Monday, February 22, 2010

खुद को पत्रकार कहने वाले ही दे रहे हैं प्रेस कौंसिल को चुनौती

भारतीय प्रेस परिषद जिसे अधिकतर लोग  प्रेस कौंसिल ऑफ़ इंडिया के नाम से जानते हैं का सम्मान देश में भी है और विदेश में भी. यह माननीय संस्थान किसी भी अखबार, पत्र-पत्रिका या टीवी चैनेल के पत्रकारों, प्रबंधकों यहां तक की मालिकों से भी पूछ सकता है कि उन्होंने प्रेस के लिए बनी अचार सहिंता का उल्लंघन क्यूं किया ? किसी भी सरकारी अधिकारी और आम नागरिक की शिकायत पर भी इस संस्थान में सबंधित अख़बार या फिर टीवी चैनेल के मामले में सुनवाई होती है. इसी तरह अगर किसी पत्रकार, सम्पादक, या फिर किसी मीडिया संस्थान के मालिक को कोई बड़े से बड़ा सरकारी अधिकारी भी तंग करे तो वह भारतीय प्रेस परिषद के पास जाकर अपनी शिकायत दर्ज करवा सकता है. प्रेस कौंसिल ऑफ़ इंडिया उस की व्यथा भी सुनती है. देश के सभी अख़बार और चैनेल इस संस्थान का आदेश बहुत ही विनम्रता से मानते हैं.यह एक ऐसा संस्थान है जो भारतीय प्रेस की रक्षा और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा...दोनों को सुनिश्चित करने के लिए लम्बे समय से अपना दायित्व निभाता चला आ रहा है. यह परिषद प्रेस से या फिर प्रेस के खिलाफ प्राप्त शिकायतों का निपटारा करते वक्त चेतावनी दे सकती है, निंदा कर सकती है और सबंधित पत्रकार के आचरण को गलत भी ठहरा सकती है. इस महान संस्थान के गौरव और सम्मान का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस के निर्णय को किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती. इसका कार्यभार चलाने के लिए सरकार काफी वित्तीय सहायता पर्दान करती है पर फिर भी सरकार का इस पर कोई नियंत्रण नहीं होता. भारतीय प्रेस परिषद को पूरी पूरी स्वतंत्रता भी दी गयी है. इस के सम्मान और अधिकारों की चर्चा समय समय पर पहले भी हो चुकी है. गौरतलब है कि  इसकी स्थापना 1966 में भारतीय संसद की ओर से की गयी थी हालांकि इसकी आवश्यकता को बहुत पहले ही अनुभव कर लिया गया था.
     इस संस्थान के गौरव ओर निशानों कि चर्चा करते हुए एक  मज़बूत आवाज़  पहले भी बुलंद  हुई थी- 
मीडिया को भटकने से रोकना होगा-- इस आशय की बात करते हुए कुछ ही  समय पूर्व ही तहलका ने भी कहा था--करवाई तो करनी पड़ेगी. पर कुल मिलाकार हालत बिगड़ती चली गयी. शायद इसी का परिणाम है कि आखिर  मीडिया पर खबरों से खिलवाड़ करने का आरोप लगने के बाद मीडिया आयोग बनाने की बात को अस्तित्व में लाने कि तैयारियन तकरीबन तकरीबन पूरी हो चुकी हैं.

लेकिन वास्तव में मामला अब बहुत ही गंभीर हो चुका है. जिस संस्थान के सामने सरकार भी नतमस्तक है ओर मीडिया भी अब उसे चुनौती मिल रही है. वह भी उन लोगों से जो खुद को पत्रकार भी कहते हैं. इस तरह के लोगों को सहयोग ओर सहायता दे रहे हैं वे लोग जो सरकार के प्रतिनिध भी हैं. अपने आपको पत्रकार कहने वालों ने इस सम्मानीय संस्थान को ठेंगा दिखाते हुए एक तरह से इसका  मजाक उड़ाना शुरू कर दिया है. प्रेस कौंसिल के नाम का दुरपयोग एक आम बात होती जा रही है. इसे रोकने के लिए कदम उठाने की बजाये  सरकार के प्रतिनिध  खुद इस तरह के कार्यक्रमों में शामिल हो कर बाकायदा अनुदान भी दे रहे हैं. कभी इस तरह के आरोप  भोपाल ओर दूसरे स्थानों पर आधारित सभा सोसाईटियों पर लगते थे पर अब इस तरह की उंगलियां लुधियाना की तरफ भी उठ रही हैं. स्थानीय पार्षद और राज्य स्तर के मंत्री इन कार्यक्रमों में शामिल हो रहे हैं. इसकी ताज़ा मिसाल मिली एक कार्यक्रम में.प्रस्तुत है एक प्रमुख समाचारपत्र में प्रकाशित हुई सचित्र रिपोर्ट.  
                                              --रैक्टर कथूरिया 


Sunday, February 21, 2010

करो तलाश तो हर बात नज़र आती है...!


केवल एक ही परीक्षा पर काम आने वाले कागज़ का उत्पादन करने के लिए ही कम से कम 15 पेड़ों को मिटा दिया जाता है. उन पेड़ों को जो हमें फल देते हैं, कड़कडाती हुई  धुप में छाया देते हैं, और बहुत से कामों में आने वाली लक्कड़ी देने के  साथ साथ हमारे पर्यावरण को प्रदूषित होने से भी बचाते हैं. पर इन सब का सिला हम दे रहे हैं उनका नामो निशान मिटा कर. एक रिपोर्ट के मुताबिक केवल एक पेड़ 20 एयर कंडीशनरों का मुकाबला कर सकता है. लेकिन फिर भी पेड़ों का कत्लेआम का  सिलसिला लम्बे समय से जारी है. इसकी जानकारी मुझे  एक ऐसी सोशल साईट पर भी मिली जिसे बहुत से लोग छुप छुप कर देखते है, पता नहीं क्यूं ?. इस मुद्दे का विस्तृत विवरण देने वाली इस कम्युनिटी का नाम था--SAY NO TO EXAMS ! अर्थात परीक्षा से इंकार करो. इस तरह की  जानकारी मिलने के बाद कुछ और गहरायी से देखा तो पता चला कि यहां बहुत कुछ ऐसा है जो बेहद महत्वपूर्ण है.
 बिछड़े हुए लोगों को खाबों में मिलने की तमन्ना करते हुए कई बार सुना. किताबों से या विद्वानों से ज्ञान की प्राप्ति को भी कई बार महसूस किया. अनोखी और अजीब बातों का संसार भी कई बार टी वी पर देखा और कई बार अख़बारों या पत्र पत्रिकायों में. पर अब यह सब कुछ सोशल साइटों पर भी बहुत ही आसानी से सम्भव है. मेरे बहुत से दोस्त ऐसे थे जिन्हें हालात की आंधियों ने भुला दिया या दूर कर दिया. किसी का अता पता बदल गया और किसी का फोन नम्बर. इन्हें मिलने की कोई आशा तो अब भी थी पर यकीन कभी हो नहीं पाया था. अभी हाल ही में स्वास्थ्य सुधारने के लिए मजबूरन काम से छुट्टी लेनी पड़ी तो सोचा कि क्यों न इन साईटों का रंग ही देख लिया जाये. पर जल्द ही यह सब एक एडिक्शन की तरह लग गया. लोग मजाक करने लगे--अरे भाई लो आप भी गए काम से.
लेकिन यह एक ऐसा नशा साबित हुआ जिसमें अगर कुछ नुकसान या खतरे हैं भी तो फायदे भी कम नहीं हैं.. एक ऐसी ही साईट पर एक से बढ़ कर एक दिलचस्प मामला नज़र आया. पहली नज़र से देखने पर जो कुछ और लगता था पर वास्तव में होता कुछ और ही था. इसे कुछ ही पल देखने से पता चला कि इंटरनैट की रंगीन और हसीन में  इस दुनिया में शहीद भगत सिंह भी है, आतंकवादियों के हाथों शहीद हुए पंजाब के शायर अवतार पाश की चर्चा भी,  शिरडी के साईं बाबा भी, श्री श्री आनंदमूर्ति  भी,  सिख धर्म भी, हिंदी ब्लोगरों की चर्चा भी और बहुत कुछ और भी. यहीं पे बस नहीं यहाँ साहित्य भी है और पत्रकारिता भी. नए पुराने गीतों की चर्चा भी और गीत संगीत की भी. मिर्ज़ा ग़ालिब भी और फैज़ अहमद फैज़ भी. इस क्षेत्र में एंटी पोर्नो भी है और एंटी स्मोकिंग भी. ऑरकुट में सरगरम रहने वाले बहुत से लोग अब फेस बुक पर नज़र आने लगे हैं. यानि कि जो चाहो सो पायो, मिलेगा सब कुछ मर्ज़ी अब आपकी है.                                                                      --रैक्टर कथूरिया

                      
पोस्ट लिखने के बाद याद आया इस सोशल साईट में से ही एक छोटी सी रचना का उल्लेख:

ANIL

SAVE BHARAT

भारत
* "आंसू टपक रहे है , भारत के बाग से .
* शहीदों की रूहे लिपट के रोती है , हर खासो आम से .
* अपनों ने बुना था हमें भारत के नाम से .
* फिर भी यहाँ जिंदा है हम , गैरों के दिए हुए नाम इंडिया से ."
सुविचार
* जो तर्क को अनसुना कर दे , वह कहर है .
* जो तर्क ही नहीं कर सके , वह मूर्ख है .
* और जो तर्क करने का साहस ही नहीं दिखा सके वह , गुलाम है.
माँ और भारत माता
* माँ तब भी रोती थी, जब बच्चा रोटी नहीं खाता था ?
* माँ अब भी रोती है, जब बेटा रोटी नहीं देता ?
* भारत माता तब भी रोती थी, जब बेटे गुलाम थे ?
* भारत माता अब भी रोती है, जब बेटे उसे Mother India कहते है ?
अब तो भारत कहो
* जिसको न निज गौरव तथा निज देश पर अभिमान है .
* वह नर नहीं , वह पशु निरा है , और मृतक समान है .
रास्त्रकवि श्री मैथिलीशरण गुप्तजी
हमारे देश का नाम हिंदी में भारत है,
इसलिए ये इंग्लिश में भी BHARAT ही होगा ना की INDIA.
This is not a joke.
SAY BHARAT NOW
http://saybharatnow.hpage.com/
http://www.petitiononline.com/A01010/petition.html