Saturday, March 21, 2015

लुधियाना में प्रेस लायंज़ क्लब


Sat, Mar 21, 2015 at 5:29 PM
आओ एकजुट होने की तरफ बढ़ें  
लुधियाना: 21 मार्च 2015:(रेक्टर कथूरिया//पंजाब स्क्रीन):
कभी वक़्त था जब पत्रकारों का दबदबा हुआ करता था। उस समय पत्रकारों की संख्या बहुत ही काम थी लेकिन उनका प्रभाव बहुत दूर तक असर करता था और उसके परिणाम भी दूरगामी हुआ करते थे। अब जबकि पत्रकारों की संख्या कई गुना बढ़ चुकी है और उनकी शक्ति और प्रभाव भी उसी हिसाब से बढ़ना चाहिए था लेकिन काम उल्टा होता चला गया। लालच, स्वार्थ, अहंकार और टांग खींचने की कुप्रथाओं ने जोर पकड़ा तो साज़िशों भरी चालें सामने आने लगीं। एक दुसरे को नीचे दिखाने के निंदनीय प्रयासों ने फुट पैदा की और फुट का फायदा उन्हें ही पहुंचा जो कभी नहीं चाहेंगे की पत्रकार एकजुट हों। इस निराशाजनक हालात में भी नई उम्र के कुछ पत्रकार पुराने मीडिया कर्मियों से सलाह करके कुछ न कुछ कोशिशें कर रहे हैं।  हम इनका स्वागत करते हैं इस आशा के साथ कि यह कोशिश मीडिया की भलाई पर केंद्रित रहते हुए गुटबन्दियों से ऊपर उठने के काम को पहल देगी। हमें आज ही एक तस्वीर ईमेल से प्राप्त हुई है जिसे यहाँ शुभकामनायों के साथ प्रकाशित किया जा रहा है।

कौन कर रहा है पंजाब में फिर से आग भड़काने की कुचेष्टा

बहुत दिनों से है यह मश्ग़ला सियासत का, कि जब जवान हों बच्चे तो क़त्ल हो जायें
आज 21 मार्च है।
अतीत के आईने में जब 21 मार्च के दिन को देखा जाता है तो याद आता है वह समय जब 21 महीने देश  को कारागार में बदलने वाली इमरजेंसी के अंत की घोषणा की गई  थी।  अभिव्यक्ति की छूट मिलते ही फूटा आम जनता का गुस्सा और इंदिरा शासन का एक बार तो अंत हो गया था। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस वी आर कृष्णा अय्यर के  फैसले से रुष्ट होकर लगाई गई इमरजेंसी के अंतर्गत पूरे देश को जेलखाने में बदल दिया गया था। जय प्रकाश नारायण जैसे वृद्ध नेताओं को भी जेल में धकेल दिया गया और इमरजेंसी के तहत मिले अधिकारों का दुरपयोग खुद आपातकाल का धनद भी न रोक सका। इसका समर्थन करने वाले वाम दलों को भी बाद में अपनी इस गलती को स्वीकार करना पड़ा। अख़बारों पर सेंसरशिप के उस दौर में कुछ कलमें बिक गयी और कुछ डर गई लेकिन सच बोलने वाले उस दौर में भी सच ही बोलते रहे। जनाब दुष्यंत कुमार के शेयर बहुत लोकप्रिय हुआ था--
 सिख संगत डॉट कॉम साभार (बड़ा करने के लिए तस्वीर पर क्लिक करें)
अब तो इस तालाब का पानी बदल दो,
ये कमल के फूल मुरझाने लगे हैं।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, 
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, 
मेरा मकसद तो है यह सूरत बदलनी चाहिए। 
दस्तकों का अब किवाड़ों पर असर होगा ज़रूर, 
हर हथेली खून से तर और बेकरार। 
सेंसरशिप की कैंची से बचने के लिए इस तरह की शायरी का सहारा लिया जाता।  एक गंभीर प्रयोग से गुज़र  सभी  परीक्षा भी थी। इसके कुछ फौरी फायदे भी हुए। अजीत अख़बार के संस्थापक सरदार साधू सिंह हमदर्द ने सिलसिलेवॉर सम्पादकीय भी लिखे जिनमें आपातकाल का स्पष्ट समर्थन था। उन्होंने कहा--रो रो कर फिर याद करोगे। चोर बाज़ारी, ज़खीराबाज़ी और ब्लैक जैसी बुराइयों पर आपातकाल में  रातो रात  काबू पा लिया गया। चाय का कप 25 पैसे में पीना मुझे अभी तक याद है। श्रीमति इंदिरागांधी में जो खूबियां थीं वो भी शायद किसी और में नहीं हैं लेकिन उनसे जो गलतियां हुईं वो भी कम गंभीर नहीं थी।
इंदिरा गांधी के लिए भी माननीय थे संत
आपातकाल के उन दिनों में हरिमंदिर साहिब में संत जरनैल सिंह भिंडरांवाले तो नहीं थे पर दरबार साहिब से इमरजेंसी के खिलाफ एक मोर्चा अवश्य चला था। लगातार 19 महीने तक--इमरजेंसी के अंत तक। सभी विरोधों को कुचल देने वाली इंदिरा सरकार हरिमंदिर से उठी विरोध की आवाज़ को इमरजेंसी के डंडे से भी नहीं दबा पाई। वह बेहद दूरअंदेश थी लेकिन ज़िद और क्रोध बड़े बड़ों की बुद्धि पर पर्दा डाल  देता है। उस समय के लोग कहते हैं कि उस भयानक दौर में ही तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अकालियों को सबक सिखाने की बात मन में ठान ली थी। देश पर हुए तानाशाही के उस वार का सामना करने के लिए श्री हरिमंदिर साहिब से चले मोर्चे के दौरान बहुत से प्रमुख विपक्षी नेता वहां छुप कर शरण भी लेते रहे और आंदोलन का मार्गदर्शन भी करते रहे। इमरजेंसी हटते  ही ठीक एक वर्ष बाद 1978 की वैशाखी के पर्व पर जब निरंकारी संप्रदाय अमृतसर में अपना सम्मेलन करता है तो फायरिंग की घटना के बाद उभर कर आती है संत जरनैल सिंह भिंडरावाले की शख्सियत। संत भिंडरांवालों का विरोध करने वालों का कहना है कि संत भिंडरांवाले को कांग्रेस ने ही उभारा तांकि अकाली दल के कद को बौना किया जा सके और पंजाब में हमेशां के लिए कांग्रेस का वर्चस्व स्थापित सके। इसके बाद शुरू होता है खूनखराबे का भयानक दौर जिसने पंजाब के शांत माहौल में आग दी। सत्ता लोलुपता के कुचक्र ने एक ऐसा चक्रव्यूह रचा जिसमें पंजाब के सभी वर्ग फंस गए। इस चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए कोई अभिमन्यु  देश के पास नहीं था। पंजाब के बहुत से भीष्म पितामह, बहुत से अर्जुन, बहुत से युधिष्टर, बहुत से भीम शकुनियों की चालों  का शिकार हो गए। यह दास्तान  बहुत लम्बी है। पंजाबी के जानेमाने लेखक कुलवंत गरेवाल ने कभी लिखा था--
पंजाब न सीमा न असीम  है  
पंजाब-तकसीम दर तकसीम दर तकसीम
किसी ने पंजाब के दुखद समय घटनक्रम की निष्पक्ष जाँच की मांग गंभीरता से नहीं की। किसी ने पंजाब के ज़ख्मों पर मरहम की  बात ईमानदारी से नहीं की। कुछ लोगों ने तमाशा बना दिया, कुछ ने आग लगा दी और कुछ  सियासी रोटियां सेंकते रहे। सुना है अब हाल ही में शिव सेना नेता राजीव टंडन ने कहा है--देश की शांति के लिये आंतकवादियो के हाथो शहीद होने वाली भारत की पूर्व प्रधानमन्त्री श्रीमति इंदिरा गांधी के देश हित में किये गए कार्यो को ले शिव सेना प्रचार सामग्री जारी करेगी। शिव सेना पंजाब के चेयरमैन राजीव टंडन व युथ प्रधान अमित अरोड़ा ने शिव सेना पंजाब के युथ विंग की मीटिंग में SGPC को भी अपना निशाना बनाते हुए कहा कि एस जी पी सी इंदिरा गांधी के हत्यारों को सम्मानित कर देश द्रोह का काम कर रही है। उन्होंने कहा की देश की पूर्व प्रधानमन्त्री इंदिरा गांधी ने देश की शांति के किये अनेक काम किये जिसमे पंजाब से "आतंकवादी भिंडरावाला" के आतंक का खात्मा करना विशेष रूप से शामिल था पंजाब में जहां तकवादियो ने अपना डर कायम कर रखा था वही हिन्दू समाज के लोगो को घरो से बसो से निकाल कर चुन चुन कर मारा जाता था जब हिन्दू समाज के लोग अपनी जान वचाने के लिए अपना घर बार छोड़ दिल्ली करनाल की तरफ कुच कर रहे थे तब इंदिरा गांधी जी की दलेरी ही थी उन्होंने पंजाब को आंतकवाद से मुक्त करवाने के लिए भारतीय फौज को इसका जिम्मा सौंपा और पंजाब के हिन्दू समाज को एक नया जीवन दिया।  इसलिए माननीय इंदिरा गांधी व सरदार बेअंत सिंह का नाम आदर से लिया जाता है देश के नौजवानो को माननीय इंदिरा गांधी के इतिहास की जानकारी देने के लिए उनकी प्रचार सामग्री जारी करेगी इस मोके पर शिव सेना पंजाब के सिटी प्रधान अश्वनी चोपड़ा युथ प्रधान भानु प्रताप सिंह सनी मेहता नीरज चोपड़ा विशेष रूप से उपस्थित थे।

Friday, March 20, 2015

खबरें पंजाब की--संक्षिप्त रिपोर्ट

 Fri, Mar 20, 2015 at 1:48 PM
डा. प्रदीप अग्रवाल कांग्रेस के महासचिव नियुक्त 
लुधियाना: 20 मार्च 2015: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो):
लगता है दिल्ली में करारी हार के बाद कांग्रेस पार्टी ने कुछ सबक सीखा है और पार्टी के अंदर का लोकतंत्र मज़बूत करना शुरू कर दिया है। शायद इसी  मकसद को सामने रख कर नई नियुक्तियों का सिलसिला तेज़ कर दिया है। जमालपुर की एच.एम. कालोनी निवासी वरिष्ठ समाज सेवक डा.प्रदीप अग्रवाल को जिला कांग्रेस कमेटी में महासचिव नियुक्त किया गया है। डा.अग्रवाल को महासचिव की जिम्मेदारी तीसरी बार मिली है। जिला कांग्रेस प्रधान गुरप्रीत गोगी ने अग्रवाल को नियुक्ति पत्र सौंपते हुए उम्मीद जताई कि वह अपने पद की गरिमा को बरकरार  रखते हुए पूरी लगन से पार्टी के हित में कार्य करेंगे।          
इस दौरान डा. अग्रवाल ने कहा कि पार्टी द्धारा सौंपी गई जिम्मेदारी को निभाने के लिए वह जी-जान से मेहनत करेंगे। इस अवसर पर पंजाब कांग्रेस कमेटी के सचिव संजीव भार्गव रोकी विशेष तौर पर उपस्थित रहे। तस्वीर में नज़र आ रहे हैं डा.प्रदीप अग्रवाल को नियुक्ति पत्र सौंपते जिला कांग्रेस प्रधान गुरप्रीत गोगी। 
लड़की का अपहरण करने वाले गिरफ्तार 
होशियारपुर:19 मार्च  2015:(पंजाब स्क्रीन ब्यूरो): 
दिन दहाड़े युवती का कथित तौर पर अपहरण एक बेहद बुरी और शर्मनाक खबर थी लेकिन उसे अगवा करके ले जाने वाले अब पुलिस के शिकंजे में हैं। अगवा करने के आरोपी को माहिलपुर पुलिस ने गिरफ्तार कर लड़की को बरामद कर लिया है। जानकारी के मुताबिक गांव वरियाना की निवासी एक महिला ने पुलिस के पास एक शिकायत दर्ज करवाई थी कि वह अपनी बेटी के साथ एक्टिवा पर जा रही थी। जब वह गांव पदराना में स्थित मिल्क प्लांट के पास पंहुची तो एक सफेद रंग की कार ने उन्हें जबरन रोक लिया। इससे पहले कि वह कुछ समझ पाती, आरोपी गोल्डी  निवासी गजर ने अपने दो साथियों सहित मिल कर उसकी बेटी को जबरन उठा कर अपनी कार में डाल लिया। उसका आरोप था कि आरोपी गोल्डी ने उसकी बेटी का अपहरन जबरन शादी की नीयत से किया है।  पुलिस ने बताया कि आरोपी को गिरफ्तार कर व अपहृत लड़की को बरामद कर परिजनो के हवाले कर दिया गया। अगर इसी तरह आरोपी काबू किये जाते रहें तो  इस शर्मनाक जुर्म की बढ़ती हुई दर को रोका जा सकता है।
रिश्वत लेते पटवारी गिरफ्तार 
गुरदासपुर:19 मार्च 2015: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो): 
अच्छे वेतन के बावजूद भी सरकारी अधिकारीयों का न तो मन भरता है और  ही उन्हें कानून का कोई खौफ रहा है।  विजिलेंस विभाग गुरदासपुर ने जमाबंदी का संशोधन करने के बदले चार हजार रूपये रिश्वत लेने के आरोप में एक पटवारी को गिरफ्तार किया है। पुलिस अधीक्षक विजिलेंस बलदेव सिंह ने बताया कि एक व्यक्ति सुखविन्द्र सिंह पुत्र हरनाम सिंह निवासी नौशहरा मझा सिंह की जी.टी.रोड पर स्थित एक दुकान का अधिग्रहण  नेशनल हाईवे को चौड़ा करने के लिए अन्य दुकानों के साथ किया गया था। विजिलेंस अधिकारी ने बताया कि राजस्व रिकार्ड में सुखविन्द्र सिंह के पिता का नाम गलती से हजारा  सिंह लिखा हुआ था तथा हल्का पटवारी रछपाल सिंह संशोधन करने के लिए दो हजार रूपये पहले ही ले चुका था। जब पटवारी रछपाल सिंह को पता चला कि पिता के नाम के संशोधन होने पर वरिन्द्र कुमार को 54 हजार रूपये का चेक सरकार से मिलना है तो पटवारी ने संशोधन करने के लिए चार हजार रूपये और देने की मांग शुरू कर दी।अब देखना यह है कि रिश्वत और भ्र्ष्टाचार के इस मायावी तंत्र को तोड़ पाने में  कामयाब होती है क्यूंकि पकड़े जाने पर अक्सर रिश्वतखोर और भ्रष्ट लोग यही कहते हैं कि  हिस्सा तो ऊपर तक जाता है पर फंस हम अकेले गए। । 
पेशी भुगतने आये कैदियों पर हमला
होशियारपुर: 19 मार्च 2015: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो):
कानून को अपने हाथ में लेने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। जायज़ नज़ायज़ हथियारों का दुरपयोग और और इन्हें चलने वालों का दुस्साहस इतना बढ़ गया है कि ये लोग किसी पर भी हमला करने से गुरेज़ नहीं करते। न इन लोगों को अदालतों से डर लगता है और न ही पुलिस से। नशे और हथियारों  पर अंधे हुए ये लोग किसी को भी निशाना बना डालते हैं। पेशी भुगतने आए दो विचाराधीन कैदियों पर हमला करने के आरोप में पुलिस ने तीन को नामजद कर तीन के खिलाफ मामला दर्ज किया है। जानकारी के मुताबिक हैड कांस्टेबल राजिंदर कुमार ने थाना सीटी पुलिस के पास एक शिकायत दर्ज करवाई है कि वह कपूरथला जेल से नवजोत सिंह उर्फ ज्योति व अवतार सिंह उर्फ मोनू को पेश करने के लिए यहां अदालत में लेकर आया था। पुलिस कर्मी के मुताबिक तीन  आरोपियों अमित कुमार उर्फ मोटी, राजन निवासी गढ़दीवाल, सुखा निवासी वाघा ने कथित तौर पर  हमला कर दिया। उसके मुताबिक इसके बाद इसके बाद तीनों आरोपी फरार हो गए। इस खतरनाक रुझान को रोकने  आवश्यक है की आम जनता में कानून का डर और विश्वास बहाल किया जाये। पुलिस और कानून को अपनी जेब मैं समझने वाले कुछ "अमीरों' और "सियासरदानों" को सबक सिखाये बिना यह सम्भव न हो सकेगा।

इमरजेंसी का वह दौर जिससे मुक्ति मिली 21 मार्च को

आपातकाल :स्वतंत्र भारत की वह कालरात्रि
तारीख: 21 Jun 2014 14:54:35
$img_title25 जून, 1975 को रात में जब 'हम भारत के लोग' सोये, तो एक स्वतन्त्र देश के अधिकार-सम्पन्न नागरिक थे; परन्तु 26 जून, 1975 को जब प्रात: जगे, तो पाया कि हम एक स्वतन्त्र देश के 'अधिकार-विपन्न बन्दी नागरिक' हैं। 26 जून का सवेरे उगा सूरज काला लगा। ऐसा विपर्यय 25/26 की उस आधी रात को मात्र एक कागज पर तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के हस्ताक्षर होते ही उसी क्षण से हो गया था। यह कागज प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के विधिमन्त्री सिद्घार्थ शंकर राय का बनाया हुआ था। वे उन प्रसिद्घ देशभक्त देशबन्धु चित्तरंजन दास के नाती थे, जो नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के राजनीतिक गुरु और विख्यात क्रान्तिकारी अरविन्द घोष को 'अलीपुर बम केस' से ससम्मान बरी कराने वाले नि:शुल्क बैरिस्टर थे। यह कागज संविधान स्थगित कर आपातकाल घोषित करने वाला आदेश था। नियमत: मन्त्रिमण्डल में सर्वसम्मत प्रस्ताव को ही राष्ट्रपति स्वीकार करते हैं; परन्तु यहां तो इस अनिवार्य संवैधानिक प्रावधान का पालन किये बिना ही मात्र प्रधानमंत्री की इच्छापूर्त्ति कर दी गयी थी, मन्त्रिमण्डल में तो उसे बाद में पारित कराने की औपचारिकता पूरी की गयी थी।
पाञ्चजन्य से साभार
यहां पर यह उल्लेख करना आवश्यक है कि आखिर फखरुद्दीन अली अहमद ने इस पूर्णत: असंवैधानिक प्रस्ताव को स्वीकृत कर राष्ट्रपति पद की गरिमा और प्रतिष्ठा को 'शून्य' करने का घोर पाप क्यों किया? ऐसी क्या बाध्यता थी उनकी? इसके लिए इन राष्ट्रपति महोदय के पूर्व इतिहास के कुछ पन्ने पलटने होंगे। फखरुद्दीन अली अहमद वह महानुभाव थे, जिन्होंने जिन्ना के निजी सचिव रहे मुईनुल्हक चौधरी के साथ मिलकर विभाजन-पूर्व असम में लगभग 20 लाख बंगाली मुसलमानों को बसाकर उस प्रदेश के इस्लामीकरण की आधारशिला रखी थी। देश के स्वतन्त्र होते ही अनेक मुस्लिम लीगी नेताओं की तरह ये भी रातोंरात खद्दर की शेरवानी पहनकर कांग्रेसी बन गये थे। इन्दिरा गांधी ने अपनी सरकार में इन्हें मंत्री बनाया था और 1974 में अरब देश मोरक्को की राजधानी रबात में हो रहे इस्लामी देशों के सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधि बनाकर भेजा था, जहां इन्हें घुसने तक नहीं दिया गया था और अपना-सा मुंह लेकर लौटना पड़ा था। मुस्लिमों को प्रसन्न रखने के अपने सेक्युलर मन्तव्य के अन्तर्गत पुरस्कार स्वरूप इन्हें राष्ट्रपति बना दिया गया था। ऐसा रीढ़हीन राष्ट्रपति इन्दिरा गांधी की इच्छा के विपरीत कैसे जा सकता था!
26 जून की प्रात: लोग स्तब्ध, हतप्रभ थे, जब उन्हें पता चला कि विपक्षी दलों के सभी मूर्धन्य नेता यथा मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी आदि ही नहीं, जयप्रकाश नारायण और वे चन्द्रशेखर, जो इन्दिरा कांग्रेस की कार्यकारिणी के निर्वाचित सदस्य थे, भी जेल भेज दिये गये हैं; प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गयी है। अखबारों की रात में ही बिजली काट दी गयी थी कि कोई समाचारपत्र न छप सके। जो कुछ छप चुके थे और सवेरे-सवेरे लोगों के हाथों में पहुंच गये थे, उनमें जिस भी अखबार का सम्पादकीय स्तम्भ रिक्त था या बड़ा-सा प्रश्नचिन्ह लगाकर छोड़ दिया गया था या ऐसा ही कोई आपातकाल विरोधी प्रयत्न दिखा, उन सब को जब्त कर लिया गया, उनके सम्पादकों को उनके इस दु:साहस के लिए जेल में ठूंस दिया गया। विपक्षी दलों और कांग्रेस के कथित या कल्पित विरोधियों की धड़ाधड़ गिरफ्तारियां शुरू हो गयीं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर भी तत्काल प्रतिबन्ध लगा दिया गया। उसके तृतीय सरसंघचालक श्री मधुकर दत्तात्रेय देवरस उपाख्य बालासाहब देवरस को भी गिरफ्तार कर यरवदा जेल भेज दिया गया। अनेक जिलों में गुटबाज कांग्रेसियों ने अपने विरोधी गुट के लोगों तक से इसी बहाने बदला ले लिया था। आपातकाल के इस भयाक्रान्त काल में कांग्रेसियों ने बहती गंगा में खूब हाथ धोये। इंदिरा गांधी की शंकालुता की पराकाष्ठा यहां तक थी कि उ़ प्र. के हेमवतीनन्दन बहुगुणा जैसे विचक्षणबुद्घि कांग्रेसी मुख्यमंत्री के आवास तक पर आई़ बी. का एक डी़ एस़ पी़ रैंक का अधिकारी जासूसी में तैनात रहा था।
इंदिरा गांधी के छोटे पुत्र संजय गांधी उस समय सरकारी आतंक के प्रतीक बन गये थे। उनके 15 सूत्री कार्यक्रम में वृक्षारोपण के साथ ही सबसे अधिक बल परिवार-नियोजन पर था। कृत्रिम उपायों से अधिक जोर पुरुषों और स्त्रियों की नसबन्दी पर था। जिलाधिकारियों में अधिकाधिक नसबन्दी कराने की ऐसी होड़ लगी थी कि पुलिस और पी़ए़सी़ से रात में गांव घिरवाकर नसबन्दी के योग्य-अयोग्य जो मिला, उसकी बलात् नसबन्दी करा दी गयी। अविवाहित युवकों, विधुर गृहस्थों और बूढ़ों तक की नसबन्दी करके आंकड़े बढ़ाये गये। लाखों के वारे-न्यारे हो गये। अधीनस्थ कर्मचारियों की विवशता देखते बनती थी। अपनी या अपनी पत्नी की नसबन्दी कराने के बाद भी नसबन्दी के कम से कम दो 'केस' दो, तभी अर्जित अवकाश, अवकाश नगदीकरण, चरित्र-पंजी में अच्छी प्रविष्टि, स्कूटर/ मोटरसाइकिल/ गृह-निर्माण, भविष्य-निधि से अग्रिम स्वीकृत किये जाते थे। सर्वत्र त्राहि-त्राहि मच गयी थी; पर प्रतिरोध करने का साहस नहीं। ऐसी घोर-परिस्थिति में भी उत्तर प्रदेश के एक जिले शाहजहांपुर के जिला अधिकारी ने नसबन्दी के लिए किसी का उत्पीड़न न करने का साहस दिखाया था। मुख्य सचिव द्वारा नसबन्दी की उनसे जिले के प्रदेश में न्यूनतम संख्या पर जब कड़े शब्दों में स्पष्टीकरण मांगा गया, तो उनका निर्भीक उत्तर था, सर! शासनादेश में 'स्वेच्छा से' नसबन्दी कराने का स्पष्ट उल्लेख है, ऐसे में किसी प्रकार की जोर-जबर्दस्ती करके किसी की नसबन्दी कैसे करायी जा सकती है? मुख्य सचिव को ऐसा उत्तर सुनने की कल्पना तक न थी; पर उनकी हिम्मत उन जिला अधिकारी का स्थानान्तरण करने तक की नहीं पड़ी। वैसे कुएं में भांग तो ऐसी पड़ी थी कि अत्याचारों की सीमा नहीं थी। सर्वाधिक प्रताड़ना उन परिवारों की महिलाओं एवं बच्चों को झेलनी पड़ी थी, जिनके घर के कमाऊ सदस्य जेलों में ठूंस दिये गये थे। एक दारुण उदाहरण- लखनऊ के चौपटियां मोहल्ले के निवासी सोशलिस्ट नेता रामसागर मिश्र को मीसा में बन्द कर दिया गया था। उनके अल्पवयस्क पुत्र ने पिता की मुक्ति के लिए हनुमान् जी का निर्जल-व्रत रखकर अपने घर से अलीगंज हनुमान-मन्दिर तक दण्डवत्-यात्रा बड़े मंगल (ज्येष्ठ मास का प्रथम मंगल) की ठानी और लोग उस पर जल डालते साथ चल रहे थे; पर मन्दिर पहुंचकर दर्शन करने के पहले ही उसके प्राण-पखेरू उड़ गये। उधर रामसागर मिश्र भी जेल से जीवित न लौट पाये। ऐसी अनेक दारुण कथाएं हैं।

देश के गण्यमान्य मनीषियों, जिनका किसी पार्टी से कोई लेना-देना न था, को भी नहीं बख्शा गया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ़ रघुवंश, जिनके दोनों हाथ लंुज-पुंज थे, को रेल की पटरी उखाड़ने के आरोप में जेल में डाल दिया गया। मराठी की प्रसिद्घ लेखिका दुर्गा भागवत जी ने एक सम्मेलन में आपातकाल की आलोचना में कुछ बोल दिया, तो उन्हें भी जेल में ठूंस दिया गया। काशी के मनीषी-प्रवर पं़ बलदेव उपाध्याय को भी पुलिस ने पकड़कर हवालात में बन्द कर दिया, तो वहां के लोग भड़क उठे, जिलाधिकारी के बंगले पर जा धमके।
इस गिरफ्तारी से अनभिज्ञ जिलाधिकारी चौंक पड़े। तुरन्त पण्डित जी को छोड़ने का आदेश दिया। बेचारे पण्डित जी को रात भर हवालात में रहना पड़ा था। महीयसी महादेवी वर्मा जी ने भी आपातकाल के विरोध में बोल दिया था, तो इलाहाबाद का जिला प्रशासन उन्हें भी बन्दी बनाने की सोचने लगा। इन्दिरा जी को कहीं से इसकी भनक लग गयी। सम्भवत: प्रसिद्घ पत्रकार पी़ डी़ टण्डन से। उन्होंने तुरन्त निषेध किया अन्यथा महादेवी जी भी दुर्गा भागवत की गति को प्राप्त हो जातीं। नेहरू जी को महादेवी जी अपना भाई मानती थीं, यह तथ्य इन्दिरा जी जानती थीं।
इस दुर्धर्ष काल में दो राजमाताओं- विजयाराजे सिन्धिया और गायत्री देवी को भी जेल में डाल दिया गया। दोनों को प्रताड़नाएं भी दी गयी थीं। स्वास्थ्य बहुत अधिक गिर जाने पर राजमाता सिन्धिया को पैरोल पर छोड़ा गया था। उनके निजी सचिव आंग्रे जी उन्हें घुमाते हुए एक स्थान पर ले गये। राजमाता जी के पूछने पर बोले, हम नेपाल-सीमा पर अमुक स्थान पर हैं, आप कहें, तो सीमा पार कर नेपाल चल जायें, फिर इन्दिरा क्या कर लेंगी? इतना सुनते ही राजमाता बिगड़ पड़ीं, आपके दिमाग में यह बात आयी कैसे? मैंने न्यायालय को वचन दिया है, अभी वापस चलो। बेचारे आंग्रे जी सन्न। राजमाता जी ने वापस लौटकर तुरन्त न्यायालय में समर्पण किया और पैरोल की अवधि पूरी होने से पहले ही पुन: जेल चली गयीं। राजमाता जी का यह प्रसंग स्वयं पूर्व सरसंघचालक पूज्य रज्जू भैया जी ने लखनऊ के अपने अन्तिम प्रवास में लगभग 45 मिनट तक लेखक से वार्त्ता में बताया था; वचन की प्रामाणिकता और जीवन के अन्तिम क्षण तक सक्रिय रहने के ये दो मन्त्र दिये थे। आज हममें से कितने इसका प्रयत्न करते हैं?
पत्रकार-धर्म निर्वाह सम्बन्धी एक प्रसंग। तब हिन्दी के दो सम्पादक शीर्ष पर थे- 1़ 'नवभारत टाइम्स' (दैनिक) के अक्षयकुमार जैन और 2़ 'हिन्दुस्तान' (दैनिक) के रतन लाल जोशी। जहां अक्षय कुमार जैन लगभग 200 पत्रकारों के साथ 'इन्दिरा गान्धी की जय' बोलते, उन्हें बधाई देने गये, वहीं रतनलाल जोशी ने अपने सम्पादकीय में लिखा, कितना सुखद आश्चर्य है कि उच्चतम न्यायालय के तीन माननीय न्यायमूर्त्तियों ने पृथक्-पृथक् निर्णय दिये; परन्तु तीनों निर्णय एक समान हैं। अक्षय कुमार जैन की कीर्त्ति इसके बाद शून्य पर जा पहुंची थी; परन्तु रतनलाल जोशी ने नौकरी व जेल जाने का खतरा मोल लेकर भी उक्त वाक्य में 'सब कुछ' कह देने का साहस जुटाया था। पत्रकारिता धर्म का ऐसा निर्वाह उन्हें अमर कर गया।
'हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता'। ऐसे सरकारी आतंक के समय भी मुस्लिम हेकड़ी का एक प्रसंग। उ़ प्र. की राजधानी के माल एवेन्यू में ईसाई कब्रिस्तान के पश्चिम चौड़ी सड़क के बाद लगभग 40 फीट चौड़ा और 300 फीट लम्बा एक सरकारी भूखण्ड। उसके पश्चिम मुस्लिम कब्रिस्तान। 1976 में एक दिन उस 'पॉश कालोनी' के लोगों के देखते-देखते उस भूखण्ड पर दिन-दहाड़े कब्जा कर लिया गया। कब्रिस्तान की पूर्वी दीवार तोड़कर हाथ की ठेलियों पर ईंट लाद-लादकर अनेक मुल्लाओं ने उनसे भूखण्ड की पूर्वी सीमा पर अस्थायी दीवार खड़ी कर ली। रातोंरात कब्रिस्तान की एक कब्र पर मकबरा बनाकर उसे 'दादा मियां की मजार' घोषित कर दिया। इस दु:साहस के नेपथ्य में था- राज्यपाल मुसलमान, उनका एक सलाहकार मुसलमान, स्वायत्त शासन (अब नगर विकास) सचिव मुसलमान तथा नगर महापालिका का प्रशासक मुसलमान। भला ऐसा स्वर्ण अवसर फिर कब मिलता! चलते-चलते एक और प्रसंग। आपातकाल में हो रहे अत्याचारों के विरुद्घ संघ का सत्याग्रह करने का निर्णय। 1,76,000 से अधिक स्वयंसेवकों ने जेल जाकर विश्व रिकार्ड बनाया। अन्ततोगत्वा संघ से प्रतिबंध हटा।
बालासाहब देवरस यरवदा जेल से जब मुक्त हुए, तो प्रसिद्घ सोशलिस्ट नेता एस़ एम. जोशी हजारों लोगों को साथ लेकर उनका स्वागत करने जेल के द्वार पर थे। वह भव्य दृश्य देखने योग्य था। लेकिन दैव दुर्विपाक से जब जनता पार्टी सरकार को अपने परामर्शी मधु लिमये और राजनारायण के दबाव में चरणसिंह ('चेयर सिंह'-राजनारायण का दिया पूर्व व्यंग्य नाम)ने गिरा दिया,तो आपातकाल में सहस्त्रों कार्यकर्त्ताओं के बलिदान और लाखों के त्याग को निष्फल करने का कलंक लेकर भी चौधरी चरण सिंह एक बार भी संसद में प्रधानमंत्री की आसन्दी पर न बैठ पाये। आपातकाल का वह काला अध्याय, स्वतन्त्र भारत के कांग्रेस से मुक्ति के स्वर्ण-अवसर का अवसान बनते-बनते रह गया।
(लेखक आनन्द मिश्र 'अभय' 'राष्ट्रधर्म' (मासिक) के सम्पादक हैं) 


Thursday, March 19, 2015

22 मार्च के सम्प्रदायिकता विरोधी सम्मेलन के लिए तैयारियां शिखर पर

Thu, Mar 19, 2015 at 5:29 PM
मज़दूर संगठनों द्धारा जोरदार प्रचार मुहिम जारी
लुधियाना के साम्प्रदायिकता विरोधी सम्मेलन में पहुंचेंगे बड़ी संख्या में लोग 
लुधियाना:19 मार्च 2015: (*लखविन्दर//पंजाब स्क्रीन ब्यूरो):
कारखाना मज़दूर यूनियन, पंजाब व टेक्सटाइल-हौज़री कामगार यूनियन, पंजाब द्वारा साम्प्रदायिकता विरोधी सम्मेलन की तैयारियाँ बड़े स्तर पर की जा रही हैं। 22 मार्च को लुधियाना में होने वाला यह सम्मेलन नौजवान भारत सभा, पंजाब स्टूडेंटस यूनियन (ललकार), बिगुल मज़दूर दस्ता, कारखाना मज़दूर यूनियन व टेक्सटाइल हौज़री कामगार यूनियन द्वारा संयुक्त रूप से किया जा रहा है। का.म.यू. व टे.हौ.का.यू. की प्रचार टोलियों ने लुधियाना के लोगों में खासकर कारखाना मजदूरों के बीच सघन प्रचार अभियान चलाया जा रहा है। अनेकों नुक्कड़ सभाएँ, मीटिंगें, पैदल व साईकिल मार्च आयोजित किए जा रहे हैं। घर-घर जाकर लोगों को धार्मिक कट्टरपंथियों की लोगों में धार्मिक नफरत का जहर घोल कर अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने की साजिशों के खिलाफ़ आगे आने का आह्वान किया जा रहा है। हिन्दी-पंजाबी में बड़े पैमाने पर पर्चा बाँटा जा रहा है। शहर में पोस्टर लगाकर सम्मेलन की सूचना लोगों तक पहुँचाई जा रही है। सोशल मीडिया पर भी इसके बारे में मुहिम चलाई जा रही है। लोगों से इस मुहिम के प्रति काफ़ी समर्थन मिल रहा है और बड़ी संख्या में लोगों के इस सम्मेलन में शामिल होने की अपील है।
    सभी धर्में के कट्टरपंथी लोगों को आपस में लड़ाने की साजिशें बहुत तेज़ कर चुके हैं। हिन्दुत्वी कट्टरपंथी ताकतों का आधार अधिक मज़बूत है इसलिए अल्पसंख्यकों पर अत्यधिक खतरा मँडरा रहा है। साम्प्रदायिकता का नुक्सान सभी धर्मों के लोगों को ही उठाना पड़ता है। अल्पसंख्यक धर्मों के कट्टरपंथी भी हिन्दुत्वी कट्टरपंथियों की काली करतूतों का फायदा उठाकर अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंक रहे हैं। सभी कट्टपंथियों का निशाना एक ही है कि लोगों को आपस में बाँटकर लोगों के निर्मिम आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक शोषण के एजण्डे को आगे बढ़ाया जाए। श्रम कानूनों में गम्भीर मज़दूर विरोधी संशोधन किए जा रहे हैं, लोगों से सरकारी सेहत, शिक्षा, परिवहन, पानी, बिजली आदि सहूलतों बड़े स्तर पर छीनी जा रही हैं, पूँजीपतियों के लिए लोगों खासकर किसानों की जमीन जबरन छीनने के लिए घोर गैरजनवादी कानून बनाए जा रहे हैं, लोगों के संघर्षों को कचलने के लिए काले कानून बनाए जा रहे हैं। जैसे-जैसे पूँजीवादी व्यवस्था का आर्थिक-राजनीतिक संकट बढ़ता जा रहा है और लोगों की आर्थिक हालत बद से बदतर होती जा रही है वैसे वैसे हुक्मरान धार्मिक कट्टरपंथ को ज्यादा से ज्यादा हवा देने में लगे हुए हैं।
हुक्मरान जनता गुस्से से बहुत डरे हुए हैं और इसलिए जनता के सारे जनवादी अधिकार छीन लेना चाहते हैं। जनवादी अधिकारों का दायरा अधिक से अधिक कम होता जा रहा है और व्यवस्था का फासीवादीकरण बढ़ता जा रहा है। मज़दूरों, मेहनतकशों, नौजवानों, छात्रों, बुद्धिजीवियों, सास्कृतिकर्मियों, कलाकारों को साम्प्रदायिक फासीवाद के इस चुनौती का मुकाबला करने के लिए बड़े अन्दोलन की तैयारियाँ करने होंगी। साम्प्रदायिकता के खिलाफ़ लड़ाई बड़ी कुर्बानियों की माँग करती है। जनवादी-क्रान्तिकारी ताकतों को बेहद सख्त लड़ाई के लिए तैयार होना होगा।
22 मार्च को लुधियाना में किया जा रहा यह सम्प्रदायिकता विरोधी सम्मेलन भगतसिंह, सुखदेव व राजगुरु की 84वीं शहादत वर्षगाँठ को समर्पित है। हमें महान क्रान्तिकारी विरासत से प्रेरणा और रास्ता लेकर साम्प्रदायिकता के खिलाफ संघर्ष के मैदान में कूदना होगा। भगतसिंह और उनके साथियों की यह सोच पूरी तरह दरुस्त थी कि लोगों की आर्थिक-राजनीतिक मुद्दों पर बनी एकता ही साम्प्रदायिक ताकतों को धूल चटा सकती है। 22 मार्च का लुधियाना में होने वाला सम्मेलन लोगों में जहाँ साम्प्रदायिकता के खिलाफ़ आपसी भाईचारा मज़बूत करने का संदेश देगा वहाँ लोगों को पूँजीवादी लूट-शोषण के खिलाफ़ अपने अर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर वर्ग एकता मज़बूत करने का आह्वान भी करेगा।
लखविन्दर-कारखाना मज़दूर यूनियन, पंजाब (रजि.) के अध्यक्ष हैं और उनका फोन नम्बर है - 9646150249

Wednesday, March 18, 2015

साहित्य चर्चा//डॉ॰विमला भण्डारी का काव्य-संसार//दिनेश कुमार माली

 Wed, Mar 18, 2015 at 9:54 AM  
विकराल हकीकतों की चर्चा के साथ साथ आशा  जगाती कविता 
दिनेश कुमार माली
डॉ॰विमला भण्डारी
`भले ही,डॉ॰ विमला भण्डारी का नाम हिंदी साहित्य जगत में एक प्रसिद्ध कथाकार,बाल-साहित्यकार, इतिहासज्ञ और राजस्थान की प्रसिद्ध साहित्यिक संस्था सलिला के संस्थापक के रूप में जाना जाता है, मगर उनकी कलम कविताओं के क्षेत्र में भी खूब चली है। “डॉ॰ विमला भण्डारी की रचना-धर्मिता” विषय पर एक मौलिक स्वतंत्र आलेख लिखने की परिकल्पना करते समय मुझमें उनके लेखन की हर विधा को पढ़ने,जानने और सीखने की तीव्र उत्कंठा पैदा हुई,जिसमें कविताएं भी एक हिस्सा थी। इसी संदर्भ में मुझे हरवंश राय बच्चनजी का एक कथन याद गया कि ईश्वर को जानने के लिए किसी साधना की आवश्यकता होती है, मगर यह भी सत्य है कि किसी इंसान के बाहरी और आंतरिक व्यक्तित्वों को जानना किसी साधना से कम नहीं होता है। मैं इस बात से पूरी तरह सहमत था,इस प्रगल्भ साधना  हेतु  मैंने विमलाजी के व्यक्तित्व का चयन किया और इस कार्य के निष्पादन हेतु कुछ ही महीनों में मैंने उनका समूचा बाल-साहित्य,कविताएं,शोध-पत्र,नाटक और इतिहास संबन्धित पुस्तकों का गहन अध्ययन किया। मगर कविताएं? कविताएं अभी तक अछूती थी। एक बड़े साहित्यकार के भीतर कवि-  हृदय की तलाश करने के लिए मैंने उनकी कविताओं को खँगालने का प्रयास किया। मेरे इस बारे में आग्रह करने पर उन्होंने अपनी कम से कम पचास से ज्यादा प्रकाशित और अप्रकाशित कविताओं की हस्तलिखित पाण्डुलिपि पढ़ने के लिए मुझे दी। पता नहीं क्यों,पढ़ते समय मुझे इस चीज का अहसास होने लगा,हो न हो, उनकी साहित्य यात्रा का शुभारंभ शब्दों के साथ साँप-सीढी अथवा आँख-मिचौनी जैसे खेल खेलते हुए कविताओं से हुआ होगा,अन्यथा उनके काव्य-सृजन-संसार में विषयों की इतनी विविधता,मनुष्य के छुपे अंतस में झाँकने के साथ-साथ इतिहास के अतीतावलोकन के गौरवशाली पृष्ठ सजीव होते हुए प्रतीत नहीं होते। मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था, शायद उनकी प्रखर विस्तारित लेखन-विधा मेरे पाठक मन पर हावी हुए जा रही थी। मेरे मानस-पटल पर कभी ‘सलूम्बर का इतिहास’, कभी माँ,तुझे सलाम’ में हाड़ी रानी का चिरस्मरणीय बलिदान, कभी बाल-साहित्य तो कभी “थोड़ी-सी जगह” जैसे कहानी-संग्रह के पात्र अपने-अपने कथानकों की पृष्ठभूमि में अपनी सशक्त भूमिका अदा करते हुए उभरने लग रहे थे। इसलिए मेरे यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि डॉ॰ विमला भण्डारी खुली आँखों से संवेदनशील मन और सक्रिय कलम की मालकिन है। दूसरे शब्दों में,वह मर्म-संवेदना से कहानीकार,दृष्टि से इतिहासकार,मन से बाल-साहित्यकार और कर्म से सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता हैं,यह बात उनकी थोड़ी-सी कविताएं और कहानियाँ पढ़ने से उजागर हो जाती है। उनकी कविताओं व अन्य साहित्यिक रचनाओं से गुजरते हुए मैंने पाया कि हर युवा कवि व साहित्यकार की भांति अतीत के प्रति मोह,वर्तमान से असंतोष और भविष्य के लिए एक स्वप्न है। हर युवा की भांति प्राकृतिक और मानवीय दोनों तरह के सौन्दर्य की तरफ वह आकृष्ट होती है। रूढ़िओं को तोड़ने का उत्साह उनमें लबालब भरा है। प्रगतिवाद का प्रभाव उनके सृजन में स्पष्टतः परिलिक्षित होता है। हिन्दी कविता की शब्दावली और बनावट इस बात की पुष्टि करती है। कुछ उदाहरण :-
1-  गिरते सामाजिक मूल्यों को दर्शाती पंक्तियाँ कविता “बूढ़ा जाते हैं माँ-बाप” से :-
धीरे-धीरे उनमें चढ़ने लगती है
स्वार्थों की फूफंद
बरगद-सी बाहें फैलाए
आकाशीय जड़े महत्वाकांक्षा की
तोड़ लेती है
सारे सरोकार और
क्षणांश में
बूढ़ा जाते हैं माँ बाप।

इस तरह, दूसरी कविता ‘विश्व सौंदर्य लिप्सा में’ कवयित्री बदलते परिवेश पर भारत के इंडिया बन जाने पर अफसोस व्यक्त करती है। सन 1955 तक स्त्रियाँ घूंघटों में ढकी रहती थी, मगर चालीस साल के लंबे सफर अर्थात निन्यानवे के आते-आते सब-कुछ विश्व सौंदर्य लिप्सा में उघड़ा हुआ नजर आने लगता है। कविता में लोकोक्ति ‘नाक की डांडी’ अद्भुत सौंदर्य पैदा कर रही है। सत्ता और पूंजी के देशी-विदेशी गठबंधन ने मध्यवर्गीय इच्छाओं को कुलीनवर्गीय संस्कृति से जोड़ दिया है।

2॰ नारी शिक्षा के प्रति आज भी राजस्थान के ग्रामीण परिवारों में अजागरूकता को लेकर उनकी कविता ‘वो लड़कियां’-जिन्हें शिक्षा लाभ लेना चाहिए/वे आज भी ढ़ोर डंगर हाँकती है/ जंगलों में लकड़ियाँ बीनती हैं/सूखे कंडे ढोती हैं/बर्तन माँजती हैं/ झाड़ू–पोछा करती हैं/पत्थर काटती हैं/अक्षय तृतीय पर ब्याह दी जाती हैं/वे स्कूल जा पाएगी कभी ?

किशोरी कोख से
किल्लोलती
जनमती है फिर
वो लड़कियां
जिन्हें जाना चाहिए था स्कूल
किन्तु कभी नहीं
जा पाएगी वो स्कूल

इसी तरह,उनकी दूसरी कविता ‘लड़कियां’ में हमारे समाज में लड़कियों पर थोपे जा रहे प्रतिबंधों, अनुशासन में रहने के निर्देशों तथा अपने रिश्तेदारों के आदेशों के अनुपालन करते-करते निढाल होने के बावजूद उन्हें पोर-पोर तक दिए जाने वाले दुखों के भोगे जाने का यथार्थ चित्रण किया गया है।यथा:-

खुली खिड़की से
झांकना मना
घर की दहलीज
बिना इजाजत के
लांघना है मना
अपने ही घर की छतपर
अकेले घूमना मना

 
इन दृश्यों की मार्मिकता इनके विलक्षण होने में नहीं है। ये दृश्य इतने आम हैं कि कविता में दिखने पर साधारणीकृत हो जाते हैं। इनका मर्म उनकी करुणा में है। कहा जा सकता है कि कवयित्री के मार्मिक चित्र स्त्री-बिंम्बो से संबंधित है। यही उनकी निजता का साँचा है जिसमें ढलकर बाह्य वास्तविकता कविता का रूप लेती है। उनके मार्मिक-करुण चित्रों के साथ उनकी कविता की शांत-मंथर-लय और अंतरंग-आत्मीय गूंज का अटूट रिश्ता है।उनमें स्त्री-अस्तित्व की चेतना है और अपने संसार के प्रति जागरूकता भी है। अलग-अलग जीवन-दृश्य मिलकर उनकी कविता को एक बड़ा परिदृश्य बनाते हैं।

कवयित्री का एक दूसरा पक्ष भी है आशावादिता का।‘तुम निस्तेज न होना कभी’ कविता में कवयित्री के आशावादिता के स्वर मुखरित हो रहे हैं कि निराशा के अंधकार में रोशनी हेतु सूरज आने की बिना आशा किए दीपक का प्रयोग भी पर्याप्त है।‘आदमी की औकात’ कविता में सपनों के घरौंदे और रेत के महलों जैसे प्रतीकों में समानता दर्शाते हुए जीवन के उतार-चढ़ाव,सुख-दुख में यथार्थ धरातल पर उनके संघर्ष को पाठकों के सम्मुख रखने का प्रयास किया है। ‘प्यार’ कविता में प्रेम जैसी संवेदनशील अनुभूति के समझ में आने से पूर्व ही उसके बिखर जाने की मार्मिक व्यथा और वेदना का परिचय मिलता है। ठीक इसी तरह,‘दरकते पल’ कविताओं में उन स्मृतियों की धुंध को ‘राख़ के नीचे दबी चिंगारी’,‘पीले पत्ते’,‘झड़ते फूल’,‘उघाड़ते पद-चिन्ह’ जैसे बिंबो का उदाहरण देकर कवयित्री ने न केवल अपने अंतकरण की सुंदरता, बल्कि पृथिवी की नैसर्गिक सुंदरता के नजदीक होने का अहसास भी कराया है।‘दो बातें प्रेम की’ कविता में अपनेपन की इबादतें सीखने का आग्रह किया गया है।‘एक सूखा गुलाब’ में कवयित्री ने पुरानी किताब और नई किताब को प्रतीक  बनाकर अपनी  भूली-बिसरी यादों को ताजा करते  हुए वेलेंटाइन-दिन के समय पुरानी किताब के भीतर रखे गुलाब के सूख जाने जैसी मार्मिक यथार्थ अनुभूतियों को उजागर करने का सशक्त प्रयास किया है। ‘लाड़ली बिटिया’ कविता में कवयित्री ने अपनी बेटी के जन्म-दिन पर खुशिया मनाने के बहाने अपने आत्मीय प्रेम या वात्सल्य का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया है। बेटी का  चेहरा,उसकी आवाज,उसकी आँखें,उसके बाल, सभी अंगों में प्यार को अनुभव करते हुए उसे अपने जीवन का सहारा बना लिया है। ऐसे ही उनकी दूसरी कविता ‘अब के बरस’ भी बेटी के जन्मदिन के उपलक्ष में है। इन कविताओं को पढ़ते समय सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराली’ की अपनी पुत्री की स्मृति में लिखी कविता ‘सरोज-स्मृति’ याद आ गई है। चाहे कवि हो या कवयित्री, चाहे पुरुष हो या नारी दोनों का बेटियों के प्रति एक विचित्र वात्सल्य,अपनापन,स्नेह व सहानुभूति होती है। इसी तरह ‘कहां खो गए’ कविता में बेटी बनकर अपने माँ के एकाकीपन व निसंगता को अनुभव करती कवयित्री आधुनिक समाज की हकीकत से सामना करवाती है कि माँ के नंदलाल, झूलेलाल, बाबूलाल आदि संबोधनों वाले बेटे अब सामाजिक स्वार्थ और लिप्सा में विलुप्त हो गए है। इसलिए माँ आज अकेली है। नितांत अकेली।

“तदनुरूप” कविता में कवयित्री डॉ॰ विमला भंडारी के दार्शनिक स्वर मुखरित होते हैं कि जब आदमी अपने जड़े खोजने के लिए अतीतावलोकन करने लगता है, तो वहाँ मिलता है उसे केवल घुप्प अंधेरा,स्मृतियों के अनगिनत श्वेत-श्याम, धवल-धूसर चलचित्र और सन्नाटे में किसी एक सुरंग से दूसरी सुरंग में कूच करता अक्लांत अनवरत दौड़ता,अकुलाता अगड़ाई लेता घुड़सवार। इसी तरह उनकी ‘याद’ कविता में यादों को ‘रोटी’को माध्यम बनाकर रूखा सूखा खाकर जीवन बिताने का साधन बताया है। ‘अंधेरे और उजालों के बीच’ और ‘चंचल मन’ कविताओं में कवयित्री की दार्शनिकता की झलक स्पष्ट दिखाई देती हैं।

 ‘तेजाबी प्यार’ कविता में आधुनिक भटके हुए नवयुवकों के एक तरफा प्यार के कारण अपनी प्रेमिकाओं के चेहरे पर एसिड डालने और उनके रास्ते में आ रही रुकावटों के ज़िम्मेवार लोगों की हत्या तक कर डालने का मर्मांतक वर्णन किया हैं। इस तरह ‘रिंगटोन’ कविता में दहेज के दरिंदों द्वारा बेटी को घोर-यातना देने का मार्मिक विवेचन है, इस कविता में कवयित्री कि नारीवादिता के स्वर मुखरित होते हैं।
जैसे :-

बेटी का फोन था
‘मुझे बचा लो माँ’ का रिंगटोन था
कल फिर उन्होंने
मुझे मारा और दुत्कारा
तुम औरत हो
तुम्हारी औकात है ?


कोई अच्छी कविता अज्ञात दृश्यों की खोज नहीं करती। वह ज्ञात स्थितियों के अज्ञात मर्म उजागर करती है। उसमें चित्रित दृश्यों को हम जीवन में साक्षात देखते हैं। फर्क यह होता है कि कविता में देखने के बाद उन जीवन दृश्यों को हम नई दृष्टि से देखने लगते है। बच्चा गोद में लेकर ‘बस में चढ़ती’ रघुवीर सहाय की  स्त्री हो या ‘छाती से सब्जी का थैला सटाए बिना धक्का खाए’ संतुलन बनाकर बस पकडनेवाली अनूप सेठी की ‘एक साथ कई स्त्रियाँ’ हों, वे रोज़मर्रा के ऐसे अनुभव हैं जिनके प्रति कविता हमें एकाएक सजग कर देती हैं।

 ‘खबर का असर’ कविता में कवयित्री आए दिन अखबारों में सामूहिक बलात्कार की खबरें पढ़कर इतना भयभीत हो उठती है कि कब, किस वक्त, कहां, कैसे ये घटनाएँ घटित हो जाएगी,सोचकर उसका दिल दहल जाता है। इस कविता की कुछ पंक्तियाँ ;-

स्त्री जात को नहीं रहा
किसी पर अब ऐतबार
प्यार,गली,मोहल्ले
दोस्त,चाँद और छतें
फिल्म,जुल्फ,रूठने
पायल की रुनझुन
इशारों में इशारों की बातें
सब वीरान हो गई
जबसे नई दिल्ली में
और दिल्ली जैसी
कई वारदातें
किस्सा-ए-आम हो गई

अनामिका ने अपनी पुस्तक “स्त्रीत्व का मानचित्र” में एक जगह लिखा है:-
“अंतर्जगत और बहिर्जगत के द्वन्द्वों और तनावों के सही आकलन की यह सम्यक दृष्टि जितनी पुरुषों के लिए जरूरी है,उतनी ही स्त्रियों के लिए भी। पर स्त्रियों का,खास कर तीसरी दुनिया की हम स्त्रियों का,बहिर्जगत अंतर्जगत पर इतना हावी है कि, कई बार हमें सुध भी नहीं आती,चेतना भी नहीं होती, कि हमारा कोई अंतर्जगत भी है और उसका होना महत्वपूर्ण है।”

विमलाजी की ‘’जिंदगी यहां’ कविता में ऐसे ही स्वरों की पुनरावृत्ति होती है :-

माँ, बहिन, बेटी,बीवी नहीं
सिर्फ औरत बनकर
बिस्तर की सलवटें बनती है जिंदगी यहां
 
जबकि ‘मैं हूँ एक स्त्री’ कविता में जमाने के अनुरूप नारी-सशक्तिकरण का आव्हान किया है, जो रामधारी सिंह दिनकर की कविता ‘अबला हाय! यही तेरी कहानी, आँचल में दुख और आँखों में पानी’ की रचना-प्रक्रिया के समय का उल्लंघन करती हुई अपने शक्तिशाली होने का परिचय देती है :-

“मैं कोई बुत नहीं जो गिर जाऊंगी
हाड़ मांस से बना जीवित पिंजर हूँ
कमनीय स्त्री देह हूँ तो क्या हुआ ?
मोड दी मैंने समय की सब धाराएँ”


किसी उपकरण को कलात्मक मानना और कि
सी को न मानना एक भाववादी तरीका है। भले ही कलावाद के नाम पर हो या जनवाद के नाम पर। कवयित्री के प्रयोगों से स्पष्ट है कि न कोई विवरण अकाव्यात्मक होता है,न बिंब,प्रतीक,सपाटबयानी,मिथक,उपमान,चरित्र वगैरह काव्यात्मक होते हैं। यह सभी कविता के उपकरण है। उपकरणों को कविता बनाती है संवेदना। वही विभिन्न उपकरणों में संबंध, संगीत और सार्थकता लाती है।

“कब तक ?” कविता में ‘बाय-पास”,”एरो’,’स्टॉप’,’फोरलेन’,’बैरियर’तथा ‘टोलनाका’ आदि शब्दों के माध्यम से कवयित्री ने समाज के समक्ष एक प्रश्न खड़ा किया है,आखिर कब तक अपनी मंजिल पाने के लिए एक औरत ‘टोलनाका’ चुकाती रहेगी?इसी तरह उनकी अन्य नारीवादी कविता ‘हरबार’ में ‘ऐसा क्यों होता है ,हरबार मुझे ही हारना होता है’ का प्रश्न उठाया है। जहां  ‘अहसास’ कविता अवसाद की याद दिलाती है, वहीं उनकी कविता ‘समय’ असीम संभावनाओं वाले नए सवेरे के आगमन, “मैं राधा-राधा’ कविता में पथिक से नए इतिहास के निर्माण का आव्हान तथा ‘विज्ञापनी धुएं के संग’ कविता संचार-क्रान्ति के प्रभाव से आधुनिक समाज के विज्ञापनों के प्रति बदलते रुख पर प्रहार है।

कवयित्री लंबे समय से पत्रकारिता से जुड़ी हुई हैं और यौवनावस्था से ही सक्रिय राजनीति में हिस्सा ले रही हैं। उनकी प्रखर राजनैतिक चेतना लगातार उनके लेखन को तराश रही है और यही कारण है कि वह अपने राजनैतिक परिवेश से अभी भी पूरी तरह संपृक्त हैं। विमला भण्डारी की कविताएं यथार्थवादी है,सामाजिक दृश्यों से सीधा सरोकार रखने वाली। केदारनाथ सिंह सामाजिक दृश्यों का सामना नहीं करते,उनकी ओर पीठ करके उनका अनुभव करते हैं। इसलिए वे माध्यम संवेगों और अमूर्तताओं के कवि के रूप में हमारे सामने आते हैं। जबकि विमला भण्डारी सामाजिक दृश्यों का खुली आँख से सामना करती है,जिनके सारे दृश्य उनके निजी-आभ्यंतर के निर्मल साँचे में ढलकर आते हैं। जिस अर्थ में ‘व्यक्तिगत ही राजनीतिक’ होता है, उस अर्थ में विमलाजी  का काव्य-संसार ‘व्यक्तिगत ही सामाजिक’ है! यह एक संयोग नहीं,परिघटना है।  ‘जब भी बोल’ कविता में कवयित्री ने हर नागरिक से जनहित में बोलने का आग्रह किया है:- –

अरे! कुछ तो बोल
जब भी बोल
जनहित में बोल


‘जनहित’ का यहां उन्होंने व्यापक अर्थ समझाया है अर्थात किसानों, मजदूरों, अबलाओं, कृशकायों, भूखे-नंगों के हित में आवाज उठाने वाले मार्क्सदी स्वर इस कविता में साफ सुनाई पड़ते हैं। जनहित के लिए वह प्रेरणा देती है।यथा:-

देखना एक दिन
न पद होगा
न होगा राज
मन की मन में रह जाएगी
तब कौन करेगा काज
जब भी बोल
जनहित में बोल।


इसी शृंखला में ‘गांव में सरकार आई’ कविता में आधुनिक लोकतन्त्र व प्रशासन से गांवों में धीमी गति से चल रहे विकास-कार्यों पर दृष्टिपात करते हुए व्यंगात्मक तरीके ने करारी चोट की है। कुछ पंक्तियाँ देखिए :-

सब की सब
कह रही है
गांवों में सरकार आई है
पपडाएँ होंठ, धुंधली नजर
मुख अब अस्ताचल की ओर है
निगोड़ी सब निपटे तो मेरा नंबर आए
प्रशासन गांवों की ओर है


राजनीति आधुनिक जीवन-प्रक्रिया का ढांचा है। वह समाज से बाजार तक पूरे जीवन को नियंत्रित करती है। इसीलिए हर प्रकार का संघर्ष एक मोर्चा राजनीति है। समाज और बाजार के विरोधी खिंचाव में राजनीति निर्विकार नहीं करती। वह एक न एक ओर झुकती है। इसीलिए वह सत्ता को कायम रखने की विद्या है, उसे बदलने की विद्या भी है। हमारे समय की प्रभावशाली राजनीति बाजारवाद के अनुरूप ढल गई है।  जिस तरह डॉ॰ विमला भंडारी का कथा-संसार वैविध्यपूर्ण है, ठीक इसी तरह कविताओं को भी रचनाकार की कलम ने सीमित नहीं रखा है। सलूम्बर,नागौर,बूंदी,मेवाड़ आदि छोटे-बड़े ठिकानों,रियासतों के वीर राजपूतों द्वारा अपने आन-बान शान की रक्षा के लिए प्राणों को न्योछावर तक कर देने की गौरवशाली अतीत परंपरा को विमला जी ने अपनी रचनाओं का केंद्र बिन्दु बनाया। उनकी कविताओं ‘अंतराल’ और ‘अब शेष कहां?’ में अपने गांव के प्रति मोह तथा अतीत को याद करते हुए वह कहती है:-

किन्तु
जलाकर
खुद को
धुआं बनकर उड जाएँ
ऐसे बिरले
अब शेष कहां !


लेखिका की ख्याति पूरे देश में बाल साहित्यकार के तौर है। बाल साहित्य में विशेष योगदान के लिए उन्हे केंद्रीय साहित्य अकादमी का पुरस्कार भी प्राप्त हुआ, तब यह कैसे हो सकता है कि उनका कविता ससार भी बाल जगत से विछिन्न रह जाता। जीवन की विविध उलझनों,आजीविका के लिए किए जाने वाले प्रयत्नों, जीवन की विविध व्यस्तताओं और पारिवारिक दायित्व-निर्वहन की आपाधापी के बीच भी विमला जी ने बाल-साहित्य पर लगातार लिखे हुए अपनी कलम की स्याही को सूखने से बचाया आज भी उनका रुझान बाल-साहित्य पर विशेष है। उनकी बाल-कविता जैसे ‘फोटू तुम्हारे’,‘मस्त है छोटू राम’,‘उफ! ये बच्चे’,‘माफ करो भाई’,‘घर धर्मशाला हो जाए’ ने हिंदी जगत में विशिष्ट ख्याति अर्जित की है। ‘इसी सदी का चाँद’ कविता में कवयित्री ने लिंग-भेद के कारण हो रहे भेदभाव, ‘सत्या’ कविता में गिरते सामाजिक मानदंडों पर करारा प्रहार करते हुए ‘यह सत्य भी क्या है?’ की कसौटी का आकलन, ‘हे गणतंत्र!’ में देश प्रेम के जज़्बात तथा मन की फुनगियों पर चिडिया बन आशाओं का संचार करने का अनुरोध है।

‘जलधारा’ कविता में किसी भी इंसान के इंद्रधनुषी जीवन-प्रवाह में नित नए आने वाले परिवर्तनों तथा उन्हें रोकने व बांधने के व्यर्थ प्रयासों का उल्लेख मिलता है। इन परिवर्तनों का आत्मसात करते हुए अनवरत आगे बढ़ते जाने का संदेश है, जबतक कि इस शरीर में प्राण न रहें। गीता के कर्मयोगी बनने के संदेश का आह्वान है इस कविता में।

यदि हम एक रचनाकार की बहुत सारी कहानियां और कविताएं एक साथ पढ़ते हैं तो उसकी मानसिक बनावट और उसके चिंतन,विचारधारा और रुझान का पता लग जाता है। उनका समग्र साहित्य पढ़ने के बाद कुछ बातें अवश्य उनके बारे में कहने कि स्थिति में स्वयं को पाता हूँ। पहला- विमलाजी अपने समाज के निचले व मध्यम वर्ग में गहरी रुचि लेती है। दूसरा – जहां भी शोषण होता है वह विचलित हो उठती है। तीसरा- एक नारी होने के कारण हमारे समाज में महिलाओं पर हो रही घरेलू हिंसा व यातनाओं  के कारणों का अच्छी तरह समझ सकती है। चार- समाज का लगभग हर तबका अपने से कमजोर तबके का शोषण करता है। पांचवा- इतना सब-कुछ होते हुए भी लेखिका/कवयित्री इस ज़िंदगी और समाज से पलायन करने  के पक्ष में नहीं है। उनकी दृष्टि आदर्शवादी है।

विमला भण्डारी के  काव्य संसार की झलक से हम आश्वस्त हो सकते हैं कि जिस गहन चिंतन और नए प्रयोगों के साथ अपने अंतरंग-कोमल स्वर से बाल-साहित्य को समृद्ध किया हैं,उन्हीं स्वरों को मधुर संगीत देकर अपने काव्य-संसार को भी सुशोभित किया है।