Saturday, January 01, 2011

ना तो जनवरी पहला महीना है और ना ही 1 जनवरी पहला दिन

मैं आज ही मीतू किरण की वाल  पर था तो वहां  विभु शर्मा जी से भी भेंट हुई. उन्होंने नए वर्ष को मनाने पर कुछ सवाल उठाये हैं जिनमें पूरी बात तर्क से की गयी है. निश्चय ही आप को भी उनकी बातें पसंद आयेंगी. अगर न भी पसंद आयें तो भी आप को सोचने के लिए विवश अवश्य करेंगी. अगर आप इस पर कुछ कहना चाहते हैं तो आपके विचारों की इंतजार हमें रहती ही है. --रेक्टर कथूरिया
ना तो जनवरी साल का पहला महीना है और ना ही 1 जनवरी पहला दिन।जो आज तक जनवरी को पहला महीना मानते आए है वो जरा इस बात पर विचार करिए।सितंबर,अक्टूबर,नवंबर और दिसंबर क्रम से 7वाँ,8वाँ,नौवाँ और दसवाँ महीना होना चाहिए जबकि ऐसा नहीं है।ये क्रम से 9वाँ,,10वाँ,11वां और बारहवाँ महीना है।हिन्दी में सात को सप्त,आठ को अष्ट कहा जाता है,इसे अङ्ग्रेज़ी में sept(सेप्ट) तथा oct(ओक्ट) कहा जाता है।इसी से september तथा October बना।नवम्बर में तो सीधे-सीधे हिन्दी के "नव" को ले लिया गया है तथा दस अङ्ग्रेज़ी में "Dec" बन जाता है जिससे December बन गया। ऐसा इसलिए कि 1752 के पहले दिसंबर दसवाँ महीना ही हुआ करता था।इसका एक प्रमाण और है।जरा विचार करिए कि 25 दिसंबर यानि क्रिसमस को X-mas क्यों कहा जाता है???? इसका उत्तर ये है की "X" रोमन लिपि में दस का प्रतीक है और mas यानि मास अर्थात महीना।चूंकि दिसंबर दसवां महीना हुआ करता था इसलिए 25 दिसंबर दसवां महीना यानि X-mas से प्रचलित हो गया। इन सब बातों से ये निस्कर्ष निकलता है की या तो अंग्रेज़ हमारे पंचांग के अनुसार ही चलते थे या तो उनका 12 के बजाय 10 महीना ही हुआ करता था।साल को 365 के बजाय 345 दिन का रखना तो बहुत बड़ी मूर्खता है तो ज्यादा संभावना इसी बात की है कि प्राचीन काल में अंग्रेज़ भारतीयों के प्रभाव में थे इस कारण सब कुछ भारतीयों जैसा ही करते थे और इंगलैण्ड ही क्या पूरा विश्व ही भारतीयों के प्रभाव में था जिसका प्रमाण ये है कि नया साल भले ही वो 1 जनवरी को माना लें पर उनका नया बही-खाता 1 अप्रैल से शुरू होता है।लगभग पूरे विश्व में वित्त-वर्ष अप्रैल से लेकर मार्च तक होता है यानि मार्च में अंत और अप्रैल से शुरू।भारतीय अप्रैल में अपना नया साल मनाते थे तो क्या ये इस बात का प्रमाण नहीं है कि पूरे विश्व को भारतीयों ने अपने अधीन रखा था। इसका अन्य प्रमाण देखिए-अंग्रेज़ अपना तारीख या दिन 12 बजे रात से बदल देते है।दिन की शुरुआत सूर्योदय से होती है तो 12 बजे रात से नया दिन का क्या तुक बनता है!!!तुक बनता है।भारत में नया दिन सुबह से गिना जाता है,सूर्योदय से करीब दो-ढाई घंटे पहले के समय को ब्रह्म-मुहूर्त्त की बेला कही जाती है और यहाँ से नए दिन की शुरुआत होती है।यानि की करीब 4-4.30 के आस-पास और इस समय इंग्लैंड में समय 12 बजे के आस-पास का होता है।चूंकि वो भारतीयों के प्रभाव में थे इसलिए वो अपना दिन भी भारतीयों के दिन से मिलाकर रखना चाहते थे इसलिए उनलोगों ने रात के 12 बजे से ही दिन नया दिन और तारीख बदलने का नियम अपना लिया। जरा सोचिए वो लोग अब तक हमारे अधीन हैं हमारा अनुसरण करते हैं और हम राजा होकर भी खुद अपने अनुचर का,अपने अनुसरणकर्ता का या सीधे-सीधी कहूँ तो अपने दास का ही हम दास बनने को बेताब हैं।कितनी बड़ी विडम्बना है ये!!!!!!
क्या है न्यू ईयर ?
एक जनवरी के नजदीक आते ही जगह-जगह हैप्पी न्यू ईयर के बैनर व होर्डिंग लगने लगते हैं। जश्न मनाने की तैयारियां प्रारम्भ हो जाती हैं। होटल, रेस्तरॉ, व पव इत्यादि अपने-अपने ढंग से इसके आगमन की तैयारियां करने लगते हैं। पोस्टर व कार्डों की भरमार के साथ दारू की दुकानों की भी चांदी कटने लगती है। कहीं कहीं तो जाम से जाम इतने टकराते हैं कि घटनाऐं दुर्घटनाओं में बदल जाती हैं और मनुष्य- मनुष्यों से तथा गाड़ियां गाडियों से भिडने लगते हैं। रात-रात भर जाग कर नया साल मनाने से ऐसा प्रतीत होता है मानो सारी खुशियां एक साथ आज ही मिल जायेंगी। हम भारतीय भी पश्चिमी अंधानुकरण में इतने सराबोर हो जाते हैं कि उचित अनुचित का बोध त्याग अपनी सभी सांस्क्रतिक मर्यादाओं को तिलांजलि दे बैठते हैं। पता ही नहीं लगता कि कौन अपना है और कौन पराया।
जनवरी से प्रारम्भ होने वाली काल गणना को हम ईस्वी सन् के नाम से जानते हैं जिसका सम्बन्ध ईसाई जगत् व ईसा मसीह से है। इसे रोम के सम्राट जूलियस सीजर द्वारा ईसा के जन्म के तीन वर्ष बाद प्रचलन में लाया गया। भारत में ईस्वी सम्वत् का प्रचलन अग्रेंजी शासकों ने 1752 में किया। अधिकांश राष्ट्रों के ईसाई होने और अग्रेंजों के विश्वव्यापी प्रभुत्व के कारण ही इसे विश्व के अनेक देशों ने अपनाया। 1752 से पहले ईस्वी सन् 25 मार्च से प्रारम्भ होता था किन्तु 18वीं सदी से इसकी शुरूआत एक जनवरी से होने लगी। ईस्वी कलेण्डर के महीनों के नामों में प्रथम छः माह यानि जनवरी से जून रोमन देवताओं (जोनस, मार्स व मया इत्यादि) के नाम पर हैं। जुलाई और अगस्त रोम के सम्राट जूलियस सीजर तथा उनके पौत्र आगस्टस के नाम पर तथा सितम्बर से दिसम्बर तक रोमन संवत् के मासों के आधार पर रखे गये। जुलाई और अगस्त, क्योंकि सम्राटों के नाम पर थे इसलिए, दोनों ही इकत्तीस दिनों के माने गये अन्यथा कोई भी दो मास 31 दिनों या लगातार बराबर दिनों की संख्या वाले नहीं हैं।
ईसा से 753 वर्ष पहले रोम नगर की स्थापना के समय रोमन संवत् प्रारम्भ हुआ जिसके मात्र दस माह व 304 दिन होते थे। इसके 53 साल बाद वहां के सम्राट नूमा पाम्पीसियस ने जनवरी और फरवरी दो माह और जोड़कर इसे 355 दिनों का बना दिया। ईसा के जन्म से 46 वर्ष पहले जूलियस सीजन ने इसे 365 दिन का बना दिया। सन् 1582 ई. में पोप ग्रेगरी ने आदेश जारी किया कि इस मास के 04 अक्टूबर को इस वर्ष का 14 अक्टूबर समझा जाये। आखिर क्या आधार है इस काल गणना का ? यह तो ग्रहों व नक्षत्रों की स्थिति पर आधारित होनी चाहिए।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् नवम्बर 1952 में वैज्ञानिक और औद्योगिक परिषद के द्वारा पंचांग सुधार समिति की स्थापना की गयी। समिति ने 1955 में सौंपी अपनी रिपोर्ट में विक्रमी संवत को भी स्वीकार करने की सिफारिश की थी। किन्तु, तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू के आग्रह पर ग्रेगेरियन कलेण्डर को ही सरकारी कामकाज हेतु उपयुक्त मानकर 22 मार्च 1957 को इसे राष्ट्रीय कलेण्डर के रूप में स्वीकार कर लिया गया।
ग्रेगेरियन कलेण्डर की काल गणना मात्र दो हजार वर्षों के अति अल्प समय को दर्शाती है। जबकि यूनान की काल गणना 3579 वर्ष, रोम की 2756 वर्ष यहूदी 5767 वर्ष, मिस्त्र की 28670 वर्ष, पारसी 198874 वर्ष तथा चीन की 96002304 वर्ष पुरानी है। इन सबसे अलग यदि भारतीय काल गणना की बात करें तो हमारे ज्योतिष के अनुसार पृथ्वी की आयु एक अरब 97 करोड़ 39 लाख 49 हजार 109 वर्ष है। जिसके व्यापक प्रमाण हमारे पास उपलब्ध हैं। हमारे प्राचीन ग्रंथों में एक-एक पल की गणना की गयी है।

जिस प्रकार ईस्वी सम्वत् का सम्बन्ध ईसा जगत से है उसी प्रकार हिजरी सम्वत् का सम्बन्ध मुस्लिम जगत और हजरत मुहम्मद साहब से है। किन्तु विक्रमी सम्वत् का सम्बन्ध किसी भी धर्म से न हो कर सारे विश्व की प्रकृति, खगोल सिद्धांत व ब्रह्माण्ड के ग्रहों व नक्षत्रों से है। इसलिए भारतीय काल गणना पंथ निरपेक्ष होने के साथ सृष्टि की रचना व राष्ट्र की गौरवशाली परम्पराओं को दर्शाती है। इतना ही नहीं, ब्रह्माण्ड के सबसे पुरातन ग्रंथ वेदों में भी इसका वर्णन है। नव संवत् यानि संवत्सरों का वर्णन यजुर्वेद के 27वें व 30वें अध्याय के मंत्र क्रमांक क्रमशः 45 व 15 में विस्तार से दिया गया है। विश्व में सौर मण्डल के ग्रहों व नक्षत्रों की चाल व निरन्तर बदलती उनकी स्थिति पर ही हमारे दिन, महीने, साल और उनके सूक्ष्मतम भाग आधारित होते हैं।
इसी वैज्ञानिक आधार के कारण ही पाश्चात्य देशों के अंधानुकरण के बावजूद, चाहे बच्चे के गर्भाधान की बात हो, जन्म की बात हो, नामकरण की बात हो, गृह प्रवेश या व्यापार प्रारम्भ करने की बात हो, सभी में हम एक कुशल पंडित के पास जाकर शुभ लग्न व मुहूर्त पूछते हैं। और तो और, देश के बडे से बडे़ राजनेता भी सत्तासीन होने के लिए सबसे पहले एक अच्छे मुहूर्त का इंतजार करते हैं जो कि विशुद्ध रूप से विक्रमी संवत् के पंचांग पर आधारित होता है। भारतीय मान्यतानुसार कोई भी काम यदि शुभ मुहूर्त में प्रारम्भ किया जाये तो उसकी सफलता में चार चांद लग जाते हैं। वैसे भी भारतीय संस्कृति श्रेष्ठता की उपासक है। जो प्रसंग समाज में हर्ष व उल्लास जगाते हुए एक सही दिशा प्रदान करते हैं उन सभी को हम उत्सव के रूप में मनाते हैं। राष्ट्र के स्वाभिमान व देश प्रेम को जगाने वाले अनेक प्रसंग चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से जुडे़ हुए हैं। यह वह दिन है जिस दिन से भारतीय नव वर्ष प्रारम्भ होता है। आईये, इस दिन की महानता के प्रसंगों को देखते हैं -
ऐतिहासिक महत्व
1 यह दिन सृष्टि रचना का पहला दिन है। इस दिन से एक अरब 97 करोड़ 39 लाख 49 हजार 109 वर्ष पूर्व इसी दिन के सूर्योदय से ब्रह्मा जी ने जगत की रचना प्रारंभ की।
2 विक्रमी संवत का पहला दिन: उसी राजा के नाम पर संवत् प्रारंभ होता था जिसके राज्य में न कोई चोर हो, न अपराधी हो, और न ही कोई भिखारी हो। साथ ही राजा चक्रवर्ती सम्राट भी हो। सम्राट विक्रमादित्य ने 2067 वर्ष पहले इसी दिन राज्य स्थापित किया था।
3 प्रभु श्री राम का राज्याभिषेक दिवस : प्रभु राम ने भी इसी दिन को लंका विजय के बाद अयोध्या में राज्याभिषेक के लिये चुना।
4 नवरात्र स्थापना : शक्ति और भक्ति के नौ दिन अर्थात्, नवरात्र स्थापना का पहला दिन यही है। प्रभु राम के जन्मदिन रामनवमी से पूर्व नौ दिन उत्सव मनाने का प्रथम दिन।
5 गुरू अंगददेव प्रगटोत्सव : सिख परंपरा के द्वितीय गुरू का जन्म दिवस।
6 आर्य समाज स्थापना दिवस : समाज को श्रेष्ठ (आर्य) मार्ग पर ले जाने हेतु स्वामी दयानंद सरस्वती ने इसी दिन को आर्य समाज स्थापना दिवस के रूप में चुना।
7 संत झूलेलाल जन्म दिवस : सिंध प्रान्त के प्रसिद्ध समाज रक्षक वरूणावतार संत झूलेलाल इसी दिन प्रगट हुए।
8 शालिवाहन संवत्सर का प्रारंभ दिवस : विक्रमादित्य की भांति शालिनवाहन ने हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने हेतु यही दिन चुना।
9 युगाब्द संवत्सर का प्रथम दिन : 5112 वर्ष पूर्व युधिष्ठिर का राज्यभिषेक भी इसी दिन हुआ।

प्राकृतिक महत्व
1 वसंत ऋतु का आरंभ वर्ष प्रतिपदा से ही होता है जो उल्लास, उमंग, खुशी तथा चारों तरफ पुष्पों की सुगंधि से भरी होती है।
2 फसल पकने का प्रारंभ यानि किसान की मेहनत का फल मिलने का भी यही समय होता है।
3 नक्षत्र शुभ स्थिति में होते हैं अर्थात् किसी भी कार्य को प्रारंभ करने के लिये यह शुभ मुहूर्त होता है।
क्या एक जनवरी के साथ ऐसा एक भी प्रसंग जुड़ा है जिससे राष्ट्र प्रेम जाग सके, स्वाभिमान जाग सके या श्रेष्ठ होने का भाव जाग सके। आइये! विदेशी को फैंक स्वदेशी अपनाऐं और गर्व के साथ भारतीय नव वर्ष यानि विक्रमी संवत् को ही मनायें तथा इसका अधिक से अधिक प्रचार करें।

मध्य रात्रि के बाद की रात बची हुई, दूसरे दिन की प्रातः तक की अंधेरे-युक्त रात्रि का क्या हुआ? मध्य रात्रि हुयी, और तुरंत एक क्षणमें, सारी शेष रात्रि को छल्लांग लगा कर सु प्रभातम्‌,। क्या कोई तर्क है, इसके पीछे?.....

१- वास्तवमें, इंग्लैंडके रात के बारह बजे, भारतमें प्रातः है। वैदिक संस्कृति के अनुसार भारतमें, प्रातः ५:३० बजे सूर्योदय के साथ साथ तिथि बदली जाती थी। उज्जैन (भारत) और गीनीच (इंग्लैंड) के अक्षांश में ८२.५ अंशोका (डिग्रीका) अंतर है। उज्जैन या प्रयाग के अक्षांश ८२.५ है, जब ग्रीनीच के (०)-शून्य हैं। इस लिए, भारत में जब प्रातः के, ५:३० बजते हैं, तब ग्रीनीच, इंग्लैंड में पिछली रात के, १२ बजे होते हैं, होती तो मध्य रात्रि है, किंतु भारत की प्रातः से ताल मिलाने के लिए मध्य रात्रि के तुरंत बाद, शेष रात्रिकी ओर दुर्लक्ष्य करते हुए, गुड मॉर्निंग (सु प्रभातम्‌) हो जाती है। यह तर्क शुद्ध प्रतीत होता है। इस तथ्य की एक पुष्टि यह भी है, कि भारत को पूरब का देश भी माना जाता है, और ऐसे ही स्वीकारा जाता है। पाठकों को ’पूरब और पच्छिम” नाम का चलचित्र (मूवी)भी स्मरण होगा, जिसमें भारत को पूरब माना गया था, और ऐतिहासिक दृष्टिसे सदा स्वीकारा भी गया है।
इसी संदर्भ में कुछ और भी विधान किया जा सकता है। वास्तव में, उत्तर और दक्षिण दिशाएं, पृथ्वी के, दो ध्रुवों के कारण तर्क शुद्ध हैं। पृथ्वी गोल घुमती है, और, उत्तर ध्रुव और दक्षिण ध्रुव दो स्थिर बिंदू हैं। परंतु, पूर्व दिशा का ऐसा नहीं है। एक मंडल में, या वृत्त में, किस बिंदु को संदर्भ बिंदू (Reference Point) माना जाए, इसका कोई तर्क नहीं दिया जा सकता। इस लिए संदर्भ बिंदू प्रयाग, या उज्जैन (जो, आज कल माना जाता है) हो सकता है।

२- कॅलेंडर भी (हमारा कालांतर) संयोग से एक पुर्तगाली क्लायंट के साथ बातचीत करते समय सुना, कि पुर्तगाली भाषा में, अंग्रेज़ी कॅलेंडर के लिए ”कलांदर” शब्द प्रयुक्त होता है, जो शुद्ध संस्कृत ”कालांतर” से अधिक मिलता जुलता प्रतीत होता है। अब जानकारों को यह कालांतर, शुद्ध संस्कृत युगांतर, मन्वंतर, कल्पांतर इत्यादि शब्दों जैसा ही, शुद्ध संस्कृत प्रतीत हो, तो कोई विशेष अचरज नहीं।
३- Day, Night, Hour इत्यादि अब कुछ Day, Night, Hour इत्यादि शब्दों का विचार करते हैं। जो वास्तव में काल गणना विषय से ही जुडे हुए हैं। Day को दिवस शब्दके मूल धातु ”दिव” के साथ मेल है। इस दिव्‌ का अर्थ दिव्यता अर्थात प्रकाश के साथ जुडा हुआ है। अपने शब्द दिवस, दिन, दिव्यता, देव (प्रकाश युक्त हस्ति) दैव (देवों पर आधारित) दिवंगत (प्रकाशमें लीन हो चुका हुआ) ऐसे शब्दों का मूल भी यह दिव‌ धातु ही है। अंग्रेज़ी में यही दिव‌ धातु के मूल से उदभूत Divine (प्रकाशमान आकृति), Day (दिवस), Deity (दैवी आकृति), Divination ( दैवी सहायता से ढूंढना), इत्यादि शब्दोंका तर्कशुद्ध संधान किया जा सकता है। यह सारे शब्द दिव्‌ धातुसे उद्‌भूत प्रतीत होते हैं।

Night उसी प्रकारसे Night को संस्कृत ”नक्त” (अर्थात रात्रि) के साथ निकटता प्रतीत होती है। संस्कृतमें ”नक्तचर” रात्रि को विचरण करने वाले प्राणियों के लिए प्रयोजा जाता है। नक्त का अर्थ रात्रि, और चर का अर्थ विचरण करने वाला यह होता है। अंग्रेज़ी में भी Nocturnal Animal सुना होगा। इस Nocturanal का ”Noct” वाला हिस्सा ”नक्त” के साथ मिलता प्रतीत होता है। उच्चारण की दृष्टि से जैसे अष्ट से अख्ट,-अठ्ठ (प ्राकृत और पंजाबी ),–आठ (गुजराती/मराठी/हिंदी) और अंगेज़ी Eight ( उच्चारानुसारी अख्ट) इसे Night (उच्चारानुसारी नख्ट) से तुलना करने पर कुछ अधिक प्रकाश पडता है।

Hour का भी मूल ”होरा” इस संस्कृत शब्द से, जिस का अर्थ एक राशि में व्यतीत किया गया समय के अर्थ से लगाया जा सकता है। ज्योतिष को ”होरा” शास्त्र भी कहा जाता है।
यह व्युत्पत्तियां अंग्रेजी डिक्‍शनरियां क्यों दिखाती नहीं है? मुझे यह प्रश्न कई बार पूछा जाता है। मेरी दृष्टि में अनुमानित उत्तर शायद यह है, कि जब यह डिक्षनरियां रची गई, तब हम पर-तंत्र थे, और भारत में मॅकॉले प्रणीत शिक्षा प्रणाली लागु की गई थी; जो भारतियों को भारत की महानता के प्रति उदासीन रखना चाहती थी। सोचिए कि जिस भारत नें विश्व में गणित की आत्मा समझी जाने वाले अंकों का योगदान किया, उन अंकों का उल्लेख भी अरबी अंक इस नाते से किया जाता था। बहुत से लोग आज भी उन्हे अरबी अंक ही मानते हैं; तब यह बात सरलता से समझ में आती है। पर हमें इस मति भ्रमित अवस्था से बाहर आना होगा, और गौरव अनुभव करते हुए, उपर उठना होगा।

संदर्भ:(१) एन्सायक्लोपेडिया ब्रिटानीका (२) विश्व इतिहास के कुछ विलुप्त पृष्ठ– पु. ना. ओक,(३) लेखक का ही, गुजराती त्रैमासिक, ”गुर्जरी” में प्रकाशित लेख,(४) लेखक की टिप्पणियां।

(मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण
अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।)

Friday, December 31, 2010

क्या बनेगा इस मीडिया का

पूंजी का दबाव बढ़ा तो बढ़ता ही चला गया. इस ने लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ मीडिया को भी प्रभावित किया. जिस की पहले से ही कई मिलें चलती थीं उसने एक आध यूनिट मीडिया का भी खोल लिया. किसी ने चैनल तो किसी ने अखबार. कारोबार का कारोबार और हथियार का हथियार. बिलकुल उसी तरह जैसे बिस्कुट, चाकलेट या साबुन बनाने की फैक्ट्री खोली जाती है. पत्रकारिता की डिग्री लेकर नए जोशोखरोश के साथ निकलने वाले युवा पत्रकार भी इन लोगों के ही काम आने थे और आये भी. इनके दम पर वे लोग भी पत्रकारिता के आकाश पर चमकाने लगे  जिन्हें इस क्षेत्र का क ख ग भी नहीं आता था. परिणाम देश ने भी भुगता, जनता ने भी भुगता और स्वयं अपनी जान जोखिम में डाल कर काम करने वाले पत्रकार भाईचारे ने भी भुगता.वे लोग भी इन अखबारों और चैनलों में न्यूज़ हैड और चैनल हैड जैसे प्रमुख पदों पर पहुंचे जिन्हें इस की जरा भी समझ नहीं थी. विज्ञापन लाने वाले और स्कियोरटी जमा कराने वाले लोग संवाददाता बनने लगे. काबिल लोग बेकार कर दिए गए. यह आग कुछ और फैली तो मालिकों तक भी पहुंचने लगी. उन पर संकट आया तो ये नौसीखिए लोग उनके काम नहीं आ एके. इसकी ताज़ा मिसाल मिली है देश की राजधानी दिल्ली में जिसे बहुत ही सलीके से सब के सामने रखा है विस्फोट ने. पढ़िए आप भी इस दिलचस्प पोस्ट को. --रेक्टर कथूरिया 
   गिरफ्तार हो गये मिस्टर चेयरमैन, चैन की बंसी बजा रहे हैं श्रीमान संपादक

समय के खेल भी निराले होते हैं. छोटे मोटे कारोबार से बिल्डर हो चले विजय दीक्षित ने अपने सखा संतोष भारतीय के साथ मिलकर 2005 में चैनल लांच करने की योजना इसलिए बनाई थी कि उनके धंधे को मीडिया का प्रोटेक्शन मिल सके. लेकिन आज पांच साल बाद वही विजय दीक्षित धोखाधड़ी के एक पांच साल पुराने मामले में गिरफ्तार हो जाते हैं लेकिन उनका अपना ही अनाम सा चैनल और गुमनाम सा संपादक उनके लिए लड़ने की बजाय आफिस में बैठकर चैन की बंसी बजा रहे हैं.
वैसे विजय दीक्षित जैसे व्यापारी जिस दिन से मीडिया व्यापार में उतरे हैं उनकी करतूतों का ही परिणाम है कि उनके संपादक तक को उनकी गिरफ्तारी का असर नहीं होता है. बिल्कुल वैसे ही जैसे विजय दीक्षित की ही पत्रिका सीनियर इंडिया में छपे एक कार्टून के विवाद में आलोक तोमर को जेल हो गयी और विजय दीक्षित को कोई फर्क नहीं पड़ा था. अब खुद विजय दीक्षित गिरफ्तार हैं, जेल में हैं लेकिन उनके संपादकीय प्रभारी राजीव शर्मा को शायद ही कोई फर्क पड़ता हो. हो सकता है राजीव शर्मा का अपना संपादकीय फर्ज आड़े आ रहा हो लेकिन उनकी अपने ही चैनल में इस बात को लेकर असंतोष है कि चैनल ही अपने मालिक के लिए नहीं लड़ रहा है.
विजय दीक्षित की गिरफ्तारी एक धोखाधड़ी के मामले में हुई है. धोखाधड़ी की शिकायत सीमा स्वरूप ने किया है. उनका आरोप है कि विजय दीक्षित की कंपनी में उन्होने पचास लाख का निवेश किया था और कंपनी ने उन्हें आश्वासन दिया था कि उनका निवेश सीनियर माल गुड़गांव में किया गया है. उनके निवेश के बदले में उन्हें निश्चित रिटर्न मिलेगा. ऐसा नहीं हुआ तो सीमा ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवा दी जिस पर कार्रवाई करते हुए दिल्ली पुलिस ने दो दिन पहले विजय दीक्षित को गिरफ्तार कर लिया. लेकिन यह तो सार्वजनिक हुई कहानी है.
असल में विजय दीक्षित दिल्ली पुलिस कमिश्नर बीके गुप्ता के निशाने पर हैं. बीके गुप्ता के बेटे ने 2005 में एक कार एक्सीडेन्ट कर दिया था. कार एक्सीडेन्ट भी उस सीरीफोर्ट इलाके में हुआ था जहां उन दिनों एस-1 चैनल का दफ्तर हुआ करता था. उस वक्त चैनल ने बड़ी बहादुरी दिखाते हुए उसे बड़ा मुद्दा बना दिया था. खैर उस वक्त तो बात आयी गयी हो लेकिन जैसे ही बी के गुप्ता दिल्ली के पुलिस कमिश्नर बने उन्होंने दीक्षित के खिलाफ मामलों की फाइलें खुलवा दी. विजय दीक्षित कोई पाक साफ आदमी तो हैं नहीं. आठ से अधिक मामले उनके खिलाफ दर्ज हैं. इसलिए पुलिस ने अपने हिसाब से उनके खिलाफ एक्शन ले लिया. लेकिन मजा देखिए कि जिस बीके गुप्ता के बेटे के खिलाफ चैनल ने पत्रकारिता की बहादुरी दिखाई थी, आज उनका अपना ही मालिक गिरफ्तार हो गया तो चैनलवाले चुप बैठ गये हैं. इसे लेकर चैनल के अंदर ही संपादक श्री के खिलाफ असंतोष है. देखना यह होगा कि मिस्टर चेयरमैन जेल से छूटकर आते हैं तो संपादक महोदय के खिलाफ क्या एक्शन लेते हैं.
            चलते चलते एक अच्छी खबर भी. पेड न्यूज़ को लेकर मीडिया जाग चुका है. देर से ही सही पर इसका विरोध तेज़ी से बढ़ रहा है. भोपाल में 2 जनवरी को इस मुद्दे पर  पत्रकार एकत्र हो रहे हैं.  इस की खबर भी विस्फोट ने बहुत ही अहमीयत से प्रकाशित की है. देखिये एक झलकपेड न्यूज के खिलाफ शुरू हुई बहस अब दिल्ली के दायरे के बाहर निकल रही है. भोपाल में वर्किंग यूनियन आफ जर्नलिस्ट के बैनर तले आगामी 2 जनवरी को देशभर के पत्रकारों का एक जमावड़ा होने जा रहे हैं जिसमें पेड न्यूज पर पत्रकार अपनी परेशानियों को बयान करेंगे.

वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया है कि इस परिचर्चा में देश के 18 राज्यों से प्रतिनिधियों को बुलाया गया है. न केवल देश के अठारह राज्यों से पत्रकारों को पेड न्यूज पर चिंता व्यक्त करने के लिए बुलाया गया है बल्कि पड़ोसी मुल्क श्रीलंका के प्रतिनिधि भी इस परिचर्चा में हिस्सा लेंगे.
परिचर्चा का उद्घाटन स्थानीय शहीद भवन में दोपहर 12.15 बजे बालाभास्कर एस करेंगे. इस अवसर पर माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति बीके कुठियाला और नई दुनिया के स्थानीय संपादक ओम मेहता विशिष्ट अतिथि के बतौर उपस्थित रहेंगे. वर्किंग यूनियन आफ जर्नलिस्ट के प्रांतीय अध्यक्ष राधा वल्लभ ने सभी स्थानीय पत्रकारों से इस परिचर्चा में शामिल होने की अपील की है.

तोड़ न पाओगे इस बार मेरे हौंसलो की उड़ान

डाक्टर विनायक सेन को सुनाई गयी सज़ा को लेकर रोष का सिलसिला जारी है. 30 दिसम्बर 2010 को भोपाल में भी डॉ. बिनायक सेन के समर्थन में एक बैठक की गयी |उस बैठक में बाद यह तय किया गया कि 1 जनवरी 2011 को यादगारे शाहजहानी पार्क में दोपहर 12 बजे से एक सभा का आयोजन किया जायेगा सभा के बाद एक रैली के रूप में सभी सहयोगी नीलम पार्क तक जायेंगे | इस मुद्दे को और आगे चर्चा करने के लिए रैली के बाद नीलम पार्क में एक बैठक भी आयोजित की जाएगी जिसमे इस मुद्दों के विषय में आगे के कार्यक्रम एवं रणनीति तय की जाएगी |
 शिक्षा अधिकार मंच, भोपाल सचिव अनिल सद्गोपाल ने इस सम्बन्ध में जारी एक अपील में कहा है कि उक्त रैली व धरने में बड़ी संख्या में हिस्सा लेकर सरकार को बता दें कि हम भारत के लोकतंत्र को कितना प्यार करते हैं।
  • इस बैठक में एक परचा बनाने का तय हुआ है जिसकी जिम्मेदारी राकेश दीवान/रोली /रिनचीन ने ली है | 
  • जब्बार भाई, रोली और रिनचिन ने  तख्तिया बनाने की जिम्मेदारी ली है 
  • बैनर और शाहजहानी पार्क की व्यवस्था की जिम्मेदारी जब्बार भाई ने ली है 
  • आदेश के सम्बन्ध में जो समीक्षा जो सुधा भरद्वाज, इलिना और कविता ने तैयार की है उसके हिंदी में अनुवाद की जिम्मेदारी एकलव्य के साथियों ने ली है |
आप अनुमान लगा सकते हैं कि शीत लहर के इस मौसम में लोग कितना बढ़ चढ़ कर आगे आ रहे हैं.इन तैयारिओं के सिलसिले में हुई इस विशेष बैठक में कलम के सिपाही भी पीछे नहीं हैं. प्रगतिशील लेखक संघ के शैलेन्‍द्र शैली, गैस  पीड़ितों के संगठन  भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन के अब्‍दुल जब्‍बार,  नागरिक अधिकारों कि जानीमानी संस्था पीयूसीएल के दीपक भट्ट, मूल अधिकारों में आते भोजन का अधिकार अभियान की रोली शिवहरे, इसी तरह आइविड की नीलम एवं नताशा , महिला शक्ति के उत्थान में लगी संस्था संगिनी की प्रार्थना मिश्रा, एक अन्य महिला संगठन मप्र महिला मंच की रिनचिन , छात्र शक्ति के प्रतीक अखिल भारतीय क्रांतिकारी विद्यार्थी संगठन, क्‍म्‍युनिस्‍ट पार्टी, इसके साथ ही पत्रकार लज्‍जा शंकर हरदेनिया, राकेश दीवान, एक और संगठन एकलव्य के अंजलि एवं कार्तिक हाईकोर्ट के वकील राघवेन्‍द्र आदि। भी इस अभ्याँ में पूरी तरह सरगर्म हैं.

अंत में रोली की एक कविता  
 
 तुम कितनी ही कोशिश कर लो, 
तोड़ न पाओगे इस बार,
मेरे हौंसलो की उड़ान,
खोने न दूंगी खुद को
अपने काम को नया काम
 नया आयाम दूंगी
 और दूंगी एक नई पहचान
 अपनी आत्मा को
 जो मुझसे शुरू होकर
 ख़त्म होगी मुझी में 
आपको यह कविता कैसी लगी अवश्य बताएं.आपके विचारों की इंतज़ार में.--रेक्टर कथूरिया 

Tuesday, December 28, 2010

पूरी दुनिया में आवाजें उठ रही है डॉ. विनायक सेन के समर्थन में


डाक्टर विनायक सेन, नारायण सान्याल और पीयूष गुहा को लेकर विचार चर्चा लगातार गरमा रही है. श्री राम तिवारी ने अपने ब्लॉग इन्कलाब ज़िंदाबाद में लिखा  है की विगत सप्ताह छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की एक अदालत ने जिन तीन लोगों को नक्सलवादियों का समर्थक होने के संदेह  मात्र के लिए आजीवन कारावास जैसी सजा सुनाई उसकी अनुगूंज बहुत दूर तक बहुत लम्बे समय तक सुनाई देती रहेगी .डॉ विनायक सेन ,नारायण सान्याल और पीयूष गुहा कितने बड़े खूंखार हैं ?.उनसे मानवता और देश को कितना खतरा है ? इस फैसले के बाद  देश की जनता ने जाना और माना की माननीय न्याय मंदिर के शिखर पर विराजित स्वर्ण कलश की चमक इस फैसले से कितनी फीकी हुई है या होने वाली है  इस एतिहासिक न्यायिक फैसले पर जारी  विमर्श के केंद्र में वस्तुत; व्यक्ति नहीं विचारधारा ही है. खास तौर से देश का मध्यम वर्ग और आम तौर पर सभी सुशिक्षित और राष्ट्र निष्ठ भारतीय इस कथन को सगर्व पेश करते हैं की 'हमारा प्रजातंत्र  चीन की साम्यवादी तानाशाही से बेहतर है ,रूसी अमेरिकी और ब्रिटेन के लोकतंत्र में भी अभिव्यक्ति की इतनी आजादी नहीं जितनी की हमारी  महान भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था में है '
श्री राम तिवारी
दुनिया के अधिकांश  देशों और विभिन्न व्यवस्थाओं में दंड नीति की अपनी अपनी खासियतें हैं .किन्तु भारत में उदात्त न्याय दर्शन और मीमांसाएँ हैं -अपराधी भले ही छूट जाये ,किन्तु निर्दोष को सजा नहीं मिलना चाहिए .
बेशक यह सही भी है किन्तु यहाँ बहुत पुरानी पोराणिक आख्यायिका है की "एक हांड़ी दो पेट बनाये ,सुगर नार श्रवण की 'मात्रु -पित्र परम भक्त श्रवण कुमार की पत्नी ने ऐसी हांड़ी वना रखी थी -जिसके दो भाग अंदर ही अंदर थे उसमें वो एक ही समय में एक हिस्से में खीर पकाती थी और दूसरे हिस्से में पतला दलिया,खीर वो अपने पति -श्रवणकुमार को खिलाती  और दलिया अपने सास -ससुर को ,अंधे सास-ससुर यही समझते की जो हम खा रहे हैं वही बेटा श्रवण खा रहा है .भारतीय लोकतंत्र रुपी हांड़ी में भी दो पेट हैं .एक सबल और प्रभुत्वशाली  वर्ग के लिए दूसरा निर्धन अकिंचन असहाय वर्ग के लिए .सारी दुनिया समझती है की हमारे लोकतंत्र की हांड़ी में जो कुछ भी पक  रहा है वो वही है जो वह देख सुन या महसूस कर रहा है .जबकि इण्डिया शाइनिंग का नारा देते वक्त 2008 में यह और भी स्पष्ट हो गया था की उन्नत वैज्ञानिक  तरक्की का लाभ देश की अधिसंख्य जनता तक नहीं पहुँच पाया है और अटलजी को -एन डी ये को अपने विश्वश्त अलायन्स पार्टनर चन्द्र बाबु नायडू जैसों के साथ पराजय का मुख देखना
पड़ा था .तब पता चला की इंडिया और भारत में खाई चोडी होती जा रही है .यह विराट दूरी  सिर्फ आर्थिक या जीवन की गुजर-बसर  तक ही नहीं अपितु सामजिक ,आर्थिक .सांस्कृतिक और न्यायिक क्षेत्रों तक पसरी हुई है .
  देश में आर्थिक सुधारों और लाइसेंस राज के आविर्भाव उपरान्त विगत 20 सालों में इतनी तरक्की हुई की पहले 5 पूंजीपति अर्थात मिलियेनार्स थे अब 54 मिलिय्र्नार्स हो गए हैं .तरक्की हुई की नहीं ?पहले 1990 में गरीबी की रेखा से नीचे 19 करोड़ निर्धन जन थे अब 33 करोड़ हो चुके हैं -तरक्की तो हुई की नहीं ?
यही बात शिक्षा ,स्वास्थ्य ,जीवन स्तर के सन्दर्भ में मूल्यांकित की जाये तो स्थिति और भी भयावह नजर आएगी .भारतीय प्रजातांत्रिक -
न्याय व्यस्था  पर प्रश्न चिन्ह सिर्फ विनायक सेन के सन्दर्भ में या रामजन्म भूमि बाबरी - मस्जिद के सन्दर्भ में
नहीं उठा बल्कि वह आजादी के फ़ौरन बाद से लगातार उठता रहा है .वह तब भी उठा जब तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने अलाहाबाद  उच्च न्यायलय में अपनी चुनावी हार को फौरन सर्वोच्च न्यायलय के मार्फ़त जीत में बदल दिया .सवाल तब भी उठा जब शाहबानो  प्रकरण में कानून बदला गया .सवाल तब भी उठा जब लाल देंगा जैसे देशद्रोही से न केवल बात की गई बल्कि उसे मुख्यमंत्री तक बनवा दिया .सवाल अब भी कायम है की हजारों डाकुओं को आत्म समर्पण के बहाने उनके अनगिनत पापों को इस देश के कानून ने और व्यवस्था ने माफ़ किया .एक बार नहीं अनेक बार ,अनेक प्रकरणों और संदर्भो में ऐसा पाया गया की शक्तिशाली  वर्ग -पप्पू यादवों .तस्लीम उद्दीनों ,बुखारियों ,ठाकरे और गुजरात के नरसंहार कर्ताओं की कानून मदद करता पाया गया .

वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण जी ने जिन एक दर्जन माननीयों  के भ्रष्टाचार में लिप्त होने के सबूत सर्वोच्च न्यायलय को दिए हैं उनके लिए अलग दंड विधान है याने कोई कुछ नहीं बोलेगा .यदि बोलेगा तो जुबान काट दी जायेगी .शूली पर लटका दिया जायेगा .इन शक्तिशाली प्रभुत्व   वर्ग के खिलाफ बोलना याने विनायक सेन होना है ,विनायक सेन एक आध तो है नहीं  की उसे जेल भेज दोगे तो ये अंधेर नगरी चोपट राज चलता रहेगा .विनायक सेन पीयूष गुहा और नारायण सान्याल तो भारतीय आत्मा का चीत्कार हैं ,आदरणीयों ,मान नीयो .इतना जुल्म न करो की आसमान रो पड़े और जनता गाने लगे की ये लड़ाई है दिए की और तूफ़ान की ...इस पूरी पोस्ट को आप यहां क्लिक करके भी पढ़ सकते हैं .
डॉ. विनायक सेन 
इसी मुद्दे पर जानी मानी वैब पत्रिका प्रवक्ता ने बाकायदा एक विचार चर्चा शुरू की है. पत्र ने परिचर्चा के शीर्षक में ही पूछा है क्या डॉ. विनायक सेन देशद्रोही हैं? इस परिचर्चा को शुरू करते हुए प्रवक्ता ने लिखा है,"डॉ. विनायक सेन पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन गए हैं। गौरतलब है कि पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) नेता और मानवाधिकार कार्यकर्ता डॉ. सेन को रायपुर जिला एवं सेशन न्‍यायालय के न्‍यायाधीश बीपी वर्मा ने 24 दिसंबर को देशद्रोह और साजिश रचने का दोषी करार दिया। न्‍यायालय ने डा. सेन के साथ ही प्रतिबंधित संगठन भाकपा (माओवादी) पोलित ब्‍यूरो के सदस्‍य नारायण सान्याल व पीजूष गुहा को उम्रकैद की सजा सुनाई। तीनों पर यह आरोप सिद्ध हुआ कि उन्होंने राज्य के खिलाफ षड्यंत्र किया था। आईपीसी की धारा 124 ए के तहत राज्य के खिलाफ षड्यंत्र करने का आरोप लगा। छत्तीसगढ़ जन सुरक्षा अधिनियम की धारा 1, 2, 3 व 5 के तहत डा. सेन को दोषी करार दिया गया। राज्य के खिलाफ गतिविधियों के तहत धारा 39-2 के तहत भी उन्हें दोषी करार दिया गया।" 
प्रवक्ता ने डाक्टर विनायक सेन के विरोध का पक्ष भी उजागर किया. पत्र ने लिखा  है:
डॉ. विनायक सेन के विरोध में
• न्‍यायाधीश बीपी वर्मा ने डॉ. सेन को देश के खिलाफ युद्ध छे़डने, लोगों को भ़डकाने और प्रतिबंधित माओवादी संगठन के लिए काम करने को दोषी करार दिया। उन्‍होंने अपने फैसले में लिखा कि आरोपी नक्सलियों के शहरी नेटवर्क को बढ़ावा देकर शहरों में हिंसक वारदात करवाना चाहते थे।
• फैसले में इस बात का उल्लेख किया गया है कि नारायण सान्याल नक्सली माओवादियों की सबसे बड़ी संस्था पोलित ब्यूरो का सदस्य है, वह बिनायक सेन व पीजूष गुहा के माध्यम से जेल में रहकर ही शहरी क्षेत्रों में हिंसक वारदातों को अंजाम देने की कोशिश में था। पुलिस को जब यह पता चला तो सबसे पहले शहर में बाहर से आने वाले संदिग्ध व्यक्तियों के बारे में होटल, लाज, धर्मशाला व ढाबों पर दबिश दी गई। दबिश के कारण ही पीयूष गुहा पुलिस के हत्थे चढ़ा।
• यह भी पाया गया है कि विनायक सेन नारायण सान्याल के पत्र पीयूष गुहा को गोपनीय कोड के माध्यम से प्रेषित किया करता था। तीनों अभियुक्तों की मंशा नक्सलियों के खिलाफ चल रहे आंदोलन सलवा जुड़ूम को समाप्त करने की भी थी।
डा. बिनायक सेन के मकान की तलाशी में नारायण सान्याल का लिखा पत्र, सेंट्रल जेल बिलासपुर में बंद नक्सली कमांडर मदन बरकड़े का डा. सेन को कामरेड के नाम से संबोधित किया पत्र व 8 सीडी जिसमें सलवा जुडूम की क्लीपिंग व नारायणपुर के गांवों में डा. सेन के द्वारा गांव वासियों व महिलाओं के मध्य बातचीत के अंश मिले हैं।
डॉ. सेन ने 17 महीनों के दौरान माओवादी नेता सान्याल से 33 मुलाकातें कीं।
इसके बाद दूसरा पक्ष भी सब के सामने रखा. ज़रा एक नज़र आप भी देखिये:

डॉ. विनायक सेन के पक्ष में

• डॉक्टर विनायक सेन ने आदिवासी बहुल इलाके छत्तीसगढ़ के लोगों के बीच काम करने की शुरुआत स्वर्गीय शंकर गुहा नियोगी के साथ की थी। पेशे से बाल चिकित्सक सेन ने वहां मजदूरों के लिए बनाए शहीद अस्पताल में लोगों का इलाज करना शुरू कर दिया। साथ ही छत्तीसगढ़ के विभिन्न इलाकों में सस्ते इलाज के लिए योजनाएं बनाने की भी उन्होंने शुरुआत की।
• पीयूसीएल के उपाध्यक्ष के तौर पर उन्होंने छत्तीसगढ़ में भूख से मौतों और कुपोषण का सवाल उठाया। उनका सबसे बड़ा अपराध सरकार की निगाहों में यह माना गया कि उन्होंने सलवा जुडुम को आदिवासियों के खिलाफ बताया था। राज्य की भाजपा सरकार द्वारा चलाए गए इस आंदोलन पर सुप्रीम कोर्ट ने भी सवाल खड़े किए थे। भाजपा ने जब 2005 में छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम लागू किया तो विनायक सेन ने इसका कड़ा विरोध किया था। और इसी कानून के तहत सेन को छत्तीसगढ़ सरकार ने 2007 में गिरफ्तार किया।
एक डाक्टर एवं एक मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में समाज के दबे-कुचले लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए काम किया।
• सेन कभी हिंसा में शामिल नहीं रहे या किसी को हिंसा के लिए नहीं उकसाया।
• देशद्रोह का अपराध तभी साबित होता है, जब राज्य के खिलाफ बगावत फैलाने का असर सीधे तौर पर हिंसा और कानून-व्यवस्था के गंभीर उल्लंघन के रूप में सामने आए।
• इससे कम कुछ भी किया गया या कहा गया, देशद्रोह नहीं माना जा सकता। सेशन कोर्ट के फैसले में डॉ. सेन को लेकर यह तय नहीं हो पाया कि उन्होंने आखिर ऐसा क्या किया, जिससे राज्य में हिंसा और कानून-व्यवस्था का खतरा पैदा हो गया।
डॉ. विनायक सेन के समर्थन में पूरी दुनिया में आवाजें उठ रही है। मानव अधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने डॉ. सेन को अपना समर्थन दिया। अमेरिका में उन्‍हें भारी समर्थन मिल रहा है। वहां के भारतीय मूल के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किया। भारत में भी वाम झुकाव वाले बुद्धिजीवी उनके पक्ष में सड़कों पर उतर रहे हैं। हालांकि देश की दो प्रमुख राष्‍ट्रीय पार्टियां कांग्रेस और भाजपा इस मुद्दे पर चुप्‍पी साधी हुई है।


प्रवक्ता में आप इसी मुद्दे से सबंधित जिन अन्य लेखों को भी यहां क्लिक करके भी पढ़ सकेंगे.उनमें शामिल हैं:
आप इस मुद्दे पर क्या सोचते हैं.....? अवश्य लिखिए....! आपके विचारों का इंतज़ार रहेगा....रेक्टर कथूरिया.

Monday, December 27, 2010

देवभूमि उत्तराखण्ड के खटीमा नगर में "ब्लॉगर मीट का आयोजन"


वन्दना जी का निमन्त्रण था. चर्चामंच पर गया तो वहां बहुत कुछ था. बिलकुल उसी तरह जैसे एक मेला लगा हो. यह मेला था रचनायों का. तरह तरह के खूबसूरत फूलों को एक जगह एकत्र करके जिस गुलदस्ते का करिश्मा यहां दिखाया गया वह सचमुच यादगारी है. ऐसे लगा जैसे किसी बहुत बड़े बाग़ में पहुंच गया. दिल से स्वत ही आभार उठने लगा वन्दना जी के प्रति. यदि उन्होंने नहीं बुलाया होता तो इन सभी नजारों से वंचित रह जाता. वापिसी कि तयारी में था कि एक नया निमन्त्रण देखा. यह निमन्त्रण था डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" की ओर से लिखा था:

प्रिय ब्लॉगर मित्रो!
अपार हर्ष के साथ आपको सूचित कर रहा हूँ कि नववर्ष 2011 के आगमन पर देवभूमि उत्तराखण्ड के खटीमा नगर में एक ब्लॉगरमीट का आयोजन 9 जनवरी, 2011, रविवार को किया जा रहा है! इस अवसर पर आप सादर आमन्त्रित है।
विस्तृत कार्यक्रम साथ कि त्स्वीत में है. गौरतलब है कि खटीमा की दूरी निम्न नगरों से इस प्रकार बताई जाती है. आप इनमें से किस भी ऐसे स्थान तक पहुँचिये जो आपके नज़दीक हो, उसके बाद बाकी की राह आसान हो जाएगी. लीजिये विभिन्न  स्थानों से खटीमा की दूरी का कुछ संक्षिप्त हिसाब किताब.- 

 डॉ.रुपचन्द्र शास्त्री "मयंक"
दिल्ली से 280 किमी
लखनऊ से 280 किमी है।
देहरादून से 350 किमी
हरिद्वार से 290 किमीमुरादाबाद से 160 किमी
रुद्रपुर से 70 किमी
बरेली से 95 किमी
पीलीभीत से 38 किमी
हल्द्वानी से 90 किमी

♥ दिल्ली से शाम को 4 बजे सम्पर्क क्रान्ति एक्सप्रेस काठगोदाम के लिए चलती है, -जो रात्रि 8ः30 पर रुद्रपुर आ जाती है। रुद्पुर से खटीमा मात्र 70 किमी है। रोडवेज की बसे यहाँ से खटीमा के लिए चलती रहती हैं। इसके अलावा प्रातः 9 बजे ओर रात को 9-30 पर भी ट्रेन रुद्पुर के लिए मिलती हैं।♥ दिल्ली आनन्द विहार से दो दर्जन रोडवेज की बसें प्रतिदिन खटीमा के लिए आती हैं। कश्मीरीगेट से प्रतिदिन दो प्राईवेट लग्जरीबसें 2बाई2 रात को 9 बजे खटीमा के लिए चलती हैं, जो सुबह खटीमा आ जाती हैं। 
देहरादून से रात को 10 बजे काठगोदाम एक्सप्रेस चलती है। जो प्रातः 5 बजे रुद्पुर पहुँच जाती है। यहाँ से रोडवेज की बस डेढ़ घण्टे में खटीमा पहुँचा देती है।
जिनका किराया रोडवेज से कम है।

हरिद्वार से भी 11 बजे रात्रि में काठगोदाम एक्सप्रेस पकड़ कर आप रुद्पुर उतर कर खटीमा की बस से आ सकते हैं।
हरिद्वार और देहरादून से बहुत सी बसें खटीमा के लिए चलती हैं।
मान्यवर मित्रों! 
लखनऊ से ऐशबाग स्टेशन से खटीमा के लिए नैनीताल एक्सप्रेस में 3 रिजर्वेशन कोच टनकपुर के लिए लगते हैं। जो खटीमा प्रातःकाल पहुँच जाते हैं।
लखनऊ से बरेली बड़ी लाइन की ट्रेन तो समय-समय पर मिलती ही रहती हैं। बरेली से रोडवेज की बसें बरेली सैटेलाइट बसस्टैंड से अक्सर मिलती रहती हैं। जो दो घण्टे में खटीमा पहुँचा देती हैं।आप खटीमा 9 जनवरी को अवश्य पधारें!
यहाँ सिक्खों का गुरूद्वारा श्री नानकमत्तासाहिब में मत्था टेकें।
माँ पूर्णागिरि के दर्शन करें। नेपाल देश का शहर महेन्द्रनगर यहाँ से मात्र 20 किमी है।
आप नेपाल की यात्रा का भी आनन्द लें।
मैं आपकी प्रतीक्षा में हूँ!

मित्रो शास्त्री जी तो आपकी प्रतीक्षा कर ही रहे हैं पर आप उन्हें अपना कार्यक्रम सूचित करना न भूलें. उनका ईमेल पता है:rcshashtri@uchcharan.com और वहां पहुँचने का पता है: डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक",टनकपुर रोड, खटीमाऊधमसिंहनगर, उत्तराखंड, भारत - 262308.  उनसे फोन पर आप सम्पर्क कर सकते हैं इन नम्बरों पर:Phone/Fax: 05943-250207, Mobiles: 09368499921, 09997996437 ..... अब आप वहां पहुँचने का पूरा प्रयास अवश्य करें. --रेक्टर कथूरिया