Saturday, April 09, 2011

भारत, हिन्दुस्तान और इंडिया // रवि वर्मा

बहुत दिनों से भारत के नाम को ले के हमारे इतिहास की किताबों में अजीब अजीब बातें की जाती हैं और ये सब अंग्रेजों के बताये रास्ते पर ही हमें पढाया गया है | भारत के कई नाम हैं, जैसे जम्बूदीप, आर्यावर्त, भारत, हिन्दुस्तान और इंडिया | पहले दो को छोड़ के मैं बाकि तीन के बारे में अपने विचार लिख रहा हूँ उम्मीद है क़ि आपको मेरे तर्क पसंद आयेंगे |  
भारत 
भारत का नाम राजा दुष्यन्त के पुत्र भरत के नाम पर रखा गया था ऐसी बातें हम पढ़ते आ रहे हैं | ये सिर्फ एक कल्पना है और कुछ नहीं | क्यों क़ि आप विश्व के किसी भी धर्म और संस्कृति को देखेंगे तो पाएंगे क़ि वो भूमि को मातृशक्ति के रूप में ही मानते हैं और हमारे देश में इसे तो मातृभूमि ही कहा जाता है और भारत माता के नाम से हम जयकारा लगाते हैं | भरत नाम के जो राजा थे वो पुरुष थे और उनके नाम पर भारत का नाम रखा गया होगा ये सही नहीं है | 
भारत कोई आज का नाम नहीं है, ये तो अनंत काल से चला आ रहा है, हमारे वेदों में, पुराणों में, ब्राम्हण ग्रंथों में, रामायण में, महाभारत में, गीता में हर जगह इस भूमि को भारत ही संबोधित किया गया है |  तो ये भारत नाम आया कैसे ? भारत बना है दो शब्द मिला के भा+रत =भारत | "भा" का मतलब हुआ "ज्ञान" और "रत" का मतलब हुआ "लगा हुआ" अब दोनों को आप जोड़िएगा तो मतलब हुआ "जो ज्ञान में रत हो" यानि हर समय जो ज्ञान प्राप्ति में लगा हुआ हो वो है भारत | और इसके प्रमाण भी हैं क़ि हमने दुनिया को अकाट्य और अतुलनीय ज्ञान दिया है | और ये भारत नाम, माँ भारती से निकला है और ये माँ भारती है विद्या की देवी सरस्वती जी | और इसके अलावा भारत का जो क्षेत्र था वो बहुत विशाल था, ये आज के अफगानिस्तान से ले के इधर बर्मा (म्यांमार) तक और हिमालय के नीचे से ले के समुद्र तक | अब आज के सन्दर्भ में इसे देखे तो अफगानिस्तान, पाकिस्तान, मालदीव, नेपाल, भारत, बंग्लादेश और बर्मा, ये था अखंड भारत या भारत वर्ष | भारत नाम लेते ही विशालता का अनुभव होता है |  
हिन्दुस्तान  
एक और नाम है भारत का वो है हिन्दुस्तान और देखिये कैसी मूर्खतापूर्ण तर्क दी जाती है हिन्दुस्तान नाम के पक्ष में | हम लोगों को पढाया गया  
क़ि जब मध्य पूर्व से आक्रमणकारी भारत में आते थे तो सिन्धु नदी के कारण इसे हिन्दुस्तान कहने लगे | ये इतिहास लिखने वाले लोग जब इतिहास लिखने बैठे होंगे तो वो भारत के पंजाब को ही भारत का बोर्डर समझते थे इसलिए उनके इस कहानी में सिन्धु नदी बीच में आ जाती है, जब क़ि उस समय का भारत अफगानिस्तान से शुरू होता था | अरे पंजाब में तो पाँच नदियाँ बहती हैं तुम्हे बार बार सिन्धु नदी ही क्यों दिखाई देती है भाई | सिन्धु नदी कभी भी हमारी पहचान नहीं थी और न होगी | बार बार सिन्धु नदी को हमारी पहचान बनाने की असफल कोशिश की गयी | और मध्य पूर्व वाले कोई ऐसे मुर्ख नहीं थे जो "स" को "ह" बोलते थे | उन्होंने यहाँ भारत में मौजूद हिन्दुओं और हिन्दू धर्म के कारण इस जगह को हिन्दुस्तान कहना शुरू किया | ये हिन्दुस्तान भी दो शब्दों को मिला के बना है | हिन्दू + स्तान=हिन्दुस्तान | "स्तान" एक पर्शियन शब्द है और इसका मतलब होता है जगह/स्थान/देश | ये संस्कृत के शब्द स्थान से पर्शियन में लिया गया है | हिन्दुस्तान का मतलब था हिन्दुओं का स्थान/हिन्दुओं का जगह/हिन्दुओं का देश | जैसे पाकिस्तान (पाक+स्तान=पाकिस्तान, हिंदी में इसका मतलब हुआ पवित्र स्थान/पवित्र जगह/पवित्र देश) | अब आप समझ गए होंगे इस "स्तान" का मतलब | ऐसे ही "स्तान" वाले कुछ देश हैं जैसे अफगानिस्तान (अफगानों का देश), किर्गिजस्तान (किर्गीजों का देश), कजाकिस्तान (कजाकों का देश), तुर्कमेनिस्तान (तुर्क्मानों का देश), आदि आदि | ये जो देशों के नाम अभी मैंने बताये ये उनके नस्ल या जाति के नाम पर आधारित हैं |  तो ये दिमाग से निकाल दीजिये क़ि सिन्धु के नाम पर हमारे देश का नाम हिन्दुस्तान पड़ा था | यहाँ रहने वाले हिन्धुओं और हिन्दू धर्म की वजह से उन्होंने हमारे देश को हिन्दुस्तान नाम दिया था | हमारे लिए भारत और उनके लिए हिन्दुस्तान |  
इंडिया   
अंग्रेज जब भारत आये तो उन्होंने बहुत बारीकी से अध्ययन किया भारत का और उन्होंने एक सूचि बनाई क़ि उन्हें भारत में क्या करना होगा क़ि भारत को गुलाम बनाया जा सके | पहला तो इसके शिक्षा तंत्र को ध्वस्त करना होगा, दूसरा इसके इसके तकनीकी संरचना (Techonological Infrastructure) को तोडना होगा, तीसरा कृषि क्षेत्र को बर्बाद करना होगा | और उन्होंने उसी हिसाब से काम भी किया और वो पूरी तरह सफल रहे अपने इस काम में |  
आप जानते हैं क़ि जब भारत स्वतंत्र हो रहा था तो अंग्रेजों ने संधि में ये प्रावधान डाला था क़ि भारत के जो रजवाड़े जिस तरफ जाना चाहते हैं तो जा सकते हैं | मतलब कोई राजा भारत के साथ मिलना चाहता है वो भारत में मिल सकता है और जो पाकिस्तान में जाना चाहता है वो पाकिस्तान में मिल सकता है | इसके अलावा सब को ये छुट था क़ि अगर आप अपना स्वतंत्र अस्तित्व रखना चाहते हैं तो स्वतंत्र भी रह सकते हैं | उस समय भारत में 565 रजवाड़े हुआ करते थे और अंग्रेज तो चाहते ही थे क़ि भारत के 565 टुकड़े हो जाएँ नहीं तो वे ऐसा कानून क्यों बनाते | इसी कानून का नतीजा था क़ि कई राज्य ऐसे भी हुए जिन्होंने ये फैसला किया था क़ि वे ना तो भारत में जायेंगे और ना पाकिस्तान में | ऐसे जो राज्य थे, वो थे कोयम्बटूर, त्रावनकोर, हैदराबाद, जूनागढ़ और जम्मू और कश्मीर | ये भारत क़ि आजादी का नहीं भारत की बर्बादी का कानून था | सरदार वल्लभ भाई पटेल को लगा क़ि अगर ये कानून लागू हुआ और कानून लागू होने के बाद बहुत से राजा ये बात बोलना शुरू कर देंगे क़ि इस कानून के आधार पर तो हमें स्वतंत्र राज्य रखने का अधिकार है, स्वतंत्र राष्ट्र बनाने का अधिकार है तब तो बहुत बड़ा संकट पैदा हो जायेगा | तो सरदार पटेल ने पहले से ही एक अभियान चलाया था क़ि ज्यादा से ज्यादा राजाओं और महाराजाओं को भारतीय राष्ट्र में जोड़ा जा सके और इसी के लिए वो समझौते कर रहे थे और करवा रहे थे | और उनकी योजना ये थी क़ि अंग्रेजों की सरकार जिस दिन तक ये कानून लागू करे उस दिन तक ज्यादा से ज्यादा राज्य और रियासतें भारत में शामिल हो जाएँ और उनके समझौते भारत सरकार के साथ हो जाएँ और ये काम उन्होंने बखूबी  किया भी और अकेले दम पर किया | बहुत कम लोग इस तरह का काम कर सकते हैं जो सरदार पटेल ने किया था | इस तरह की साजिस की थी अंग्रेजों ने भारत को टुकड़ों में बाटने की |
अब सवाल उठता है क़ि ये भारत का नाम इंडिया क्यों रखा अंग्रेजों ने ? हमें बचपन से पढाया गया क़ि अंग्रेज भारत आये तो इन्डस नदी और सिन्धु घाटी सभ्यता (Indus Valley Civilization)  के नाम पर इन्होने भारत को इंडिया कहना शुरू किया | पहले तो मैं बता दूँ क़ि अंग्रेजों ने कभी भी इन्डस नदी के रास्ते भारत में प्रवेश नहीं किया था, वो भारत जब भी आये तो समुद्र के रास्ते से आये | और ये सिन्धु या इन्डस नदी भारत की कोई ऐसी महत्वपूर्ण नदी नहीं थी गंगा जी की तरह, जो हमारे भारत की पहचान इस सिन्धु नदी से बनती या बनी होगी |
 

दूसरी बात ये क़ि सिन्धु घाटी सभ्यता की खोज अंग्रेजों के भारत में रहते हुए हुई थी न क़ि अंग्रेजों के आने के पहले, इस की पहली जानकारी 1842 में मिली थी और बाद में 1920 में इस पर ज्यादा काम हुआ | और उसके पहले मैकाले का बयान 1835 में आया था जो उसने ब्रिटिश पार्लियामेंट में दिया था तब उसने भारत को इंडिया ही कह के संबोधित किया था और उसके पहले के भी जितने दस्तावेज हैं उन सब में भारत को इंडिया ही बताया गया है | तो ये कुतर्क बार बार देना क़ि भारत का नाम 
Indus River और Indus Valley Civilization के नाम पर था वो बिलकुल गलत और भ्रामक है | 
अंग्रेजों ने ये इंडिया नाम उधार लिया था ग्रीक से, भारत को ग्रीक भाषा में इंडिया कहते और लिखते हैं | आप जब भारत को ग्रीक लिपि में लिखेंगे तो वो होगा ινδια | (आप इस लाल से लिखे हिस्से  को कॉपी करके पेस्ट कीजिये http://translate.google.com 
वेबसाइट के बाई तरफ के हिस्से में और Language ग्रीक चुनिए और दाहिनी तरफ हिंदी चुनिए और जब आप Translate पर क्लिक करेंगे तो वहां भारत लिखा जायेगा) | अंग्रेजों ने ये इंडिया नाम ग्रीक लोगों की भाषा से लिया था, ग्रीक लोग इंडिया कहते थे उसका मतलब भारत ही होता था लेकिन अंग्रेजों के रास्ते होते हुए अब हम भारत के लोग भी भारत को इंडिया ही कहने लगे हैं, जो क़ि कहीं से भी भारत नहीं है |
अब सवाल उठता है क़ि भारत को अंग्रेजों ने आजादी के बाद भी इंडिया नाम से संबोधित करने को क्यों कहा ? (सत्ता के हस्तांतरण समझौते में कहा गया है क़ि "
भारत का नाम INDIA रहेगा और सारी दुनिया में भारत का नाम इंडिया ही प्रचारित किया जायेगा और सारे सरकारी दस्तावेजों में इसे इंडिया के ही नाम से संबोधित किया जायेगा | हमारे और आपके लिए ये भारत है लेकिन दस्तावेजों में ये इंडिया है |") और अंग्रेजों के इशारे पर उस समय हमारे देश के कर्णधारों ने संविधान के प्रस्तावना में लिखा क़ि "India that is Bharat " जब क़ि होना ये चाहिए था "Bharat that was India " लेकिन दुर्भाग्य इस देश का क़ि ये भारत के जगह इंडिया हो गया | इसकी वजह है क़ि अंग्रेज नहीं चाहते थे क़ि भारत फिर से पुराना भारत बने और फिर उसी उचाईं को प्राप्त करे जो वो अंग्रेजों के आने के समय था | उन्हें डर था क़ि भारत फिर से ज्ञान में रत रहने वाला न बन जाये | और भारत नाम से जो विशालता का बोध होता है वो बोध इन्हें न हो जाये | जैसा कि मैंने ऊपर लिखा है अंग्रेजों ने भारत को खंड खंड में तोड़ने का पूरा तो पूरा प्रयास किया ही था लेकिन भला हो सरदार पटेल का जिन्होंने उनकी मंशा पर पानी फेर दिया था |
भारत और इंडिया में अंतर
भारत और इंडिया में कई अंतर है | जैसे 
  • इंडिया competion पर चलता है और भारत cooperation पर |
  • इंडिया की theory है Survival of the fittest और भारत की theory है Survival of all including the weakest |
  • इंडिया में ज्ञान डिग्री से मिलता है और भारत में ज्ञान सेवा से मिलता है |
  • इंडिया में Nuclear Family चलती है और भारत में Joint Family | 
  • इंडिया में सिद्धांत है स्व हिताय स्व सुखाय और भारत में सिद्धांत है बहुजन हिताय बहुजन सुखाय | 
  • इंडिया में "I " "मैं" चलता है और भारत में "हम" चलता है |
आपने धैर्यपूर्वक पढ़ा इसके लिए धन्यवाद् और अच्छा लगे तो इसेफॉरवर्ड कीजियेआप अगर और भारतीय भाषाएँ जानते हों तो इसेउस भाषा में अनुवादित कीजिये...मतलब बस इतना ही है की ज्ञान का प्रवाह होते रहने दीजिये | 
एक भारत स्वाभिमानी 
--रवि वर्मा 

Wednesday, April 06, 2011

जन्म ,मरण और फिर जन्म कहीं // पूनम मटिया

जन्म ,मरण और फिर जन्म कहीं
यही प्रकृति है इस देह की
जब तक रहती है आत्मा विराजमान
मानव देखता है स्वप्न नए
रच
ता रहता है नए कीर्तिमान
अंतकाल फिर मिलती है काया ‘उसमे’
मिट्टी हो जाती है फिर मिट्टी
खोकर अपना आस्तित्व इस धरा में
एकाकार होता है ईश से
नव निर्माण के लिए आतुर,और
पाकर गोद इस नर्म धरती की
अंकुरण होता है फिर
जैसे कोई कोमल कोपल नयी
फैलाती है शाखाएं
इस दिशाहीन जगत में
रचती है जाल रेखाओं का
मायाजाल अनगिनत आशाओं का
चक्र चलता रहे युहीं अंतहीन
जन्म ,मरण और फिर जन्म कहीं
भ्रमित है मानव, संभवतः
क्या, क्यों और कहाँ
होना है स्थिर मुझको अंततः
                 --पूनम मटिया 

Monday, April 04, 2011

अगर ब्रिटेन इस संधि को नकार दे तो भारत फिर से गुलाम ?

 ?इन विचारों से मतभेद आपके भी हो सकते हैं. इन तथ्यों पर शक आपको भी हो सकता है लेकिन इनकी  प्रस्तुति में जो पीड़ा झलकती है उसे नजर अंदाज़ करना आपके बस में भी न होगा. देशप्रेम में रंगने के बाद ही ऐसी बेबाकी आती है. अप इन विचारों को पढ़ कर क्या महसूस करते हैं अवश्य लिखिए.रवि वर्मा ने यह लेख पंजाब स्क्रीन के लिए भेजा है जिसे हम ज्यों का त्यों प्रकाशित कर रहे हैं.-रेक्टर कथूरिया 
हिंदी का दुर्भाग्य या कहें भारत का दुर्भाग्य // रवि वर्मा  
भारत की जो तथाकथित आज़ादी है वो एक agreement के तहत/अन्तर्गत हैवोagreement है Transfer of power agreement (सत्ता के हस्तांतरण की संधि)| भारत में जो कुछ भी आप देख रहे हैं वो सब इसी agreement के शर्तों के हिसाब से चल रहाहै | और आज अगर ब्रिटेन इस संधि को नकार दे तो भारत फिर से गुलाम हो जायेगाये मजाक की बात मैं नहीं कर रहा हूँइस मसले पर बड़े बड़े वकील चुप हो जाते हैं और कहते हैं की हो सकता है | खैरभारत का दुर्भाग्य ये रहा कि भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु बन गए या कहें अंग्रेजों द्वारा स्थापित किये गए प्रधानमंत्री थे वो | मैं आप लोगों को एक सच्ची घटना बताता हूँ .....ब्रिटेन की संसद जिसे House of Commons कहा जाता है,  वहां भारत की आज़ादी-स्वतंत्रता को लेकर जब विचार विमर्श हो रहा था तो एक मेम्बर ने कहा कि नेहरु को क्यों चुना जा रहा है प्रधानमंत्री के तौर परतो दुसरे ने कहा कि नेहरु देखने में तो भारतीय है लेकिन रहन सहन और सोच में बिलकुल हम जैसा है | इस वाकये का सारा दस्तावेज इंग्लैंड के संसद House of Commons की library में उपलब्ध है | और येजो अंग्रेजी है वो उसी Transfer of power agreement (सत्ता के हस्तांतरण की संधिके तहत हमारे ऊपर थोपी गयी | अंग्रेजी हटाना और हिंदी को स्थापित करना भारत में मुश्किल लग रहा है | मैं यहाँ कुछ तथ्य आप सब के सामने रखता हूँ कि क्यों इस देश से अंग्रेजी हटाना मुश्किल है |
भारत में अंग्रेजी का इतिहास  
भारत में जहाँगीर के समय पहली बार अँगरेज़ भारत में आये और व्यापार के नाम पर उन्होंने जो कुछ किया वो सब को मालूम है | उस समय भारत में 565 रजवाड़े हुआ करते थे और अंग्रेजों ने उन सभी राज्यों से अंग्रेजी में agreement कर के उस सभी का राज्य एक एक कर के हड़प लिया | क्योंकि अँगरेज़ जो agreement करते थे वो अंग्रेजी में होता था और सभी agreement के अंत में एक ऐसी बात होती थी जिसकी वजह से सब के सब राज्य अंग्रेजो के हो गए (वो agreement के बारे में मैं यहाँ कुछ विशेष नहीं लिखूंगा) | हमारे यहाँ जो राजा थे उन लोगों को अंग्रेजी नहीं आती थी, जो क़ि स्वाभाविक था,  इस लिए वो इन संधियों के मकडजाल में फंस गए लेकिन आजादी के बाद वाले नेताओं को तो अच्छी अंग्रेजी आती थी वो कैसे फंस गए ? जब हमें आज़ादी मिली तो हमारे देश में सब कुछ बदल जाना चाहिए था लेकिन सत्ता जिन लोगों के हाथ में आयी वो भारत को इंग्लैंड की तरह बनाना चाहते थे | आज़ादी की लड़ाई के समय सभी दौर के क्रांतिकारियों का एक विचार था कि भारत अंग्रेज़ और अंग्रेजी दोनों से आज़ाद हो और राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी स्थापित हो | जून 1946 में महात्मा गाँधी ने कहा था कि आज़ादी मिलने के 6 महीने के बाद पुरे देश की भाषा हिंदी हो जाएगी और सरकार के सारे काम काज की भाषा हिंदी हो जाएगी | संसद और विधानसभाओं की भाषा हिंदी हो जाएगी | और गाँधी जी ने घोषणा कर दी थी कि जो संसद और विधानसभाओं में हिंदी में बात नहीं करेगा तो सबसे पहला आदमी मैं होऊंगा जो उसके खिलाफ आन्दोलन करेगा और उनको जेल भेजवाऊंगा | भारत का कोई सांसद या विधायक अंग्रेजी में बात करे उस से बड़ी शर्म की बात क्या हो सकती है | लेकिन आज़ादी के बाद सत्ता गाँधी जी के परम शिष्यों के हाथ में आयी तो वो बिलकुल उलटी बात करने लगे | वो कहने लगे कि भारत में अंग्रेजी के बिना कोई काम नहीं हो सकता है| भारत में विज्ञान और तकनिकी को आगे बढ़ाना है तो अंग्रेजी के बिना कुछ नहीं हो सकता, भारत का विकास अंग्रेजी के बिना नहीं हो सकता, भारत को विश्व के मानचित्र पर बिना अंग्रेजी के नहीं लाया जा सकता | भारत को यूरोप और अमेरिका बिना अंग्रेजी के नहीं बनाया जा सकता | अंग्रेजी विश्व की भाषा है आदि आदि | गाँधी जी का सपना गाँधी जी के जाने के बाद वहीं ख़तम हो गया | भारत में आज हर कहीं अंग्रेजी का बोलबाला है | भारत की शासन व्यवस्था अंग्रेजी में चलती है, न्यायालयों की भाषा अंग्रेजी है, दवा अंग्रेजी में होती है, डॉक्टर पुर्जा अंग्रेजी में लिखते हैं, हमारे शीर्ष वैज्ञानिक संस्थानों में अंग्रेजी है, कृषि शोध संस्थानों में अंग्रेजी है | भारत में ऊपर से ले के नीचे के स्तर पर सिर्फ अंग्रेजी, अंग्रेजी और अंग्रेजी है |
भारत का संविधान (अंग्रेजी के सम्बन्ध में ) 
26 जनवरी 1950 को जो संविधान इस देश में लागू हुआ उसका एक अनुच्छेद है343 | इस अनुच्छेद 343 में लिखा गया है कि अगले 15 वर्षों तक अंग्रेजी इस देश में संघ (Union) सरकार की भाषा रहेगी और राज्य सरकारें चाहे तो ऐसा कर सकती हैं | 15 वर्ष पूरा होने पर यानि 1965 से अंग्रेजी को हटाने की बात की जाएगी | एक संसदीय समिति बनाई जाएगी जो अपना विचार देगी अंग्रेजी के बारे में और फिर राष्ट्रपति के अनुशंसा के बाद एक विधेयक बनेगा और फिर इस देश से अंग्रेजी को हटा दिया जायेगा और उसके स्थान पर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओँ को स्थापित किया जायेगा | ये जो बात है वो अनुच्छेद 343 के पहले पैरा ग्राफ में हैं लेकिन उसी अनुच्छेद के तीसरे पैरा ग्राफ में लिखा गया है कि भारत के विभिन्न राज्यों में से किसी ने भी हिंदी का विरोध किया तो फिर अंग्रेजी को नहीं हटाया जायेगा | फिर उसके आगे अनुच्छेद 348 में लिखा गया है कि भारत में भले ही आम बोलचाल कि भाषा हिंदी रहे लेकिन Supreme Court में, High Court में अंग्रेजी ही प्रमाणिक भाषा रहेगी |
1955 में एक समिति बनाई गयी सरकार द्वारा, उस समिति ने अपनी रिपोर्ट में कह दिया कि देश में अंग्रेजी हटाने का अभी अनुकूल समय नहीं है | 1963 में संसद में हिंदी को लेकर बहस हुई कि अंग्रेजी हटाया जाये और हिंदी लाया जाये | 1965 में 15 वर्ष पुरे होने पर राष्ट्रभाषा हिंदी बनाने की बात हुई तो दक्षिण में दंगे शुरू हो गए और यहाँ मैं बताता चलूँ कि भारत सरकार के ख़ुफ़िया विभाग कि ये रिपोर्ट है कि वो दंगे प्रायोजित थे सरकार की तरफ से | ये उन नेताओं द्वारा करवाया गया था जो नहीं चाहते थे कि अंग्रेजी को हटाया जाये | (ये ठीक वैसा ही था जैसे वन्दे मातरमके सवाल पर मुसलमानों को गलत सन्देश देकर भड़काया गया था तो यहाँ केंद्र सरकार को मौका मिल गया और उसने कहना शुरू किया कि हिंदी की वजह से दंगे हो रहे हैं तो अंग्रेजी को नहीं हटाया जायेगा | इस बात को लेकर 1967 में एक विधेयक पास कर दिया गया | इतना ही नहीं 1968 में उस विधेयक में एक संसोधन कर दिया गया जिसमे कहा गया कि भारत के जितने भी राज्य हैं उनमे से एक भी राज्य अगर अंग्रेजी का समर्थन करेगा तो भारत में अंग्रेजी ही लागू रहेगी, और आपकी जानकारी के लिए मैं यहाँ बता दूँ क़ि भारत में एक राज्य है नागालैंड वहां अंग्रेजी को राजकीय भाषा घोषित कर दिया गया है | अब ये बिलकुल असंभव है कि हम अंग्रेजी को इस देश से हटा सकें | मैं जनता हूँ कि ये व्यवस्था परिवर्तन हम लोग नहीं कर सकते हैं | हम अपनी भारतीय भाषाओं का सम्मान करने भी लगे तो क्या फर्क पड़ता है अंग्रेजी तो हर हाल में रहेगी | व्यवस्था बदलनी है तो कम से कम 400 सांसद चाहिए जो कि एक विधेयक लाये और इस कानून को उलट दे और मुझे ये संभव नहीं लग रहा है | ये जो गन्दी राजनीति इस देश में आप देख रहे हैं वो अभीगन्दी नहीं हुई है ये अंग्रेजों से अनुवांशिक तौर पर हमारे नेताओं ने ग्रहण किया थाऔर वो आज भी चल रहा है | 
मौलिकता आती है मातृभाषा से आप खुद के ऊपर प्रयोग कर के देखिएगा | अंग्रेजी या विदेशी भाषा में हम केवल Copy Pasting कर सकते है | और मातृभाषा छोड़ के हम अंग्रेजी के पीछे पड़े हैं तो मैं आपको बता दूँ क़ि अंग्रेजी में हमें छः गुना ज्यादा मेहनत लगता है | हम लोगों ने बचपन में पहाडा याद किया था गणित में आपने भी किया होगा और मुझे विश्वास है क़ि वो आपको आज भी याद होगा लेकिन हमारे बच्चे क्या पढ़ रहे हैं आज भारत में वो पहाडा नहीं टेबल याद कर रहे हैं | और मैं आपको ये बता दूँ क़ि इनका जो टेबल है वो कभी भी इनके लिए फायदेमंद नहीं हो सकता | जो पढाई हम B.Tech या MBBS की करते हैं  अगर वो हमारी मातृभाषा में हो जाये तो हमारे यहाँ विद्यार्थियों को छः गुना कम समय लगेगा मतलब M .Tech तक की पढाई हम 4 साल तक पूरा कर लेंगे और वैसे ही MBBS में भी हमें आधा वक़्त लगेगा | इस विदेशी भाषा से हम हमेशा पिछलग्गू ही बन के रहेंगे | दुनिया का इतिहास उठा के आप देख लीजिये, वही देश दुनिया में विकसित हैं जिन्होंने अपनी मातृभाषा का उपयोग अपने पढाई लिखाई में किया | 
कुछ और तथ्य
  • भारत में जो राज्यों का बटवारा भाषा के हिसाब से हुआ वो गलत था |
  • भारत क़ी तरह पाकिस्तान में भी कई भाषाएँ हैं और वहां पंजाबी सबसे लोकप्रिय भाषा है | इसके अलावा वहां पश्तो है , सिन्धी है , बलूच है लेकिनउर्दू मुख्य जोड़ने वाली भाषा है | ये जो इच्छा शक्ति पाकिस्तान ने दिखाई थीवो भारत के नेताओं ने नहीं दिखाया क्यों क़ी नेहरु यहाँ प्रधानमंत्री थे और वो सिर्फ देखने में भारतीय थे |
  • आज़ादी के पहले भारत में जो collector हुआ करते थे उनकी पोस्टिंग किसी जिले में इसी आधार पर होती थी क़ि वो हिंदी जानते हैं क़ी नहीं | लेकिनअब इस देश में ऐसा कोई नियम नहीं है | आपको कोई भाषा आती हो या नहीं आती है अंग्रेजी आनी चाहिए किसी जिले का collector बनने के लिए |
अंग्रेजी को ले के लोगों में भ्रांतियां  
अंग्रेजी को ले के लोगों के मन में तरह तरह कि भ्रांतियां हैं मसलन 
  • अंग्रेजी विश्व भाषा है
  • अंग्रेजी सबसे समृद्ध भाषा है
  • अंग्रेजी विज्ञान और तकनीकी कि भाषा है
क्या वाकई अंग्रेजी विश्व भाषा है ? पूरी दुनिया में लगभग 200 देश हैं और उसमे सिर्फ 11 देशों में अंग्रेजी है यानि दुनिया का लगभग 5 % | अब बताइए कि ये विश्व भाषा कैसे है? अगर आबादी के हिसाब से देखा जाये तो सिर्फ 4 % लोग पुरे विश्व में अंग्रेजी जानते और बोलते हैं | विश्व में सबसे ज्यादा भाषा जो बोली जाती है वो है मंदारिन (Chinese) और दुसरे स्थान पर है हिंदी और तीसरे स्थान पर है रुसी (Russian) और फिर स्पनिश इत्यादि लेकिन अंग्रेजी टॉप 10 में नहीं है | अरे UNO जो कि अमेरिका में है वहां भी काम काज की भाषा अंग्रेजी नहीं है |
क्या वाकई अंग्रेजी समृद्ध भाषा है ? किसी भी भाषा की समृद्धि उसमे मौजूद शब्दों से मानी जाती है | अंग्रेजी में मूल शब्दों कि संख्या मात्र 65,000 है | वो शब्दकोष (dictionary) में जो आप शब्द देखते हैं वो दूसरी भाषाओँ से उधार लिए गए शब्द हैं | हमारे बिहार में भोजपुरी, मैथिली और मगही के शब्दों को ही मिला दे तो अकेले इनके शब्दों कि संख्या 60 लाख है| शब्दों के मामले में भी अंग्रेजी समृद्ध नहीं दरिद्र भाषा है | इन अंग्रेजों की जो बाइबिल है वो भी अंग्रेजी में नहीं थी और ईशा मसीह अंग्रेजी नहीं बोलते थे | ईशा मसीह की भाषा और बाइबिल की भाषा अरमेक थी | अरमेक भाषा की लिपि जो थी वो हमारे बंगला भाषा से मिलती जुलती थी, समय के कालचक्र में वो भाषा विलुप्त हो गयी |
क्या वाकई अंग्रेजी विज्ञान और तकनिकी कि भाषा है ? आप दुनिया में देखेंगे कि सबसे ज्यादा विज्ञानं और तकनिकी की किताबे (Russian ) रुसी भाषा में प्रकाशित हुई हैं और सबसे ज्यादा विज्ञान और तकनिकी में research paper भी Russian में प्रकाशित हुई हैं | मतलब ये हुआ कि विज्ञान और तकनिकी कि भाषा Russian है न कि अंग्रेजी | दर्शन शास्त्र में सबसे ज्यादा किताबें छपी हैं वो German में हैं | मार्क्स और कांट एक दो उदहारण हैं | चित्रकारी , भवन निर्माण, कला और संगीत कि सबसे ज्यादा किताबें हैं वो French में हैं | अंग्रेजी में विज्ञान और तकनिकी पर सबसे कम शोध हुए हैं | जितने अविष्कार अंग्रेजों के नाम से दुनिया जानती है उसमे आधे से ज्यादा दुसरे देशों के लोगों का अविष्कार है जिसे अंग्रेजों ने अपने नाम से प्रकाशित कर दिया था | अब इन्टरनेट के ज़माने में सब बातों की सच्चाई सामने आ रही है धीरे धीरे | कभी मौका मिला तो इस पर लिखूंगा |
सारांश ये है कि अगर आपमें व्यवस्था परिवर्तन की हिम्मत है तो आप हिंदी ला सकते हैं अन्यथा बस चुपचाप देखते रहिये और अपने काम में लगे रहिये | कुछ नहीं होने वाला | विश्व में दूसरी सबसे ज्यादा बोले जाने वाली भाषा होने के बावजूद हिंदी लौंडी ही बन के रहने के लिए बाध्य है अपने ही देश में | इतने लम्बे पत्र को आपने धैर्यपूर्वक पढ़ा इसके लिए आपका धन्यवाद् | और अच्छा लगा हो तो इसे फॉरवर्ड कीजिये, आप अगर और भारतीय भाषाएँ जानते हों तो इसे उस भाषा में अनुवादित कीजिये (अंग्रेजी छोड़ कर), अपने अपने ब्लॉग पर डालिए, मेरा नाम हटाइए अपना नाम डालिए मुझे कोई आपत्ति नहीं है | मतलब बस इतना ही है की ज्ञान का प्रवाह होते रहने दीजिये |

एक भारत स्वाभिमानी
रवि