Friday, December 24, 2010

कुछ राज़ की बातें

कुछ मित्रों का संदेश देखने के लिए फेसबुक पर गया तो वहां अचानक ही मुलाक़ात हुई मनसा आनंद जी से उनकी पोस्ट का शीर्षक बहुत तेज़ी से बुला रहा था. लिखा था  सोना सर्वाधिक प्राण ऊर्जा को अपनी और आकर्षित करता है. बात पते की मालुम होती थी. यूं लगा आज पहली बार रहस्य खुला कि लोग सोने के पीछे पागल क्यूं होते हैं. पूरा लिंक खोला तो सामने सचमुच इसी रहस्य की बात थी. विस्तार से लिखा था.   सोना एक मात्र धातु है जो सर्वाधिक रूप से प्राण ऊर्जा को अपनी तरफ आकर्षित करता है। और यही सोने  का मुल्‍य है, अन्‍यथा कोई मुल्‍य नहीं है। 
इसलिए पुराने दिनों में, कोई दस हजार साल पुराने रिकार्ड उपलब्ध है, जिनमें सम्राटों ने प्रजा को सोना पहनने की मनाही कर रखी थी। कोई आदमी दूसरा सोना नहीं पहन सकता था। सिर्फ सम्राट पहन सकता था। उसका राज था कि वह सोना पहनकर दूसरे लोगों को सोना पहनना रोककर ज्‍यादा जी सकता था। लोगों की प्राण ऊर्जा को अनजाने अपनी तरफ आकर्षित कर सकता था। जब आप सोने को देखते है। तो सिर्फ सोने को देखकर आकर्षित नहीं होते, आपकी प्राण ऊर्जा सोने की तरफ बहनी शुरू हो जाती है। इसलिए आकर्षित होते है। 
इसलिए सम्राटों ने सोने का बड़ा उपयोग किया और आम आदमी को सोना पहनने की मनाही कर दी गई था। कि कोई आदमी सोना नहीं पहन सकता है। इस सम्बन्ध में और पढ़ने के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं और पहुंच सकते हैं ज्ञान की मंज़िल पर जहां आपको मिलेंगे सोने के साथ साथ बहुत सी और चीज़ों के राज़...वो भी बिलकुल सीधी-साधी भाषा में.ओशो सत्संग पर इस तरह की ख़ास ख़ास बातें पोस्ट करने वाले आनंद प्रसाद कहते हैं," ओशो की किरण जीवन में जिस दिन से प्रवेश किया, वहीं से जीवन का शुक्‍ल पक्ष शुरू हुआ, कितना धन्‍य भागी हूं ओशो को पा कर उस के लिए शब्‍द नहीं है मेरे पास.....अभी जीवन में पूर्णिमा का उदय तो नहीं हुआ है। परन्‍तु क्‍या दुज का चाँद कम सुदंर होता है। देखे कोई मेरे जीवन में झांक कर। आस्‍तित्‍व में सीधा कुछ भी नहीं है...सब वर्तुलाकार है , फिर जीवन उससे भिन्‍न कैसे हो सकता है।
कुछ अंबर की बात करे,


  • कुछ धरती का साथ धरे।
    कुछ तारों की गूंथे माला,
    नित जीवन का एहसास करे।। 
    अपने इसी मंच से वह अक्सर ही बताते हैं बहुत सी पते की बातें. उन्होंने बताया कि कैसे होता है....वृक्षों का भी संवेगों और भावनाओं को महसूस करना वृक्षों के संवेगों पर, भावनाओं पर। वह बड़ा हैरान करने वालो प्रयोग हुआ। पहले किसी नह सोचा भी नहीं था कि वृक्षों में संवेग हो सकते है। महावीर के बाद जगदीश चंद्र बसु तक बात ही भूल गई थी। 
    चित्र साभार: स्पिरिट ऑफ़ ट्री 
    फिर जगदीश चंद्र बसु ने थोड़ा बात उठाई कि वृक्षों में जीवन है। लेकिन बसु भी धीरे-धीरे विस्‍मृत हो गए। विज्ञान से यह बात ही खो गई। इसकी चर्चा ही बंद हो गई। अभी अमरीका में फिर पुन: एक नया उद्भव हुआ, आकस्‍मिक हुआ। दुनिया की बहुत सी खोजें आकस्‍मिक हुई है। जो वैज्ञानिक काम कर रहा था वह किसी और दृष्‍टि से काम कर रहा था। लेकिन खोज में उसको यह अनुभव हुआ कि वृक्षों में कुछ संवेदनाएं मालूम होती है। तो उसने वृक्षों में महीन तार जोड़े और यंत्र बनाए देखने के लिए कि वृक्ष भी कुछ अनुभव करते है। तो तुम अगर वृक्ष के पास जाओ कुल्‍हाड़ी लेकिर तो तुम्‍हें कुल्‍हाड़ी लेकिर आता देखकर वृक्ष कंप जाता है। अगर तुम मारने के विचार से जा रहे हो, वृक्ष को काटने के विचार से जा रहे हो तो बहुत भयभीत हो जाता है। अब तो यंत्र है जो तार से खबर दे देते है। 
    नीचे ग्राफ बन जाता है। की वृक्ष कांप रहा है कि नहीं। घबड़ा रहा है, बेचैन हो रहा है, तुम्‍हें कुल्‍हाड़ी लिए आता देख कर। लेकिन अगर तुम कुल्‍हाड़ी लेकर जा रहे हो, और आप का काटने का कोई इरादा नहीं है। कोई विचार नहीं है मन में। सिर्फ गुजर रहे हो वहां से तो वृक्ष बिलकुल नहीं यह तो बड़ी हैरानी की बात है। इसका मतलब यह हुआ की तुम्‍हारे भीतर जो काटने का भाव है, वह वृक्ष को संवादित हो जाता है। फिर जिस आदमी ने वृक्ष काटे है पहले, वह बिना कुल्‍हाड़ी के भी निकलता है तो वृक्ष  कंप जाता है। क्‍योंकि उसकी दुष्‍टता जाहिर है। उसकी दुश्‍मनी जाहिर है।  
    चित्र साभार: किंग बैग 
    लेकिन जिस आदमी ने कभी वृक्ष नहीं काटे है, पानी दिया है पौधों को जब वह पास से आता है तो वृक्ष प्रफुल्‍लता से भर जाता है। उसके भी ग्राफ बन जाते है। कि वह कब प्रफुल्‍ल है, कब प्रसन्‍न है कब परेशान है, भय भीत है। और वैज्ञानिक अद्भुत आश्‍चर्यजनक निष्‍कर्षों पर पहुंचे है कि एक वृक्ष को काटो तो सारे वृक्ष बग़ीचे के कंप जाते है। पीड़ित हो जाते है। और एक वृक्ष को पानी दो तो बाकी वृक्ष भी प्रसन्‍न हो जाते है—जैसे एक समुदाय है। इससे भी गहरी बात जो पता चली है, यह कि एक वृक्ष के पास बैठ कर तुम एक कबूतर को मरोड़ कर मार डालों, तो वृक्ष कंप जाता है। जैसे कबूतरों से भी बड़ा जोड़ है। जैसे सारी चीजें जुड़ी है संयुक्‍त है। होना भी ऐसा ही चाहिए, क्‍योंकि हम एक ही आस्‍तित्‍व की तरंग है। सागर तो एक है, हम उसकी ही लहरें है। एक लहर वृक्ष बन गई एक लहर पशु बन गई, एक लहर मनुष्‍य बन गई। लेकिन हम सब भीतर जुड़े हुए है। इस तरह के बहुत से राज़ जानने के लिए आप केवल एक क्लिक करके जा सकते हैं ओशो सत्संग  पर.

1 comment:

वन्दना said...

आपकी अति उत्तम रचना कल के साप्ताहिक चर्चा मंच पर सुशोभित हो रही है । कल (27-12-20210) के चर्चा मंच पर आकर अपने विचारों से अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.uchcharan.com