानी परम्परा को सहेजते हुए इस बार मऊ जिले के देवकली, पतिला और सलाहाबाद में तीन दिवसीय आयोजन इतिहास का गवाह बनने जा रहा है, जहां 'शहादत से शहादत तक' नामक आयोजन 23 से 25 मार्च 2013 के बीच सफलता पूर्वक जारी है। यह तीन दिवसीय आयोजन शहीद-ए-आज़म भगत सिंह के शहादत दिवस से गणेश शंकर विद्यार्थी के शहादत दिवस तक हो रहा है। इस बार का फिल्म उत्सव समर्पित है इरोम शर्मिला को जो आज के इस लोकतन्त्र पर एक बहुत बढ़ा सवाल बन उभरी है। अपनी महानता के ढोल पीटने वालों की पोल खोलती इरोम शर्मिला। सत्ता और राजनीती की हकीकत को बेनकाब करती इरोम शर्मिला के अथक संघर्ष को है। 

मऊ फिल्म उत्सव में शामिल होने के लिए देश भर से हमारे पास हर रोज़ फोन आ रहे हैं जिससे हमारा हौसला बढ़ा है। हम आप सभी को खुले दिल से आमंत्रित करते हैं। बहुत से लोग समय पर पता न लग पाने के कारण इसमें शामिल नहीं हो पाए। पर इन सभी ने अपनी प्रसन्नता भी व्यक्त की और शुभ कामनाएं भी भेजीं। 

इस ढांचे को और बेहतर बनाने की ज़रूरत है। अपने ऊर्जावान और उत्साही साथियों की मदद से यह कारवां अपने शुरुआती तेवर के साथ दिन-ब-दिन आगे बढ़ता जा रहा है। इस सफ़र से जुड़ने के लिए हमें और नये साथियों की ज़रूरत है। उनका रास्ता खुला हुआ है, वे जब और जैसे आएं, हम उनका तहेदिल से स्वागत करते हैं। उम्मीद है की इस बार का आयोजन इस जन सिनेमा के काफिले को और विशाल करेगा। आयी हम सभी मिलजुल कर चलें। याद रखें और लगातार सबको याद दिलाते जायें---
चले चलो कि वोह मंजिल अभी नहीं आई----


प्रदर्शित फिल्में
Tales from the Margins/Kavita Joshi/23 min
 AFSPA,1958/Haobam Paban Kumar/76 min
 Inqilab/Gauhar Raza/40 min
 Jai Bim Comrade/Anand Patwardhan/199 min
 Children of Heaven/Majid Majidi/ 89 min
 Gaon Chodab Nahin/KP Sasi/5:18 sec

Garm Hava/ MS Sathyu/146 min
 Bawandar/Jag Mundhra/125 min
 India Untouched/Stalin K/108 min

Thursday, March 21, 2013

यूएनआई के 52वें वार्षि‍क समारोह में हुई विस्तृत चर्चा

21-मार्च-2013 19:44 IST
मीडिया में वायर से जुड़ी और अधि‍क न्‍यूज एजेंसि‍यों की आवश्‍यकता
                    --सूचना और प्रसारण मंत्री श्री मनीष ति‍वारी ने कहा कि‍ इसकी अत्‍यधि‍क संभावनाएं 
सूचना और प्रसारण मंत्री श्री मनीष ति‍वारी ने मीडि‍या क्षेत्र की बढती संभावनाओं और समाचार के क्षेत्र में सूचना के प्रवाह को देखते हुए देश भर में वायर से जुड़ी और समाचार एजेंसि‍यां स्‍थापि‍त करने की आवश्‍यकता बताई है। उन्‍होंने कहा कि‍ इसकी अत्‍यधि‍क संभावनाएं हैं क्‍योकि‍ ये एजेंसि‍यां उप-क्षेत्रीय, क्षेत्रीय और राष्‍ट्रीय स्‍तर पर सूचना के प्रवाह को बनाए रखती हैं। समाचार एजेंसि‍यों की संख्‍या बढ़ने से न केवल स्‍थानीय खबरें राष्‍ट्रीय स्‍तर पर पहुंचेंगी बल्‍कि‍ इससे ये एजेंसि‍यां राष्‍ट्रीय और स्‍थानीय स्‍तर पर समाचार के प्रसार में संतुलन स्‍थापि‍त कर पाएंगी। सूचना के पहुंचाने में वि‍वि‍धता को देखते हुए ऐसी व्‍यवस्‍था से स्‍थानीय मुद्दों को वि‍शि‍ष्‍टता से राष्‍ट्रीय स्‍तर पर पहुंचाया जा सकेगा। सूचना और प्रसारण मंत्री ने आज दि‍ल्‍ली में यूनाइटेड न्‍यूज ऑफ इंडि‍या के 52वें वार्षि‍क समारोह को संबोधि‍त करते हुए ये बात कही। 

श्री ति‍वारी ने वहन कि‍ए जाने वाले राजस्‍व मॉडल की रूप रेखा तैयार करने की तत्‍काल आवश्‍यकता बताई। डि‍जीटलीकरण प्रक्रि‍या का जि‍क्र करते हुए उन्‍होंने कहा कि‍ यह प्रसारण क्षेत्र में पारदर्शि‍ता तथा दीर्घकालीन टि‍काउ प्रक्रि‍या लाने का प्रयास है जि‍ससे सभी संबंद्ध पक्षों को मदद मि‍लेगी। उन्‍होने कहा कि‍ नई मीडि‍या और त्‍वरि‍त संचार व्‍यवस्‍था के आगमन के साथ ही राजस्‍व मॉडलों को उन मापदंडों के बारे में भी वि‍चार करना होगा जो वि‍भि‍न्‍न दर्शक/श्रोता वर्गों के लि‍ए हों।


यूएनआई के 52वें वार्षि‍क समारोह में हुई विस्तृत चर्चा 
वि. कासोटिया/अजीत/सुजीत-1539

INDIA: १६५ ग्राम अनाज का खाद्य सुरक्षा क़ानून

An Article by the Asian Human Rights Commission               March 20, 2013
क्या १६५ ग्राम अनाज से भुखमरी और कुपोषण दूर होगा? --सचिन कुमार जैन
आप खुद ही सोच लीजिये क्या १६५ ग्राम अनाज से भुखमरी और कुपोषण दूर होगा? पर भारत की सरकार ऐसा ही मानती है. खाद्य सुरक्षा में दालें और खाने का तेल शामिल नहीं है; क़ानून बन रहा है पर भ्रष्टाचार करने वालो के लिए इसमे लगभग खुली छूट है क्योंकि इसमे अपराध गैर-जमानती गंभीर अपराध नहीं है, फिर भले ही यह भूख-कुपोषण से मौत का कारण क्यों न बने; यह भूख से मुक्ति के बजाये कंपनियों के फायदे कमाने का बड़ा साधन बनेगा क्योंकि इसमे बच्चों के पोषण में ठेकेदारों के लिए खूब मौके दिए गए है. भ्रष्ट सरकार की मंशा सामने आ गयी है. १९ मार्च २०१३ को केबिनेट ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक को मंज़ूरी दे दी है. देश के दस राज्यों ने मांग की थी कि इस क़ानून में देश की पूरी जनसँख्या को शामिल किया जाए और केवल उस तबके को बाहर रखा जाय जो अमीर है, चार पहिया वाहन चलता है, सुनिश्चित रोज़गारधारी है और आयकर का भुगतान करता है. गरीबों की पहचान करने के बजाये अमीरों की पहचान करना आसान होगा. इस मान से देश की १२ से १४ प्रतिशत जनसँख्या खाद्य सुरक्षा क़ानून के फायदों से वंचित की जाती. संकट यह है कि केबिनेट द्वारा पारित विधेयक में यह कहा गया है कि देश की ६७ प्रतिशत जनसँख्या को खाद्य सुरक्षा का कानूनी मिलेगा और सभी राज्यों एक समान ६७ प्रतिशत जनसँख्या को ही गरीब माना जाएगा. इस मान से देश में विकास का चमकदार चेहरा बन कर उभरे गुजरात और केरल को उत्तरप्रदेश और बिहार के बारबरी में रखा जा रहा है. पिछडे हुए बिहार को विशेष राज्य का दर्ज़ा दिलाने के लिए १७ मार्च को दिल्ली में महारैली करने वाले नितीश कुमार और उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री ने खुद प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर कहा कि गरीबी के मामले में सभी राज्यों को एक तराजू पर तोलना गलत है. यानी गरीबी की रेखा से सम्बंधित अब तक चली आ रही समस्याएं बरकरार रहेंगी. तमिलनाडु सरकार ने तो यहाँ तक कहा था कि हमें इस क़ानून के दायरे से बाहर राखए क्योंकि हम पहले से ही इससे कहीं व्यापक हक वाली योजना चला रहे हैं.
वैज्ञानिक मानकों के अनुसार एक वयस्क व्यक्ति को १४ किलो अनाज, ८०० ग्राम तेल और डेढ़ किलो दाल की हर माह जरूरत होती है. सरकार उन्हे इसके एवज में केवल ५ किलो अनाज देगी. इसमे दो बहुत बड़े संकट हैं. पहला – देश की ७७ प्रतिशत जनसँख्या को अब भी अपनी आय का ७० प्रतिशत हिस्सा केवल भोजन के लिए खर्च करते रहना पड़ेगा. यानी उन पर मंहगाई और भुखमरी का भार बना रहेगा. दूसरा – कुपोषण भी बना रहेगा क्योंकि प्रोटीन की जरूरत को पूरा करने के लिए दालों और वसा की जरूरत को पूरा करने के लिए खाने के तेल का सरकार ने कोई प्रावधान नहीं किया है. इसका मतलब यह भी है कि सरकार दालों और खाने के तेल के बाज़ार को लाभ कमाने की पूरी छूट दिए रहना चाहती है, फिर भले ही कोग कुपोषण के शिकार बने रहें. यह दर्दनाक बात है कि सर्वोच्च न्यायालय में यह निर्देश दिया हुआ है कि हर परिवार (औसत ५ सदस्य) को ३५ किलो राशन का हक है. इस तरह एक सदस्य को ७ किलो राशन हर माह पाने का हक है. सरकार क़ानून बना कर उसे २ किलो कम कर रही है.
जिस देश में आधी महिलायें, दो तिहाई किशौरी बालिकाएं खून की कमी की शिकार हैं, जहाँ महिलाओं को समाज अपने शरीर और प्रजनन सम्बन्धी निर्णय लेने का हक़ नहीं देता है, वहां सरकार स्त्री और बच्चों को ही इसके लिए अपराधी मानते हुए भोजन के हक़ सीमित कर रही है. यह स्थिति मातृत्व मृत्य का बड़ा कारण है. हमारी सरकार ने तय किया है कि अब किसी भी परिवार में पहले दो बच्चों को ही जिन्दा रहने का हक़ होगा, इसीलिए उसने पहले दो बच्चों के जन्म पर ही मातृत्व हक़ देने का फैसला किया है. यह सरकार समाज के चरित्र को समझती ही नहीं है कि उसका यह प्रावधान महिलाओं और बच्चों के जीवन के खिलाफ है. दो बच्चों के प्रावधान हो हटाया जाना चाहिए था.
एक झूठ और कहा गया है. सरकार का कहना है कि इससे सब्सिडी बिल ९०००० करोड़ से बढ़ कर १.३५ लाख करोड़ हो जाएगा. सच यह है कि अब भी सरकार जनसँख्या की २००१ के जनगणना आंकड़ों का उपयोग न करके वर्ष २००० की अनुमानित जनसँख्या की आंकड़ों का उपयोग करती है. जिसके कारण २ करोड़ परिवार सस्ते राशन के अधिकार से वंचित हैं. यदि ईमानदारी से सही जनसँख्या आंकड़ों का उपयोग किया जाए तो सरकार का सब्सिडी खर्चा १.१३ लाख करोड़ तक पंहुच जाता है. यह राशि सरकार द्वारा कार्पोरेट्स और बाज़ार को दी जाने वाली ६ लाख करोड़ की सालाना रियायत का २० फीसदी से भी कम है. आज अपने सकल घरेलु उत्पाद का लगभग २० प्रतिशत ही करों के रूप में सरकार के पास आता है, जबकि विकसित देशों में लगभग ५० प्रतिशत हिस्सा करों के रूप में सरकारी खजाने में आता है. सरकार अब भी इस सच को स्वीकार नहीं कर रही है और उन्हे करो में छूट दिए जा रही है, जिन्हे यह छूट नहीं दी जाना चाहिए. और बाद में बहाना बनाया जाता है कि भूख से मुक्ति के लिए क़ानून पर खर्च करने के लिए पैसा नहीं है. उत्पादन यानी की खेती को संरक्षण, विकेन्द्रीकृत खरीदी, भण्डारण और वितरण को अब भी मुख्य विधेयक में जगह नहीं दी गयी है.यह परिशिष्ट में दर्ज है, जिसे बिना संसद की अनुमति के नौकरशाह भी हटा सकता है या बदल सकता है. यानी सरकार अनाज के आयात के पक्ष में है और नहीं चाहती है कि यह क़ानून देश में किसानों के संकट के निवारण का एक औज़ार बने. बिना किसानों और उत्पादन प्रणाली का स्थानीयीकरण किये हम अपने आर्थिक संसाधनों का सही प्रबंधन नहीं कर पायेंगे. यह सरकार को समझना चाहिए. सच तो यह है कि सरकार अनाज के बदले नकद हस्तांतरण यानी पैसा देने की नीति लाने की कोशिश में जुटी हुई है ताकि खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश की नीति को आधार देने का काम किया जा सके. सरकार ६७ प्रतिशत जनसँख्या को नकद राशि देगी ताकि वो खुले बाजार में जाएँ और निजी बहुराष्ट्रीय खुदरा कंपनियों से अनाज खरीदें. इस्सका सीधा मतलब यह है कि सरकार का एक लाख करोड रूपया सीधा इन बड़ी कंपनियों के पास जाएगा; किसानों के पास नही.
सरकार हमें शुद्ध और सुरक्षित भोजन देने के बजाये भोजन का रासायनिकीकरण कर रही है. वह जी एम् तकनीक और फोर्टीफिकेशन से भोजन का उत्पादन करवाना चाहती है ताकि बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लाभ कमाने का ज्यादा अवसर मिल सके और किसान संकट में आकर अपनी खेती को छोड़ दें, जिससे कम्पनियाँ जमीन, जंगल और पानी पर कब्ज़ा कर पायें.
यह अच्छा है कि विधेयक में अनाज की अभी कीमतें बहुत कम रखी गयी हैं, जिससे लोगों को लाभ तो होगा पर अनाज की मात्रा कम कर दी गयी है जिससे उन्हे शेष अनाज ऊँची कीमत पर खुले बाज़ार से खरीदना होगा. एक मायने से इस विधेयक में जो प्रावधान हैं वे भुखमरी के तात्कालिक कारणों को तो छूते हैं, परन्तु भूख के मूल सवालों को अब भी नज़रंदाज़ करते हैं. यह विधेयक कुपोषण की शर्म से हमें मुक्ति नहीं दिला पायेगा.
About the Author: Mr. Sachin Kumar Jain is a development journalist, researcher associated with the Right to Food Campaign in India and works with Vikas Samvad, AHRC's partner organisation in Bophal, Madhya Pradesh. The author could be contacted atsachin.vikassamvad@gmail.com Telephone: 00 91 9977704847
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About AHRC: The Asian Human Rights Commission is a regional non-governmental organisation that monitors human rights in Asia, documents violations and advocates for justice and institutional reform to ensure the protection and promotion of these rights. The Hong Kong-based group was founded in 1984.

Tuesday, March 19, 2013

19-मार्च-2013 20:05 IST
सोशल मीडिया पर मौजूदगी से एआईआर समसामयिक रुख से तालमेल बिठाने में सक्षम- मनीष तिवारी

सूचना एंव प्रसारण मंत्री श्री मनीष तिवारी ने आज एआईआर उर्दू सेवा, एफएम गोल्‍ड, एआईआर यूट्यूब चैनल और एआईआर समाचारों के लिए एनड्रायड आधारित मोबाइल फोन सेवा से संबंधित आकाशवाणी के नए मीडिया प्‍लेटफार्मों की शुरूआत की। 

इस मौके पर श्री तिवारी ने कहा कि सोशल मीडिया प्‍लेटफार्मों पर एआईआर की उपस्थिति देशभर में इसकी पहुंच बढ़ाने की दिशा में एक महत्‍वपूर्ण कदम है। इस कदम से सोशल मीडिया प्‍लेटफार्मों पर 24 घंटे मौजूद श्रोताओं तक पहुंच बढ़ाने में आकाशवाणी को काफी मदद मिलेगी। इससे आकाशवाणी को सोशल मीडिया में समसामयिक रूख के साथ तालमेल बिठाने में भी मदद मिलेगी। सोशल मीडिया का इस्‍तेमाल करते हुए लोग दुनिया के किसी भी हिस्‍से में एआईआर की सामग्रि‍यों से रूबरू हो सकते है। एआईआर प्रसारण के इतिहास में यह एक महत्‍वपूर्ण कदम है क्‍योंकि जीवंत वेब प्रसारण से सार्वजनिक प्रसारणकर्ताओं को एक नया माध्‍यम भी मिल रहा है। इस पहल से एआईआर के श्रोताओं को बटन की एक क्‍लि‍क के साथ ही पलक झपकते ही एआईआर की सामग्री तक पहुंच हो जाएगी। 

एआईआर न्‍यूज नेटवर्क से खबरें प्राप्‍त करने के लिए विकसित एनड्रायड आधारित मोबाइल सेवा के संबंध में श्री तिवारी ने कहा कि घरेलू और विदेशी श्रोताओं तक समाचार और सूचनाएं पहुंचाने के अलावा यह नवीन तकनीक आवाज के रूप में लोगों तक क्षेत्रीय भाषाओं में राष्‍ट्रीय और क्षेत्रीय समाचार बुलेटि‍न पहुंचाने में मदद करेगा। श्री तिवारी ने एनड्रायड तकनीक के जरिए समाचार आधारित विशेष प्रोगाम विकसित करने के लिए एआईआर की सराहना की। 

इस कार्यक्रम में सूचना एवं प्रसारण सचिव, प्रसार भारती के अध्‍यक्ष, प्रसार भारती के मुख्‍य कार्यकारी अधिकारी और मंत्रालय एवं प्रसार भारती के अन्‍य वरिष्‍ठ अधिकारी भी मौजूद थे।
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वि.कासेाटिया/अनिल/रामकिशन-1470

Friday, March 15, 2013

राष्ट्रीय संगोष्ठी का चैथा दिन

‘जाति प्रश्न और माक्र्सवाद’ पर चर्चा जारी 
जाति व्यवस्था आज सामंती ताकतों की नहीं, पूजीवाद की सेवा कर रही है 
चंडीगढ़, 15 मार्च। आज सामन्ती शक्तियां नहीं बल्कि पूंजीवादी व्यवस्था जातिप्रथा को जिन्दा रखने के लिए जिम्मेदार है और यह मेहनतकश जनता को बांटने का एक शक्तिशाली राजनीतिक उपकरण बन चुकी है। इसलिए यह सोचना गलत है कि पूंजीवाद और औद्योगिक विकास के साथ जाति व्यवस्था स्वयं समाप्त हो जाएगी।
‘जातिप्रश्न और माक्र्सवाद’ विषय पर भकना भवन में जारी अरविंद स्मृति संगोष्ठी के चैथे दिन आज यहां पेपर प्रस्तुत करते हुए ‘आह्वान’ पत्रिका के संपादक अभिनव सिन्हा ने यह बात कही। ‘जाति व्यवस्था संबंधी इतिहास लेखन’ पर केंद्रित अपने आलेख में उन्होंने जातिप्रथा के उद्भव और विकास के बारे में सभी प्रमुख इतिहासकारों के विचारों की विवेचना करते हुए बताया कि जाति कभी भी एक जड़ व्यवस्था नहीं रही है, बल्कि उत्पादन संबंधों में बदलाव के साथ इसके स्वरूप और विशेषताओं में भी बदलाव आता रहा है।
उन्होंने कहा कि प्राचीन भारत में वर्ण व्यवस्था का उदय अभिन्न रूप से समाज में वर्गों, राज्य और पितृसत्ता के उदय से जुड़ा हुआ है। अपने उद्भव से लेकर आजतक जाति विचारधारा शासक वर्गों के हाथ में एक मजबूत औजार रही है। यह गरीब मेहनतकश आबादी को पराधीन रखती है और उन्हें अलग-अलग जातियों में बांट देती है। पूंजीवाद ने जातिगत श्रम विभाजन और खान-पान की वर्जनाओं को तोड़ दिया है लेकिन सजातीय विवाह की प्रथा को कायम रखा है, क्योंकि पूंजीवाद से इसका कोई बैर नहीं है। 
इससे पहले, कल शाम के सत्र में दिल्ली विश्वविद्यालय की शिवानी ने ‘जाति, वर्ग और अस्मितावादी राजनीति’ विषय पर और सोशल साइंसेज स्टडीज़ सेंटर, कोलकाता के प्रस्कण्व सिन्हाराय ने ‘पश्चिम बंगाल में जाति और राजनीति: वाम मोर्चे का बदलता चेहरा’ विषय पर पेपर प्रस्तुत किए।
शिवानी ने अपने पेपर में कहा कि पहचान की राजनीति जनता के संघर्षों को खंड-खंड में बांटकर पूंजीवादी व्यवस्था की ही सेवा कर रही है। जातीय पहचान को बढ़ावा देने की राजनीति ने दलित जातियों और उपजातियों के बीच भी भ्रातृघाती झगड़ों को जन्म दिया है। जाति, जेंडर, राष्ट्रीयता आदि विभिन्न अस्मिताओं के शोषण-उत्पीड़न को खत्म करने की लड़ाई को साझा दुश्मन पूंजीवाद और साम्राज्यवाद की ओर मोड़नी होगी, और यह काम वर्गीय एकजुटता से ही हो सकता है।
श्री सिन्हाराय ने बंगाल में नामशूद्रों से निकले मतुआ समुदाय की राजनीतिक भूमिका की चर्चा करते हुए कहा कि वाम मोर्चे ने 1947 के बाद मतुआ शरणार्थियों की मांगों को मजबूती से उठाया था, लेकिन बाद में वाम मोर्चे पर हावी उच्च जातीय भद्रलोक नेतृत्व ने न केवल उनकी उपेक्षा की, बल्कि मतुआ जाति का दमन भी किया। पिछले चुनावों में कई इलाकों में वाम मोर्चे की हार का यह भी कारण था।
पर्चों पर जारी बहस में हस्तक्षेप करते हुए सुखविन्दर ने कहा कि जाति व्यवस्था को सामंती व्यवस्था के साथ जोड़कर देखने से न तो दुश्मन की सही पहचान हो सकती है और न ही संघर्ष के सही नारे तय हो सकते हैं। वास्तविकता यह है कि आज भारत में दलितों के शोषण का आधार पूंजीवादी व्यवस्था है। जमीन जोतने वाले को देने का नारा आज अप्रासंगिक हो चुका है।
लेखक शब्दीश ने कहा कि ब्राह्मणवाद के विरुद्ध अपनी नफरत के कारण अंबेडकर उपनिवेशवाद की साजिश को समझ नहीं पाए। दलित उत्पीड़न को लेकर अंबेडकर की पीड़ा सच्ची थी, लेकिन केवल पीड़ा से कोई मुक्ति का दर्शन नहीं बन सकता।
संहति से जुड़े शोधकर्ता एवं एक्टिविस्ट असित दास ने अपने आलेख पर उठे सवालों का जवाब देते हुए कहा कि यह सोचना होगा कि दमन-उत्पीड़न के खिलाफ दबे हुए गुस्से को हम वर्गीय दृष्टिकोण किस तरह से दे सकते हैं।
नेपाल राष्ट्रीय दलित मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष तिलक परिहार ने कहा कि साम्राज्यवाद आज भी फूट डालो राज करो की नीति के तहत पूरी दुनिया में अस्मिताओं की राजनीति को बढ़ावा दे रहा है। नेपाल में दलितों के बीच हजारों एनजीओ सक्रिय है जिन्हें अरबों डालर की फंडिंग मिलती है। लेकिन वहां अधिकांश दलित कम्युनिस्टों के साथ खड़े हैं।
बातचीत में आईआईटी, हैदराबाद के प्रोफेसर एवं कवि लाल्टू, कोलकाता से आए अनन्त आचार्य, मुंबई से आए लेखक पत्रकार प्रभाकर, नेपाल से आई संतोषी विश्वकर्मा, डा.दर्शन खेड़ी, बेबी कुमारी, संदीप, लश्कर सिंह आदि ने भी बहस में हस्तक्षेप किया। बहस इतनी सरगर्म रही कि कल सत्र का समय खत्म हो जाने के बाद भी रात ग्यारह बजे तक चर्चा जारी रही। 
आज के सत्र की अध्यक्षता नेपाल के प्रसिद्ध साहित्यकार निनु चपागाईं, वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता कश्मीर सिंह और ‘प्रतिबद्ध’ के संपादक सुखविंदर ने की। मंच संचालन नौजवान भारत सभा के तपीश मैंदोला ने किया।

Thursday, March 14, 2013

मार्क्सवाद कोई जड़ दर्शन नहीं है

क्रांति के बिना दलित मुक्ति नहीं हो सकती 
दलितों की व्यापक भागीदारी के बिना भारत में क्रांति संभव नहीं
चंडीगढ़, 14 मार्च। चर्चित लेखक व विचारक डा आनन्द तेलतुंबड़े ने आज यहां कहा कि दलित मुक्ति के लिए डा. अंबेडकर के सारे प्रयोग एक ‘‘महान विफलता’’ में समाप्त हुए और जाति प्रथा के विनाश के लिए आन्दोलन को उनसे आगे जाना होगा।
‘जाति प्रश्न और मार्क्सवाद’ विषय पर भकना भवन में चल रही अरविन्द स्मृति संगोष्ठी के तीसरे दिन अपना वक्तव्य रखते हुए डा.तेलतुंबड़े ने कहा कि आरक्षण की नीति से आज तक सिर्फ 10 प्रतिशत दलितों को ही फायदा हुआ है। इसका एक कारण यह भी है कि डा. अंबेडकर ने आरक्षण की नीति को सही ढंग से सूत्रबद्ध नहीं किया। उन्होंने कहा कि क्रांति के बिना दलित मुक्ति नहीं हो सकती और दलितों की व्यापक भागीदारी के बिना भारत में क्रांति सम्भव नहीं।
डा. तेलतुंबड़े ने कहा कि भारत के वामपन्थियों ने मार्क्सवाद को कठमुल्लावादी तरीके से लागू किया है जिससे वे जाति समस्या को न तो ठीक से समझ सके और न ही इससे लड़ने की सही रणनीति विकसित कर सके। संगोष्ठी में प्रस्तुत आधार पत्र की बहुत सी बातों से सहमति जताते हुए भी उन्होंने कहा कि अंबेडकर, फुले या पेरियार के योगदान को खारिज करके सामाजिक क्रांति को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।
उन्होंने कहा कि अंबेडकर ने मार्क्सवाद का गहन अध्ययन नहीं किया था, लेकिन उनके मन में उसके प्रति गहरा आकर्षण था। हमें मार्क्स और अंबेडकर आंदोलनों को लगातार एक-दूसरे के करीब लाने के बारे में सोचना होगा। इसके लिए सबसे जरूरी है कि दलितों पर अत्याचार की हर घटना पर कम्युनिस्ट उनके साथ खड़े हो।
‘आह्वान’ पत्रिका के संपादक अभिनव ने डा. अंबेडकर के वैचारिक प्रेरणा स्रोत अमेरिकी दार्शनिक जॉन डेवी के विचारों की विस्तृत आलोचना प्रस्तुत करते हुए कहा कि वे उत्पीड़ित वर्गों की मुक्ति का कोई मुकम्मल रास्ता नहीं बताते। वे ‘एफर्मिटिव एक्शन’ के रूप में राज्य द्वारा कुछ रियायतों और कल्याणकारी कदमों से आगे नहीं जाते। यही बात हम अंबेडकर के विचारों में भी पाते हैं। आनन्द तेलतुंबड़े के वक्तव्य की अनेक बातों से असहमति व्यक्त करते हुए अभिनव ने कहा कि अंबेडकर के सभी प्रयोगों की विफलता का कारण हमें उनके दर्शन में तलाशना होगा। सामाजिक क्रांति के सिद्धांत की उपेक्षा करके अंबेडकर केवल व्यवहार के धरातल पर प्रयोग करते रहे और उनमें भी सुसंगति का अभाव था। 
अभिनव ने कहा कि दलित पहचान को कायम करने और उनके अन्दर चेतना और गरिमा का भाव जगाने में डा. अंबेडकर की भूमिका को स्वीकारने के साथ ही उनके राजनीतिक-आर्थिक-दार्शनिक विचारों की आलोचना हमें प्रस्तुत करनी होगी।
आईआईटी हैदराबाद के प्रोफेसर और प्रसिद्ध साहित्यकार लाल्टू ने कहा कि मार्क्सवाद कोई जड़ दर्शन नहीं है, बल्कि नये-नये विचारों से सहमत होता है। मार्क्सवादियों को भी ज्ञानप्राप्ति की अनेक पद्धतियों का प्रयोग करना चाहिए और एक ही पद्धति पर स्थिर नहीं रहना चाहिए। प्रोफेसर सेवा सिंह ने कहा कि अंबेडकर का मूल्याकंन सही इतिहास बोध के साथ किया जाना चाहिए। साथ ही इस्लाम पर अंबेडकर के विचारों की भी पड़ताल करने की जरूरत है। 
पंजाबी पत्रिका ‘प्रतिबद्ध’ के संपादक सुखविंदर ने डा. तेलतुंबड़े द्वारा कम्युनिस्टों की आलोचना के कई बिन्दुओं पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि भारत के कम्युनिस्टों के पास 1951 तक क्रांति का कोई विस्तृत कार्यक्रम ही नहीं था, ऐसे में जाति के सवाल पर भी किसी सुव्यवस्थित दृष्टि की उम्मीद करना गलत होगा। लेकिन देश के हर हिस्से में कम्युनिस्टों ने सबसे आगे बढ़कर दलितों-पिछड़ों के सम्मान की लड़ाई लड़ी और अकूत कुर्बानियां दीं।
  आज संगोष्ठी में दो अन्य पेपर पढ़ें गये जिन पर चर्चा जारी है। ‘संहति’ की ओर से असित दास ने ‘जाति प्रश्न और मार्क्सवाद’ विषय पर आलेख प्रस्तुत किया, जबकि पीडीएफआई, दिल्ली के अर्जुन प्रसाद सिंह का पेपर ‘भारत में जाति का सवाल और समाधान के रास्ते’ उनकी अनुपस्थित में तपीश मेंदोला ने प्रस्तुत किया।
आधार पत्र तथा अन्य पेपरों पर जारी बहस में यूसीपीएम माओवादी के वरिष्ठ नेता नीनू चापागाई, सिरसा से आए कश्मीर सिंह, देहरादून से आए जितेन्द्र भारती, लखनऊ के रोहित राजोरा व सूर्य कुमार यादव, लुधियाना के डा.ॅ अमृत, दिशा छात्र संगठन के सन्नी, वाराणसी के राकेश कुमार आदि ने विचार व्यक्त किए।
सत्र की अध्यक्षता नेपाल राष्ट्रीय दलित मुक्ति मोर्चा के अध्ययक्ष तिलक परिहार, ज्ञान प्रसार समाज के संचालक डा.हरिश तथा डा.अमृत पाल ने किया। संचालन का दायित्व सत्यम ने निभाया।

जाति प्रश्न और मार्क्सवाद:चौथी अरविंद स्मृति संगोष्ठी

दलित मुक्ति के प्रश्न को वर्ग-संघर्ष से जोड़ना होगा
चंडीगढ़, 13 मार्च। ‘‘जाति व्यवस्था और दलित उत्पीड़न के समूल नाश के लिए हमें इस सवाल का उत्तर ढूंढना ही होगा कि रैडिकल दलित राजनीति और अंबेडकर सहित नये-पूराने दलित विचारकों के पास दलित मुक्ति की परियोजना क्या है और उसके अमली रूप क्या है।’’ जाति प्रश्न और मार्क्सवाद विषय पर यहां चल रही चौथी अरविंद स्मृति संगोष्ठी में यह बात उभर कर सामने आई। संगोष्ठी में चर्चा के लिए प्रस्तुत आधार पत्र में कहा गया है कि आरक्षण और कानूनी रियायतों से दलित उत्पीड़न और उनकी अपमानजनक सामाजिक स्थिति का खात्मा संभव नहीं है।
भारत में बहुलांश दलित आबादी सर्वहारा है, मगर आज सर्वहारा आबादी का बहुलांश दलित नहीं है। ऐसे में जातिगत आधार पर सिर्फ दलितों की लामबंदी उनकी वास्तविक मुक्ति या जाति उन्मूलन की मंजिल तक हमें नहीं पहंुचा सकती। आधार पत्र में कहा गया है कि जाति केवल ऊपरी ढांचे का भाग नहीं, बल्कि आर्थिक मूलाधार का भी हिस्सा है और इसलिए उत्पादन संबंधों को क्रांतिकारी तरीके से बदले बिना इसे समस्या को जड़ से खत्म नहीं किया जा सकता।
अरविंद मार्क्सवादी अध्ययन संस्थान की ओर से आधार पत्र प्रस्तुत करते हुए सत्यम ने कहा कि पूंजीवाद-साम्राज्यवाद के विरुद्ध लड़ने की प्रक्रिया में यदि जाति का प्रश्न कम्युनिस्टों के एजेंडा में नहीं होगा तो सबसे गरीब-शोषित आबादी जातिगत भेदभाव और जातिवादी नेताओं के जाल में उलझी रह जायेगी। क्रांतिकारी संगठनों द्वारा जातीय आधार पर संगठन बनाना गलत है लेकिन उन्हें जाति उन्मूलन मंच बनाकर इस घृणित प्रथा के विरुद्ध अवश्य लड़ना चाहिए।
आधार पत्र में जाति व्यवस्था के इतिहास की विस्तृत चर्चा के साथ ही इस प्रश्न पर अंबेडकर, फुले, पेरियार के विचारों तथा पहचान की राजनीति की मार्क्सवादी विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। पेपर में कहा गया है कि अंबेडकर ने दलित चेतना को ऊपर उठाने में ऐतिहासिक भूमिका निभायी लेकिन दलित मुक्ति का कोई व्यावहारिक रास्ता पेश नहीं किया। दलित मुक्ति की समाजवादी परियोजना को विस्तार से प्रस्तुत करने के साथ ही जाति के प्रश्न पर प्रचार और संघर्ष का फौरी कार्यक्रम भी दिया गया।
इस बात पर विशेष बल दिया गया कि कम्युनिस्टों को अपने निजी आचरण और व्यवहार में जाति और धार्मिक कर्मकाण्ड नहीं मानने को सख्ती से लागू करना होगा।
आधार पत्र पर चर्चा में हिस्सा लेते हुए नेपाल राष्ट्रीय दलित मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष तिलक परिहार ने कहा कि दलित मुक्ति के प्रश्न को वर्ग संघर्ष से जोड़ना होगा। उन्होंने एशिया के स्तर पर जाति-विरोधी मंच गठित करने का प्रस्ताव दिया।
पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ के अंबेडकर सेंटर के निदेशक प्रो. मंजीत सिंह ने कहा कि पूंजीवाद ने जाति व्यवस्था को कमजोर नहीं बल्कि मजबूत बनाया है और आज हमारे सामने एक पूंजीवादी जाति व्यवस्था मौजूद है।
पंजाबी पत्रिका ‘प्रतिबद्ध’ के संपादक सुखविन्दर ने अपने वक्तव्य में इस सोच को गलत बताया कि जाति प्रश्न को न समझ पाने के कारण ही भारत में वामपन्थी आन्दोलन विफल रहा। उन्होंने कहा कि कम्युनिस्टों की वैचारिक कमियों के कारण वे भारतीय समाज को ठीक से समझ नहीं सके, फिर भी दलितों के अधिकार और सम्मान के लिए लड़ने और कुर्बानी देने में वे सबसे आगे रहे हैं।
दिल्ली से आये ‘आह्वान’ के संपादक अभिनव ने पहचान की राजनीति और सबआल्टर्न विचारों की विस्तृत आलोचना प्रस्तुत करते हुए कहा कि वर्ग संघर्ष का रास्ता छोड़ चुकी कम्युनिस्ट पार्टियों के कुकर्मों के लिए सभी क्रांतिकारियों को दोषी ठहराना गलत है।
सोशल साइंस स्टडीज सेंटर, कोलकाता के डॉ. प्रस्कन्वा सिन्हाराय ने कहा कि दलितों के भीतर की अलग-अलग पहचानों को देखा जाना जरूरी है। जाति आज एक आर्थिक प्रवर्ग है और केवल आरक्षण से दलितों की बराबरी नहीं आ सकती।
रिबब्लिकन पैंथर्स, मुंबई, यूसीपीआई के गोपाल सिंह, बामसेफ के हरिहरण सांप्ले, चंडीगढ़ के एडवोकेट शमशेर सिंह, संगरूर से आये संदीप आदि ने भी चर्चा में हिस्सा लिया।
अध्यक्ष मण्डल की ओर से डॉ. सुखदेव ने भी बहस में सार्थक हस्तक्षेप किया। अध्यक्ष मण्डल के अन्य सदस्य चिंतन विचार मंच, पटना के देवाशीष बरात तथा कात्यायनी थे।
- मीनाक्षी (प्रबन्ध न्यासी), आनन्द सिंह (सचिव)
अरविन्द स्मृति न्यास

अधिक जानकारी के लिए कृपया संपर्क करेंः
कात्यायनी - 09936650658, सत्यम - 09910462009, नमिता (चंडीगढ़) - 9780724125

भारतीय समाज की मुक्ति जातिप्रश्न को हल किये बिना संभव नहीं!

‘जाति प्रश्न और मार्क्सवाद’ पर पांच दिवसीय संगोष्ठी

मैं अन्तिम साँस तक ज़ि‍न्‍दगी की जंग लड़ूँगी

Tuesday, March 12, 2013

चौथी अरविन्द स्मृति संगोष्ठी चंडीगढ में शुरू

भारतीय समाज की मुक्ति जातिप्रश्न को हल किये बिना संभव नहीं!
चंडीगढ़, 12 मार्च। चौथी अरविन्द स्मृति संगोष्ठी में ‘जाति प्रश्न और मार्क्सवाद’ विषय पर आज यहां भकना भवन में देशभर से आये बुद्धिजयों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच चर्चा और विचार-मन्थन शुरू हुआ जो अगले चार दिनों तक जारी रहेगा।
संगोष्ठी की शुरुआत में ही यह बात स्पष्ट रूप से रेखांकित की गयी कि भारतीय समाज को शोषण से मुक्त करने की कोई भी परियोजना जाति प्रश्न को छोड़कर नहीं बनायी जा सकती। इस पांच दिवसीय संगोष्ठी में पंजाब, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, महाराष्ट्र, बिहार आदि राज्यों से आये इतिहासकार, समाजशास्त्री, लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता तथा संस्कृतिकर्मी भाग ले रहे हैं। इनके अलावा नेपाल की दोनों प्रमुख पार्टियों के वरिष्ठ नेता भी संगोष्ठी में भाग ले रहे हैं तथा ब्रिटेन और जर्मनी के बुद्धिजीवी भी भाग लेंगे।
उद्घाटन सत्र में अरविन्द मार्क्सवादी अध्ययन संस्थान की ओर से सत्यम ने कहा कि संगोष्ठी में मार्क्सवाद और अंबेडकरवाद के संबंध, डॉ अंबेडकर के राजनीतिक विचारों, जातिप्रश्न की मार्क्सवादी समझ, जातिप्रश्न के इतिहासलेखन, जातिप्रश्न और दलित साहित्य एवं सौंदर्यशास्त्र जैसे सवालों पर खुलकर चर्चा की जायेगी ताकि सामाजिक बदलाव की लड़ाई के अवरोधों को दूर किया जा सके। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ दशकों में क्रांतिकारी मार्क्सवादी खेमे के बीच यांत्रिक सोच में बदलाव  आया है और दलितवादी खेमे के बीच भी अंबेडकर के विचारों की सीमाओं को लेकर उठ रहे हैं।
सत्यम ने कहा कि मार्क्सवाद और अंबेडकरवाद के बीच समन्वय कराने के प्रयास तथा सबआल्टर्न एवं पहचान की राजनीति आजकल काफी चलन में है। इनका मार्क्सवादी दृष्टि से विश्लेषण जरूरी है।
अरविन्द स्मृति न्यास की मुख्य न्यासी मीनाक्षी ने बताया कि का. अरविन्द की स्मृति में भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के किसी महत्वपूर्ण विषय पर प्रतिवर्ष राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया जाता है। अरविंद मार्क्सवादी अध्ययन संस्थान कम्युनिस्ट आंदोलन के वैचारिक और व्यावहारिक पहलुओं पर शोध तथा अध्ययन के लिए स्थापित किया गया है।
संगोष्ठी में आये अतिथियोें का स्वागत करते हुए पंजाबी पत्रिका ‘प्रतिबद्ध’ के संपादक सुखविंदर ने कहा कि पंजाब में वामपंथी आंदोलन का एक विशेष इतिहास रहा है और यहां जातिप्रश्न भी विशिष्ट रूप में मौजूद है। यह हमारे लिए गौरव की बात है कि हर सवाल पर इतना महत्वपूर्ण आयोजन चंडीगढ में किया जा रहा है।
उद्घाटन सत्र की अध्ययक्षता एकीकृत नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के पोलित ब्येरो सदस्य एवं प्रसिद्ध साहित्य आलोचक निनु चपागाई, मुंबई की वरिष्ठ टेªड यूनियनकर्मी दीप्ति, अरविंद स्मृति न्यास की मीनाक्षी तथा ‘आह्वान’ पत्रिका के संपादक अभिनव ने की। संचालन कवयित्री कात्यायनी ने किया।
कार्यक्रम की शुरूआत का. अरविंद को श्रद्धांजति के साथ हुई। विहान सांस्कृति मंच की टीन ने क्रांतिकारी गीत प्रस्तुत किये।
संगोष्ठी में इस विषय के विभिन्न आयामों पर कुल 14 आलेख प्रस्तुत किये जायेंगे। संगोष्ठी का आधार आलेख ‘जाति प्रश्न और उसका समाधानः एक मार्क्सवादी दृष्टिकोण’ के अलावा पंजाबी पत्रिका ‘प्रतिबद्ध’ के सम्पादक सुखविन्दर ‘अम्बेडकरवाद और दलित मुक्ति’ पर, ‘आह्वान’ के सम्पादक अभिनव ‘जाति का इतिहासलेखन’ पर, ‘वर्ग, जाति और अस्मितावादी राजनीति’ पर  दिल्ली विश्वविद्यालय की शिवानी, ‘पश्चिम बंगाल में जाति और राजनीति’ पर सेंटर फॉर स्टडीज इन सोशल साइंसेज, कोलकाता के प्रस्कण्वा सिन्हारे, ‘मार्क्सवादी परंपराओं में जाति और सेक्स’ पर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के डा. राजर्षि दासगुप्ता, ‘मार्क्सवाद और जाति प्रश्न’ पर दिल्ली के शोधकर्ता और ऐक्टिविस्ट असित दास, पहचान की राजनीति पर बी.आर. अंबेडकर कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रशांत गुप्ता, मार्क्स(वाद) तथा अम्बेडकर(वाद) की साझा प्रासंगिकता पर पंजाब के सुखदेव सिंह जनागल तथा जाति व पहचान की राजनीति की सीमाओं पर ‘जाति विरोधी आंदोलन’ के जयप्रकाश पेपर प्रस्तुत करेंगे।
इसके अलावा सुप्रसिद्ध इतिहासकार प्रो. इरफान हबीब की ओर से भारत में जाति के विषय में एक पृष्ठभूमि पत्र संगोष्ठी में प्रस्तुत किया जाएगा। एकीकृत कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी) के पोलित ब्यूरो सदस्य तथा सांस्कृतिक विभाग के प्रभारी निनु चपागाईं ‘दलित समस्या और सौंदर्यशास्त्र’ विषय पर आलेख प्रस्तुत करेंगे तथा श्रमिक मुक्ति दल (डेमोक्रेटिक), पुणे के डा. अनंत फड़के की ओर से ‘जातिवादी पदसोपानक्रम के भौतिक आधार के उन्मूलन के कार्यक्रम’ पर आलेख प्रस्तुत किया जाएगा। ग्लासगो विश्वविद्यालय, स्कॉटलैंड के प्रो. पॉल कॉकशॉट इंटरनेट लिंक के द्वारा अपनी प्रस्तुति देंगे और उनका आलेख ‘डा. अम्बेडकर या डा. मार्क्स’ प्रस्तुत किया जाएगा।

- मीनाक्षी (प्रबन्ध न्यासी), आनन्द सिंह (सचिव)
अरविन्द स्मृति न्यास
अधिक जानकारी के लिए कृपया संपर्क करेंः
कात्यायनी - 09936650658, सत्यम - 9910462009, नमिता (चंडीगढ़) - 9780724125
 चौथी अरविन्द स्मृति संगोष्ठी चंडीगढ में शुरू

Monday, March 11, 2013

INDIA: (मनरेगा 3)// सचिन कुमार जैन

An Article by the Asian Human Rights Commission
केन्द्रीय नियमों के आधार पर महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना का क्रियान्वयन  

नियमों के प्रभाव–2 फरवरी 2006 को जब राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी क़ानून लागू किया गया था, तब यह अहसास तो था कि इस क़ानून को लागू करना आसान न होगा. कारण था एक बहुत बुनियादी किन्तु जवाबदेय व्यवस्था की गैर-मौजूदगी. सोच बहुत महत्वाकांक्षी थी. कुछ लोग इस क्रांतिकारी भी मानते थे, क्योंकि इस दौर में जबकि राज्य नागरिकों के प्रति अपने मूल कर्तव्यों से विमुख हो रहा था, तब सरकार ग्रामीणों को 100 दिन के रोज़गार की कानूनी गारंटी देने का क़ानून बना रही थी. जन संस्थाओं और लोक अधिकार संगठनों ने इसमें बहुत रचनात्मक और सक्रीय भूमिका निभाई थी. अगर आप स्वतंत्र भारत में बने तमाम कानूनों की भाषा के नज़रिए से पढ़ें तो हमारा दावा है कि इस क़ानून और इसकी मार्ग निर्देशिका की भाषा सबसे सरल और स्पष्ट मानी जा सकेगी. यह एक मांग आधारित कार्यक्रम है, यानी लोग काम मांगेंगे तो उन्हे काम का अधिकार मिलेगा; परन्तु शुरुआत में काम मांगने, पावती देने जैसे नियमों पर ज्यादा ठोस काम नही हुआ क्योंकि सरकार मान रही थी यदि इस प्रावधान का पालन किया तो शायद एक भी ग्रामीण काम का हक़ मांगने न आएगा क्योंकि भारत की व्यव्स्था से यदि सबसे ज्यादा कोई नाउम्मीद हुआ है, तो इस देश के गाँव के लोग! वर्ष 2009 तक अनुभवों पर नज़र रखी गयी. सबसे सामान्य आंकलन यही निकल कर आया कि इस नए रोज़गार क़ानून में क्रियान्वयन के सन्दर्भ में व्यवस्था में नीति बनाने वाले तंत्र से लेकर अफसरान और जनप्रतिनिधि तक कोई जवाबदेय नही रहा है. तब 2009-10 से इस क़ानून को नियम के नज़रिए से लागू करने की कोशिशें शुरू हुई. यही वह समय भी था जब नीति बनाने वालों और देश की अर्थव्यवस्था की दिशा तय करने वाले यह तर्क देने लगे थे कि हम 30-40 हज़ार करोड़ रूपए नाली में फेंक रहे हैं. अब चुनौती थी मनरेगा को एक व्यवस्था के तहत लाना.
आज की स्थिति में जब नियमों को लागू करने की बात हो रही है तो पता चल रह है कि हमारे यहाँ सरकार में वित्तीय आडिट की व्यवस्था नही है. केंद्र सरकार का नियम है कि जिलों को नई किश्त तभी जारी की जायेगी जब वे अपने पास उपलब्ध पूर्व की किश्तों का 60 फ़ीसदी हिस्सा खर्च कर लेंगे और इतनी ही कामों की जानकारी सूचना प्रबंधन प्रणाली (एम्आईएस) में दर्ज कर देंगे. भारत सरकार की वेबसाईट पर मंडला जिले की जानकारियों को अपलोड करने के लिये इंटरनेट की 100 मेगा बाईट प्रति सेकेण्ड की गति चाहिए होती है, जो मंडला को न मिल पायी और वह एम्आईएस में जानकारी दर्ज करने में पिछड़ता गया.
कामों का पूरा होना – मनरेगा के तहत शुरू हुए काम क्या अपनी पूर्णता को प्राप्त कर सके? हम यह देख चुके हैं कि एक वित्तीय वर्ष में शुरू किया गए काम दूसरे या तीसरे वित्तीय वर्ष में जाकर पूरे हो रहे हैं, जिनसे ग्रामसभा समुदाय के स्तर पर निगरानी नहीं हो पा रही है. भारत सरकार ने निर्देशित किया है कि पूर्व ने शुरू किये गए कामों को पहले पूरा किया जाए और उनके पूर्णता प्रमाणपत्र जारी किये जाएँ. किसी भी काम के पूर्ण प्रमाणपत्र तभी जारी किये जा सकते हैं जब वे भौतिक रूप से पूरे हो जाएँ और मजदूरी का पूरा भुगतान हो जाए. लालपुर में इस साल 5 काम भौतिक रूप से पूरे हो चुके हैं, पर उनमे मजदूरी का भुगतान शेष हैं, जिससे उन्हे पूर्णता प्रमाणपत्र जारी न किया जा सकेगा. इसी तरह चूंकि जिले में लगभग आठ लाख मानव दिवसों की मजदूरी का भुगतान शेष है, इसलिए भारत सरकार का यह नियम व्यवस्था को पटरी पर आने से रोकने वाला है. मनरेगा एम्आईएस के मुताबिक मंडला में वर्ष 2008-09 में 67.78 प्रतिशत और 2011-12 में 67 प्रतिशत काम पूर्ण हुए थे. ताज़ा साल में यानी 13 जनवरी 2013 तक केवल 35.8 प्रतिशत काम की पूर्ण हुए हैं. बीजाडांडी में इस साल केवल 14.28 प्रतिशत और निवास में 13.22 प्रतिशत काम ही पूर्ण हुए हैं. मवाई विकासखंड में एक भी काम पूरा नही हुआ. मध्यप्रदेश की स्थिति मंडला की स्थिति अलग नही है. वर्ष 2008-09 में मध्यप्रदेश में 75 फ़ीसदी काम पूरे हो गए थे, वर्ष 2011-12 में 48 प्रतिशत काम पूरे हुए और इस साल स्थिति और नीचे आ गयी. इस साल 25 प्रतिशत काम ही पूरे हुए. यदि भारत सरकार कामों के पूरा होने की शर्त पर कायम रहती है तो मध्यप्रदेश का आर्थिक संकट बरकरार रहने वाला लगता है.
वित्तीय आडिट की व्यवस्था – केंद्र सरकार द्वारा मनरेगा के तहत जारी की गयी राशि का पूरा उपयोग किया गया या नहीं, यह स्वतंत्र वित्तीय आडिट से स्पष्ट होता है. भारत सरकार इस पक्ष पर अब सख्त है कि हर पंचायत का नियमित आडिट हो, परन्तु इस व्यवस्था को एक सही आकार लेना अभी शेष है. लालपुर और लावर मुडिया पंचायतों के सामने संकट यह है कि वे खुद तो अपने खर्चे का वित्तीय आडिट नहीं करवा सकती हैं. आडिट एजेंसियों के बारे में राज्य स्तर पर निर्णय लिया जाता है. वर्ष 2011-12 के आडिट के लिये राज्य सरकार ने आडिटर का चयन ही अक्तूबर 2012 मे किया, जबकि नियम अनुसार 30 सितम्बर तक आडिट की रिपोर्ट अनिवार्य रूप से भारत सरकार को प्रेषित कर दी जाना चाहिए थी. परिणाम स्वरुप केंद्र सरकार से जरूरी राशि मिलने में बाधा आने लगी. आज मंडला जिले में सरकार को 9 लाख मानव दिवसों की लगभग 10 करोड़ रूपए की मजदूरी और लगभग 10 करोड़ रूपए के सामग्री के बिलों का भुगतान करना है, परन्तु उन्हे यह राशि नहीं मिल रही है. बडवानी जिले में आडिट का काम 17 सितम्बर को शुरू किया गया. वहां 106 पंचायतें ऐसी थी, जिनका वर्ष 2006 से किसी न किसी वर्ष आडिट ही लंबित था. वहां वन विभाग ने मनरेगा से बजट लिया पर चार साल तक आडिट नही करवाया. अब चूंकि मध्यप्रदेश में इस योजना के तहत आडिट की परंपरा ही विकसित नही हो पायी इसलिए वर्ष 2006-07 से अब तक 5000 पंचायतों के अलग-अलग वर्षों के आडिट नही हो पाए. इसी दौर में पंचायतों के अलावा अन्य क्रियान्वयन एजेंसियों, जैसे वन विभाग, ग्रामीण यांत्रिकी विभाग आदि ने मनरेगा का बजट तो ले लिया पर 4-4 सालों से आडिट नहीं करवाए. ये एजेंसियां भी सामाजिक अंकेक्षण से दायरे से लगभग बाहर ही हैं. इससे लगभग 500 करोड़ रूपए की राशि का अधिकृत हिसाब ही नहीं मिल पा रहा है. ताज़ा स्थितियों में यह विश्लेषण करने की जरूरत भी है कि हम नियमों के मुताबिक़ केवल ढांचे बनाने पर ध्यान केन्द्रित न करें. हम योजना के बेहतर क्रियान्वयन की कोशिश के दौरान आ रही दिक्कतों का सही विश्लेषण करें. उन्हें केवल शासकीय कार्यालय तक सीमित रखेंगे तो ग्राम सभा के सदस्यों को कभी पता नही चल पायेगा कि समस्या के कारण क्या हैं? और सरकार–समाज के बीच अविश्वास की खाई बढती जायेगी. नियम बनाने और उन्हे लागू करने का काम भी लोगों की सहभागिता से ही होना चाहिए.
*This is the third article in an article series confronting with the issues plaguing the implementation of MNREGA in India.
About the Author: Mr. Sachin Kumar Jain is a development journalist, researcher associated with the Right to Food Campaign in India and works with Vikas Samvad, AHRC's partner organisation in Bophal, Madhya Pradesh. The author could be contacted atsachin.vikassamvad@gmail.com Telephone: 00 91 9977704847
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About AHRC: The Asian Human Rights Commission is a regional non-governmental organisation that monitors human rights in Asia, documents violations and advocates for justice and institutional reform to ensure the protection and promotion of these rights. The Hong Kong-based group was founded in 1984.

चौथी अरविन्द स्मृति संगोष्ठी 12 मार्च से चण्डीगढ़ में

‘जाति प्रश्न और मार्क्सवाद’ पर पांच दिवसीय संगोष्ठी
देशभर से आये विद्वानों और कार्यकर्ताओं के अलावा विदेशों से भी भागीदारी होगी
चंडीगढ़, 10 मार्च। ‘जाति प्रश्न और मार्क्सवाद’ विषय पर 12 मार्च से चंडीगढ़ में शुरू हो रही पांच दिवसीय संगोष्ठी में भारत में सामाजिक परिवर्तन से जुड़े इस अत्यंत महत्वपूर्ण साल पर गहन चर्चा होगी। संगोष्ठी में देश के विभिन्न हिस्सों के प्रसिद्ध विद्वानों, लेखकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ ही विदेशों से भी इस विषय पर काम करने वाले विद्वान भागीदारी करेंगे। 
बाबा सोहनसिंह भकना भवन (सेक्टर 29 डी, चंडीगढ़) में 12 से 16 मार्च तक चलने वाली संगोष्ठी के आयोजक ‘अरविन्द स्मृति न्यास’ की मुख्य न्यासी मीनाक्षी ने बताया कि जाति प्रश्न के तमाम पहलुओं को लेकर इतनी व्यापक और गहन चर्चा संभवतया पहली बार आयोजित की जा रही है। ख़ासतौर पर वामपंथी आंदोलन और मार्क्सवाद के साथ जाति के प्रश्न को जोड़कर इतने व्यापक फलक पर पहले कभी विचार नहीं किया गया है। 
संगोष्ठी में इस विषय के विभिन्न आयामों पर कुल 14 आलेख प्रस्तुत किये जायेंगे। संगोष्ठी का आधार आलेख ‘जाति प्रश्न और उसका समाधानः एक मार्क्सवादी दृष्टिकोण’ के अलावा पंजाबी पत्रिका ‘प्रतिबद्ध’ के सम्पादक सुखविन्दर ‘अम्बेडकरवाद और दलित मुक्ति’ पर, ‘आह्वान’ के सम्पादक अभिनव ‘जाति का इतिहासलेखन’ पर, ‘वर्ग, जाति और अस्मितावादी राजनीति’ पर  दिल्ली विश्वविद्यालय की शिवानी, ‘पश्चिम बंगाल में जाति और राजनीति’ पर सेंटर फॉर स्टडीज इन सोशल साइंसेज, कोलकाता के प्रस्कण्वा सिन्हारे, ‘मार्क्सवादी परंपराओं में जाति और सेक्स’ पर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के डा. राजर्षि दासगुप्ता, ‘मार्क्सवाद और जाति प्रश्न’ पर दिल्ली के शोधकर्ता और ऐक्टिविस्ट असित दास, पहचान की राजनीति पर बी.आर. अंबेडकर कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रशांत गुप्ता, मार्क्स(वाद) तथा अम्बेडकर(वाद) की साझा प्रासंगिकता पर पंजाब के सुखदेव सिंह जनागल तथा जाति व पहचान की राजनीति की सीमाओं पर ‘जाति विरोधी आंदोलन’ के जयप्रकाश पेपर प्रस्तुत करेंगे।
इसके अलावा सुप्रसिद्ध इतिहासकार प्रो. इरफान हबीब की ओर से भारत में जाति के विषय में एक पृष्ठभूमि पत्र संगोष्ठी में प्रस्तुत किया जाएगा। एकीकृत कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी) के पोलित ब्यूरो सदस्य तथा सांस्कृतिक विभाग के प्रभारी निनु चपागाईं ‘दलित समस्या और सौंदर्यशास्त्र’ विषय पर आलेख प्रस्तुत करेंगे तथा श्रमिक मुक्ति दल (डेमोक्रेटिक), पुणे के डा. अनंत फड़के की ओर से ‘जातिवादी पदसोपानक्रम के भौतिक आधार के उन्मूलन के कार्यक्रम’ पर आलेख प्रस्तुत किया जाएगा। ग्लासगो विश्वविद्यालय, स्कॉटलैंड के प्रो. पॉल कॉकशॉट इंटरनेट लिंक के द्वारा अपनी प्रस्तुति देंगे और उनका आलेख ‘डा. अम्बेडकर या डा. मार्क्स’ प्रस्तुत किया जाएगा।
संगोष्ठी के विभिन्न सत्रों में होने वाली चर्चा में प्रसिद्ध लेखक व चिंतक आनंद तेलतुंबड़े, प्रसिद्ध साहित्यकार व जेएनयू के प्रो. तुलसीराम, विख्यात समाजशास्त्री प्रो.सतीश देशपांडे, प्रसिद्ध लेखिका प्रो. (श्रीमती) विमल थोराट, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो.पी.के. विजयन एवं डा. सरोज गिरि, प्रसिद्ध कवयित्री व सामाजिक कार्यकर्ता कात्यायनी, पीडीएफआई के अर्जुन प्रसाद सिंह, सीपीएन (एम) के वरिष्ठ सदस्य तिलक परिहार, नेपाली कवि एवं एक्जिटविस्ट संगीत श्रोता, नागपुर से नामदेव लाघवे, दिल्ली से डा. श्यामबिहारी राय तथा आदित्य नारायण सिंह, कोलकाता से अनंत आचार्य, रिपब्लिकन पैंथर्स, मुंबई से उत्तमराव जागीरदार व शरद गायकवाड, हिमाचल प्रदेश से हरगोपाल सिंह, चंडीगढ़ विश्वविद्यालय से प्रो. मनजीत सिंह, जेएनयू से प्रो. चमनलाल, पंजाबी लेखक संतोख सिंह विरदी, मुंबई के पत्रकार विजय प्रकाश सिंह, लेखक अरविन्द शेष तथा जर्मनी के कलाकार एवं वाम सामाजिक कार्यकर्ता योहानेस पॉल रैठर आदि प्रमुख रूप से भाग लेंगे। इसके अलावा पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा एवं महाराष्ट्र के विभिन्न ग्रुपों एवं जनसंगठनों के प्रतिनिधि, लेखक-पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता संगोष्ठी में हिस्सा लेंगे।
सुश्री मीनाक्षी ने कहा कि जाति प्रश्न, विशेषकर दलित प्रश्न आज भी भारतीय समाज का एक ऐसा जीवन्त-ज्वलन्त प्रश्न है, जिसे हल करने की प्रक्रिया के बिना व्यापक मेहनतकश अवाम की एकजुटता और उनकी मुक्ति-परियोजना की सपफलता की कल्पना नहीं की जा सकती। इस प्रश्न पर लम्बे समय से संगोष्ठियाँ-परिचर्चाएँ होती रही हैं लेकिन इस गम्भीर ऐतिहासिक प्रश्न के हर पहलू पर गम्भीर शोध और पूर्वाग्रह-मुक्त लम्बी बहसों का अभाव रहा है। इस संगोष्ठी का मकसद इसी कमी को पूरा करना है।
‘दायित्वबोध’ पत्रिका के सम्पादक तथा प्रखर वामपन्थी क्रान्तिकारी कार्यकर्ता एवं बुद्धिजीवी दिवंगत का. अरविन्द की स्मृति में अरविन्द स्मृति न्यास की ओर से होने वाली हर वर्ष भारत में सामाजिक बदलाव से जुड़े किसी अहम सवाल पर संगोष्ठी का आयोजन किया जाता है। पहली दो संगोष्ठियां दिल्ली व गोरखपुर में मज़दूर आंदोलन के विभिन्न पहलुओं पर हुई थीं जबकि तीसरी संगोष्ठी भारत में जनवादी अधिकार आंदोलन के सवाल पर लखनऊ में आयोजित की गई थी। इसी क्रम में चौथी संगोष्ठी के पंजाब में आयोजन का एक विशेष महत्व भी है क्योंकि यहां वामपंथी आंदोलन और जाति के प्रश्न का अपना विशिष्ट इतिहास रहा है। सुश्री मीनाक्षी ने विश्वास व्यक्त किया कि पंजाब के सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता तथा विद्वान सेमिनार में होने वाले विचार-विमर्श में खुलकर हिस्सा लेंगे और विचारोत्तेजक बहस-मुबाहसे की पहले की तीन संगोष्ठियों की परम्परा को चंडीगढ़ में नया आयाम मिलेगा। 
- मीनाक्षी (प्रबन्ध न्यासी), आनन्द सिंह (सचिव)
अरविन्द स्मृति न्यास

अधिक जानकारी के लिए कृपया संपर्क करेंः
कात्यायनी - 09936650658, सत्यम - 9910462009, नमिता (चंडीगढ़) - 9780724125

Saturday, March 09, 2013

साहिर लुधियानवी की जयंती पर स्‍मृति डाक टिकट


08-मार्च-2013 16:14 IST
राष्‍ट्रपति ने जारी किया साहिर लुधियानवी पर स्‍मृति डाक टिकट
भारत के राष्‍ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी ने आज राष्‍ट्रपति भवन में स्‍वर्गीय साहिर लुधियानवी की जयंती (8 मार्च, 2013) पर स्‍मृति डाक टिकट जारी किया। 

इस अवसर पर राष्‍ट्रपति ने कहा कि स्‍वर्गीय साहिर लुधियानवी मुख्‍य रूप से एक ऐसे शायर के रूप में प्रसिद्ध थे जो आम आदमी की रोज़मर्रा जीवन से जुड़ी परेशानियों और उनके सब्र के इम्तिहान के बारे में लिखते थे। प्रेम और सुंदरता पर अपनी रचनाओं के कारण उन्‍होंने युवाओं के बीच भी अपनी पहचान बनाई। उन्‍होंने समकालीन दौर के मूल्‍यों और सामाजिक चिंताओं को बेहद संवेदशीलता के साथ लिखा था। 

राष्‍ट्रपति ने कहा कि उर्दू शायरी को फिल्‍मों में इस्‍तेमाल करना साहिर लुधियानवी के महानतम योगदान में से एक है। उन्‍होंने फिल्‍म लेखक संघ के ज़रिए गीतकारों की पहचान के लिए भी लड़ाई लड़ी। श्री मुखर्जी ने कहा कि उनके निधन के 33 साल बाद उनकी जयंती पर स्‍मृति डाक टिकट जारी किया जाना इस बात का सबूत है कि अपनी शायरी और अपने गीतों के जरिए वे आज भी लोगों के दिलों में जिंदा हैं। 

इस अवसर पर केंद्रीय संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री श्री कपिल सिब्‍बल तथा केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री श्री मनीष तिवारी भी उपस्थित थे। (PIB)

वि.कासोटिया/प्रियंका/संजना-1165

साहिर के शहर से........ .....ساحر کے شہر سے  ·


बल्‍क एलपीजी स्‍टाक पर निगरानी

08-मार्च-2013 19:04 IST
रसोई गैस के सिलेंडरों का परिदान
Courtesy Photo
बुकिंग किए जाने के 48 घंटों के भीतर एलपीजी आपूर्ति की सुपुर्दगी करने के उद्देश्‍य से ओएमसीज दैनिक आधार पर बल्‍क एलपीजी स्‍टाक पर निगरानी रख रही हैं ताकि आवश्‍यकता के अनुसार बाजार की मांग पूरी करने के लिए अबाधिक भरण प्रचालन सुनिश्चित किया जा सके। इसके अलावा, उच्‍चतम मांग को पूरा करने के लिए आवश्‍यकता के आधार पर संयंत्रों का प्रचालन रविवार और अवकाश क दिनों तथा नियमित कार्यदिवसों को निर्धारित कार्य समय के बाद भी किया जाता है। ओएमसीज के क्षेत्र अधिकारी सभी वितरकों पर नियमित रूप से निगरानी रखते हैं और बढ़ी हुई मांग को पूरा करने के लिए यदि किसी वितरक को अतिरिक्‍त आपूर्ति की जानी अपेक्षित होती है तो यह आपूर्ति उसे जारी की जाती है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि बाजार में कोई बैकलाग न रहे।
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस राज्‍य मंत्री श्रीमती पनबाका लक्ष्‍मी ने आज लोकसभा में एक प्रश्‍न के लिखित उत्‍तर में यह जानकारी दी। (PIB)


वि. कासोटिया/राजेन्‍द्र/दयाशंकर -1186

Friday, March 08, 2013

केवल पांच बच्चियों से हुयी थी शिक्षा- क्रांति की शुरूआत

जैन स्कूल में की गयी बहन देवकी देवी को श्रद्धा से सलाम 
जब समाज का एक बहुत बड़ा और प्रभावशाली हिस्सा बच्चियों के जन्म को बुरा समझ रहा था, जन्म होते ही उन्हें मार डालने की साजिशें रची जाती थीं, खुश किस्मती से अगर फिर भी बच गयीं तो उन्हें खेलने और पढने की उम्र में ही विवाह के बंधन में बाँध दिया जाता था। उस समय समाज के कुछ लोग हिम्मत करके इस सब  के खिलाफ केवल आवाज़ ही नहीं उठा रहे थे बल्कि खुद कुछ करके भी दिखा रहे थे। इन्हीं में से एक थी बहन देवकी देवी। नारी शिक्षा और नैतिक जीवन शैली को अपनी सारी उम्र समर्पित क्र देने वाली बहन देवकी देवी की ओर से शिक्षा के क्षेत्र में लगाया गया एक छोटा सा पौदा आज बहुत बड़ा वट वृक्ष बन चूका है। लुधियाना में देवकी देवी जैन गर्ल्ज़ स्कूल और डी डी  जैन गर्ल्ज़ कालज के नाम से चल रहीं शिक्षण संस्थाएं आज आधी दुनिया अर्थात महिला जगत को सशक्त और शिक्षित करने में लगी हैं।

महिला दिवस के शुभ अवसर पर लुधियाना के रूपा मिस्त्री गली क्षेत्र में स्थित जैन गर्ल्ज़ सीनियर सेकेंडरी स्कूल में उस महान आत्मा बहन देवकी देवी को भी बहुत ही आदर के साथ सलाम की गयी। बाल ब्रह्मचारिणी भं देवकी देवी जैन का जन्म 12 मार्च 1906 को श्री भक्त प्रेम चंद तथा माता श्रीमती भनी देवी के घर में हुआ। कहते हैं की महान आत्माएं विश्व में जन हित के लिए ही आती हैं। भं देवकी देवी का जन्म भी इसी की एक मिसाल साबित हुआ।  खेलने खाने की अल्प उम्र जब बच्चे खान-पान और खिलौनों के लिए झगड़ते हैं उस समय इस मासूम लेकिन दूर द्रष्टा बच्ची ने खुद को धर्म और समाज निर्माण के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने पूज्य श्री सद्गुरु धर्मपिता जैन धर्म दिवाकर जैनागम रत्नाकर आचार्य सम्राट पूज्य श्री आत्मा राम जैन जी के चरण कमलों में अपने सारे जीवन को समर्पित करने भीष्म प्रतिज्ञा की।  यह सब उन्होंने अपने पिटे के जीवन काल में ही स्वयं को सौरभाविन्त रखने के लिए किया। उन्होंने जिंदगी के आखिरी सांस तक इस संकल्प को निभाया भी। उनका सारा जीवन धर्म साधना में लीन रहा और साथ ही साथ सक्रिय रूप से नारी शिक्षा को समर्पित भी। यह सब मुझे बताया इस स्कूल की प्रिंसिपल मीना गुप्ता और स्टाफ के अन्य सदस्यों ने। 
उस समय नारी शिक्षा की बात करना किसी क्रांति से कम नहीं था। समाज के साथ मंगा लेना आसान कभी भी नहीं होता। पर धर्म और साधना की शक्ति से उन्होंने लगातार अपने विजयी कदम बढ़ाने जारी रखे। अगर आज नारी पूरे समाज के सामने एक शक्ति बन कर उभरी है तो इसमें बहन देवकी देवी का भी बहुत ही अहम योगदान है। इस  सम्बन्ध में इन शिक्षण संस्थानों की समिति के सेक्रेटरी विपिन जैन बहुत ह कम शब्दों में महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं। आप जान कर हैरान होंगें कि जैन शिक्ष्ण संस्थानों के जिस विशाल रूप को देख कर आज सभी  चमत्कृत हो जाते हैं उसकी शुरूआत हुयी थी केवल पांच  लडकियों से। श्री आत्मा जी महाराज की प्रेरणा से वह छोटी सी शुरूआत आज पर्वत बन चुकी है। अब इन शिक्षण संस्थानों में अमीर गरीब सभी बच्चों को बिना किसी भेदभाव के शिक्षा दी जाती है। वितीय तौर से कमजोर वर्ग का यहाँ विशेष ख्याल रखा जाता है। वर्दी से लेकर किताबों तक की सुविधा उन्हें मिलती है। योग से लेकर कम्प्यूटर तक के क्षेत्र में उन्हें पारंगत किया जाता है तां कि आज की बच्चियां भविष्य में सशक्त नारी बन कर स्वस्थ समाज के निर्माण में योगदान डाल सकें। देखो  गुरु में श्रद्धा और प्रेम कितना था इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि अपने धर्मपिता आचार्य सम्राट पूज्य श्री आत्माराम जी महाराज क्क देवलोकगमन होने के दो माह पश्चात ही सात अप्रैल 1962 आत्म ज्योति में समा गयीं।  अब शरीरक रूप में में तो बहन देवकी देवी हमारे दरम्यान नहीं हैं पर उनका संकल्प, उनका कार्य निरंतर और अबाध चल रहा है।   स्कूल हो या कालज जब भी देखो यही लगता है कि  उनकी शांत छवि अपनी मूर्ती के रूप में सब देख रही, सब सम्भाल रही है। इन शिक्षा संस्थानों से शिक्षा पाकर बहुत सी बच्चियां ऊंचे स्थानों पर पहुँच चुकी हैं और नारी उत्थान में कार्यरत हैं।जैन गर्ल्ज़ सीनियर सेकेंडर स्कूल की प्रिंसिपल मीना गुप्ता स्वयं भी इसी स्कूल की छात्र रही हैं। जब उनसे महिला दिवस के सम्बन्ध में बात हुयी तो उनकी जुबां पर बस एक ही नाम आया बहन देवकी देवी। स्कूल के सारे  स्टाफ ने  इस बार के महिला दिवस पर उन्हें बहुत ही श्रद्धा से याद किया और साथ ही उनके दिखाए मार्ग पर चलने का संकल्प भी लिया।--रेक्टर कथूरिया (मोबाईल-98882-72025)