Wednesday, May 11, 2011

साजो में तुमको खोजा है,रागों में तुम्हे पुकारा है

पाली (राजस्थान) में आठ अगस्त 1985 को जन्मे राजेश नारायण वैष्णव के अंतर मन में एक तड़प है जो बाहर आने का प्रयास कर रही है कविता को माध्यम बना कर. भावनायों के वेग में अभी तकनीकी कमजोरियां दूर करने का महत्वपूर्ण काम अभी बाकी है लगता है आज कल बैंगलोर की एक कम्पनी के साफ्टवेयर डिवेलपर होने के कारण ९स तरफ भी जल्द विजयी होंगें.इन रचनायों में अप्प राजेश के कवी मन की झलक देख पायेंगे. इन रचनायों पर आपके विचारों की इंतजार तो रहेगी ही. रेक्टर कथूरिया 

प्रेम  संगीत 
मत छेड़ो ह्रदय के तारों को,
तेरे ही स्वर के सुर है सजे,
प्रति क्षण मेरी इन श्वासों में,
प्रीत का ही संगीत बजे||


झंकृत स्वरों का मधुर गीत,
मनमीत तुम्हे ही मन है,
साजो में तुमको खोजा है,
रागों में तुम्हे पुकारा है||

इस ह्रदय सितार को जब भी तुम,
मृदु हस्त से झंकृत करती हो,
ये ह्रदय उच्रिन्खाल होता है,
लहू स्पंदन भी थम जाता है||

हर साधक प्रीत संगीत का,
स्व-मनमीत से बस इतना ही कहे,
रुके न ये तेरी अंगुलिका,
इस साज को जब प्रेरित तू करे ||
                            -राजेश वैष्णव 
                         
मेरे मीत
हे मेरे मीत, ओ मेरे साथी,
ओ मेरे मार्गदर्शक,
जब न होते तुम मेरे संग,
ये जीवन पथ लगता है निरर्थक,
मित्र तुम हो वो सारथी,
जिसने नीति विचारक सम,
था परीक्षण  के क्षण में,
इस अर्जुन का साथ दिया,
देकर के गीता स्वरुप घ्यान मुझे,
हर बाधा, हर अड़चन से,
मुझको मुक्त किया,
ईर्ष्या तप्त ज्वलित धरती पर,
क्या करूँ वर्णित जो साथ दिया,
जैसे प्रचंड ज्वलित थल को,
किसी ने हिम धार से सींचित किया,
जब भी तुम्हारे सानिध्य में ,
हे मीत मेरे, मैं रहता हूँ ,
तब तब इस मन को मलय पवन से,
स्पर्श हुआ मै पाता हूँ ,
मेरी कविता भर में नहीं वर्णित,
ह्रदय में स्थान वही तुम पाते हो,
जो स्थान है सर्वातिप्रिय  का,
उनसे भी प्रिय हुए  जाते हो ||
                             -राजेश वैष्णव

नेह की देहरी
नेह की इस देहरी पर,
देह अपनी सेंकता हूँ,
मै डाल भर हो कर भी देखो,
बोझ कितने झेलता हूँ,
मै कभी कल्लोल गिरते बर्तनों में,
मै कभी मुस्कान उन की चमक में,
एक नन्ही पौध हो कर भी,
पेट कितने सींचता हूँ,
नेह की इस देहरी पर.........

माँ नहीं देखती मुझे,
मै दूर जो हूँ,
क्या बताऊँ भाग्य के हाथो,
बड़ा मजबूर जो हूँ,
कभी किसी पुर्जे को,
किस्मत-कल से,
फिर से जोड़ता हूँ,
नेह की इस देहरी पर.........

किसी विद्यालय की घंटी,
दौड़ क्यों मेरी न बनती,
किसी पिता की उंगली,
साथ क्यों मेरा न बनती,
भाग्य के ऐसे अंधेरो को,
हाथो से नित पोंछता हूँ,
नेह की इस देहरी पर.........

मेरे विधाता बैठ शीशे के भरम में,
क्यों कि सतत है ये हाथ,जीवन-भरण में,
चरण छू आशीष,
जिनके ले न पाया ,
आज उनके ही चरण,
मै सीधता हूँ,
नेह की इस देहरी पर.........

नेह की इस देहरी पर,
फिर फूल देखो इक खिला,
न फिर टूटे इस पर वही,
बोझ ढोने की प्रथा,
ले चला अपने हाथो में,
पार्श्व में इस मार्ग के,
जिस मार्ग पर कभी,
दुर्भाग्यवश न मै चला....
            -राजेश वैष्णव    

Monday, May 09, 2011

आखिर कैसे रुके अपमान का दोहराव ?

अभी पहला कोई मामला ठंडा भी नहीं हुआ होता कि देवी देवतायों के अपमान का कोई न कोई नया मामला सामने आ जाता है.इस बार यह सब हुआ हिन्दू धर्म के साथ. बिकनी पर हिंदू देवी लक्ष्मी का चित्र प्रकाशित कर दिया गया जिससे हिंदू समुदाय द्वारा इस मामले पर कडा विरोध जताया गया. 
पंजाब केसरी में प्रकाशित खबर
जब विवाद काफी बढ़ गया तो इस बिकनी को बनाने वाली एक आस्ट्रेलिया स्विमवेयर कंपनी ने भावनाओं को आहत करने के लिए हिंदू समुदाय से माफ़ी मांग ली और ऐलान किया कि देवी लक्ष्मी की तस्वीर नए सत्र में हमारे स्विमवेयर पर प्रकाशित नहीं होगी. इस विवाद को फ़ैलाने वाली एक आस्ट्रेलिया स्विमवेयर कंपनी लिजा ब्ल्यू ने अपनी माफ़ी के साथ यह वादा भी किया कि फ़ैशन शो के दौरान रैंप पर पेश स्विमवेयर को भी बाजार से हटा लिया गया है. यह मामला मिडिया में भी काफी छाया रहा. आस्ट्रेलिया से उठी चिंगारी देश के कई कोनो में पहुंची. इस उखड़ समचार के फैलते ही हिन्दू समुदाय पूरी तरह आक्रोश से भर उठा.
गौरतलब है कि इस स्विमवेयर कंपनी ने पिछले सप्ताह सिडनी में रोजमाउंट आस्ट्रेलियन फ़ैशन वीक में जिस माडल को बिकनी पहने हुए रैंप पर उतारा उसकी बिकनी के सामने के हिस्से तथा पिछले हिस्से पर लक्ष्मी देवी का चित्र प्रकाशित किया था. 
इससे पूर्व, यूनिवर्सल सोसायटी फ़ोर हिंदुइज्म के अध्यक्ष राजन जैद ने कंपनी से सार्वजनिक रूप से माफ़ी मांगने और इस रेंज के स्विमवेयर को बाजार से तुरंत वापस लिए जाने की मांग की थी. इस माफीनामे लोगों कि आहात भावनायों को नियंत्रण करने में कुछ आसानी हुई है और उनका क्रोध शांत हुआ है पर यह सवाल एक बार फिर गम्भीर हो गया है कि देवी देवतायों का इस तरह बार बार अपमान करके लोगों कि धार्मिक भावनायों को भडकाने कि साज़िश किस के इशारे पर होती है ? इस तरह कि बातों के दोहराव को रोकने के लिए क्या किया जाना चाहिए ? आप इस पर क्या सोचते हैं ? इस पर आपके विचारों की इंतज़ार बनी रहेगी हमेशां की तरह.   --रेक्टर कथूरिया 

Sunday, May 08, 2011

तेरे होने से मैंने ये देखा जहाँ.......!

ज़िन्दगी की राहें सीधी और सपाट नहीं होती. कदम कदम पर ज़िन्दगी जीने की कीमत देनी पड़ती है. शयामल सुमन ने इस हकीकत को बार बार जी कर देखा है. संघर्ष, संघर्ष और लगातार संघर्षों से निकला एक साधारण इंसान शयामल सुमन जो अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता और जीवन-कर्म के बीच की दूरी को निरंतर कम करने की कोशिश में आज भी संघर्षरत है.उनकी  रचनायें कहती हैं, उनका स्वभाव कहता है कि उन्होंने इस राह पर चलने का मौल बार बार अदा किया लेकिन कभी हार नहीं मानी.प्रस्तुत हैं उनकी कुछ काव्य रचनायें, आपको उनकी  कविता के तेवर कैसे लगे, उनकी कलम की धार कैसी लगी अवश्य बताएं.-रेक्टर कथूरिया.

माँ
मेरे गीतों में तू मेरे ख्वाबों में तू,
इक हकीकत भी हो और किताबों में तू।
तू ही तू है मेरी जिन्दगी।
क्या करूँ माँ तेरी बन्दगी।।

तू न होती तो फिर मेरी दुनिया कहाँ?
तेरे होने से मैंने ये देखा जहाँ।
कष्ट लाखों सहे तुमने मेरे लिए,
और सिखाया कला जी सकूँ मैं यहाँ।
प्यार की झिरकियाँ और कभी दिल्लगी।
क्या करूँ माँ तेरी बन्दगी।।


तेरी ममता मिली मैं जिया छाँव में।
वही ममता बिलखती अभी गाँव में।
काटकर के कलेजा वो माँ का गिरा,
आह निकली उधर, क्या लगी पाँव में?
तेरी गहराइयों में मिली सादगी।
क्या करूँ माँ तेरी बन्दगी।।


गोद तेरी मिले है ये चाहत मेरी।
दूर तुमसे हूँ शायद ये किस्मत मेरी।
है सुमन का नमन माँ हृदय से तुझे,
सदा सुमिरूँ तुझे हो ये आदत मेरी।
बढ़े अच्छाईयाँ दूर हो गन्दगी।
क्या करूँ माँ तेरी बन्दगी।।

         # # #
अच्छा लगा
हाल पूछा आपने तो पूछना अच्छा लगा
बह रही उल्टी हवा से जूझना अच्छा लगा

दुख ही दुख जीवन का सच है लोग कहते हैं यही
दुख में भी सुख की झलक को ढ़ूँढ़ना अच्छा लगा

हैं अधिक तन चूर थककर खुशबू से तर कुछ बदन
इत्र से बेहतर पसीना सूँघना अच्छा लगा

रिश्ते टूटेंगे बनेंगे जिन्दगी की राह में
साथ अपनों का मिला तो घूमना अच्छा लगा

कब हमारे चाँदनी के बीच बदली आ गयी
कुछ पलों तक चाँद का भी रूठना अच्छा लगा

घर की रौनक जो थी अबतक घर बसाने को चली
जाते जाते उसके सर को चूमना अच्छा लगा

दे गया संकेत पतझड़ आगमन ऋतुराज का
तब भ्रमर के संग सुमन को झूमना अच्छा लगा

           # # #

रीति बहुत विपरीत

जीवन में नित सीखते नव-जीवन की बात।
प्रेम कलह के द्वंद में समय कटे दिन रात।।

चूल्हा-चौका संग में और हजारो काम।
इस कारण डरते पति शायद उम्र तमाम।।

झाड़ु, कलछू, बेलना, आलू और कटार।
सहयोगी नित काज में और कभी हथियार।।

जो ज्ञानी व्यवहार में करते बाहर प्रीत।
घर में अभिनय प्रीत के रीति बहुत विपरीत।।

बाहर से आकर पति देख थके घर-काज।
क्या करते, कैसे कहे सुमन आँख में लाज।।
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परिचय
नाम :
श्यामल किशोर झा

लेखकीय नाम : श्यामल सुमन

जन्म तिथि: 10.01.1960

जन्म स्थान : चैनपुर, जिला सहरसा, बिहार

शिक्षा : स्नातक ( अर्थशास्त्र, राजनीति शास्त्र एवं अँग्रेज़ी)

तकनीकी शिक्षा : विद्युत अभियंत्रण में डिप्लोमा
वर्तमान पेशा : प्रशासनिक पदाधिकारी टाटा स्टील, जमशेदपुर

साहित्यिक कार्यक्षेत्र : छात्र जीवन से ही लिखने की ललक, स्थानीय समाचार पत्रों सहित देश के कई पत्रिकाओं में अनेक समसामयिक आलेख समेत कविताएँ, गीत, ग़ज़ल, हास्य-व्यंग्य आदि प्रकाशित                        
स्थानीय टी.वी. चैनल एवं रेडियो स्टेशन में गीत, ग़ज़ल का प्रसारण, कई कवि-सम्मेलनों में शिरकत और मंच संचालन।
अंतरजाल पत्रिका "अनुभूति, हिन्दी नेस्ट, साहित्य कुञ्ज, साहित्य शिल्पी आदि में सैकड़ों रचनाएँ प्रकाशित।
गीत ग़ज़ल संकलन "रेत में जगती नदी" कला मंदिर प्रकाशन दिल्ली में शीघ्र प्रकाशनार्थ
रुचि के विषय : नैतिक मानवीय मूल्य एवं सम्वेदना



आप उनकी काव्य रचनायें उनके कविता जगत मनोरमा में भी पढ़ सकते हैं बस यहाँ क्लिक करके. 

पोस्ट स्क्रिप्ट: श्यामल सुमन गाते भी बहुत अच्छा है...जल्द ही आपको सुनवायेंगे उनकी आवाज़ में उन्हीं की  एक और रचना 

आज भी कार्य दिवस का समय वही आठ घंटे क्यूं ?


Sat, May 7, 2011 at 7:13 PM

समाजवादी आन्दोलन की सैधान्तिक भूल और इंकलाबी कार्यक्रम..... 

1886 से आज तक 125 वर्षों कार्य दिवस का समय वही आठ घंटे है , जबकि मशीन की बेहतरी ने लोगों को काम से बाहर धकेलने का काम लगातार जारी रखा है | काम के घंटों को कम करने का केंद्रीय कानून बनाने की मांग वाले कार्यक्रम पर संघर्ष  न करना अंतर्राष्ट्रीय मजदूर और युवा आन्दोलन की सबसे बड़ी सैधान्तिक भूल है और ठहराव का कारण भी ... रोशन सुचान

 
बात 14 जुलाई 1889 की है , जब लगभग 20 देशों के श्रमिक वर्ग के प्रतिनिधि पेरिस के मजदूर अधिवेशन में पहुंचे थे | मकसद बहुत बड़ा था , मेहनतकशों के हक़ की लड़ाई को आगे बढ़ाना | इस अधिवेशन को इतिहास में दूसरे इंटरनेशनल के नाम से जाना जाता है | मार्क्स की मृत्यु(1883) के बाद उनका सैधान्तिक मित्र फ्रेडरिक एंगल्ज इस अधिवेशन को दिशा देने वाला था | पहले इंटरनेशनल का सम्मेलन 28 सितम्बर 1864 को शुरू हुआ था | जिसमें खुद मार्क्स ने नेतृत्व किया था | एंगल्ज तब से ही मार्क्स का सबसे नजदीकी सैधान्तिक मित्र था | दोनों ने 1848 में पूंजी की वैश्विक एकजुटता के विरुद्ध दुनिया भर के मेहनतकशों को एक हो जाने का निमंत्रण दिया था | तब औद्दोगिक क्रांति और मशीनीकरण बढ़ रहा था | सो उत्पादन में वृद्धि हुई और मुनाफा बढ़ा | फलस्वरूप बेरोज़गारी में भारी वृद्धि हुई , मशीन ने लोगों को काम से बाहर धकेल दिया था | पर श्रमिक वर्ग को उस बढ़े हुए मुनाफे से कोई हिस्सेदारी मिलना तो दूर , काम के घंटे भी निश्चित नहीं थे | इस अंतराष्ट्रीय    महाधिवेशन ने मुनाफे में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने तथा मशीनीकरण से बढ़ रही बेरोज़गारी को दूर करने के उद्देश्य से काम के घंटों को घटाने के लिए संघर्ष का आह्वान किया था | इनका प्रमुख उद्देश्य " Reduction of Working Hours " दर्ज किया गया था | 1886 में मजदूरों को 8 घंटे काम के लिए संघर्षकरने के लिए कहा गया | अमेरिका के शिकागो में 8 घंटे कार्य दिवस के लिए संघर्ष तेज़ हुआ | 3 लाख 50 हज़ार लोगों ने इसमें भाग लिया | हुकूमत ने जुल्म किया , फांसियां दी गई और गोलिया चली , सड़कों पर खून बहा | आखिरकार 2 लाख लोगों ने 8 घंटे केकार्य दिवस को जीत लिया | दूसरे इंटरनेशनल ने पहले इंटरनेशनल के काम को आगे बढ़ाया | हर देश में 8 घंटे के कार्य दिवस के लिए संघर्ष शुरू हुआ | इस नारे को मिला समर्थन और जीत भी मिसाल बनी | एंगल्ज ने उसी शाम को लिखा "42 वर्ष पहले जब हमने दुनिया भर के मेहनतकशों एक हो का नारा दिया , तब बहुत कम आवाजों ने सुर में सुर मिलाया था | आज जब मैं ये शब्द लिख रहा हूँ तो यूरोप और अमेरिकी मजदूर पहली बार लामबंद होकर अपनी जुझारू शक्तियों का जायजा ले रहे हैं | 8 घंटे काकार्यदिवस कानून द्वारा स्थापित किया जाए | जैसा कि 1866 में इंटरनेशनल की जेनेवा कांग्रस में एलान किया गया था और आज की झांकी इस तथ्य के बारे में सभी देशों के पूंजीपतियों और भूमिपतियों की आँखें खोल देगी कि आज सचमुच सभी देशों के मेहनतकश एकजुट हैं | काश! अगर मार्क्स इसे अपनी आँखों से देखने के लिए मेरे साथ होता |"  अब सोचने की बात ये है की 1886 में जब काम के घंटे 8 हुए थे , तब से लेकर आज तक 125 वर्षों में मशीन का विकास कितने गुना बढ़ा है | पर कार्यदिवस वही 8 घंटों का ही है | मानव सभ्यता का इतिहास इस बात का गवाह है की प्रत्येक नईं खोज मनुष्य के जीवन को बेहतर से और बेहतर करती गई है | प्रत्येक नईं मशीन मनुष्य के काम को हल्का और उसकी जरूरतों की पूर्ति के लिए ज्यादा उत्पादन करती गई | 1970 के दशक में आई विज्ञानिक - तकनीकी क्रांति के बल पर आज दुनियाँ ऐसी अद्भुत मशीनों की मालिक है , जिसका मानव जाती की भलाई में प्रयोग करने पर इस धरती पर सभी को स्वर्ग जैसी जिन्दगी दी जा सकती है | जरूरत है तो बस मानवता के भले के लिए फिक्रमंद एक आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था स्थापित करने की | पर पूंजीवादी प्रबंध हर नई खोज को मानवता की भलाई के लिए प्रयोग करने को तैयार नहीं है | तकनीकी क्रांति और आधुनिक मशीनों ने उत्पादन में इतनी अराज़कता पैदा कर दी है की उत्पादन खरीदने वाले नहीं हैं , वहीं मजदूर वर्ग को काम से बाहर का रास्ता भी दिखा दिया है | मशीन की बेहतरी से बेरोज़गारी में खतरनाक वृद्धि हो रही है | 1987 में 500 बड़ी कम्पनियां 5 प्रतिशत श्रमशक्ति द्वारा 25 प्रतिशत उत्पादन कर रही थीं |वहीं 2007 में 500 बड़ी कम्पनियां 0.05 प्रतिशत श्रमशक्ति द्वारा 25 प्रतिशत उत्पादन कर रही हैं | ये है आधुनिक मशीन का कमाल | 21 वर्षों में यह अंतर 1/20 से 1/200 तक पहुंच गया है | आज का पूंजीवादी प्रबंध मानवविरोधी होने के कारण मशीन की लूट द्वारा अपने मुनाफे के ढेर को बड़ा कर रहा है | पूंजी कुछ ही हाथों में , यहाँ तक की एक ही हाथ में चले जाने का काम कर रहा है | एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया की आबादी के महज़ 2 प्रतिशत लोगों के पास कुल दौलत का 50 फीसदी है , उससे नीचे वाले 8 प्रतिशत लोगों के पास35 प्रतिशत दौलत है , नीचे वाले 20 प्रतिशत के पास 4 प्रतिशत , उससे नीचे वाले 20 प्रतिशत के पास 3 प्रतिशत , नीचे वाले 20 प्रतिशत लोगों के पास 2 प्रतिशत दौलत है , सबसे नीचे वाले 2 प्रतिशत लोगों के पास कुल दौलत का महज़  1 प्रतिशत है | यानी की 20 प्रतिशत आबादी के पास 89 प्रतिशत और 80 प्रतिशत के पास भीख के रूप में महज़ 11 प्रतिशत दौलत है | भारत में सिर्फ 533 अमीर लोगों के पास 1232135 करोड़ रुपयों की संपत्ति है | सो इन परिस्थितियों में समाज के सामने धन का बंटवारा , श्रम उत्पादकता , बेरोज़गारी , कार्य दिवस का समय , वित्तीय पूंजी विचारणीय बिंदु हैं | 1886 से आज तक 125 वर्षों कार्य दिवस का समय वही आठ घंटे है , जबकि मशीन की बेहतरी से लोगों को काम से बाहर धकेलने का काम लगातार जारी है | काम के घंटों को कम करने का केंद्रीय कानून बनाने की मांग वाले कार्यक्रम के लिए संघर्ष पर ध्यान न देना अंतर्राष्ट्रीय मजदूर और युवा आन्दोलन की सबसे बड़ी सैधान्तिक भूल है और ठहराव का कारण भी | आज फिर पहले - दूसरे इंटरनेशनल की तरह जरूरत है , नए केंद्रीय संघर्ष के केंद्र की | जब ऐसा हुआ , ठहराव टूटेगा और जीत कर निकलेगा मजदूर- नौजवान वर्ग | इसलिए Reduction of Workers की जगह हमारा नारा होना चाहिए "  Reduction of Working Hours Without Pay Loss " | कार्य दिवस को तब तक छोटाकरो ,जब तक सभी को काम न मिल जाए | 10 प्रतिशत तक कार्य दिवस को छोटा करने पर 11 प्रतिशत नए काम के अवसर पैदा होते हैं और 20 प्रतिशत तक कार्य दिवस को छोटा करने पर 25 प्रतिशत नए लोगों को काम मिलता हैं | 30 प्रतिशत तक कार्य दिवस को छोटा करने पर 42 प्रतिशत नए काम के अवसर पैदा होते हैं और 40 प्रतिशत तक कार्य दिवस को छोटा करने पर 66 प्रतिशत नए लोगों को काम मिलता हैं | 50 प्रतिशत तक काम के घंटों को घटाकर 4 घंटे का कार्य दिवस करने पर सभी को काम मिल जायगा | नौजवानों और ट्रेड यूनियंस के संगठनों को सभी लोगों को रोज़गार प्राप्ति के लिए , मानव शक्ति के नियोजन और कार्यदिवस को कानूनन छोटा करवाने की लड़ाई को मजबूत करने वाले आन्दोलन चलाने चाहियें | दुनिया भर की सरकारों को ललकारकर ये कहना होगा की 18 वर्ष के प्रत्येक युवा को (शिक्षित-अशिक्षित सभी को)काम देने की गारंटी का कानून बनाया जाए , और जब तक सरकार 18 वर्ष का होने पर काम देने में असफल है तो उसको काम के इंतज़ार में न्यूनतम वेतन के मुताबिक भत्ता दिया जाए ..रोशन सुचान , राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष: आल इंडिया स्टुडेंट्स फैडरेशन आप इसे यहाँ क्लिक करके भी पढ़ सकते हैं .



Tuesday, May 03, 2011

कार्टूनिस्ट्स ही ऐसे हैं जिन पर भृष्टाचार का कोई दाग नहीं लगा

कार्यक्रम की शुरुआत ठीक 6 बजे तू ही गुर गोबिंद...तू परब्रह्म तू ही भगवंत ... शब्द से हुयी और शब्द के बाद पहुच रहे अतिथिओं और पहुँच चुके अतिथियों को चाए पानी दिया जा रहा था.जब मैं उस कायर्क्रम पर पहुंचा तो वहां लोगों ने मुझे अजीत अखबार की टीम से समझा, फिर श्याम जगोता जी ने यह कह कर उनका भ्रम दूर किया क अजीत में मेरे कार्टून छापते हैं ये उनको देख कर आये हैं यहाँ पर | |
स्टेज को कार्यक्रम के मुख्य आयोजक त्रियम्बक शर्मा ने संभाला और मंच सँचालन किया और अपने इस कार्यक्रम के बारे में जानकारी दी और अपने दिल की बातें साझी करीं..
उन्होंने कहा की यह कार्टून वाच भारत की एक ही मासिक पत्रिका है जो पिछले 15  वर्षों से लगतार चलती आ रही है| उन्होंने कहा की जब मैंने ये काम शुरू किया था तो लोगों ने मेरी खिल्ली उड़ाई थी फिर भी मैंने ये कैसे काम शुरू कर लिया लेकिन आज ये जिस मुकाम पर पहुच चूका है वो आप सब की आँखों के सामने है | उन्होंने ने हँसते हुए और मजाकिया लहजे में कहा के मेरे कार्टूनिस्ट बन्ने में मेरे पिता जी श्रीमान प. मृत्युंजय शर्मा जी का बहुत बड़ा हाथ है क्यों की वो मुझे बचपन में बहुत मारते थे और मैं गुस्से में उनका कार्टून बना देता था | अगर मेरे पिता जी मुझे न पिटते तो शायद मैं आज कार्टूनिस्ट न होता | साथ ही साथ उन्होंने ने देश भर के कार्टूनिस्ट्स की पीड़ा को उजागर करते हुए बताया के हम कार्टूनिस्ट्स को कोई नहीं पूछता, हमारे कार्टून भी अखबार वाले बड़ी मुश्किल से छापते हैं और वो भी पिछले पन्नों पर पहले पन्ने की तो बात ही छोडो और अगर कोई विज्ञापन आ जाये तो वो पिछले पन्ने वाला कार्टून भी गायब हो जाता है | उन्होंने बताया कि कार्टून तो समाज में चल रही गलत बातों पर व्यंग्य तो कसता ही है लेकिन उसमे एक सामाजिक सन्देश भी होता है | उन्होंने बताया कि हमें कोई नेता अच्छा नहीं समझता क्यों की हम उनकी की हुयी करतूतों पर से पर्दा उठा देते हैं और कई बार तो हमारे उस प्रकार के कार्टून अखबार वाले छपने से मना कर देते हैं | बताते हुए उन्होंने ये कहा की जब भी कोई नेता या कारोबारी आपस में नात कर रहे हों और वहां पर कोई कार्टूनिस्ट पहुच जाये तो सबसे पहले उसे भगा देते हैं ता की कल को कोई उनका कार्टून ही न बना दे | उन्होंने बातों बातों में ये भी बताया कि वह  अपने संघर्ष के दिनों में अख़बारों के लिए फ्री में कार्टून बनाते थे |
अपने कार्यक्रम के बारे मैं और जानकारी  देते हुए उन्होंने ने कहा उन्होंने यह सन्मानित करने का काम इस लिए  किया है ता की भारत के कोने कोने में बस रहे कार्टूनिस्ट्स को उनका बनता सम्मान  मिल सके क्यों कि एक कार्टूनिस्ट अपनी उपजीविका चलने के लिए पैसे बाद में मांगता है पहले वह अपना सम्मान चाहता है | भारत में 80-85 वर्षों के कार्टूनिस्ट्स बैठे हैं जिनको कोई जनता भी नहीं और उन्हें कोई मान भी नहीं दिया गया है हम उनको आदर देंगे ता की इस पेशे को नयी पीढ़ी एक गौरवशाली पेशे की सोच से अपना सके | एक बात उन्होंने ने बड़े गर्व से छाती ठोक कर कही की दुनिया के सभी पेशों में से एक कार्टूनिस्ट्स ही ऐसे हैं जिन पर भृष्टाचार का कोई दाग नहीं लगा है और किसी ने आज तक ये नहीं सुना होगा की उस या इस कार्टूनिस्ट ने सिफारिश पर किसी का कार्टून बनाया हो |
     इसी दौरान ठीक 6:45 पर कलाम साहब आये और सारा हाल उनके स्वागत के लिए खड़ा होकर तलिआन मरने लगा | कलाम साहब ने अपने हाथ से कैनवस पर कार्टून बना कर कार्यक्रम की रस्मी शुरुआत की | इसके बाद त्रियंबक , प. मृत्युंजय और हिमांशु दिवेदी (हरी भूमि अखबार के संपादक) जी ने मंच पर खड़े होकर कलम साहब के पधारने के सन्दर्भ में भाषण दिया | फिर कलम साहब ने उम्र भर की पर्प्तियों के लिए परुस्कार दिया | सन्मान लेने वाले ये नाम हैं 1.  अजीत निनान, (दिल्ली), 2. जानेमाने कार्टूनिस्ट काक, (दिल्ली) 3. हुसैन  जामिन जैदी, (दिल्ली),4.  पांडुरंगा राव, (बंगलौर). 5. जगजीत रना, (दिल्ली),और सुधीरनाथ  को कार्टून और कार्टूनिज्म को बढ़ावा देने के लिए खास पुरूस्कार से सन्मानित किया गया |
उस के पशचात अजित नैनं ने दर्शकों को संबोधित किया और दिल की बाते साझी करी. सबसे पहले त्रियम्बक जी और कलाम साहब का धन्यवाद किया | उन्होंने अपने बारे में बताते हुए कहा की मैं बचपन में पढता कम और कार्टून ज्यादा बनाता था | मैं अपने पेपरों में भी कार्टून ही बनाता रहता था इसी लिए मेरे नंबर कम आते थे | मैं कलाकारी करता रहता था और मेरे पेपर क्लास ऊपर कर के दिखाए जाते थे | मैं अम्बा का 3D चित्र बनाता था | उन्होंने अपनी पसंद बताते हुए कहा के मुझे कार्टून ज्यादा पसंद है बजाये क वो रंगीन हों | आज की तकनालोजी के नुक्सान बताते हुए उन्होंने कहा क आज कल कार्टून बनाने का काम भी कंप्यूटर पर ही होता है और अगर आपसे अगर कोई असल मांग ले तो आपको अपना कंप्यूटर देना पड़ेगा बजाये कागज़ के | साथ ही उन्होंने सोनिया गाँधी जी पर अपना गिला ज़ाहिर ये कह कर किया की उन्होंने मनमोहन जी को भारत का प्रधान मंत्री बना कर हमारा काम कम कर दिया है वो ऐसे के एक तो उनका धार्मिक चेहरा है; मैं कार्टून बनाते समय उनकी दाह्ड़ी से छेड़छाड़ नहीं कर सकता, उनकी पगड़ी से छेड़ छाड़ नहीं कर सकता और उनकी शख्सियत बेदाग़ है और बहुत पढ़े लिखे इंसान हैं | अगर येही प्रधान मंत्री जी क पद पर सोनिया जी आप होती तो पता ही नहीं की उनकी कितनी तरहों के कार्टून बन गए होते |
इसके बाद कलाम साहब ने कार्टून वाच पत्रिक का अगला संस्करण जरी किया और मंच पर खड़े होकर सभी को संबोधित किया जिसकी विडियो दो हिस्सों मैं है  एक भाग तो आप  यहां  क्लिक करके देख सकते हैं और दूसरा भाग यहां क्लिक करके.देख सकते हैं.  उनके  संबोधन के कुछ ही देर बाद कार्यक्रम रात के खाने के बाद समाप्त हो गया और लोग अपने अपने घर को चले गए. शाम जगोता ने  मुझे और कोमल सोहल को कहा कि आप लोग ही हमारी असली कमाई हो क्यों की इस पेशे से जुड़े लोग तो आ ही जाते हैं और आते रहेंगे लेकिन हम लोगों को इसके बारे में जागरूक करना चाहते हैं | उन्होंने हम दोनों का भरी आँखों से धन्यवाद किया. 
--नोयडा से सतिन्द्र शाह सिंह 

Monday, May 02, 2011

ओबामा ने किया पाकिस्तान का धन्यवाद

               वह फोटो जिसे बाद में फर्जी बताया गया और हटा दिया गया 
व्यक्ति नहीं विचारधारा है ओसामा. इस शीर्षक से बृज किशोर सिंह ने जनोक्ति लिए लिखे अपने आलेख में कहा है यह वही ओसामा है जो कभी सोवियत संघ के साथ जंग में अमेरिका का दोस्त हुआ करता था. हम एक ओसामा को मरेइमंगे तो रक्तबीज की तरह दस और ओसामा पैदा हो जायेंगे. लेखक ने याद दिलाया है कि रूस के खिलाफ जंग और षडयंत्र में पाकिस्तान भी अमेरिका का सामरिक सांझेदार था. बदलाव की ज़ोरदार इच्छा लिए हुए विद्रोही स्वभाव के पत्रकार बृज किशोर सिंह बहुत ही साफ़ शब्दों में कहते हैं कि ओसामा के मारे जाने से भारत को कोई फायदा होने वाला नहीं है. इसं पूरी पोस्ट को आप यहाँ क्लिक करके भी पढ़ सकते हैं.
इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इस आपरेशन में सहयोग के लिए पाकिस्तान के राष्ट्रपति  आसिफ अली ज़रदारी का धन्यवाद  किया. ओबामा ने कहा कि दोनों देशों के लिए यह बहुत ही अच्छा और ऐतिहासिक दिन है. ओबामा ने  11 इत्म्ब्र 2001 में हुए उस हमले में मारे गए तीन हजार लोगों के परिजनों से भी संवेदना व्यक्त की और कहा कि लादेन की मौत से उन सभी बेगुनाहों के साथ न्याय हुआ है.  इसके साथ ही उनहोंने कहा कि ओसामा मुस्लिम नेता नहीं बल्कि मुस्लमानों का हत्यारा था. इस पूरी रिपोर्ट को आप पढ़ सकते हैं केवल यहाँ क्लिक करके. --रेक्टर कथूरिया वह फोटो जिसे बाद में फर्जी बताया गया और हटा दिया गया 

Obama thanked Pakistan for its help in the operation


Sunday, May 01, 2011

महंगी रोटी सस्ता मानव जगह जगह पर बिकता है



नया दौर
नये दौर के इस युग में
सब कुछ उल्टा पुल्टा है|
महंगी रोटी सस्ता मानव
जगह जगह पर बिकता है.|
कहीं पिंघलते हिम पर्वत तो
हिम युग का अंत बताते हैं,|
सूरज की गर्मी भी बढ़ती
अंत जहाँ का दिखता है.|
अबला भी अब बनी है सबला
अंग परदर्शन खेल में|
नैतिकता का अंत हुआ है
जिस्म गली में बिकता है.|
रिश्तो का भी अंत हो गया
भौतिकता के बाज़ार में,
कौन पिता और कौन है भ्राता
पैसे से बस रिश्ता है.|
भ्रष्ट आचरण आम हो गया
रुपया पैसा खास हो गया,
मानवता भी दम तोड़ रही
स्वार्थ दिलों में दिखता है.|
पत्नी सबसे प्यारी लगती
ससुराल भी न्यारी लगती,
मात पिता संग घर में रहना
अब तो दुष्कर लगता है. | 
डॉ अ कीर्तिवर्धन
99113-23732