Thursday, June 30, 2011

भारत

कण-कण में जहाँ शंकर बसते,बूँद-बूँद मे गंगा,
जिसकी गौरव गाथा गाता,विश्व विजयी तिरंगा|
सागर जिसके चरण पखारे,और मुकुट हिमालय,
जन-जन में मानवता बसती,हर मन निर्मल,चंगा|
वृक्ष धरा के आभूषण,और रज जहाँ कि चन्दन,
बच्चा-बच्चा राम-कृष्ण सा,बहती ज्ञान कि गंगा|
विश्व को दिशा दिखाती,आज भी वेद ऋचाएं,
कर्मयोग प्रधान बना,गीता का सन्देश है चंगा|
'अहिंसा तथा शांति' मंत्र, जहाँ धर्म के मार्ग,
त्याग कि पराकाष्ठा होती, 'महावीर'सा नंगा|
भूत-प्रेत और अंध विश्वाश का,देश बताते पश्छिम वाले,
फिर भी हम है विश्व गुरु,अध्यातम सन्देश है चंगा|
डॉ अ कीर्तिवर्धन
(०९९११३२३७३२) 

चवन्नी को विनम्र श्रद्धांजलि


चवन्नी का अवसान : चवनिया मुस्कान:चवन्नी का  अतिम संस्कार

सच तो ये है कि चवन्नी से परिचय बहुत पहले हुआ और"चवनिया मुस्कान" से बहुत बाद में। आज जब याद करता हूँ अपने बचपन को तो याद आती है वो खुशी, जब गाँव का मेला देखने के लिए घर में किसी बड़े के हाथ से एक चवन्नी हथेली पर रख दिया जाता था "ऐश" करने के लिए। सचमुच मन बहुत खुश होता था और चेहरे पर स्वाभाविक चवनिया मुस्कान आ जाती थी। हालाकि बाद में चवनिया मुस्कान का मतलब भी समझा। मैं क्या पूरे समाज ने समझा। मगर उस एक दो चवन्नी का स्वामी बनते ही जो खुशी और "बादशाहत" महसूस होती थी, वो तो आज हजारों पाकर भी नहीं महसूस कर पाता हूँ।

15 अगस्त 1950 से भारत में सिक्कों का चलन शुरू हुआ। उन दिनों "आना" का चलन था आम जीवन में। आना अर्थात छः पैसा और सोलह आने का एक रूपया। फिर बाजार और आम आदमी की सुविधा के लिए 1957 में दशमलव प्रणाली को अपनाया गया यानि रूपये को पैसा में बदल कर। अर्थात एक रूपया बराबर 100 पैसा और 25 पैसा का सिक्का चवन्नी के नाम से मशहूर हो गया। 

भले ही 1957 में यह बदलाव हुआ हो लेकिन व्यवहार में बहुत बर्षों बाद तक हमलोग आना और पैसा का मेल कराते रहते थे। यदि 6 पैसे का एक आना और 16 आने का एक रूपया तो उस हिसाब से एक रुपया में तो 16x6 = 96 पैसे ही होना चाहिए। लेकिन उसको पूरा करने के लिए हमलोगों को समझाया जाता था कि हर तीन आने पर एक पैसा अधिक जोड़ देने से आना पूरा होगा। मसलन 3 आना = 3x6+1=19 पैसा। इस हिसाब से चार आना 25 पैसे का, जो चवन्नी के नाम से मशहूर हुआ। फिर इसी क्रम से 7 आने पर एक पैसा और अधिक जोड़कर यानि 7x6+2 = 44 पैसा, इसलिए आठ आना = 50 पैसा, जो अठन्नी के नाम से आज भी मशहूर है और अपने अवसान के इन्तजार में है। उसके बाद 11 आने पर 3 पैसा और 14 आने पर 4 पैसा जोड़कर 1 रुपया = 16x6+4 = 100 पैसे का हिसाब आम जन जीवन में खूब प्रचलित था 1957 के बहुत बर्षों बाद तक भी।

हलाँकि आज के बाद चवन्नी की बात इतिहास की बात होगी लेकिन चवन्नी का अपना एक गौरवमय इतिहास रहा है। समाज में चवन्नी को लेकर कई मुहाबरे बने, कई गीतों में इसके इस्तेमाल हुए। चवन्नी की इतनी कीमत थी कि एक दो चवन्नी मिलते ही खुद का अन्दाज "रईसाना" हो जाता था गाँव के मेलों में। लगता है उन्हीं दिनों मे किसी की कीमती मुस्कान के लिए"चवनिया मुस्कान" मुहाबरा चलन में आया होगा। चवन्नी का उन दिनों इतना मोल था कि "राजा भी चवन्नी ऊछाल कर ही दिल माँगा करते थे"। यह गीत बहुत मशहूर हुआ आम जन जीवन में जो 1977 में बनी फिल्म "खून पसीना" का गीत है।

लेखक:श्यामल सुमन  
"मँहगाई डायन" तो बहुत कुछ खाये जात है। मँहगाई बढ़ती गयी और छोटे सिक्के का चलन बन्द होता गया। 1970 में 1,2और 3 पैसे के सिक्के का चलन बन्द हो गया और धीरे धीरे चवन्नी का मोल भी घटता गया। चवन्नी का मोल घटते ही "चवन्नी छाप व्यापारी", "चवन्नी छाप डाक्टर" आदि मुहाबरे चलन में आये जो क्रमशः छोटे छोटे व्यापारी और आर०एम०पी० डाक्टरों के लिए प्रयुक्त होने लगा।

और आज चवन्नी का इतना मोल घट गया "मंहगाई डायन" के कारण कि आज उसका का अतिम संस्कार है। चवन्नी ने मुद्रा विनिमय के साथ साथ समाज से बहुत ही रागात्मक सम्बन्ध बनाये रखा बहुत दिनों तक। अतः मेरी विनम्र श्रद्धांजलि है चवन्नी को उसके इस शानदार अवसान पर।--श्यामल सुमन; सम्पर्क--09955373288

Sunday, June 26, 2011

दुष्यंत ने गजल को आम इंसान के बोलचाल की भाषा भी बनाया

मुझे याद है आपातकाल का वह दौर जब हर तरफ एक अन्जाना सा सहम था. पत्र पत्रिकाएँ सेसर होती थी.न तो सरकार के खिलाफ कुछ प्रकाशित हो सकता था और न ही पत्र में कोई स्थान खाली छोड़ा जा सकता था. हर जगह सेंसर अधिकारीयों की ड्यूटियां लगाई गयीं थी. सोच रहा था आज ऐसा क्या लिखा जाये जो मन की बात भी करे और सेंसर की पकड़ में भी न आये. दोपहर गुज़र रही थी की अचानक ही पिता जी बहार से आये तो उन्के३ न्हात में एक हिंदी पत्रिका थी. शायद सारिका. दुष्यंत की गज़लों को समर्पित एक विशेषांक था वह. करीब दो घंटे के बाद दुष्यंत की कुछ गज़लों को गुरुमुखी लिपि में तब्दील किया गया. उनमें एक अश्यार था...
अब तो इस तालाब का पानी बदल दो,
ये कंवल के फूल मुरझाने लगे हैं. 
उन दिनों जो लोग सेंस्र्शुदा सामग्री पढ़ कर बोर महसूस करने लगे थे वे बहुत प्रसन्न हुए. उन्हें लगा कहीं से ताज़ी ठंडी हवा का कोई झोंका आया है. इन ग्ज्ल्लों को पंजाबी में देख कर विदेशों से भी बहुत पत्र आये. इस गर्मजोशी को देख कर हम सब खुद भी हैरान थे. इसलिए इसके बाद भी दुष्यंत जी की रचनायों का प्रकाशन उस पंजाबी पत्रिका में होता रहा. इस सबके साथ इन गज़लों के अश्यार कब दिल और दिमाग में उतर गए कुछ पता ही नहीं चला. कई बार ऐसी नौबत आती की की खास मुद्दे पर बात खनी होती या आम बातचीत में अपना पक्ष कुछ ज़ोरदार बनाना होता तो दुष्यंत जी के अश्यार खुद-ब-खुद जुबां पर आ जाते. ऐसा केवल मेरे साथ ही नहीं हुआ बहुत से लोग आज भी दुष्यंत जी की शेयरों के ज़रिये अपनी बात अधिक प्रभावी ढंग से ख पाते हैं.
दुष्यंत कुमार त्यागी एक ऐसे हिंदी कवि और ग़ज़लकार थे जिन्होंने गजल को आम इंसान के बोलचाल तक में शामिल कर दिया. इन्होंने 'एक कंठ विषपायी', 'सूर्य का स्वागत', 'आवाज़ों के घेरे', 'जलते हुए वन का बसंत', 'छोटे-छोटे सवाल' और दूसरी बहुत सी किताबों का सृजन किया. दुष्यंत कुमार उत्तर प्रदेश के बिजनौर के रहने वाले थे. जिस समय दुष्यंत कुमार ने साहित्य की दुनिया में अपने कदम रखे उस समय भोपाल के दो प्रगतिशील (तरक्कीपसंद) शायरों ताज भोपाली तथा क़ैफ़ भोपाली का ग़ज़लों की दुनिया पर राज था. हिन्दी में भी उस समय अज्ञेय तथा गजानन माधव मुक्तिबोध की कठिन कविताओं का बोलबाला था.। उस समय आम आदमी के लिए नागार्जुन तथा धूमिल जैसे कुछ कवि ही बच गए थे. सिर्फ़ 42 वर्ष के छोटे से जीवन में दुष्यंत कुमार ने न केवल अपार ख्याति अर्जित की बलिक ऐसी रचना की जो आज भी कहती है दुष्यंत यहीं हैं हमारे आसपास...आज उसने यह कहा आज उसने वह कहा...देखो तो सही कितनी गहरी बातें हैं बहुत ही सादगी से कही गयीं.. निदा फ़ाज़ली उनके बारे में लिखते हैं."दुष्यंत की नज़र उनके युग की नई पीढ़ी के ग़ुस्से और नाराज़गी से सजी बनी है. यह ग़ुस्सा और नाराज़गी उस अन्याय और राजनीति के कुकर्मो के ख़िलाफ़ नए तेवरों की आवाज़ थी, जो समाज में मध्यवर्गीय झूठेपन की जगह पिछड़े वर्ग की मेहनत और दया की नुमानंदगी करती है." जिंदगी बेहद सस्ते जमानों में भी बहुत महंगी रही है. रोज़ की छोटी छोटी ज़रूरतें पूरी जिंदगी निगल जाती हैं. इन बैटन को दुष्यंत कितनी सादगी से कह लेते थे इसका एक नया अंदाज़, एक नया रंग  वातायन ने बहुत ही खूबसूरती से प्रस्तुत किया. ये दो गजलें बभीैं और दो पत्र भी.
दुष्यंत कुमार टू धर्मयुग संपादक
पत्थर नहीं हैं आप तो पसीजिए हुज़ूर|
संपादकी का हक़ तो अदा कीजिए हुज़ूर|१|

अब ज़िन्दगी के साथ ज़माना बदल गया|
पारिश्रमिक भी थोड़ा बदल दीजिए हुज़ूर|२|

कल मैक़दे में चेक दिखाया था आपका|
वे हँस के बोले इससे ज़हर पीजिए हुज़ूर|३|

शायर को सौ रुपए तो मिलें जब गज़ल छपे|
हम ज़िन्दा रहें ऐसी जुगत कीजिए हुज़ूर|४|

लो हक़ की बात की तो उखड़ने लगे हैं आप|
शी! होंठ सिल के बैठ गये ,लीजिए हुजूर|५|


धर्मयुग सम्पादक टू दुष्यंत कुमार
[धर्मवीर भारती का उत्तर बकलम
दुष्यंत कुमार्]


जब आपका गज़ल में हमें ख़त मिला हुज़ूर|
पढ़ते ही यक-ब-यक ये कलेजा हिला हुज़ूर|१|

ये "धर्मयुग" हमारा नहीं सबका पत्र है|
हम घर के आदमी हैं हमीं से गिला हुज़ूर|२|

भोपाल इतना महँगा शहर तो नहीं कोई|
महँगी का बाँधते हैं हवा में किला हुज़ूर|३|

पारिश्रमिक का क्या है बढा देंगे एक दिन|
पर तर्क आपका है बहुत पिलपिला हुज़ूर|४|

शायर को भूख ने ही किया है यहाँ अज़ीम|
हम तो जमा रहे थे यही सिलसिला हुज़ूर|५|


[पहली बार ये दोनों ही गज़लें धर्मयुग के होली अंक 1975 में प्रकाशित हुयी थीं।]
भाई वीरेन्द्र जैन जी के ब्लॉग से 
साभार यहाँ आपके सामने भी रखीं गयीं हैं. अब साथ ही साथ देखिये जरा वायस आफ हार्ट का सुन्दर प्रस्तुतिकरण. इसी तरह एक प्रयास किया नव निर्माण ने भी.एक और यादगारी अंदाज़ है बागे वफा हिंदी की तरफ से. 

कविता:जो तीन दिन की बेचैनी के बाद अनायास फूट पड़ी

मुनादी / धर्मवीर भारती     


खलक खुदा का, मुलुक बाश्शा का
हुकुम शहर कोतवाल का...
हर खासो-आम को आगह किया जाता है
कि खबरदार रहें
और अपने-अपने किवाड़ों को अन्दर से
कुंडी चढा़कर बन्द कर लें
गिरा लें खिड़कियों के परदे
और बच्चों को बाहर सड़क पर न भेजें
क्योंकि
एक बहत्तर बरस का बूढ़ा आदमी अपनी काँपती कमजोर आवाज में
सड़कों पर सच बोलता हुआ निकल पड़ा है !

शहर का हर बशर वाकिफ है
कि पच्चीस साल से मुजिर है यह
कि हालात को हालात की तरह बयान किया जाए
कि चोर को चोर और हत्यारे को हत्यारा कहा जाए
कि मार खाते भले आदमी को
और असमत लुटती औरत को
और भूख से पेट दबाये ढाँचे को
और जीप के नीचे कुचलते बच्चे को
बचाने की बेअदबी की जाय !

जीप अगर बाश्शा की है तो
उसे बच्चे के पेट पर से गुजरने का हक क्यों नहीं ?
आखिर सड़क भी तो बाश्शा ने बनवायी है !
बुड्ढे के पीछे दौड़ पड़ने वाले
अहसान फरामोशों ! क्या तुम भूल गये कि बाश्शा ने
एक खूबसूरत माहौल दिया है जहाँ
भूख से ही सही, दिन में तुम्हें तारे नजर आते हैं
और फुटपाथों पर फरिश्तों के पंख रात भर
तुम पर छाँह किये रहते हैं
और हूरें हर लैम्पपोस्ट के नीचे खड़ी
मोटर वालों की ओर लपकती हैं
कि जन्नत तारी हो गयी है जमीं पर;
तुम्हें इस बुड्ढे के पीछे दौड़कर
भला और क्या हासिल होने वाला है ?

आखिर क्या दुश्मनी है तुम्हारी उन लोगों से
जो भलेमानुसों की तरह अपनी कुरसी पर चुपचाप
बैठे-बैठे मुल्क की भलाई के लिए
रात-रात जागते हैं;
और गाँव की नाली की मरम्मत के लिए
मास्को, न्यूयार्क, टोकियो, लन्दन की खाक
छानते फकीरों की तरह भटकते रहते हैं...
तोड़ दिये जाएँगे पैर
और फोड़ दी जाएँगी आँखें
अगर तुमने अपने पाँव चल कर
महल-सरा की चहारदीवारी फलाँग कर
अन्दर झाँकने की कोशिश की !

क्या तुमने नहीं देखी वह लाठी
जिससे हमारे एक कद्दावर जवान ने इस निहत्थे
काँपते बुड्ढे को ढेर कर दिया ?
वह लाठी हमने समय मंजूषा के साथ
गहराइयों में गाड़ दी है
कि आने वाली नस्लें उसे देखें और
हमारी जवाँमर्दी की दाद दें

अब पूछो कहाँ है वह सच जो
इस बुड्ढे ने सड़कों पर बकना शुरू किया था ?
हमने अपने रेडियो के स्वर ऊँचे करा दिये हैं
और कहा है कि जोर-जोर से फिल्मी गीत बजायें
ताकि थिरकती धुनों की दिलकश बलन्दी में
इस बुड्ढे की बकवास दब जाए !

नासमझ बच्चों ने पटक दिये पोथियाँ और बस्ते
फेंक दी है खड़िया और स्लेट
इस नामाकूल जादूगर के पीछे चूहों की तरह
फदर-फदर भागते चले आ रहे हैं
और जिसका बच्चा परसों मारा गया
वह औरत आँचल परचम की तरह लहराती हुई
सड़क पर निकल आयी है।

ख़बरदार यह सारा मुल्क तुम्हारा है
पर जहाँ हो वहीं रहो
यह बगावत नहीं बर्दाश्त की जाएगी कि
तुम फासले तय करो और
मंजिल तक पहुँचो

इस बार रेलों के चक्के हम खुद जाम कर देंगे
नावें मँझधार में रोक दी जाएँगी
बैलगाड़ियाँ सड़क-किनारे नीमतले खड़ी कर दी जाएँगी
ट्रकों को नुक्कड़ से लौटा दिया जाएगा
सब अपनी-अपनी जगह ठप !
क्योंकि याद रखो कि मुल्क को आगे बढ़ना है
और उसके लिए जरूरी है कि जो जहाँ है
वहीं ठप कर दिया जाए !

बेताब मत हो
तुम्हें जलसा-जुलूस, हल्ला-गूल्ला, भीड़-भड़क्के का शौक है
बाश्शा को हमदर्दी है अपनी रियाया से
तुम्हारे इस शौक को पूरा करने के लिए
बाश्शा के खास हुक्म से
उसका अपना दरबार जुलूस की शक्ल में निकलेगा
दर्शन करो !
वही रेलगाड़ियाँ तुम्हें मुफ्त लाद कर लाएँगी
बैलगाड़ी वालों को दोहरी बख्शीश मिलेगी
ट्रकों को झण्डियों से सजाया जाएगा
नुक्कड़ नुक्कड़ पर प्याऊ बैठाया जाएगा
और जो पानी माँगेगा उसे इत्र-बसा शर्बत पेश किया जाएगा
लाखों की तादाद में शामिल हो उस जुलूस में
और सड़क पर पैर घिसते हुए चलो
ताकि वह खून जो इस बुड्ढे की वजह से
बहा, वह पुँछ जाए !


डा. धर्मवीर भारती 
लोकनायक जे पी 
[तानाशाही का असली रूप सामने आते देर नहीं लगी। नवम्बर की शुरूआत में ही हुआ वह भयानक हादसा। जे.पी.ने पटना में भ्रष्टाचार के खिलाफ रैली बुलायी। हर उपाय पर भी लाखों लोग सरकारी शिकंजा तोड़ कर आये। उन निहत्थों पर निर्मम लाठी-चार्ज का आदेश दिया गया। अखबारों में धक्का खा कर नीचे गिरे हुए बूढ़े जे.पी.उन पर तनी पुलिस की लाठी, बेहोश जे.पी.और फिर घायल सिर पर तौलिया डाले लड़खड़ा कर चलते हुए जे.पी.। दो-तीन दिन भयंकर बेचैनी रही, बेहद गुस्सा और दुख...9 नवम्बर रात 10 बजे यह कविता अनायास फूट पड़ी] बाश्शा सलामत को खूनखराबा पसन्द नहीं !

Saturday, June 25, 2011

आपातकाल के काले दौर की यादें अडवाणी जी के शब्दों में

भारत की स्वतंत्रता के छह दशकों में दो तिथियाँ ऐसी हैं, जिन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकता है और ये दोनों जून 1975 से जुड़ी हुई हैं। इनमें से एक है12 जून। सभी राजनीतिक विश्लेषकों को अचंभे में डालते हुए गुजरात विधानसभा चुनावों में इंदिरा कांग्रेस की भारी पराजय हुई। दूसरा, उसी दिन इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने रायबरेली से इंदिरा गांधी के लोकसभा में चुने जाने को निरस्त कर दिया और इसके साथ ही चुनावों में भ्रष्टाचार फैलाने के आधार पर उन्हें छह वर्षों के लिए चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित कर दिया।
दूसरी तिथि है 25 जून। लोकतंत्र-प्रेमियों के लिए यह तिथि स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे काले दिवसों में से एक के रूप में याद रखी जाएगी। इस दुर्भाग्यपूर्ण तिथि से घटनाओं की ऐसी शृंखला चल पड़ी, जिसने विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र को विश्व की दूसरी सबसे बड़ी तानाशाही में परिवर्तित कर दिया।
दिल्ली में जून के महीने में सबसे अधिक गरमी होती है। अतएव जब दल-बदल के विरुध्द प्रस्तावित कानून से संबंधित संयुक्त संसदीय समिति ने बगीचों के शहर बंगलौर, जो कि ग्रीष्मकाल में भी अपनी शीतल-सुखद जलवायु के लिए विख्यात है, में 26-27 जून को अपनी बैठक करने का निर्णय लिया तो मुझे काफी प्रसन्नता हुई। हम दोनोंअटलजी और मैंइस समिति के सदस्य थे, जिसके कांग्रेस (ओ) के नेता श्याम नंदन मिश्र भी सदस्य थे। हालाँकि, जब 25 जून की सुबह मैं दिल्ली के पालम हवाई अड्डे पर बंगलौर जानेवाले विमान पर सवार हुआ तो मुझे इस बात का जरा भी खयाल नहीं था कि यह यात्रा दो वर्ष लंबी अवधि के लिए मेरे 'निर्वासन' की शुरुआत है।
लोकसभा के अधिकारियों ने बंगलौर हवाई अड्डे पर मेरे सहयात्री मिश्र और मेरी अगवानी की। राज्य विधानसभा के विशाल भवन के पास स्थित विधायक निवास पर हमें ले जाया गया। अटलजी एक दिन पहले ही वहाँ पहुँच चुके थे।

26 जून को सुबह 7.30 बजे मेरे पास जनसंघ के स्थानीय कार्यालय से एक फोन आया। दिल्ली से जनसंघ के सचिव रामभाऊ गोडबोले का एक अत्यावश्यक संदेश था। वे कह रहे थे कि मध्य रात्रि के तुरंत बाद जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई और अन्य महत्त्वपूर्ण नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया है। गिरफ्तारी जारी है। पुलिस शीघ्र ही अटलजी और आपको गिरफ्तार करने के लिए पहुँचने वाली होगी।

पुलिस हम लोगों को गिरफ्तार करने के लिए सुबह 10.00 बजे आ पहुँची। प्रख्यात समाजवादी नेता मधु दंडवते भी एक अन्य संसदीय समिति की बैठक में भाग लेने के लिए बंगलौर में मौजूद थे, उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया। हम चारों को बंगलौर सेंट्रल जेल ले जाया गया।

जेल
हम लोगों को आमने-सामने स्थित दो बड़े आकार के कमरों में रखा गया। श्याम बाबू और दंडवते एक कमरे में थे तथा अटलजी और मैं दूसरे कमरे में। हम लोग जल्द ही वहाँ के अनुकूल हो गए। जेल अधिकारियों ने हमें खाना पकाने के बरतन, चीनी मिट्टी के बरतन, खाद्य सामग्रीअन्न और सब्जी दिए, जैसाकि कारागार नियमावली में विनिर्देश था। अटलजी ने स्वेच्छया खाना पकाने की देखभाल करना स्वीकार किया। 'लोकसभा हू'ज हू' में उनकी रुचियों के अंतर्गत 'खाना पकाना' दिया गया है। वे जो खाना पकाते थे, वह सादा किंतु संपूर्ण आहार होता था।

बंगलौर जेल में मुझे अपने जीवन का एक विरल वरदान जो प्राप्त हुआ, वह अकेलापन, और इसका तात्पर्य थाइसका अच्छा उपयोग करना। एक अच्छे पुस्तकालय और शांत अध्ययन-कक्ष के अलावा जेल में एक बैडमिंटन कोर्ट एवं टेबल टेनिस हॉल था, जहाँ मैं नियमित रूप से खेलता था। असल में जयंत, जो कि अब एक शीर्ष टेबल टेनिस खिलाड़ी है, ने सर्वप्रथम इस खेल के प्रति रुचि उस समय विकसित की, जब वह कमला और प्रतिभा के साथ पहली बार मुझसे बंगलौर जेल में मिलने आया था। चूँकि मेरे कई साथी कैदी कर्नाटक से थे, मैंने कन्नड़ सीखना शुरू कर दिया और समाचार-पत्रों की मुख्य खबर पढ़ने और कुछ प्रारंभिक वाक्य बोलने में काफी प्रगति कर ली। समय बिताने का मेरा सर्वप्रिय साधन निश्चित रूप से पुस्तकें और पुस्तकालय था।

जेल के दौरान मेरे सुखद क्षण वे होते थे, जब मुझे या तो कमला या मेरे बच्चों द्वारा लिखे पत्र प्राप्त होते थे अथवा वे मुझसे मिलने बंगलौर आते थे। मुझे पता चला कि अध्यापिका अकसर प्रतिभा और जयंत से पूछती थी'पापा वापस आए?' मेरे बच्चों को यह कहते हुए बहुत कष्ट होता था'नहीं, अभी नहीं।' मुझे अपने कारावास का कभी कोई पछतावा नहीं हुआ, चूँकि यह लोकतंत्र की रक्षा के लिए चुकाया जानेवाला अनिवार्य मूल्य था। फिर भी, कोई भी ऐसी बात जो मेरे बच्चों को कष्ट दे, मुझे क्षोभ से भर देती थी।

भारतीय इतिहास के सर्वाधिक अंधकारपूर्ण कालखंड की समाप्ति
वर्ष 1976 के अस्त होते-होते इस बात के संकेत बढ़ने लगे थे कि आपातकालीन सूर्य भी अस्त होगा।
इंदिरा गांधी की अलोकप्रियता देश में और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती जा रही थी। उनका एकमात्र समर्थक सोवियत संघ और कम्युनिस्ट गुट के कठपुतली शासक थे।

16 जनवरी को मैंने डायरी में लिखा'इंडियन एक्सप्रेस में प्रमुख खबर है कि लोकसभा चुनाव मार्च के अंत अथवा अप्रैल के आरंभ में होंगे और इस संबंध में औपचारिक घोषणा संसद् के अगले सत्र के आरंभ में की जाएगी।' इसके दो दिन पश्चात् 18 जनवरी, 1976 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लोकसभा भंग किए जाने की घोषणा की।

डायरी में मेरी आखिरी टिप्पणी, जो 18 जनवरी को मेरे स्वतंत्र होने से कुछ पहले लिखी गई थी, इसप्रकार हैदोपहर में लगभग 1.30 बजे जेल अधीक्षक छबलाणी मेरे कमरे में आए और कहा कि एक वायरलेस संदेश दिल्ली से आया है, जो मेरे कारावास को समाप्त करने के संबंध में है.......

चुनावों की घोषणा और जनता पार्टी का जन्म
बंगलौर में एक दिन व्यतीत करने के बाद मैं मद्रास (अब चेन्नई) चला गया, जहाँ से मैंने 20 जनवरी को दिल्ली के लिए उड़ान भरी। कमला और बच्चे रेलगाड़ी से घर लौटे। इस समय तक अटलजी भी रिहा हो चुके थे। इससे पहले उन्हें दिल्ली के एम्स (AIIMS) अस्पताल में भेज दिया गया था, जहाँ वे स्लिप डिस्क ऑपरेशन के बाद स्वास्थ्य-लाभ कर रहे थे। मोरारजी भाई को तावडू (हरियाणा) के कारावास से मुक्त किया गया। तीन दिन बाद 23 जनवरी को इंदिरा गांधी ने मार्च में चुनाव कराए जाने की घोषणा की। इस घोषणा के बाद कई अन्य राजनीतिक बंदियों को रिहा कर दिया गया।

देश में राजनीतिक घटनाक्रम बिजली की-सी तेजी से बदला। जिस दिन नए चुनावों की घोषणा हुई उसी दिन जयप्रकाशजी ने जनता पार्टी के निर्माण की घोषणा की और अट्ठाईस सदस्यीय एक राष्ट्रीय कार्यकारिणी समिति बनाई, जिसमें मोरारजी देसाई को अध्यक्ष और चरण सिंह को उपाध्यक्ष बनाया गया। इसके सदस्य चार दलोंजनसंघ, कांग्रेस (ओ), सोशलिस्ट पार्टी और लोकदल से थे, जिन्होंने विलय के बाद एक नए दल को जन्म दिया। मधु लिमये, रामधन और सुरेंद्र मोहन के साथ मैं इसके चार महासचिवों में से एक था।

जनता पार्टी के जन्म से देश में राजनीतिक स्थितियाँ बदल गईं। ऐसा लगता था कि यह एक विशाल और हितैषी शक्ति है, जो भारत को उन्नीस महीने के निरंकुश शासन से मुक्ति दिलाएगी। हालाँकि चुनाव होने में अभी कुछ सप्ताह शेष थे और लोगों को अभी आपातकाल पर अपना फैसला देना था, लेकिन हवा में तानाशाही पर लोकतंत्र की विजय की तरंग घुल गई थी। मुझे लगता था कि भारत एक नाटकीय कायांतरण के शीर्ष पर खड़ा है, जो एक युग के समापन और एक नए युग के उदय का संकेत है। इसकी तुलना तीन दशक पूर्व वर्ष 1947 में भारत द्वारा पारगमन के संबंध में किए गए अनुभव से की जा सकती थी। निश्चित रूप से भारत में यह दूसरा स्वतंत्रता संग्राम विजयी हुआ था।

लोकसभा चुनावों की तैयारी के लिए बहुत कम समय बचा था, जो कि 16 मार्च को होने अधिसूचित थे। जनता पार्टी को चुनाव प्रचार के आरंभ से ही कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। हमारा झंडा और चुनाव-चिह्न नए थे, इसलिए मतदाता इसे कम जानते थे। इसके विपरीत, लोग कांग्रेस के चुनाव-चिह्न चरखा से भली-भाँति परिचित थे। हमारी पार्टी के पास संसाधनों का अभाव था, जबकि कांग्रेस के पास अपार धन था। कांग्रेस के पास सरकार-नियंत्रित मीडिया भी था। चूँकि आपातकाल अभी भी औपचारिक रूप से लागू था, लोग आमतौर पर डरे और सशंकित थे। वे खुले तौर पर इस बात पर चर्चा करने को तैयार नहीं थे कि वे अपना वोट किसे देंगे। लेकिन यह सच है कि जनता पार्टी की चुनाव सभाओं में काफी भीड़ जुटती थी; किंतु आरंभिक दिनों में कांग्र्रेस-विरोधी लहर का कोई संकेत नजर नहीं आता था। वास्तव में कांग्रेस के झंडे गाँवों और कस्बों दोनों में जनता पार्टी से बहुत अधिक संख्या में लगे थे।

फिर भी हवा में बदलाव का एक झोंका आ रहा था। एक निर्वाचक भूकंप के पूर्व कंपन का अनुभव हो रहा था।

यह स्पष्ट रूप से सिध्द हो गया, जब 20 मार्च को चुनाव परिणाम घोषित हुए।कांग्रेस स्वतंत्रता के बाद पहली बार पराजित हुई। जनता पार्टी को 542 सदस्यीय सदन में 295 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत मिला। कांग्रेस की सूची मात्र 154 सीटों तक सीमित रह गई। सत्ताधारी दल के लिए यह पराजय उस समय और शर्मनाक हो गई, जब यह खबर फैली कि इंदिरा गांधी रायबरेली से और उनके पुत्र संजय गांधी अमेठी से चुनाव हार गए हैं। ये दोनों उनके अपने निर्वाचन क्षेत्र थे। 
आपातकाल आधिकारिक रूप से 23 मार्च, 1977 को समाप्त हो गया। इसके साथ ही भारतीय गणतंत्र के इतिहास की सर्वाधिक अंधकारपूर्ण अवधि का अंत हो गया। -लालकृष्ण आडवाणी की वैब साईट से साभार 

Thursday, June 23, 2011

....और अब बाज़ार में आई प्रो. भुल्लर की फोटो लगी टी-शर्ट

मामला कोई भी क्यूं न हो लोग जब चाहते हैं तो वे अपने मन की बात को जन जन तज पहुंचाने का तरीका ढून्ढ ही लेते हैं.  प्रो..दविंदर पाल सिंह भुल्लर की फांसी का मुद्दा उठा तो दोनों तरफ के लोग नए नए रास्ते अपना कर आगे आने लगे.फांसी का समर्थन  करने वाले सन्गठन शिव सेना के एक नेता इस कार्य के लिए जल्लाद बनने का आवेदन पत्र लेकर मीडिया के सामने आये तो इस फांसी का विरोध करने वाले प्रो. भुल्लर के हक़ में टीशर्ट ले कर बजार में आ गए जिस पर छपी है प्रो.की तस्वीर. गौरतलब है कि  पंजाब में इन दिनों प्रोफ.दविंदर पाल सिंह भुल्लर की फोटो लगी टी-शर्ट बाज़ार में खुल कर आई है और धडल्ले से  हाथो हाथ बिक भी रही है. पुछा तो पता चला कि वे यानी कि पंजाब के नौजवान इसे पहन कर प्रो..दविंदर पाल सिंह भुल्लर के ;लिए घोषित फांसी की सजा को ख़तम करने की मांग कर रहे है.
पंजाब में जहाँ पंजाब सरकार,एसजीपीसी,के इलावा सैकड़ों धार्मिक,और सामाजिक संगठन,राष्टरपति द्वारा प्रोफ.दविंदर पाल सिंह भुल्लर की फांसी की सजा की अपील को ख़ारिज कर फांसी की सजा को को कायम रखने का अपने अपने विरोध कर रहे है वही -प्रो..दविंदर पाल सिंह भुल्लर की फांसी का विरोध करने का एक नया तरीका पंजाब के लोगों ने ढूंड निकाला है इस टीशर्ट को पहन कर. फांसी के विरोध का यह आधुनिक और पूरी तरह शांत मई तरीका कहाँ तक कामयाब रहता है इसका पता तो आने वाले वक्त में ही लगेगा लेकिन फ़िलहाल युवा वर्ग ने इसे पहन रखा है अपने सीने के साथ लगा कर  जिसे देख कर वे लोग भी इस बात को जानने का प्रयास करने लगे हैं जो ब्लू स्टार आपरेशन और उसके बाद लम्बे समय तक चली हिंसा के समय बहुत ही छोटे थे या फिर बाद में जन्मे थे.  
इस टी शर्त की लगातार बढ़ रही मांग को फेखते हुए पंजाब स्क्रीन ने भी मीडिया टीम के साथ कुछ बाज़ारों का दौरा किया. पंजाब की रेडीमेड कपड़ों की सबसे बड़ी मार्केट अकालगढ़ मार्केट लुधियाना में यह टी-शर्ट बहुत ही तेज़ी और उत्साह से बिक रही है..सिख युवक इसे बड़े शौंक से खरीद रहे है और जोश से पहन रहे हैं. इस टी-शर्ट को बेच रहे दुकानदारों का कहना है की जब से प्रो..दविंदर पाल सिंह भुल्लर की फोटो लगी टी-शर्ट बाज़ार में आई है तब से इसकी मांग तेज़ी से बढ रही है लुधियाना के साथ साथ यह टी-शर्ट पुरे पंजाब में तो बिक ही रही है साथ ही दिल्ली और हरयाणा में भी इसे पूरे जोशो ख्स्रोश से खरीदा जा रहा है.
प्रो..दविंदर पाल सिंह भुल्लर की फांसी की सजा का विरोध हर कोई अपने अंदाज़ में कर रहा है,,एसजीपीसी ने जहाँ अरदास दिवस मनाया वहीँ पंजाब के राजपाल को एक मांग पात्र भेंट कर फांसी की सजा को माफ़ करने की मांग की  कुक्स्ह्ह लोगों ने खून से हस्ताक्षर करके पत्र लिखे.  विरोध के इन नए नए तरीकों से फांसी की सजा माफ़ हो पाती है या नहीं इसका पता तो वक्त आने पर ही चलेगा लेकिन एक बात साफ़ है कि सिक्ख युवा वर्ग में वह एक नायक की तरह बन गया है..........ब्यूरो रिपोर्ट 

हमने चिराग रख दिया तूफां के सामने.....!

नफरत की आंधी कहीं भी चले यह हमेशां अपने साथ दुःख दर्द, आंसू और उदासियाँ ही लेकर आती हैं. हंसते भरे घरों को उजाड़ देना, घरों के चिराग बुझा देना इस के लिए बहुत ही मामूली बातें होती हैं. तबाही पर खिलखिलाती हुयी इन आँधियों को चलाने वाले अक्सर इसकी मार से बच जाते हैं और मासूम लोग इसका निशाना बन जाते हैं. आस्ट्रेलिया में भी यही हुआ जहाँ बहुत से भारतीय नौजवानों को मौत के घाट उतार दिया गया. पर कहते हैं न रात के काले घने अँधेरे में भी कहीं न कहीं रौशनी कौंध ही जाती है. आस्ट्रेलिया के मामले में एक मशाल रौशन की है वहां के एक कलाकार ने. नफरत की ह्वयों के खिलाफ मोहब्बत के चिराग जलाने की हिम्मत भी उसे उस मिहब्बत से ही मिली जो उसे भारत नें रहते हुए नीली. लीजिये आ भी देखिये इस वीडियो में वो सारी कहानी:

आस्ट्रेलियन टीवी नैट वर्क  पर प्रसारित इस शुभ संदेश की शानदार और जानदार वीडियो को आप यूं ट्यूब पर भी देख सकते हैं    इसको दुनिया के सामने लाने में ब्रिटिश सिक्ख फैडरेशन ने भी प्रमुख भूमिका अदा की है.  
हम उनके आभार से इसे आपके लिए भी यहाँ दिखा रहे हैं तन की मोहब्बत का यह संदेश अधिक से अधिक लोगों तक फैले.....खास तौर पर उन लोगों तक की जो भारतियों, खास कर पंजाबियों और सिक्खों की जान के दुश्मन बने हैं.. यदि आपके पास भी कोई ऐसा ही वीडियो हो या फिर कोई एनी तस्वीर या आलेख तो उसे अवश्य भेजिए. हम उसे आपके नाम के साथ प्रकाशित करेंगे.--रेक्टर कथूरिया 

Sunday, June 19, 2011

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

सुभद्रा कुमारी चौहान की अमर रचना  
सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।
वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।
महाराष्टर-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।

निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।
अश्रुपूर्णा रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।
रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठुर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात?
जबकि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।
बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी रोयीं रिनवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,
'नागपूर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार'।
यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।
हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,
जबलपूर, कोल्हापूर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बड़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वन्द्ध असमानों में।
ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।
अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।

पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये अवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।

घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी, 
दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।

तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

झाँसी की रानी की समाधि पर / सुभद्राकुमारी चौहान

इस समाधि में छिपी हुई है, एक राख की ढेरी |
जल कर जिसने स्वतंत्रता की, दिव्य आरती फेरी ||
यह समाधि यह लघु समाधि है, झाँसी की रानी की |
अंतिम लीलास्थली यही है, लक्ष्मी मरदानी की ||

यहीं कहीं पर बिखर गई वह, भग्न-विजय-माला-सी |
उसके फूल यहाँ संचित हैं, है यह स्मृति शाला-सी |
सहे वार पर वार अंत तक, लड़ी वीर बाला-सी |
आहुति-सी गिर चढ़ी चिता पर, चमक उठी ज्वाला-सी |

बढ़ जाता है मान वीर का, रण में बलि होने से |
मूल्यवती होती सोने की भस्म, यथा सोने से ||
रानी से भी अधिक हमे अब, यह समाधि है प्यारी |
यहाँ निहित है स्वतंत्रता की, आशा की चिनगारी ||

इससे भी सुन्दर समाधियाँ, हम जग में हैं पाते |
उनकी गाथा पर निशीथ में, क्षुद्र जंतु ही गाते ||
पर कवियों की अमर गिरा में, इसकी अमिट कहानी |
स्नेह और श्रद्धा से गाती, है वीरों की बानी ||

बुंदेले हरबोलों के मुख हमने सुनी कहानी |
खूब लड़ी मरदानी वह थी, झाँसी वाली रानी ||
यह समाधि यह चिर समाधि है , झाँसी की रानी की |
अंतिम लीला स्थली यही है, लक्ष्मी मरदानी की |
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"लक्ष्मी-पुत्रों" को अपने देश में हमेशा "बिशेष-दर्जा" प्राप्त रहा

Fri, Jun 17, 2011 at 6:02 PM 
स्वामी निगमानंद:लक्ष्य मिला न ठाम:जय हो लक्ष्मी मैया की
निगमानन्द जी बिना हो हल्ला के इस "असार" संसार को छोड़ कर चले गए और छोड़ गए गंगा को उसकी उसी पीड़ा के साथ जिसके लिए उन्होंने जान दिया। इसी के साथ उनके जननी और जनक की मानसिक छटपटाहट को भी समझने की जरूरत है। निगमानन्द कब अनशन पर बैठे? कब कोमा मे गए? प्रायः सभी अनजान। उसी अस्पताल में बाबा रामदेव के प्रति सारा देश चिन्तित लेकिन वहीं निगमानन्द के बारे में चर्चा तक नहीं। जबकि उनके भी अनशन का उद्येश्य "सार्वजनिक-हित" ही था, अन्ना और रामदेव की तरह। मीडिया की कृपा हुई और सारा देश निगमानन्द के मरने के बाद जान पाया इसकी पृष्ठभूमि और मरने के बाद का किचकिच भी।
निगमानन्द के माता पिता ने लाश पर दावेदारी की, जो बहुत हद तक स्वभाविक भी है। संतान को नौ महीने अपने कोख में रखकर उसे पालने की पीड़ा एक माँ से बेहतर कौन जाने? यूँ तो किसी के सन्तान की मौत किसी भी माँ बाप के लिए असहनीय है लेकिन इस असहनीय पीड़ा के बाद भी यदि उस मृत सन्तान की लाश भी न मिले तो उसकी पीड़ा को सहानुभूतिपूर्वक समझने की जरूरत है।
निगमानन्द मिथिला का बेटा था। जन्म से लेकर मृत्यु तक जितने भी संस्कार होते हैं और उससे जुड़े सारे धार्मिक कर्म-काण्ड का मिथिला में एक अलग महत्व है और इस दृष्टिकोण से सम्भवतः पूरे देश में सबसे अलग एवं अग्रणी। संस्कृत मे एक उक्ति भी है "धर्मस्य गुह्यं ज्ञेयो मिथिलायां व्यवहारतः"। लेकिन निगमानन्द के माता पिता को अपने पुत्र की ही लाश नहीं मिली सशक्त दावा पेश करने के बाद भी। स्थानीय प्रशासन ने भी मना कर दिया। हाँ इजाजत मिली भी तो शांति पूर्वक अंतिम संस्कार (भू-समाधि) देखने के लिए जो कि मिथिला की संस्कृति में किसी भी हाल में स्वीकार्य नहीं है कम से कम ब्राह्मण परिवार में।
जिस आश्रम में निगमानन्द रहते थे उसके प्रमुख शिवानन्द जी की "वाणी" सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वे एक पुरानी चिट्ठी को संदर्भित करते हुए बड़े ही तार्किक ठंग से फरमा रहे थे कि "एक सन्यासी का लाश एक गृहस्थ को नहीं दिया जा सकता"। अन्ततोगत्वा नहीं ही दिया गया। सन्यासी का मोटा मोटी जो अर्थ जो आम जनों की भाषा में समझा जाता है वो यह कि जो व्यक्तिगत भौतिकता की मोह छोड़ कर "बहुजन हिताय बहुजन सुखाय" कार्य करे। आदरणीय शिवानन्द जी तो उस सन्यासियों के प्रमुख हैं। फिर एक "लाश" से उनका इतना जबरदस्त "मोह" कैसा? वो भी तो किसी माँ की सन्तान हैं। क्या माँ की ममता का कोई मोल नहीं? यदि हाँ तो फिर ऐसे "सन्यास" का क्या मोल? जब किसी साधु- सन्यासी का भरण-पोषण भी इस समाज की उत्पादकता पर किसी न किसी रूप में निर्भर है तो क्या उस सन्यासी का उस समाज के प्रति कोई जवाबदेही नहीं? सामाजिक सम्वेदना से कोई सरोकार नहीं?
हमारे देश में मुख्यतः दो प्रकार के महत्वपूर्ण मंदिर पाये जाते हैं - एक "आस्था" के तो दूसरा "न्याय" के। मजे की बात है कि इन दोनों मंदिरों में या इसके इर्द-गिर्द, अभीतक ज्ञात या अज्ञात जितने भी प्रकार के भ्रष्टाचार हैं, अनवरत होते हैं। क्या मजाल जो आप इनके खिलाफ आवाज उठा दें? यदि न्यायलय के खिलाफ बोले तो "न्यायिक अवमानना" का खतरा और यदि आस्था के खिलाफ बोले तो "धार्मिक गुंडई" का डर। अतः "प्रिय शिवानन्द" जी के बारे में इससे अधिक कहना खतरों से खेलने जैसा लगता है। पता नहीं किसकी "धार्मिक भावना" को चोट लग जाए? सम्वेदनाएं मरतीं जा रहीं हैं। प्रशासन के लोग की भी अपनी बेबसी है। उन्हें मंत्रियों से निर्देश मिलता है और मंत्री जी की आत्मा निरन्तर जातिगत या धार्मिक "वोट" के लिए लालायित रहती है। तो फिर वो ऐसा खतरा कभी मोल लेंगे क्या? प्रशासन ने भी माता-पिता की ममता को कुचल दिया अपने आदेश से। 
लेखक श्यामल सुमन 
अन्ततः निगमानन्द के अंतिम संस्कार में वही हुआ जो उनके कौलिक-संस्कार से भिन्न था। उनके माता पिता का हाल भगवान जाने। गंगा-प्रदूषण बदस्तूर जारी है। आगे भी जारी रहेगा चाहे निगमानन्दों की फौज ही क्यों न अनशन पर बैठ जाय और प्राण-दान भी क्यों न कर दे। अन्ना और रामदेव जी के जबरदस्त आन्दोलन और उसके हस्र से अनुमान लगाना कठिन नहीं है। न गंगा को प्रदूषण से मुक्ति मिली और यदि मिथिला के "वयवहार" को मानें तो निगमानन्द को भी "मुक्ति" नहीं मिली। आखिर निगमानन्द को क्या मिला? "लक्ष्मी-पुत्रों" को अपने देश में हमेशा "बिशेष-दर्जा" प्राप्त रहा है और आगे भी रहेगा, इसकी पुरजोर सम्भावना है। जय हो लक्ष्मी मैया की। : श्यामल सुमन 

Thursday, June 16, 2011

इलाज के बहाने जहर दिया जाता रहा निगमानंद को ?

 तुमने उस देशभगत निगमानंद को मार डाला
कहा जाता है की स्वामी निगमानंद की तबीयत बिगड़ने पर जब उन्हें हॉस्पिटल लाया गया था , तो उन्हें  जहर दिया गया था | उनके पेराकारों का तो यहाँ तक कहना है की हॉस्पिटल के अन्दर इलाज के बहाने उनको जहर दिया जाता रहा और उनकी बिगड़ रही हालत को लोगों से छुपाया गया | ऐसा तभी हो सकता है जब सरकार उनको अपने रास्ते का काँटा समझ रहे उद्योगपतियों की दासी बन जाए | अपने आपको पार्टी विद डिफरेंस कहने वाली बीजेपी की सरकार ने गंगा को प्रदूषित कर रहे उद्योगपतियों और हिमालयन स्टोन क्रेशर के मालिक ज्ञानेश कुमार का खुलकर साथ दिया है | राजनेताओं को तो गंदगी फैलाने वाले थैलीशाहों के वोट भी चाहियें और नोट भी , इसलिए वो स्वामी निगमानंद जैसों का साथ देने की बजाए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उद्योगपतियों और थैलीशाहों का साथ देते रहेंगे | हम सबका फ़र्ज़ बनता है की हम इस नेक काम को करने में अपना हिस्सा डालें , जिसके लिए उन्होंने अपनी कुर्बानी दी |गंगा के प्रदूषित हो रहे पानी के इलावा सभी नदियों को प्रदूषित होने से बचाना होगा  .- रोशन सुचान 
9 दिनों के अनशन की नोटंकी वाले रामदेव और शहीद होने वाले निगमानंद एक ही हॉस्पिटल में
निगमानंद नहीं रहे , गंगा को बचाने की मांग को लेकर 68 दिनों तक अनशन करने के बाद स्वामी निगमानंद की मौत हो गई। उनका स्वामी होने का उतना महत्व नहीं था , जितना एक जनहितैषी किरदार का मनुष्य बनकर मानवता की भलाई में अपनी क़ुरबानी देने का है |  वे उसी  हॉस्पिटल में भर्ती थे, जहां बाबा रामदेव भी भर्ती थे । इससे पहले भी स्वामी निगमानंद जी ने क्रमवार 73 दिन , 68 दिन के इलावा लोहारीनागपाला जल विद्युत परियोजना को रद्द करने की मांग को लेकर भी अनशन किया था। ये बात सही है की जहां टी |आर| पी| है वहां मीडिया और जहां वोट हैं वहां राजनेता | याद रहे की सिर्फ 9 दिनों का अनशन करने वाले रामदेव का हाल जानने के लिए देशभर का मीडिया और हाई प्रोफाइल संत व नेता वहां जमावड़ा लगाए रहे, लेकिन कोमा की हालत में जीवन-मृत्यु से जूझ रहे निस्वार्थ योगी निगमानंद की किसी ने खबर नहीं ली , शाएद इसलिए की उन्होंने कोई स्टंट नहीं किया और रविवार की रात उनकी गुमनाम मौत हो गई। भारतीय समाज में जिस गंगा को गंगा माता कहकर पूजा जाता है , वो उस गंगा में डाली जा रही गंदगी के विरोधी थे | जो आवाज़ उन्होंने उठाई वो किसी ने नहीं सुनी और तब स्वामी ने कहा की जब तक गंगा में डाली जा रही गंदगी को बंद नहीं किया जाता ,  तब तक वो अनाज का एक दाना भी नहीं खायेंगे और वो मरणव्रत पर बैठ गये | कई उद्योगपति तो मान गये पर बीजेपी सरकार तक सीधी पहुंच रखने वाला हिमालयन स्टोन क्रेशर के मालिक ज्ञानेश कुमार नहीं मान रहा था और सरकार की पीठ पर सवार होकर वो अपनी जिद पर अड़ा रहा , हारकर स्वामी ने मोर्चा लगा लिया और अपनी जान देकर शहीद हो गये | कहा जाता है की स्वामी निगमानंद की तबीयत बिगड़ने पर जब उन्हें हॉस्पिटल लाया गया था , तो उन्हें  जहर दिया गया था | उनके पेराकारों का तो यहाँ तक कहना है की हॉस्पिटल के अन्दर इलाज के बहाने उनको जहर दिया जाता रहा और उनकी बिगड़ रही हालत को लोगों से छुपाया गया | ऐसा तभी हो सकता है जब सरकार उनको अपने रास्ते का काँटा समझ रहे उद्योगपतियों की दासी बन जाए | अपने आपको पार्टी विद डिफरेंस कहने वाली बीजेपी की सरकार ने गंगा को प्रदूषित कर रहे उद्योगपतियों और हिमालयन स्टोन क्रेशर के मालिक ज्ञानेश कुमार का खुलकर साथ दिया है | स्वामी शिवानंद ने राज्य की बीजेपी सरकार पर उद्योगपतियों , और उच्च पदों पर बैठे लोगों के इशारे पर इस युवा संन्यासी को जहर देकर मारने का आरोप लगाया है तथा पोस्टमार्टम  एम्स से करवाने की मांग की है | रही बात प्रदूषण की तो भारत में जल स्त्रोतों का प्रदूषण बढ़ रहा है , अगर प्रदूषण इसी तरह से बढता रहा तो हमारी अगली पीढियां अपने जन्म के साथ ही रोगों को लेकर पैदा होंगी , जिनका इलाज करना आसान नहीं होगा |  ये हमारी सबकी जिम्मेदारी होनी चाहिए पर इन कामों को करने के लिए कोई निगमानंद या संत सींचेवाल जैसे ही सामने आते हैं | राजनेताओं को तो गंदगी फैलाने वाले थैलीशाहों के वोट भी चाहियें और नोट भी , इसलिए वो स्वामी निगमानंद जैसों का साथ देने की बजाए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उद्योगपतियों और थैलीशाहों का साथ देते रहेंगे | 
रोशन सुचान
ले दे कर बात रही मीडिया की तो उनको भी रामदेव जैसे ड्रामेबाजों की खबर ज्यादा अहम लगती है और भारत के भविष्य के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाने वाले जिक्र के काबिल ही नहीं लगते | ये भी हमारे समाज का दुखांत ही है की कोई दल भी इन कामों के लिए अपनी दिलचस्पी नहीं दिखा रहा | जिस मकसद के लिए निगमानंद ने अपनी बली दी , वो अकेले उनकी नही पूरे समाज की समस्या थी | हम सबका फ़र्ज़ बनता है की हम इस नेक काम को करने में अपना हिस्सा डालें , जिसके लिए उन्होंने अपनी कुर्बानी दी |  शहीद स्वामी को सच्ची श्रधांजली है की गंगा के प्रदूषित हो रहे पानी के इलावा सभी नदियों को प्रदूषित होने से बचाना होगा | वहीं 68 दिनों के अनशन के बावजूद निगमानंद से बातचीत न करने तथा उद्योगपतियों और उच्च पदों पर बैठे लोगों के इशारे पर संन्यासी को जहर देकर मारने के आरोपों से विवादों में घिरी बीजेपी सरकार की जांच करवानी होगी - रोशन सुचान (दो टूक से साभार) 

Tuesday, June 14, 2011

सत्ता लोलुप दलों के सहारे कभी क्रांतियाँ नहीं होती

बदलाव निश्चित है : आम आदमी की ताकत ही क्रांती लाएगी न की सत्ता से बंधे दल 

अभी हाल ही में एक आलेख प्रकाशित हुआ था पंजाब स्क्रीन में जो हमें रवि वर्मा की ओर से प्राप्त हुआ. उनके लेख पहले भी पंजाब स्क्रीन में प्रकाशित होते रहे हैं और उन्हें पसंद भी किया जाता रहा है. अब जब थोडा सा विरोध हुआ तो उन्होंने  यह कहा क यह आलेख उनका लिखा हुआ ही नहीं है. उन्होंने स्पष्ट किया की उन्होंने इसे कापी पेस्ट किया था. अगर सच यह है तो रवि जी को मूल स्रोत का उल्लेख करना चाहिए था.  सत्य की आवाज़ में तभी दम होता है जब सत्य बोलने वाला खुद भी सामने आकर पूरी निडरता से इस सत्य की कीमत चुकाने को तैयार हो. मुझे वो शेयर याद आ रहा है : 
जिस धज से कोई मकतल में गया, वोह शान सलामत रहती है, 
यह जान तो आनी जानी है;  इस जान की कोई बात नहीं...!  
महेंद्र कचोलिया जी को यह बात याद रझने चाहिए की अगर आज किसी की पुकार सुन कर भी सवा करोड़ लोगों में से केवल एक लाख लोग ही मैदान में आते हैं तो कसूर लोगों का नहीं उन नेतायों का है जिनकी अपने आवाज़ में कभी सच नहीं होता. वे पुकारते हैं. लोगों को भड़काते हैं और जब गोली चलती है तो खुद किसी पिछले दरवाज़े से निकल कर सुरक्षित स्थानों पर पहुँच जाते हैं. इतिहास गवाह है की जब जब भी अगुवाई करने वाले सचे मन से आगे आये हैं तब तब लोगों ने भी उनके एक इशारे पर अपना सब कुछ न्योछावर किया. सत्ता के लिए गिरगिट की तरह रंग बदलने वालों के सहारे कभी क्रांतियाँ नहीं होती. दूसरों पर कुर्बानी का उपदेश तभी असर करता है जब आह्वान करने वाला खुद भी हर कुर्बानी के लिए तैयार हो. हमें इस पर आपके विचारों की इंतज़ार रहेगी पर उससे पहले पढिये. महेंद्र कचोलिया और रवि वर्मा के विचार  --रेक्टर कथूरिया 


रवि भाई, 
बातें सच हैं.. बात कहने का तरीका थोडा गलत हैं…. 
देश में हताशा है… आम आदमी में हताशा है…. आम आदमी की मानसिकता बदल गयी है… बेईमानी अब सहज हो गयी ..लोगों के दिमाग पर सुबह सुबह न्यूज़पेपर…. पूरा दिन चलने वाले मीडिया… ने घोटाला घोटाला घोटाला कर के लोगों का मानस ही ऐसा बना दिया कि आम इन्सान अब बेईमान हो गया … हजारों करोड़ों के घोटाले mein आम आदमी को लगता है…क्या हुआ जो मैंने 2-5000 कि रिश्वत खाई….


आपने एक बात सच कही…. जनता मुद्दे के साथ है …फिर चाहे उसे अन्ना उठाये… चाहे  बाबा रामदेव या चाहे आप उठाएं….


टुनिशिया  मैं एक आदमी ने पहल कि और सर्कार बदल डाली… मगर हिंदुस्तान की जनता में तो इतना भी दम नहीं कि एक कॉमन काज के लिए घर से बहार निकले… टुनिशिया कि आबादी कितनी थी…. 10 लाख लोग सड़कों पर थे… यहाँ 125 करोड़ लोगों में से 1 लाख लोग आये थे बाबा के साथ…

चलो इस देश की यही नियति है तो कौन क्या कर सकता है ?

 दूसरी और इस पर अपनी जवाबी प्रतिक्रिया में रवि वर्मा लिखते हैं...:

आदरणीय महेंद्र कचोलिया जी

आपके पत्र के लिए आपका धन्यवाद् | मैं यहाँ स्पष्ट कर दूँ कि ये लेख मैंने नहीं लिखा है मैंने बस आप लोगों के लिए कॉपी करके पेस्ट किया है |

कहाँ जाता है कि जब घुप्प अँधेरा होता है तो सुबह भी जल्दी आती है और मुझे अब लग रहा है कि सवेरा जल्दी आएगा | बदलाव तो होना है, ये निश्चित है | आज देश में गरीबों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। विकास का लाभ चन्द लोगों के हाथों में सिमटता जा रहा है। योजना आयोग के अनुसार 2004-05 में भारत में गरीबों की संख्या 27 फीसदी थी। जो योजना आयोग के ही अनुसार अब बढ़कर 32 फीसदी हो गयी है। इतना ही नहीं, विकास की दर 8 या 9 प्रतिशत बताई जा रही है, उसके बावजूद गरीबों की संख्या इतनी बढ़ गयी है। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद, जिसकी अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गाँधी हैं, ने कहा है कि यदि देश में खाद्य सुरक्षा कानून बनाना है तो भारत की 70 फीसदी आबादी को 2 या 3 रूपये प्रति किलो अनाज देना पड़ेगा। मतलब यह हुआ कि देश की 70 फीसदी आबादी अत्यंत गरीब है। फिर हम दुनिया के मंचों पर, मूँछों पर ताव देकर, यह क्यों कहते हैं कि भारत तेजी से आर्थिक प्रगति कर रहा हैੈ भारत के कुछ लोग बेहद धनी होते जा रहे हैं, पर साफ ज़ाहिर है कि इस आर्थिक प्रगति का लाभ आम आदमी को नहीं मिल रहा। इसका मूल कारण है भ्रष्टाचार। जो धन जनता के हित की योजनाओं पर खर्च होना चाहिए, वह भ्रष्टाचारियों की जेब में जा रहा है और इस लूट में कई बड़े औद्योगिक घराने भी शामिल हैं। फिर भी भ्रष्टाचार के इस विकराल स्वरूप के बारे में कोई भी राजनैतिक दल गम्भीर नहीं है। बयान सब देते हैं। पर अपना आचरण बदलने को कोई तैयार नहीं। नतीज़तन आम जनता मंहगाई की मार के साथ साथ भरष्टाचार झेल रही है। ऐसे में जो नेतृत्व का शून्य पैदा हो गया था, उसे भरने के लिए अन्ना हजारे व बाबा रामदेव जैसे लोग मैदान में उतर रहे हैं। भ्रष्टाचार के विरूद्ध इनका अभियान बिल्कुल उचित है और इनका हठ भी सही है। क्योंकि बिना डरे राजनैतिक दल कुछ भी बदलने नहीं जा रहे। ये आपस में छींटाकशी करते रहेंगे और उसका राजनैतिक फायदा लेते रहेंगे। भ्रष्टाचार को निपटाने की कोई कोशिश नहीं करेंगे। इसलिए किसी न किसी को तो यह जिम्मेदारी लेनी ही थी। अब स्वामी रामदेव और अन्ना हजारे ने ली है तो उन्हें इस लड़ाई को अंजाम तक ले जाना होगा। इसमें अनेक बाधाऐं भी आयेंगी। कुछ तो राजनैतिक दलों की ओर से और कुछ निहित स्वार्थों की ओर से। इस लड़ाई में देश के हर जागरूक नागरिक को हिस्सा लेना चाहिए। जरूरी नहीं कि सब एक मंच पर से ही लड़ें। भारत-पाकिस्तान का युद्ध होता है तो कश्मीर, पंजाब, राजस्थान और गुजरात के मोर्चे पर अलग-अलग लड़ा जाता है। भ्रष्टाचार से युद्ध भी भारत-पाक युद्ध से कम नहीं है। इसलिए जिसे जहाँ, जैसा मंच मिले, जुट जाना चाहिए। सफलता और असफलता तो भगवान के हाथ में है लेकिन कर्म तो करना होगा | हृदय से सभी चाहते हैं कि ऐसे सभी प्रयास सफल हों और आम आदमी को भ्रष्टाचार से राहत मिले।
रवि

हम सब क्रांति के प्रति जबाबदेह हैं--चे ग्वेरा

चे ग्वेरा की क्रांति की व्याख्या- फिदेल कास्त्रो
सन् 1965 के दौरान चे ग्वेरा के गायब हो जाने को लेकर तरह-तरह की अंफवाहें उड़ाई जा रही थीं। इस तरह की भ्रमपूर्ण और गलत खबरों को जानबूझकर हवा दी जा रही थी, जिसमें क्रांतिकारी दस्तों में फूट पड़ जाए। इन अफवाहपूर्ण खबरों में दावा किया जाता था कि फिदेल कास्त्रो और चे ग्वेरा के बीच विद्यमान राजनीतिक समझदारी का अंत हो गया है, यह कि कास्त्रो ने चे पर प्रतिबंध लगा दिए हैं, उन्हें निर्वासित कर दिया गया है, या कि चे की हत्या की जा चुकी है। जानबूझकर पूर्वोक्त किस्म के विभ्रमों को सप्रयास फैलाया जा रहा था। 
28 सितंबर 1965 को आयोजित एक विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए फिदेल कास्त्रो ने घोषणा की कि कुछ ही दिनों में वह चे ग्वेरा के उस पत्र को सार्वजनिक करेंगे जिसे चे ने क्यूबा छोड़ने से बिलकुल पहले लिखा था। इसी सभा में कास्त्रो ने कहा, ੋआने वाले अवसर पर हम जनता को कामरेड अर्नेस्टो चे ग्वेरा के बारे में बताएंगे।ੋ कास्त्रो ने इसके आगे कहा कि शत्रु इस मामले में एक बहुत बड़ी साजिश का अनुमान कर रहा है और ढेरों भ्रम फैला रहा है कि वे यहां हैं, कि वे वहां हैं, वे जिंदा हैं या उनकी मृत्यु हो चुकी है। इस समय वे भ्रमित हैं और लगातार भ्रमों की ही खोज कर रहे हैं। वे कपटपूर्ण बातें बना रहे हैं। हम कामरेड अर्नेस्टो चे ग्वेरा के एक दस्तावेज को आपके सामने लाना चाहते हैं, जिसमें उन्होंने अपनी अनुपस्थिति के बारे में बताया है, उसकी व्याख्या की है। लेकिन जैसा मैंने आपको पहले ही बताया कि इसके लिए एक पूरी बैठक की आवश्यकता होगी (अभी की आवाजें)। अभी नहीं, क्योंकि मैं यहां वह दस्तावेज नहीं लाया हूं। वैसे मैंने यह घोषणा साधारण रूप में ही की है||||जैसा मैंने आपको बताया कि उस अवसर पर हम (चे) के उस दस्तावेज को पढ़ेंगे और कुछ मुद्दों पर चर्चा भी करेंगे। कास्त्रो द्वारा इंगित बैठक से तात्पर्य क्यूबाई कम्युनिस्ट पार्टी की नव गठित केंद्रीय समिति के साथ आयोजित बैठक से था, जिसका सार्वजनिक रूप से सीधा प्रसारण हुआ। पार्टी की इस नव गठित केंद्रीय समिति में स्पष्ट रूप से चे ग्वेरा का नाम नहीं था। इस तथ्य को फिदेल कास्त्रो ने अपने 3 अक्टूबर 1965 को दिए गए भाषण में स्पष्ट किया। इस सभा में श्रोताओं के रूप में ग्वेरा का परिवार भी उपस्थित था।पार्टी की हमारी केंद्रीय समिति से एक खास व्यक्ति अनुस्थित है जिसमें सभी आवश्यक वरीयताएं और गुण विद्यमान हैं। लेकिन उस व्यक्ति का नाम पार्टी की केंद्रीय समिति के घोषित सदस्यों में नहीं है। शत्रु इसमें सक्षम है कि वह इस विषय में कोई इंद्रजालिक कल्पना कर ले। लेकिन इन भ्रमों को उत्पन्न करने की कोशिशें करते हुए शत्रु थक चुका है, वह संशय और अनिश्चितता उत्पन्न करने की अपनी कोशिशों से परेशान हो चुका है और इस सबका हमने बहुत धैर्यपूर्वक इंतजार किया है क्योंकि ऐसे समय पर इंतजार करना आवश्यक था।यह अंतर क्रांतिकारियों और प्रति-क्रांतिकारियों, साम्राज्यवादियों और क्रांतिकारियों के बीच का है। क्रांतिकारी जानते हैं कि इंतजार किस तरह से किया जाता है। हम जानते हैं कि किस तरह से धैर्य रखा जाता है। हम कभी निराश नहीं होते हैं। जबकि प्रतिक्रियावादी, प्रति-क्रांतिकारी हमेशा निराशा की स्थिति में ही रहते हैं, सतत उद्विग्नता के शिकार रहते हैं और निरंतर झूठ बोलते रहते हैं। और यह सब भी वे अत्यंत छिछले और घृणित तरीके से ही करते हैं।आप उन यांकी सीनेटरों और अधिकारियों की लिखी चीजें पढ़ें, तब स्वयं से प्रश्न करेंਸ जो व्यक्ति अपने सहयोगियों के साथ संतुलित बरताव नहीं कर पा रहा है वह कांग्रेस में क्या करता होगाੈ इनमें से कुछ तो सर्वोच्च स्तर की मूर्खता का ही प्रतिनिधित्व करते हैं। ये लोग विस्मयकारी ढंग से झूठ बोलने की आदत से ग्रस्त हैं। सच मायने में वे झूठ बोले बिना जीवित ही नहीं रह सकते हैं। वे सचाई से भयग्रस्त रहते हैं। वही, यदि क्रांतिकारी सरकार एक बात कहती है, तो आगे भी वही बात कहती है। जबकि शत्रु इसमें तीव्रता देखते हैं, भयावहता देखते हैं, और सबसे बड़ी बात कि वे इस सबके पीछे एक योजना, षडयंत्र देखते हैं! यह सब कितना हास्यास्पद है! वे किस डर में जीते हैं! और इस सबको देखकर आप कह सकते हैं ਯ क्या वे इसी पर विश्वास करते हैं क्या वे जो कहते हैं उन पर विश्वास करते हैंੈ क्या वे अपनी ही कही बातों पर विश्वास करने की आवश्यकता महसूस करते हैंੈ क्या वे उन सब बातों पर विश्वास किए बिना जीते हैं जिन्हें वह दिन-प्रतिदिन कहते रहते हैंੈ या वे इसीलिए सब कुछ कहते हैं कि उस पर विश्वास नहीं किया जाए.
इस विषय में कुछ भी कहना मुश्किल है। असल में चिकित्सकों और मनोवैज्ञानिकों के मस्तिष्क में क्या है कौन सा डर है जो उन्हें हर चीज भयग्रस्त कर देती है या किसी भी चीज से उन्हें तीव्र, लड़ाकू और आतंककारी योजना का ही आभास होता रहता हैੈ वे बिलकुल नहीं जानते कि साफ हाथों और सचाई से लड़ाई करने से बेहतर कोई और तकरीब या रणनीति नहीं होती। क्योंकि यही वे हथियार हैं जो आत्मविश्वास पैदा करते हैं, विश्वास बढ़ाते हैं, सुरक्षा, गरिमा और नैतिकता को बढ़ाते और प्रसारित करते हैं। और हम क्रांतिकारी शत्रुओं को पराजित करने, उन्हें नेस्तनाबूत करने के लिए इन्हीं हथियारों का प्रयोग करते हैं।
झूठ! क्या आज तक किसी ने क्रांतिकारियों के मुंह से झूठ सुना हैੈ झूठ वह हथियार है जो कभी भी क्रांतिकारियों की मदद नहीं कर सकता है। और किसी भी गंभीर, अच्छे क्रांतिकारी के लिए इस बेहूदे हथियार की कभी कोई आवश्यकता भी नहीं रही है। उनका हथियार तर्क होता है, नैतिकता होता है, सचाई होता है, एक विचार की रक्षा करना होता है, एक प्रस्ताव होता है, एक पक्ष (पोजीशन) ग्रहण करना होता है।ੋ
संक्षेप में, हमारे विरोधियों द्वारा प्रयुक्त नैतिकता संबंधी नियमावली वास्तविकता में दयनीय है। इस तरह भविष्यवक्ता, पंडित, क्यूबाई मामलों के विशेषज्ञ नियमित रूप से काम कर रहे हैं कि सामने आ पड़ी इस पहेली को सुलझाया जा सके। क्या चे ग्वेरा की मृत्यु हो चुकी है क्या अर्नेस्टो चे ग्वेरा बीमार हैं क्या अर्नेस्टो चे ग्वेरा के क्यूबा से मतभेद उत्पन्न हो चुके हैंੈ और भी इसी तरह के ढेरों बेहूदा कयास। स्वाभाविक रूप से यहां के लोगों का विश्वास मजबूत है। यहां लोग विश्वास करते हैं। लेकिन शत्रु इसी तरह की चीजों का प्रयोग करता है, विशेषकर बाहर रहकर वह भ्रम फैलाते हैं। वे हमारे ऊपर मिथ्यापवाद करते हैं। यहां, क्यूबा के विषय में उनका कहना है कि यहां एक विध्वसंक, भयावह कम्युनिस्ट शासन है। बिना कोई सबूत छोड़े लोग यहां से गायब हो रहे हैं। बिना कारण बताए उन्हें निर्वासित किया जा रहा है। और जब लोगों ने उन सबकी अनुपस्थिति को रेखांकित किया, तब हमने कहा कि हम उन्हें उचित समय पर वह सब बताएंगे। इसका मतलब इंतजार करने का कोई कारण था।
हम साम्राज्यवादी शक्तियों की घेरेबंदी में रहते और काम करते हैं। यह विश्व सामान्य परिस्थितियों में नहीं है। इतने लंबे समय तक वियतनामी लोगों के ऊपर यांकी साम्राज्यवाद के आपराधिक बम गिरते रहे, हम नहीं कह सकते कि हम सामान्य परिस्थितियों में हैं। स्थिति ऐसी है कि 1,00,000 से अधिक यांकी सैनिक मुक्ति आंदोलन का दमन करने के लिए भूमि पर उतर चुके हैं। अब साम्राज्यवादी भूमि के सैनिक एक गणतंत्र में, जिसे अन्य गणतंत्रों के समान अधिकार प्राप्त है, वे सैनिक उसकी सार्वभौमिकता को नष्ट कर रहे हैं। यह स्थिति डोमनिक गणतंत्र की तरह है। तात्पर्य यह है कि विश्व सामान्य परिस्थितियों में नहीं है। जब हमारे देश घिरे हुए हैं, तब साम्राज्यवादी भाड़े के टट्टू और नियोजित आतंकवादी कार्रवाइयां बेहूदे तरीके से की जा रही हैंਸ जैसे कि सिएरा एरेनजाजू (निष्काषित किए गए प्रति-क्रांतिकारियों द्वारा स्पेनी व्यापारिक जहाज पर आक्रमण) के मामले में हुआ। उस समय साम्राज्यवादी धमकाते थे कि वे लैटिन अमरीका या विश्व के किसी भी देश में हस्तक्षेप कर सकते हैं। तात्पर्य सीधा है कि हम सामान्य परिस्थितियों में नहीं रह रहे हैं। हम क्रांतिकारी कभी सामान्य परिस्थितियों में नहीं रह पाते हैं। बावजूद इसके, उस समय जब हम भूमिगत रूप से बाटिस्टा की तानाशाही का मुकाबला कर रहे थे, तब भी हमने संघर्ष के नियमों का पालन किया। इसी तरह, जब इस देश में क्रांतिकारी सरकार की स्थापना हो गई, विश्व को इसे वास्तविक रूप में स्वीकार करना चाहिए था। लेकिन ऐसी स्थिति में भी हमने (तब भी) संघर्ष के नियमों का उल्लंघन नहीं किया। इसका सीधा मतलब है कि विश्व सामान्य परिस्थितियों में नहीं है।
इसकी व्याख्या के लिए मैं अर्नेस्टो चे ग्वेरा के हस्तलिखित-टाइप पत्र को पढ़ने जा रहा हूं, जो सारे मामले की स्वयं ही व्याख्या करता है। मुझे विस्मय होगा यदि मुझे अपनी मित्रता और साथीपन को बताने की आवश्यकता हो कि कैसे इस मित्रता की शुरुआत हुई और यह किन परिस्थितियों में इसका विकास हुआ।मुझे लगता है कि इसकी आवश्यकता नहीं। मैं स्वयं को उनके पत्र को पढ़ने तक ही सीमित रखूंगा।
मैं इसे पढ़ता हूं ਯ हवाना|||||ੋ इसमें कोई तारीख नहीं पड़ी है, क्योंकि इस पत्र के विषय में उद्देश्य था कि उसे किसी उचित अवसर पर पढ़ा जाए। लेकिन ध्यान रहे कि यह इसी साल के अप्रैल की पहली तारीख को प्राप्त हुआ था। आज से बिलकुल छह महीने और दो दिन पहले। मैं इसे पढ़ना शुरू करता हूं।
हवाना
कृषि वर्ष
फिदेल ਯ
इस क्षण मैं कई चीजें याद कर रहा हूं। वह क्षण जब मैं तुमसे (क्यूबाई क्रांतिकारी) मारिया एंटोनियो के घर पर पहली बार मिला था। उसी समय तुमने मुझसे साथ काम करने का प्रस्ताव दिया था। शुरुआती तैयारियों के दौरान ढेरों समस्याएं और तनावपूर्ण स्थितियों का सामना करना पड़ा। एक दिन वे वापस आए और पूछा कि मौत के मामले में किसको जिम्मेदार ठहराया जाए, और वास्तव में इस सबकी जिम्मेदारी किसके ऊपर है। बाद में हमने इस सचाई को जाना कि क्रांति (यदि यह वास्तविक हो) में या तो व्यक्ति जीता है या फिर उसकी मृत्यु होती है। हमारे कई साथी हमें विजय के रास्ते पर छोड़कर आंख मूंद कर चले गए।
आज ये सारी चीजें कम नाटकीय प्रतीत होती हैं क्योंकि हम अधिक परिपक्व हो चुके हैं। लेकिन घटनाएं तो स्वयं को दोहराती हैं। मुझे प्रतीत होता है कि क्यूबाई क्रांति के साथ संबध्द मैंने अपने कर्तव्य को पूरा कर दिया है। और अब मैं तुमसे विदा कहता हूं। सभी साथियों को और तुम्हारे आदमियों को, जो अब मेरे हैं, विदा कहता हूं। अब मैं औपचारिक रूप से पार्टी की नेतृत्व स्थिति के साथ मंत्रीपद और कमांडर के ओहदे से भी त्यागपत्र देता हूं। इसके साथ ही साथ मैं क्यूबाई नागरिकता से भी त्यागपत्र देता हूं। इसके साथ क्यूबा के प्रति मेरा कोई विधिक दायित्व शेष नहीं रह गया है। लेकिन अब दायित्व कुछ प्रकृति का हो गया है। एक ऐसी प्रकृति का दायित्व जिसे उस तरह से नहीं तोड़ा जा सकता है जिस तरह किसी पद के साथ संलग्न दायित्व से पृथक हुआ जाता है।
अपने पिछले जीवन को याद करते हुए मुझे विश्वास है कि मैंने पर्याप्त एकलयता और समर्पण के साथ क्रांतिकारी कार्यों और उसकी विजय में योगदान किया है। केवल मेरी पहली गंभीर असफलता ने तुम्हारे ऊपर मेरे विश्वास को बढ़ा दिया है। सिएरा मनेस्ट्रा के पहले क्षण से ही नेतृत्व और क्रांतिकारिता के तुम्हारे गुण को शीघ्रता से नहीं सीख पाया हूं।
वास्तव में मैं यहां बहुत ही भव्य और गरिमामय दिनों में रहा हूं। कैरेबियन (मिसाइल) संकट के बुरे समय में भी तुम्हारी तरफ से तुम्हारे लोगों के जुड़ाव को तीव्रता से महसूस करता रहा हूं। उन दिनों को याद करते हुए कहता हूं कि ऐसा शायद ही कभी हुआ हो, जब किसी नेतृत्वकर्ता ने तुम्हारी तरह की बुध्दिमत्ता का प्रदर्शन किया हो। मैं स्वयं पर गर्व करता हूं कि मैंने तुम्हारा अनुकरण किया। बिना किसी झिझक के तुम्हारे प्रति यह आस्था इसके साथ जुड़े खतरों का आकलन करते हुए और सिध्दांतों पर आस्था रखते हुए थी।संसार के कई अन्य देश भी मेरे साधारण प्रयासों की उपेक्षा कर रहे हैं। मैं उन दायित्वों को पूरा कर सकता हूं, जिन्हें तुमने अस्वीकृत किया है। जाहिर सी बात है कि तुम्हारी जिम्मेदारी क्यूबाई प्रमुख के रूप में है। इस कारण हम दोनों के अलग होने का समय आ गया है।
मैं जानता हूं कि वह अवसर गम और खुशी दोनों का है। मैं अपनी सबसे शुध्दतम आशाएं निर्माता और अपने आत्मियों में सबसे प्रिय के प्रति छोड़े जाता हूं। साथ ही एक ऐसे व्यक्ति से दूर हो रहा हूं, जिसने मुझे एक पुत्र की तरह प्यार किया है। सच में, यह बात मेरी भावनाओं पर एक जख्म की तरह है। मैं एक नए युध्द क्षेत्र की ओर इस विश्वास के साथ जा रहा हूं कि तुम मेरा मार्गदर्शन करोगे। मेरे लोगों की भावनाएं किसी पवित्र कर्तव्य को पूरा करने और साम्राज्यवाद के प्रति लड़ने के लिए विद्यमान हैं। यह आश्वासन सभी आंतरिक घावों और चोटों से बढ़कर है।
मैं एक बार पुनਯ दोहराता हूं कि अब उदाहरणों के सिवा क्यूबा के प्रति मैं अपनी समस्त जिम्मेदारी से मुक्त होता हूं। लेकिन यह याद रखना कि यदि मेरा अंतिम समय किसी दूसरी धरती-आकाश के नीचे आता है, निश्चित रूप से मेरा अंतिम विचार तुमतुम्हारे लोगों के बारे में ही होगा। मैं तुम्हारी शिक्षाओं और तुम्हारे द्वारा दिए गए उदाहरण के लिए तुम्हें शुक्रिया अदा करता हूं। और मैं कोशिश करूंगा कि मैं अपने कार्यों को अंतिम परिणाम तक पहुंचा सकूं।
हमारी क्रांति की विदेश नीति के लिए मुझे हमेशा याद किया जाएगा, शायद आगे भी। मैं जहां भी रहूंगा, क्यूबाई क्रांतिकारी होने के दायित्व का निर्वाह करूंगा, और इसी गरिमा के अनुरूप व्यवहार भी करूंगा। मुझे खेद है कि मैं अपने बीवी-बच्चों के लिए कुछ भी नहीं छोड़कर जा रहा हूं। लेकिन मैं इस स्थिति में भी खुश हूं। मुझे उनके लिए इसके अलावा और कुछ नहीं चाहिए कि राज्य उन्हें रहने के लिए पर्याप्त जगह उपलब्ध करा दे और पर्याप्त शिक्षा दिला दे। तुमसे और अपने लोगों से कहने के लिए बहुत सारी बातें हैं, लेकिन मुझे महसूस होता है कि वे अनावश्यक हैं। शब्द सब कुछ नहीं व्यक्त कर सकते हैं, जिनकी हम उनसे अपेक्षा करते हैं। और मैं नहीं सोचता कि अनावश्यक ही ढेरों पृष्ठ रंगे जाएं।
विजय की ओर आगे हमेशा! मृत्यु या जन्मभूमि! मैं अपने समस्त क्रांतिकारी उत्साह के साथ तुम्हारा आलिंगन करता हूं। चे| जो लोग क्रांतिकारियों के विषय में कहते हैं, और विश्वास करते हैं कि क्रांतिकारी व्यक्ति ठंडे, असंवेदनशील और भावनाहीन व्यक्ति होते हैं, उनके लिए यह पत्र सभी किस्म की भावनाओं, संवेदनाओं के साथ परिपूर्णता का उदाहरण होगा। कॉमरेड यह कोई जिम्मेदारी नहीं ,जिसका हमसे जुड़ाव हो ‍।हम सब क्रांति के प्रति जबाबदेह हैं।और यह हम सभी की जिम्मेदारी है कि हम अपनी सर्वोच्च क्षमता के साथ क्रांतिकारी आंदोलन का समर्थन और सहयोग करें। हम इस जिम्मेदारी इसके परिणाम और इसके साथ जुड़े खतरों का भी अहसास करते हैं। हम इन सात वर्षों से अधिक के समय में यहां साम्राज्यवादी शक्तियों की उपस्थिति को अच्छी तरह समझ गए हैं। साथ ही इस बात को भी अच्छी तरह से समझ गए हैं कि यहां किस तरह लोगों का शोषण किया जाता है और उन्हें किस चरह उपनिवेशित किया जाता है। हम इन विद्यमान खतरों के साथ आगे बढ़ेंगे और लगातार क्रांति के दायित्व को निभाते रहेंगे।

इस कर्तव्य को पूरा करना हमारी जिम्मेदारी है और कामरेड चे ग्वेरा की पूर्वोक्त भावनाओं के प्रति अत्यधिक सम्मान है। यह आदर स्वतंत्रता और अधिकार के प्रति है। वह सच्ची स्वतंत्रता हैउनकी स्वतंत्रता नहीं, जो हमें बेड़ियों में कसना चाहते हैं, बल्कि उन लोगों की स्वतंत्रता है जिन्होंने गुलामी की जंजीरों के विरुध्द बंदूकें उठाई हैं।
मि|(राष्ट्रपति) जॉनसन, हमारी क्रांति एक अन्य तरह की स्वतंत्रता का दावा करती है! और वह जो क्यूबा छोड़कर साम्राज्यवादियों के साथ रहने के लिए जाना चाहते हैं, वह लोग जो साम्राज्यवादियों के लिए काम करने कांगो और वियतनाम जाना चाहते हैं, वे यह सब कर सकते हैं। सभी जानते हैं कि साम्राज्यवादियों की ओर से नहीं, बल्कि क्रांतिकारियों की ओर से जब भी लड़ाई के लिए आवश्यकता होती है, इस देश के प्रत्येक नागरिक ने कभी इनकार नहीं किया है।
यह एक स्वतंत्र देश है मि| जॉनसन, सभी के लिए स्वतंत्र ! और वह मात्र एक पत्र नहीं था, इसके अलावा हमारे पास अन्य साथियों के पत्र और शुभकामनाएं आ चुकी हैं। ये पत्र ੋमेरे बच्चों के लिएੋ या ੋमेरे माता-पिता के लिएੋ हैं। हम इन सभी पत्रों को उनसे संबंधित रिश्तेदारों और साथियों को देंगे। लेकिन इसके बावजूद हम उनसे यह अनुरोध भी करेंगे कि वे इन पत्रों को क्रांति को समर्पित कर दें, क्योंकि हमें विश्वास है कि ये दस्तावेज इतने महत्वपूर्ण हैं कि वे इतिहास का हिस्सा बनेंगे।
मुझे विश्वास है कि अब सभी चीजों की व्याख्या हो गई है। यहां हमें यही सब बताना था। बाकी को शत्रुओं की चिंताओं के लिए छोड़ देते हैं। हमारे सामने पर्याप्त लक्ष्य हैं, कई कार्य हैं जिन्हें पूरा करना है। अपने देशवासियों और विश्व के प्रति कई कर्तव्यों को निभाना है, और हम सब उसे पूरा करेंगे। (दो टूक से  साभार

Monday, June 13, 2011

जून, 1975 और जून, 2011 // लालकृष्ण आडवाणी


भारतीय जनसंघ एवं भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्‍यक्ष। भारत के उप
 प्रधानमंत्री एवं केन्‍द्रीय गृहमंत्री रहे। राजनैतिक शुचिता के प्रबल पक्षधर।  
प्रखर बौद्धिक क्षमता के धनी एवं बृहद जनाधार वाले करिश्‍माई व्‍यक्तित्‍व।
 वर्तमान में भाजपा संसदीय दल के अध्‍यक्ष एवं लोकसभा सांसद।
हस्तरेखा विशेषज्ञ, ज्योतिषियों इत्यादि के प्रति मेरा सदैव अविश्वास रहा है। राजनीति में ऐसे अनेक हैं जो अपने विश्वस्त ज्योतिषी की सलाह के बिना किसी नए प्रोजेक्ट को शुरु करने से हिचकते हैं।
मैं अक्सर एक ऐसे अवसर का स्मरण करता हूं जब मेरा यह अविश्वास बुरी तरह से हिल गया।
1970 के दशक में हमारी पार्टी (तब जनसंघ) की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में एक प्रतिष्ठित पेशेवर ज्योतिषी डा. वसंत कुमार पंडित थे। वे मुंबई से थे (तब बम्बई)। वह पार्टी के प्रतिबध्द कार्यकर्ताओं में से थे जो कश्मीर के पूर्ण विलय के आंदोलन और आपातकाल के विरुध्द आन्दोलन सहित चौदह बार जेल गए थे। पार्टी में काम करते-करते पहले वह बंबई शहर जनसंघ और बाद में महाराष्ट्र प्रदेश जनसंघ के अध्यक्ष बने।
***
गत् सप्ताह लखनऊ में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की दो दिवसीय बैठक हई। पार्टी अध्यक्ष श्री गडकरी ने 4 जून की शाम को मुझे समापन भाषण करने को कहा। मैंने अपने भाषण की शुरुआत इस टिप्पणी से की कि जून 1975 भारतीय राजनीति में कभी भी न भुलाये जा सकने वाले महीने के रुप में याद रहेगा। और मैंने आश्चर्य व्यक्त किया कि क्या जून 2011 भी हम सबके लिए ऐसा ही न भुलाये जा सकने वाला महीना बनने जा रहा है।
जून, 1975 में एक के बाद एक दो बड़ी घटनाएं घटीं।
11 जून को गुजरात विधानसभा चुनावों के परिणाम घोषित हुए। तब तक गुजरात कांग्रेस का अभेद्य दुर्ग था। लेकिन श्री मोरारजी देसाई के मार्गदर्शन में संयुक्त विपक्ष ने इस दुर्ग को धराशायी किया और राज्य विधानसभा में सफलता पाई।
उसके अगले दिन की घटना कांग्रेस पर बिजली गिरने समान थी। श्रीमती इंदिरा गांधी के विरुध्द दायर चुनाव याचिका के आधार पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने रायबरेली से उनका चुनाव रद्द कर दिया और भ्रष्ट चुनावी आचरण के आधार पर 6 वर्षों तक उनके चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी।
इन दो घटनाओं ने स्वभाविक रुप से सभी गैर-कांग्रेसी क्षेत्रों में एक किस्म का आशावाद भर दिया। वस्तुत: इसी माहौल में हमारी पार्टी की कार्यकारिणी की बैठक गुजरात विधानसभाई चुनावों की गणना के तत्काल बाद 15,16 तथा 17 जून को माऊण्ट आबू में हुई।
दूसरे दिन दोपहर के भोजन के पश्चात मैंने यूं ही वसंत कुमार से पूछा ”पण्डितजी, आपके नक्षत्र आगे के लिए क्या बोल रहे हैं? ”1976 की शुरुआत में लोकसभाई चुनाव होने थे। गुजरात के आधार पर मेरा राजनैतिक अनुमान मुझे 1976 के प्रति आशावादी बना रहा था। उनके उत्तर ने मुझे झकझोर दिया और साथ ही मेरे आशावाद को भी।
उन्होंने कहा ”आडवाणीजी, सच में मैं भी नहीं समझ पा रहा हूं, अपने स्वयं के अनुमान से जो मैं देख रहा हूं वे बताते हैं कि हम दो साल के वनवास की ओर बढ़ रहे हैं।”
दस दिन बाद 26 जून को प्रधानमंत्री ने आपातकाल की घोषणा कर दी।
वसंत कुमार की भविष्यवाणी के अनुरुप आपातकाल 21 महीने रहा !
वास्तव में यह दो वर्षीय वनवास ही सिध्द हुआ!
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सन् 2002 में अपने वर्तमान निवास स्थान 30, पृथ्वीराज रोड पर आने से पहले 32 वर्षों तक मैं C1/6, पण्डारा पार्क में रहा (1970 में जब से मैं पहली बार संसद के लिए चुना गया)। मेरे एकदम पडोस में टण्डन बंधु रहते थे: (जिनमें से एक गोपाल टण्डन, सूचना एवं प्रसारण मंत्री के रुप में मेरे विशेष सहायक थे तो दूसरे बिशन टण्डन आपातकाल के दौरान श्रीमती गांधी के साथ प्रधानमंत्री कार्यालय में संयुक्त सचिव थे)।
बिशन टण्डन की पुस्तक ”पीएमओ डायरी” एक ऐसा दस्तावेज है जो बताता है कि तीन वरिष्ठतम न्यायाधीशों – न्यायाधीश हेगड़े, न्यायाधीश शेलट और न्यायाधीश ग्रोवर-की वरिष्ठता को नजरअंदाज करना एक सुनियोजित प्रपंच था जिसका उद्देश्य मुख्य रुप से न्यायाधीश हेगड़े को मुख्य न्यायाधीश बनने से रोकना तथा उनके स्थान पर ए.एन.रे को बैठाना था। प्रधानमंत्री इसकी इच्छुक थीं कि यह सुनिश्चित हो जाए कि यदि उच्च न्यायालय उनके विरुध्द चुनाव याचिका स्वीकार कर भी ले तो सर्वोच्च न्यायालय उसे ठुकरा सके। यह संभव तो हुआ मगर आपातकाल के बाद, क्योंकि संविधान में किये गये संशोधनों और कानूनों ने वरिष्ठता के उल्लंघन को निरर्थक बना दिया।
11-12 जून की दोनों घटनाओं के बाद विपक्ष कुछ गिरफ्तारियां इत्यादि की उम्मीद तो कर रहा था। लेकिन हम में से किसी ने अप्रत्याशित आपातकाल जैसे की उम्मीद नहीं की थी -जिसमें मीडिया पर पूर्ण सेंसरशिप, युध्द की तुलना में भी ज्यादा कठोर, यहां तक कि संसदीय बहसों की रिपोर्ट पर भी सेंसरशिप लोकनायक जयप्रकाश, मोरारजी भाई देसाई, वाजपेयीजी, और चन्द्रशेखरजी जैसे नेताओं को कारावास, सभी प्रमुख विपक्षी सांसदों तथा एक लाख से ऊपर विपक्षी कार्यकर्ताओं को बन्दी बनाना शामिल था।
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5 जून की सुबह चेन्नई में वेणु श्रीनिवासन (टीवीएस) की सुपुत्री का एन.आर नारायणमूर्ति (इंफोसिस) के सुपुत्र से विवाह का निमत्रंण मुझे मिला था। 4 जून को मैं दिल्ली पहुंचा और अपनी सुपुत्री प्रतिभा के साथ लगभग अर्ध्दरात्रि को चेन्नई।
इसके कुछ घंटे बाद प्रतिभा ने मुझे जगाया और टीवी खोलने को कहा और रामलीला मैदान में बाबा रामदेव के भक्तों – पुरुषों, महिलाओं और बच्चों – पर हो रहे हमले को देखने को कहा। मैंने टीवी खोला और वास्तव में दिख रहे दृश्य रोंगटे खड़े कर देने वाले थे।
अगली सुबह हमारी स्थानीय ईकाई द्वारा आयोजित संवाददाता सम्मेलन में मैंने कहा: वहां जनरल डायर की बंदूकें और गोलियां नहीं थीं लेकिन महिलाओं और बच्चों पर होने वाले अत्याचारों ने जालियांवाला बाग कांड की याद ताजा करा दी।
अपने संवाददाता सम्मेलन में मैंने एक बार ताजा घटनाओं और 1975 में होने वाली घटनाओं के बीच साम्य की ओर ध्यान दिलाया।
एक बदनाम सरकार ही अपने कुकृत्यों का बचाव क्रुध्द जनमत के सामने करने में असमर्थ सिध्द होती है और एक हताश नेतृत्व ही इसी ढंग से व्यवहार करता हैं। मैंने राष्ट्रपति से आग्रह किया कि वे सरकार को संसद का आपात सत्र बुलाने हेतु कहें जिसमें तीन मुद्दों पर विचार किया जा सके: एक के बाद एक आए सामने आए घोटाले, विदेशों में ले जाए गये काले धन को वापस लाना और शांतिपूर्ण लोगों पर बरपा कहर। मैंने पुलिस को इस व्यवहार को ‘नंगा फासिज्म‘ करार दिया ।
पहले जब अन्ना हजारे ने लोकपाल मुद्दा उठाया तो उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के साथ जोड़ दिया गया। इन दिनों बाबा रामदेव के आंदोलन को भी आरएसएस के साथ प्रायोजित बताया जा रहा है। किसी को भी नहीं भूलना चाहिए कि जब जयप्रकाश नारायण आपातकाल विरोधी आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे तब उन्हें भी इस तरह के स्वर सुनने को मिले थे।
इस सन्दर्भ में मुझे ‘हिन्दू‘ के ‘बिजनेस लाइन‘ का यह सम्पादकीय बहुत महत्वपूर्ण लगा। ”डू पीपुल मैटर” शीर्षक से प्रकाशित इसका शुरुआती पैराग्राफ इस प्रकार है:
”पिछले आठ सप्ताहों से हजारे – रामदेव के अभियानों के अनवरत दबाव में फंसी सरकार हताशा में भ्रष्टाचार से लोगों का ध्यान हटाने के उद्देश्य से एक के बाद एक गलती कर रही है। लोगों के मन में यह मुख्य धारणा बन गई है कि भ्रष्ट को बचाने के लिए यह सरकार किसी भी हद तक जा सकती है। गलतियां तो अच्छे ढंग से लिपिबध्द हैं लेकिन सीधे-सादे तर्क अब सामने हैं। पहला कि सिविल सोसाइटी के नागरिकों को विधायी एजेण्डा हथियाने की अनुमति नहीं दी जी सकती; दूसरा कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के पीछे आरएसएस है। दूसरे तर्क को यदि पहले लें तो अवश्य पूछा जा सकता है: मान लीजिए यदि यह सत्य भी है कि आंदोलन के पीछे आरएसएस है, तो क्या इससे यह गैरकानूनी हो जाता है? क्यों सरकार भ्रष्टाचार से ध्यान हटाकर आरएसएस की ओर ले जा रही है? यदि आरएसएस के स्वयंसेवक भूकम्प या बाढ़ में सहायता करते हैं तो उनकी सहायता को सरकार अस्वीकार कर देगी? अत: बिन्दू यह नहीं है कि कौन क्या कर रहा है अपितु यह है कि क्या करना चाहिए। और यह स्पष्ट रुप से सरकार को अस्थिर करने के प्रयास” जैसी आपातकाल की शब्दावली का प्रयोग कर रहा है" (प्रवक्ता से साभार