Saturday, July 10, 2010

मां....

हिंदी में साहित्य रचना पूरे जोरशोर से जारी है. गहरी गहरी संवेदनापूर्ण  बातें करतीं हुईं. इस तरह की एक कविता दिखी एक सोशल साईट पर जिसे लिखा था मधु गजधर ने. लम्बे से चुपचाप साहित्य सृजन में जुटी मधु गजधर रेडियो टीवी के साथ साथ वेब पत्रकारिता में भी तेज़ी से आगे बढ़ रही है. फिलहाल देखिये एक कविता:  मां....
उस मासूम का जन्म मुझे पत्नी से माँ तो बना गया लेकिन ,
माँ बनने के बाद फिर कुछ और बनने की कभी चाहना ही ना रही,
एक संतोष ,एक गर्माहट सी उतर आई थी जीवन में ,
उस के नन्हे हाथों की छुअन आज भी मेरे गालों पर जिन्दा है ,
जिसे हर दिन नहाते वक्त पानी से भी बचाया है मैंने ,
उस की किलकारी ने नए संगीत को जन्माया है भीतर मेरे,
उस की तुतलाहट ने नए शब्दों का अर्थ उतारा है मेरे जीवन में,
उस के पीछे दौड़ते मैंने तितलियों की दुनिया को एक बार फिर से देखा है ,
और उस के साथ जिया है मैंने खरगोश की छुअन ओर चिडियायौ की चचहाहट को,
दूध को "दूद्दू" ,मुंह को "मुइयाँ" कहते हुए उसे बड़े होते देखा है मैंने,
वो मेरी आँख का तारा ,मेरे कलेजे का टुकड़ा मेरे मातृत्व का सौभाग्य चिन्ह,
आ !मेरे बेटे मैं तुझ पर अपनी उम्र ,अपनी खुशियाँ अपनी दुआएं न्यौछावर कर दूं,
हर बुरी नज़र से बचाने के लिए अपनी आँख के पुतली की कालिमा से ,
आ तेरी माथे पर एक छोटा सा नज़र का टीका रख दूं,
और सुन ..........................
मेरे बच्चे !.........
इस दुनिया में तू कुछ इस तरह से जिंदगी जीना
कि लोग जब तुझे देखें तो उन्हें मेरी भी याद आ जाए,
और वो कहें................................................
कि हाँ एक माँ थी कभी ,जिसने जन्मा था इस सपूत को,
आज वो माँ ना रही जिन्दा इस दुनिया में तो क्या है ,
वो माँ अपनी ही रची इस रचना में मर कर भी तो कहीं जिन्दा है,
उस माँ की अपनी इस निशानी में ,उस माँ की ही अपनी कहानी है ,
लोग कहते हैं कि माँ जन्म देती है अपनी औलाद को ,
सच तो ये है कि औलाद ही गढ़ती है अपनी माँ के किरदार को,
औलाद ही जन्म नहीं लेती ,लेती है जन्म एक माँ भी .....
.........मधु गजाधर
27 June 2010

इसी तरह सुप्रसिद्ध साहित्यकार गजानन माधव मुक्तिबोध की पत्नी श्रीमती शांता मुक्तिबोध को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए उनके जीवन संघर्ष की कई यादों को ताज़ा किया है संजीव तिवारी ने आरम्भ पर जो आज के विचलित मानव की जीने की एक नयी प्रेरणा और ऊर्जा देती हैं. हाल ही में भरत बंद हुआ तो एक बार फिर बहुत सी यादें ताज़ा ही गयीं उस युग की जब सब कुछ थम सा गया था. लेकिन यही समय एक क्रांति का संदेश लेकर भी आया. अब यह बात अलग है की यह नयी क्रांति और नयी आज़ादी भी कहीं गुम हो गयी थी. पर इस बार जो भारत बंद हुआ तो उसे एक नए नजरिये से देखा रंजीत कुमार ने. इस नए नजरिये को व्यक्त कर रही कविता को आप पढ़ सकते हैं हिंदी कुञ्ज के नए अंक में में केवल यहां कलिक करके. इसके साथ ही आपको पहले ही मिल चुकी एक खुशखबरी की चर्चा कर रहे हैं जनोक्ति परिवार के अमित कुमार मीत. देखिये कैसा लगा बाबा की गुफा में मोबाईल. ब्लॉगजगत में काफी नाम कम चुके रांचीहल्ला ने इस क्षेत्र को और भी अधिक अर्थपूर्ण  बनाने के लिए बहुत कुछ किया है. अब अपनी नयी पोस्ट पोस्ट में है एक कविता :
उम्र भर लिखते रहे,हर्फ़-हर्फ़ बिखरते रहे
बस तुझे देखा किये,आँख-आँख तकते रहे....!!
उम्र भर लिखते रहे.....
कब किसे ने हमें कोई भी दिलासा दिया
खुद अपने-आप से हम यूँ ही लिपटते रहे....!!
उम्र भर लिखते रहे.......
इसे पूरा पढ़े बिना तो आप इसका आनंद नहीं उठा पायेंगे.

हमने बात शुरू की थी मधु गजधर जी की एक कविता से सो वहीँ आते हैं. उन्हों ने अपनी एक नयी पोस्ट में कहा:

मंजिलें भी वही हैं और रास्ते भी सभी अपने पहचाने से हैं,
हम ही ना जाने क्यों अब चलते चलते थक से गए हैं . 


टिप्पणी में  जो कुछ कहा गया उसके जवाब में मधु जी का जवाब भी बहुत ही अर्थपूर्ण है. देखिये आप भी  इसे पढ़ कर  इसके अर्थों  को महसूस  कीजिये,"मैं मानती हूँ ऐसा नहीं होना चाहिए ...लेकिन कुछ लोग ऐसे हैं जो आज उम्र होने पर अपने ही घर में सिकुड़े सिमटे बैठ है ...मानो बुढ़ापा उन का एक अपराध है और अपने ही बच्चों से मुहं चुरा रहे है ...बेटे की एक घुड़की से सहम जाते है ...ये दो लाइने उन लोगों के दर्द को समझ कर मेरी कलम से उभरी हैं ..मैं मारीशस में एक सोशल वर्कर भी हूँ ...मुझे लोगों को नजदीक से देखने... उन की पीड़ा को समझने की मालिक ने शक्ति दी है पर फिर भी कुछ दुःख इतने भारी हैं की उन्हें सुन कर मैं स्वयं दुखी हो जाती हूँ |ना जाने कितनी बार मैं स्वयं रोई हूँ उन के लिए ...एक बुजुर्ग पत्नी की मर्त्यु के बाद अपनी ही मेहनत की कमाई से बनाए अपने ही घर में घुट घुट कर रहे....वो ही घर ,वो ही बच्चे ...घर पर अब बेटे का शासन है और उस के राज्य में अब वो एक पुरानी व्यर्थ की चीज बन कर रह गए है ...परमात्मा से अपने लिए मर्त्यु मांग रहे है क्योंकि अब अपने जीवन को ढोते ढोते थक गए है....आप सब कृपया उन के लिए दुआ करना ...." आपको यह प्रस्तुती कैसी लगी अवश्य बताएं.--रेक्टर कथूरिया

1 comment:

madhu said...

स्नेही कथूरिया जी , एक बार आपने फिर मुझे निशब्द कर दिया है ,पंजाब स्क्रीन के इतने बड़े मंच पर आपने मुझ जैसी साधारण स्त्री को पंहुचा कर मुझे भाव विव्हल कर दिया है | पंजाब स्क्रीन के इतना बड़े परिवार में आप की अनुकम्पा से जो एक छोटी सी जगह मुझे मिली है मैं इस के लिए आप की आभारी हूँ और इस वृहद परिवार का एक हिस्सा बन कर आज स्वयं को गौरवान्वित पाती हू... See moreँ | मैं यहाँ ये भी कहना चाहूंगी की मैं कोई लेखिका या कवियत्री नहीं हूँ ...ये समय समय पर हिर्दय की गहराई से उमड़ने वाले वो भाव हैं जो मुझे बार बार अन्दर से मजबूर करते है की " हमें बाहर निकालो अन्दर अब हमारा दम घुट रहा है " और बाहर निकल कर वो भाव क्या रूप लेते है ,कितना आप के मन प्राण को छू पाते है ये सब मैं अपने बहुमूल्य पाठक गण पर छोड़ देती हूँ | मैं जीवन के किसी भी क्षेत्र में किसी भी प्रकार की प्रशंसा की हकदार अपने को नहीं पाती | मैंने इतने अच्छे लेखकों को पढ़ा है की उन्हें पढ़ कर हर बार मैं ठगी सी रह गयी हूँ..की उफ़ इतने गहरी पकड़, इतना गहरा भाव..| उन्हें पढ़ कर हफ़्तों तक स्वयं कलम उठाने की हिम्मत भी नहीं कर पाती |पर मालिक ने आप जैसे सज्जन लोगों से पहचान करवा कर प्रेरणा और हिम्मत का एक स्तम्भ जरूर दे दिए है |उसी आधार पर मैं कहना चाहूगी की मुझे एक ललक है अपने लेखन पर आप सब की स्वस्थ आलोचना की जो मुझे मेरी त्रुटियाँ बताए और मुझे सुधार का मौका दे ,मेरी प्रतियोगिता मेरे अन्दर के "मैं " से है | जो मैंने आज किया मेरे कल का कार्य उस से बहतर होना चाहिए | मैं पंजाब स्क्रीन के सभी अपनों को अपनी श्रधा और सम्मान समर्पित करते हुए आप सब के शुभ और मंगल की प्रार्थना करती हूँ और गुजारिश करती हूँ की आप सब अपनी दुआओं में कभी कभी मुझे याद कर लेना ...मैं भारत से भोगोलिक दृष्टिकोण से बहुत दूर हूँ पर मेरा मन मेरी आत्मा सदा भारत और भारत के अपने लोगों के इर्द गिर्द ही घूमती रहती है ..