Saturday, March 09, 2013

साहिर लुधियानवी की जयंती पर स्‍मृति डाक टिकट


08-मार्च-2013 16:14 IST
राष्‍ट्रपति ने जारी किया साहिर लुधियानवी पर स्‍मृति डाक टिकट
भारत के राष्‍ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी ने आज राष्‍ट्रपति भवन में स्‍वर्गीय साहिर लुधियानवी की जयंती (8 मार्च, 2013) पर स्‍मृति डाक टिकट जारी किया। 

इस अवसर पर राष्‍ट्रपति ने कहा कि स्‍वर्गीय साहिर लुधियानवी मुख्‍य रूप से एक ऐसे शायर के रूप में प्रसिद्ध थे जो आम आदमी की रोज़मर्रा जीवन से जुड़ी परेशानियों और उनके सब्र के इम्तिहान के बारे में लिखते थे। प्रेम और सुंदरता पर अपनी रचनाओं के कारण उन्‍होंने युवाओं के बीच भी अपनी पहचान बनाई। उन्‍होंने समकालीन दौर के मूल्‍यों और सामाजिक चिंताओं को बेहद संवेदशीलता के साथ लिखा था। 

राष्‍ट्रपति ने कहा कि उर्दू शायरी को फिल्‍मों में इस्‍तेमाल करना साहिर लुधियानवी के महानतम योगदान में से एक है। उन्‍होंने फिल्‍म लेखक संघ के ज़रिए गीतकारों की पहचान के लिए भी लड़ाई लड़ी। श्री मुखर्जी ने कहा कि उनके निधन के 33 साल बाद उनकी जयंती पर स्‍मृति डाक टिकट जारी किया जाना इस बात का सबूत है कि अपनी शायरी और अपने गीतों के जरिए वे आज भी लोगों के दिलों में जिंदा हैं। 

इस अवसर पर केंद्रीय संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री श्री कपिल सिब्‍बल तथा केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री श्री मनीष तिवारी भी उपस्थित थे। (PIB)

वि.कासोटिया/प्रियंका/संजना-1165

साहिर के शहर से........ .....ساحر کے شہر سے  ·


बल्‍क एलपीजी स्‍टाक पर निगरानी

08-मार्च-2013 19:04 IST
रसोई गैस के सिलेंडरों का परिदान
Courtesy Photo
बुकिंग किए जाने के 48 घंटों के भीतर एलपीजी आपूर्ति की सुपुर्दगी करने के उद्देश्‍य से ओएमसीज दैनिक आधार पर बल्‍क एलपीजी स्‍टाक पर निगरानी रख रही हैं ताकि आवश्‍यकता के अनुसार बाजार की मांग पूरी करने के लिए अबाधिक भरण प्रचालन सुनिश्चित किया जा सके। इसके अलावा, उच्‍चतम मांग को पूरा करने के लिए आवश्‍यकता के आधार पर संयंत्रों का प्रचालन रविवार और अवकाश क दिनों तथा नियमित कार्यदिवसों को निर्धारित कार्य समय के बाद भी किया जाता है। ओएमसीज के क्षेत्र अधिकारी सभी वितरकों पर नियमित रूप से निगरानी रखते हैं और बढ़ी हुई मांग को पूरा करने के लिए यदि किसी वितरक को अतिरिक्‍त आपूर्ति की जानी अपेक्षित होती है तो यह आपूर्ति उसे जारी की जाती है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि बाजार में कोई बैकलाग न रहे।
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस राज्‍य मंत्री श्रीमती पनबाका लक्ष्‍मी ने आज लोकसभा में एक प्रश्‍न के लिखित उत्‍तर में यह जानकारी दी। (PIB)


वि. कासोटिया/राजेन्‍द्र/दयाशंकर -1186

Friday, March 08, 2013

केवल पांच बच्चियों से हुयी थी शिक्षा- क्रांति की शुरूआत

जैन स्कूल में की गयी बहन देवकी देवी को श्रद्धा से सलाम 
जब समाज का एक बहुत बड़ा और प्रभावशाली हिस्सा बच्चियों के जन्म को बुरा समझ रहा था, जन्म होते ही उन्हें मार डालने की साजिशें रची जाती थीं, खुश किस्मती से अगर फिर भी बच गयीं तो उन्हें खेलने और पढने की उम्र में ही विवाह के बंधन में बाँध दिया जाता था। उस समय समाज के कुछ लोग हिम्मत करके इस सब  के खिलाफ केवल आवाज़ ही नहीं उठा रहे थे बल्कि खुद कुछ करके भी दिखा रहे थे। इन्हीं में से एक थी बहन देवकी देवी। नारी शिक्षा और नैतिक जीवन शैली को अपनी सारी उम्र समर्पित क्र देने वाली बहन देवकी देवी की ओर से शिक्षा के क्षेत्र में लगाया गया एक छोटा सा पौदा आज बहुत बड़ा वट वृक्ष बन चूका है। लुधियाना में देवकी देवी जैन गर्ल्ज़ स्कूल और डी डी  जैन गर्ल्ज़ कालज के नाम से चल रहीं शिक्षण संस्थाएं आज आधी दुनिया अर्थात महिला जगत को सशक्त और शिक्षित करने में लगी हैं।

महिला दिवस के शुभ अवसर पर लुधियाना के रूपा मिस्त्री गली क्षेत्र में स्थित जैन गर्ल्ज़ सीनियर सेकेंडरी स्कूल में उस महान आत्मा बहन देवकी देवी को भी बहुत ही आदर के साथ सलाम की गयी। बाल ब्रह्मचारिणी भं देवकी देवी जैन का जन्म 12 मार्च 1906 को श्री भक्त प्रेम चंद तथा माता श्रीमती भनी देवी के घर में हुआ। कहते हैं की महान आत्माएं विश्व में जन हित के लिए ही आती हैं। भं देवकी देवी का जन्म भी इसी की एक मिसाल साबित हुआ।  खेलने खाने की अल्प उम्र जब बच्चे खान-पान और खिलौनों के लिए झगड़ते हैं उस समय इस मासूम लेकिन दूर द्रष्टा बच्ची ने खुद को धर्म और समाज निर्माण के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने पूज्य श्री सद्गुरु धर्मपिता जैन धर्म दिवाकर जैनागम रत्नाकर आचार्य सम्राट पूज्य श्री आत्मा राम जैन जी के चरण कमलों में अपने सारे जीवन को समर्पित करने भीष्म प्रतिज्ञा की।  यह सब उन्होंने अपने पिटे के जीवन काल में ही स्वयं को सौरभाविन्त रखने के लिए किया। उन्होंने जिंदगी के आखिरी सांस तक इस संकल्प को निभाया भी। उनका सारा जीवन धर्म साधना में लीन रहा और साथ ही साथ सक्रिय रूप से नारी शिक्षा को समर्पित भी। यह सब मुझे बताया इस स्कूल की प्रिंसिपल मीना गुप्ता और स्टाफ के अन्य सदस्यों ने। 
उस समय नारी शिक्षा की बात करना किसी क्रांति से कम नहीं था। समाज के साथ मंगा लेना आसान कभी भी नहीं होता। पर धर्म और साधना की शक्ति से उन्होंने लगातार अपने विजयी कदम बढ़ाने जारी रखे। अगर आज नारी पूरे समाज के सामने एक शक्ति बन कर उभरी है तो इसमें बहन देवकी देवी का भी बहुत ही अहम योगदान है। इस  सम्बन्ध में इन शिक्षण संस्थानों की समिति के सेक्रेटरी विपिन जैन बहुत ह कम शब्दों में महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं। आप जान कर हैरान होंगें कि जैन शिक्ष्ण संस्थानों के जिस विशाल रूप को देख कर आज सभी  चमत्कृत हो जाते हैं उसकी शुरूआत हुयी थी केवल पांच  लडकियों से। श्री आत्मा जी महाराज की प्रेरणा से वह छोटी सी शुरूआत आज पर्वत बन चुकी है। अब इन शिक्षण संस्थानों में अमीर गरीब सभी बच्चों को बिना किसी भेदभाव के शिक्षा दी जाती है। वितीय तौर से कमजोर वर्ग का यहाँ विशेष ख्याल रखा जाता है। वर्दी से लेकर किताबों तक की सुविधा उन्हें मिलती है। योग से लेकर कम्प्यूटर तक के क्षेत्र में उन्हें पारंगत किया जाता है तां कि आज की बच्चियां भविष्य में सशक्त नारी बन कर स्वस्थ समाज के निर्माण में योगदान डाल सकें। देखो  गुरु में श्रद्धा और प्रेम कितना था इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि अपने धर्मपिता आचार्य सम्राट पूज्य श्री आत्माराम जी महाराज क्क देवलोकगमन होने के दो माह पश्चात ही सात अप्रैल 1962 आत्म ज्योति में समा गयीं।  अब शरीरक रूप में में तो बहन देवकी देवी हमारे दरम्यान नहीं हैं पर उनका संकल्प, उनका कार्य निरंतर और अबाध चल रहा है।   स्कूल हो या कालज जब भी देखो यही लगता है कि  उनकी शांत छवि अपनी मूर्ती के रूप में सब देख रही, सब सम्भाल रही है। इन शिक्षा संस्थानों से शिक्षा पाकर बहुत सी बच्चियां ऊंचे स्थानों पर पहुँच चुकी हैं और नारी उत्थान में कार्यरत हैं।जैन गर्ल्ज़ सीनियर सेकेंडर स्कूल की प्रिंसिपल मीना गुप्ता स्वयं भी इसी स्कूल की छात्र रही हैं। जब उनसे महिला दिवस के सम्बन्ध में बात हुयी तो उनकी जुबां पर बस एक ही नाम आया बहन देवकी देवी। स्कूल के सारे  स्टाफ ने  इस बार के महिला दिवस पर उन्हें बहुत ही श्रद्धा से याद किया और साथ ही उनके दिखाए मार्ग पर चलने का संकल्प भी लिया।--रेक्टर कथूरिया (मोबाईल-98882-72025) 

Wednesday, March 06, 2013

इस मौत को क्या कहा जाए?

Wed, Mar 6, 2013 at 3:09 PM
An Article by the Asian Human Rights Commission
INDIA: स्त्री विरोधी नहीं हो सकते सभ्य समाज--शिशिर कुमार यादव
पिछले कई दिनों से देश भर में,समाज द्वारा महिलाओं के प्रति अपराधों के घिनौने रूप पर एक चर्चा और विमर्श का माहौल हैं. अफ़सोस यह कि यह माहौल किसी आत्मचेतना के चलते नहीं बल्कि एक निर्मम बलात्कार और हत्या से उभरे जनाक्रोश के चलते बना है. इस घटना के लगभग दो महीने के बाद भी न समाज शर्मिन्दगी से उबार पाया है न उसी समाज के एक हिस्से के लोग दरिंदगी से और हमारा हासिल वह समाज है जिसमें एक महिला अपनी प्राकृतिक जीवन यात्रा इसलिए पूरी नहीं कर सकती क्योंकि समाज नहीं चाहता था कि वह इस तरह सें जिएं. इस खबर के बाद गलतियों और खामियों के सामाजिक और राजनैतिक निहितार्थ निकाले जा रहे हैं, जिनकी अपनी ही प्रकृति और सीमा होगी. लेकिन फिर भी यह हत्या, जो न केवल निर्मम बल्कि बडे सधे तरीके से भी की हैं उस ओर सोचना जरूरी हैं कि क्या सच में हम एक सभ्य समाज में जी रहे हैं? क्या सच में हम ऐसा ही समाज चाहते हैं? इस मौत को क्या कहा जाए? हादसा, अपराध, दुर्घटना या कोई और शब्द. शायद किसी भी शब्द में इतनी ताकत हो जो इसे पूरी तरह से विश्लेषित कर सकें. वस्तुतः देखें तो इस हादसे के सन्दर्भ में भाषा की सीमा भी साफ दिखती हैं क्योंकि सिर्फ हादसा कहने से ऐसे अपराधों की गंभीरता और वीभत्सता का मौलिक चरित्र ही खत्म हो जाता हैं.
Photo  courtesy:Indian Pics
अफ़सोस यह भी है कि ऐसे निर्मम अपराधों के बाद तमाम लोग ऐसे अपराधियों के लिए मौत की सजा माँगने लगते हैं जैसे मृत्युदंड से इस समस्या का समाधान हो जाएगा. पर मृत्युदंड ने दुनिया के किसी भी हिस्से में अपराध रोके हों इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिलता. एक दूसरे स्तर पर भी देखें तो समझ आता है कि अगर मौत की सजा इन दुष्कृत्यो को रोक सकती तो एक अपराधी को ऐसी सजा मिलने के बाद अपराधी और समाज दोनो ही इसकी पुनरावृत्ति नहीं करते. इन हादसों की पुनरावृत्ति हमें यह बतलाती हैं कि अब भी हम ना तो इनकी गंभीरता समझ पाए हैं और ना ही वीभत्सता. हाँ मौत की सजा देने से यह जरूर होगा कि बलात्कारी सबूत न छोड़ने के प्रयास में पीड़ित की हत्या करने पर उतर आयें.
जो भी हो पर इस हादसे ने हमें एक बार खुद की ओर सोचने के लिए झकझोरा हैं कि हम कैसे सामाजिक औऱ राजनैतिक ढाचें में जी रहे हैं? हम एक ऐसे समाज रह रहे हैं जिसमे आधी दुनिया की भागीदार स्त्री के मूलभूत अधिकारों को हम सभ्यता के हजारों साल आगे आने के बाद भी बर्बर तरीके से कुचलता जाता रहा है. हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं जिसमे महिलाओं के प्रति इस बर्बरता को जिंदा रखनें के लिए चरणबद्ध तरीको से जाल बुने जाते हैं और उनके खिलाफ होने वाले अपराधों की फेहरिश्त उनके परिवारों से ही शुरू हो जाती है. भ्रूण हत्या, परिवार के अन्दर यौन हिंसा, दहेज़, दहेज़ हत्या, ध्यान से देखें तो यह सब स्त्रियों के विरुद्ध उनके द्वारा किये जाने वाले अपराध हैं जो अन्यथा उनके बचाव के लिए जिम्मेदार हैं. 
कहने की जरूरत नहीं है कि हम जिस देश में रह रहें हैं उसमें इन अपराधों को सामाजिक और राजनैतिक मान्यता की अदृश्य शक्ति मिली हुई हैं. हम और आप इन्हे पहचानते और जानते भी हैं औऱ कई बार इनके हिस्से भी होते हैं पर बदलते नहीं हैं. हमें इनसे दिक्कत सिर्फ तब होती है जब यह हमारे अपनों के साथ हों. हाँ, ऐसे अपराधों के बाद आने वाली प्रतिक्रियायों पर नजर डालने से इन अपराधों को मौन स्वीकृति दिलाने वाले चेहरे भी साफ़ नजर आने लगते हैं. दिल्ली के इस मामले के बाद समाज और सार्वजनिक मंचो से बयान उसकी बानगी हैं। और इसी लिए यह पूछना जरूरी बनता है कि ऑनरकिलिंग को भावनात्मक और सामाजिकता से जुड़ा मुद्दा माननें वाले औऱ चुपचाप भ्रूण हत्या को बढावा देने वाले समाज से, इस हत्या पर ईमानदारी भरी प्रतिक्रिया औऱ बदलाव की उम्मीद करना कहां तक समझदारी भरा कदम होगा.

अफ़सोस यह भी है कि समाज संस्कृति के उद्घोषक जो इस देश को " कोस कोस पर बदले पानी, चार कोस पर बानी से" विविधता भरी संस्कृति का वर्णन कर अपना सीना चौड़ा करते हैं वे भी यह भूल जाते हैं कि महिलाओं को लेकर लगभग पूरा देश एक ही तरह का व्यवहार करता है. क्या उत्तर क्या दक्षिण, क्या राजस्थान क्या बंगाल, क्या शिक्षित क्या अशिक्षित, महिलाओं के प्रति अपराध और उनके अधिकारों के प्रति रवैया लगभग एक सरीखा और एक समान हैं. देश का कोई कोना दंभ से इसका दावा नही कर सकता हैं कि वह इन स्थितियों और परिस्थितियों से खुद को इतर रखे हुए हैं. स्पष्ट हैं कि महिलाओं के प्रति नजरिये को लेकर आजतक हमारा समाज जहां था वहीं हैं और अगर कुछ बदलाव के चिन्ह दिखाई भी पडे हैं तो उन्हे कुचलनें के लिए समाज ने अपराधियों को हमेशा बढ़ावा दिया हैं. जिससे उनकी नैतिकता और सभ्यता की खोखली पाठशाला का पाठ महिलाएं आसानी से समझ लें. आज भी समाज, नारी देह और उसकी स्वतंत्रता को अपने पैमानो से देखता हैं और आगे भी उसे नियंत्रित करने का प्रयास जारी हैं. इन कोशिशों में अपराधी और अपराध को मौन सहमति देकर आगे भी नियंत्रित करना चाहता हैं. इसीलिए सामाजिक व्यवस्था का कोई भी परिवर्तन, आज भी अलोकतांत्रिक तरीके से ही कुचला जाता हैं. राजनैतिक और सामाजिक संस्थाए इनको न केवल बढ़ावा देती हैं वरन कई बार अगुवाई भी करती नजर आती हैं.

निश्चित ही कोई भी समाज या व्यवस्था आदर्श नहीं होती हैं, अच्छे और बुरे गुण सभी सामाजिक व्यवस्था के हिस्से होते हैं. भारतीय सामाजिक व्यवस्था उससे इतर नहीं हैं, लेकिन फिर भी महिलाओं के प्रति समाजीकरण की वह व्यवस्था जिसमें उनके प्रति किए गए अपराध जो कि सामाजिक अपराध हैं और समाज का हिस्सा रहे है. इनका इतिहास बर्बर काल सें हैं और आज भी अनवरत जारी हैं. आज भी हम ऐसे ही समाज को पाल पोस रहे हैं जो महिलाओं के अधिकारों के प्रति पूर्णतया असंवेदनशील हैं. इस कदर की असंवेदनशीलता और अपराध को बढावा देना किसी भी सभ्य समाज का हिस्सा नहीं होता हैं. ऐसे में हमारा दावा कितना खोखला हैं कि हम एक सभ्य समाज में हैं और हमारे द्वारा एक सभ्य समाज का निर्माण किया जा रहा हैं.
About the Author: Mr. Shishir Kumar Yadav is a research scholar based in Jawaharlal Nehru University, New Delhi. He could be contacted at shishiryadav16@gmail.com
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About AHRC: The Asian Human Rights Commission is a regional non-governmental organisation that monitors human rights in Asia, documents violations and advocates for justice and institutional reform to ensure the protection and promotion of these rights. The Hong Kong-based group was founded in 1984.


Hum Dekhenge by Tina Sani


क्या सच में हम ऐसा ही समाज चाहते हैं?


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मनरेगा 2: कुछ कठोर सीखें//सचिन कुमार जैन

An Article in Hindi by the Asian Human Rights Commission India:
नियोजन यानी योजना और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (मनरेगा 2)
Courtesy Photo: Punjab Kesari
केवल अपेक्षा ही नहीं थी बल्कि उम्मीद भी थी कि राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना न केवल गाँव के लोगों को रोज़गार का अधिकार देगी, बल्कि हमारी चरमराती शासन व्यवस्था (गवर्नेंस) को भी एक ठोस आधार देगी. यही वह क़ानून भी है, जिसने गाँव को यह अधिकार दिया कि वे अपनी योजना और बजट बनाएंगे, वे अधोसंरचनात्मक विकास की अपनी खुद की प्राथमिकताएं तय करेंगे, निगरानी करेंगे कि 
तय योजना के मुताबिक़ काम हो, किसी के अधिकार का हनन न हो, भेदभाव न हो. पहली बार सामाजिक अंकेषण को कानूनी रूप दिया गया. पर मंडला जिले की लावर मुडिया पंचायत के अनुभव हमें कुछ कठोर सीखें दे रहे हैं. वर्ष 2011-12 और वर्ष 2012-13 में इस पंचायत ने 364 जाब कार्डधारियों के आधार पर 56-56 लाख रूपए का बजट बनाया और योजना तय की, परन्तु इन दोनों ही वर्षों में यह पंचायत 20 से 22 लाख रूपए की राशि ही खर्च कर पायी और आधे से ज्यादा काम अधूरे रहे. यह विश्लेषण नहीं किया गया कि आखिर योजना बनाने में कहीं कोई गड़बड़ी है या क्रियान्वयन में. और इसके बाद भी वर्ष 2013-14 के लिये जो नई योजना बनायी गयी है उसका बजट है 80 लाख रूपए.

हम जानते हैं कि लावर मुडिया सरीखी हज़ारों पंचायतों के बजट के आधार पर ही देश का आर्थिक नियोजन होता है, और जब पंचायतें स्वीकृत बजट में से 45 प्रतिशत हिस्सा ही खर्च कर पायें तब यह अनुमान लगाना आसान है कि राष्ट्रीय बजट के स्तर पर इसके क्या विसंगतिपूर्ण प्रभाव हो सकते हैं. मैं यह कतई नही कहना चाहता हूँ कि पंचायतों और ग्राम सभा की नियोजन पद्धति में कोई लाइलाज खोट है, परन्तु यह सवाल जरूर है कि मनरेगा को लागू होने के आठ साल बाद भी क्या हम पंचायतों और ग्राम सभा को नियोजन की क्षमता से वाकिफ नही करा पाए हैं. मध्यप्रदेश ने वर्ष 2012-13 के लिये यह आंकलन किया था कि 1960 लाख मानव दिवस श्रम पैदा किया जाएगा. राज्य योजना के मुताबिक दिसम्बर 2012 तक यानी 9 माह में 1486 लाख मानव दिवस श्रम पैदा किया जाना था, वास्तविक स्थिति के मुताबिक दिसंबर 2012 तक कुल 760 लाख मानव दिवस श्रम ही पैदा किया जा सका है.

लालपुर के तिन्सई गाँव की कहानी कह रही है सरकार व्यवस्था बना रही है, पर लोगों का व्यवस्था में से विश्वास टूट रहा है. यहाँ की निगरानी समिति से सदस्य और दमखम से बात कहने वाले शंकर सिंह मरावी कहते हैं हम गाँव के लोगों ने कई बार एक साथ बैठ कर रेडियो पर यह सुना है कि भारत सरकार ने हमारे गाँव के लोगों को रोज़गार की गारंटी दी है. हम मांग करेंगे तो 15 दिन में रोज़गार मिलेगा और काम करने के 15 दिन के अन्दर हमे अपने काम की मजदूरी मिल जायेगी. हमने आठ महीने पहले 15 दिन का काम किया था, इसकी मजदूरी आठ महीने बाद मिली. यह भी आसानी से न मिली, 15 बार तो पंचायत के चक्कर लगाए, चार बार जनपद आफिस गए. कलेक्टर को 3 कागज़ भेजे. ये कौन सी गारंटी है? अब तो यही लगता है सरकार की गारंटी की बात झूठी है और अच्छा तो यही है कि किसी ठेकेदार के यहाँ काम करें, अस्सी रूपए ही मिलते हैं पर शाम को मिल तो जाते हैं. तीन गाँव की पंचायत है लालपुर. आमतौर पर हम मानते हैं कि पंचायतों के सरपंच इस कार्यक्रम में भ्रष्टाचार का पलीता लगा रहे हैं. उन्होने अपने घर भर लिये हैं और गाँव के स्तर पर बनी पंचायती राज व्यवस्था के प्रति बनी उम्मीदों को तोड़ कर रख दिया है. यहाँ का एक व्यापक विश्लेषण बताता है कि पंचायती राज व्यवस्था को सरपंचों ने नहीं हमारी राज्य व्यवस्था और अफसरशाही ने भी गहरा आघात पंहुचाया है.

लालपुर के सरपंच मदन सिंह वरकडे अपनी पंचायत की जानकारी सामने रखते हुए बताते हैं कि इस पंचायत को वर्ष 2010-11 में मनरेगा के तहत 100 कामों की स्वीकृति मिली थी, इनमे से उन्होने 52 काम उसी वर्ष पूरे किये और 48 काम वर्ष 2011-12 में आकर पूरे हुए. इन कामों के मजदूरी करने वालों की मजदूरी का पूरा भुगतान जनवरी 2013 में जाकर हो पाया. वर्ष 2012-13 के लिये 25 कामों की तकनीकी स्वीकृति जारी की गयी पर 15 जनवरी 2013 तक यानी वितीय वर्ष के लगभग ख़त्म होने तकin कामों की राशि जारी ही नहीं हुई थी. पहले तो मदन सिंह कहते हैं कि चूंकि मजदूर काम पर नही आ रहे हैं इसलिए उसी वित्तीय वर्ष में काम पूरी नहीं हो पाए, पर शंकर सिंह मरावी इस तर्क का विरोध करते हुए कहते हैं कि मजदूरी का भुगतान ही नहीं होता है तो गरीब आदिवासी काम पर क्यों आयेंगे? एक योजना जिसके तहत 371 जाबकार्ड धारी इस पंचायत को इस साल लेबर बजट के मान से 81 लाख रूपए का बजट प्राप्त हो सकता था, पर कोई राशि जारी न हो सकी. वर्ष 2011 में यहाँ एक जाबकार्डधारी को औसतन 30 दिन का ही रोज़गार मिला. अगले साल यानी 2012 में यह कम होकर 15 दिन के स्तर पर आ गया. यह तो बीमारी के लक्षण हैं जो हमें पंचायत के स्तर पर नज़र आ रहे हैं. बीमारी का कारण कहीं और है.

आज की स्थिति में हमें लालपुर और लावर मुडिया पंचायतों का अध्ययन करने की कोशिश की. एक आम व्यक्ति के नज़रिए से यहाँ की वार्षिक कार्ययोजना और वार्षिक योजना की प्लानिंग बिलकुल अस्पष्ट और घालमेल वाली नज़र आती है. मनरेगा के तहत वर्ष 2010-11 की योजना में यहाँ 100 काम तय किये गए और 60 लाख रूपए का बजट बनाया गया. इनमे से आधे काम पूरे नही हुए तो उन्हे अगले वर्ष यानी 2011-12 की कार्ययोजना में शामिल कर लिया गया और बजट बना 70 लाख रूपए का. साफ़ तौर पर यदि हम यह कहें कि इन दो सालों में लालपुर पंचायत को 1.30 करोड़ रूपए मिले तो क्या यह सही होगा? नही, बिलकुल नही! सच तो यह है कि इन्होने कुल 40 लाख रूपए ही खर्च किये. पंचायतों के स्तर पर उपलब्ध दस्तावेजों का कोई भी अपने स्तर पर अकेले अध्ययन नही कर सकता है, जब तक कि उस पंचायत के सरपंच-सचिव, जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी, लेखापाल और कार्यपालन यंत्री और जिला कार्यक्रम अधिकारी से पूरा स्पष्टीकरण न मिले; जो कि ग्राम सभा को मिलना लगभग असंभव होता है. जरूरत इस बात की है कि एक बहुत ही स्पष्ट प्रारूप में कार्ययोजना, बजट आवंटन और व्यय की जानकारी गाँव को उपलब्ध हो. चूंकि इसे बहुत ही तकनीकी काम बना दिया गया है, इसलिए ग्रामसभा अकेले कभी भी सामजिक अंकेक्षण नही कर सकती है; क्योंकि उसे किसी व्याख्या के लिये सरपंच-सचिव और जनपद के अधिकारियों पर ही निर्भर रहना होगा.

इसका मतलब साफ़ है कि गांव में योजना बनाने से लेकर निर्धारित समय में मजदूरी के भुगतान से जुड़े कानूनी प्रावधान लागू ही नहीं हो पा रहे हैं. अब भारत सरकार के निर्देश हैं कि सभी काम पूरे किये जाएँ और उनके पूर्णता प्रमाणपत्र जारी किये जाएँ तभी मांग के मुताबिक़ राशि का आवंटन होगा. लालपुर और लावर मुडिया को देख कर तो लगता है कि अभी व्यवस्था को पटरी पर आने में बहुत वक्त लगने वाला है. बेहतर होगा कि नए नियमों के सन्दर्भ में जमीनी वास्तविकताओं का अध्ययन किया जाए. 

--सचिन कुमार जैन

Tuesday, March 05, 2013

अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी समारोह 8 जून से नेपाल में

तीन विधाओं की महक से महकेगी त्रिसुगंधि !
आशा पांडेय ओझा 
बाधायों, कठिनाईयों और सीमित साधनों के बावजूद हिंदी प्रेमी हिंदी के प्रचार/ प्रसार के लिए हमेशां सक्रिय रहे हैं। नेपाल में होने वाला अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन इसी सिलसिले की एक कड़ी कहा जा सकता है। अखिल भारतीय साहित्यकला मंच की ओर से काठमाण्डु (नेपाल) में अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी समारोह 8 जून 2013 से 11 जून, 2013 तक आयोजित किया जा सकता है। अब जबकि अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस आठ मार्च को आने ही वाला है--इस अवसर पर यह जानकारी देते हुए हर्ष हो रहा है कि साहित्य के शेत्र में सक्रिय एक शिष्ट महिला हस्ताक्षर इस आयोजन की कामयाबी के लिए विशेष तौर पर सरगर्म है।मेरा अभिप्राय है आशा पण्डे ओझा से। उनके मुताबिक इसकी तैयारियां जोरों पर हैं। गौरतलब है कि इस समारोह में त्रिसुगंधि नामक काव्य संकलन/ संग्रह का विमोचन होना है । इस पुस्तक में प्रकाशन हेतु रचनाकारों से उनकी मौलिक व अप्रकाशित रचनाएँ आमंत्रित है, जो प्रिण्ट में प्रकाशित न हुई हों । वेब पर अपलोडेड रचनाएँ स्वीकार्य होंगीं । इच्छुक रचनाकार किसी एक विधा में अपनी दो रचनाएँ अपने संक्षिप्त जीवन-परिचय के साथ भेज दें ।
काव्य विधा हेतु तीन प्रभाग तय किये गइ सम्मेलन ये हैं -  कविता ,गीत और ग़ज़ल इन्ही तीन विधाओं की महक से महकेगी यह त्रिसुगंधि !
रचनाकारों की रचनाएँ हम तक 15/3/2013 तक अवश्य पंहुच जायें, ताकि अनुमोदित तथा स्वीकृत रचनाओं को संकलित कर संकलन-पुस्तक पर काम करने के लिए हमारे पास उपयुक्त समय रहे ।
प्रविष्टिभेजने हेतु मेल-आइडी-trisugandhi@gmail.com 
आभार 
आशा पांडेय ओझा 
सह संयोजक 
द्वारा, अखिल भारतीय साहित्यकला मंच

Monday, March 04, 2013

पहली बार गूगल + हैंगआउट पर

03-मार्च-2013 19:43 IST
बजट के बारे में नागरिकों के सवालों के जवाब
वित्त मंत्री पी. चिदंबरम 2013-14 के आम बजट पर करेंगे विशेषज्ञों से चर्चा 
केंद्रीय वित्त मंत्री श्री पी. चिदंबरम कल भारतीय समय के अनुसार सुबह आठ बजे गूगल+हैंगआउट बहुपक्षीय वीडियो कान्फ्रेन्स के ज़रिए आम बजट 2013-14 पर नागरिकों के सवालों के जवाब देंगे। ऐसा पहली बार हो रहा है जब केंद्रीय मंत्रिमंडल का कोई मंत्री नागरिकों से बात करने आम बजट के बारे में उनके सवालों के जवाब देने के लिए इस माध्यम का इस्तेमाल करेगा। यह संवाद का शक्तिशाली माध्यम है तथा दुनिया भर में इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले इसे देखते हैं। गूगल + हैंगआउट पर एक बार में 10 लोग भाग ले सकते हैं। बाद में कोई व्यक्ति एयर पर हैंगआउट के इस्तेमाल से इसे यू ट्यूब या लाइव स्ट्रीम पर शेयर कर सकता है। 
वित्त मंत्री गूगल + हैंगआउट पर जानी-मानी हस्तियों के समूह के साथ भी चर्चा करेंगे। इनमें एशिया के वरिष्ठ अर्थशास़्त्री श्री जहांगीर अज़ीज़ और भारत के मुख्य अर्थशास्त्री जेपी मोर्गन, श्री आनंद महिंद्रा, महिंद्रा एंड महिंद्रा के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक, श्री अमित सिंघल, वरिष्ठ उपाध्यक्ष गूगल$इंक तथा एक्सिस कैपिटल के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी श्री मनीष चोखानी शामिल हैं। इसका संचालन वरिष्ठ पत्रकार श्री सेंथिल चेंगलवरयन करेंगे। 

नागरिक google.com/+GoogleIndia पर गूगल इंडिया + पेज या InConversation यूट्यूब चैनल के ज़रिए विशेष बजट गूगल+ हैंगआउट लाइव देख सकेंगे। 

हैंगआउट से पहले नागरिक वीडियो अपलोड करके या यूट्यूब चैनल पर टिप्पणी करके अथवा गूगल इंडिया + पेज और टैगिंग टैक्स्ट या hashtag #asktheFM पर वीडियो के ज़रिए वित्त मंत्री पी. चिदंबरम को अपने सवाल भेज सकते हैं। (PIB)
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वि. कसोटिया/प्रदीप/सुनील/796