Saturday, April 12, 2014

श्री मद भागवत कथा के संदर्भ में प्रचार सामग्री जारी

Sat, Apr 12, 2014 at 3:23 PM
अवध पब्लिक वेल्फेयर सोसाईटी द्धारा विशेष आयोजन 
लुधियाना: 12 अप्रैल 2014: (राजेश मिश्रा//पंजाब स्क्रीन): 
अवध पब्लिक वेल्फेयर सोसाईटी द्वारा शिव मन्दिर गली न.5 प्र्ताप नगर के सहयोग से इस बार 13 अप्रैल से लेकर 20 अप्रैल तक चलने वाली श्री मद भागवत कथा के प्र्चर प्र्सर हेतु कैलंडर ,पोस्टर, निमंत्रण पत्र आदि सामग्री मन्दिर प्रागण में सोसाईटी तथा मन्दिर के प्र्धान श्री पी.एन.पाठक व राम रूप शुक्ल ने जारी की इस अवसर पर मन्दिर में उपस्थित सोसाईटी तथा मन्दिर के सदस्यो को संबोधित करते श्री.पी.एन.पाठक ने कहा की शिव मन्दिर में इस बार 13 अप्रैल से लेकर 20 अप्रैल तक श्री मद भागवत कथा आयोजित की जा रही है जिसमे प्रमुख संत ब्यास पीठ स्वामी दयानंद सरस्वती जी महाराज अपनी संगीतमय कथा द्वारा श्र्धालुयो को रसभोर करेगे कथा रोजाना साय.7 बजे से आरम्भ होगी 13 अप्रैल को मन्दिर से ही शोभा यात्रा आरम्भ होगी जिसमे भारी संख्या में लोग शामिल होगे इस कथा में मुख्य अतिथि पुर्वांचल समाज के संरक्षक व उद्योगपति श्री टी.आर.मिश्रा, दिनेश तिवारी होगे 20 अप्रैल को अमृतमय भंडारा होगा जिसके लिए सदस्यो को जिमेवारी दी गई इस अवसर पर मन्दिर संरक्षक रघुवंशमणि शर्मा , ए.के.त्रिपाठी ,सुखराम आज़ाद ,राम क्रिशन पांडे ,राम रतन शुक्ल ,राजेश मिश्रा ,संतोष वर्मा ,अम्बिका प्र्साद पांडे , मानिक राम तिवारी ,राज बहादुर सिंह ,मदन लाल चावला ,कुल्दीप शर्मा , नंद किशोर शर्मा , जीया लाल वर्मा ,जगजीवन तिवारी आदि शामिल रहे

Wednesday, April 09, 2014

“आप” प्रत्याशी फूल्का को जगराओं रैली में मिला भारी समर्थन

लोगों के साथ ज़मीन पर बैठे लोकसभा प्रत्याशी फूलका 
लुधियाना, 9 अप्रैल 2014: (रेकटर कथूरिया/पंजाब स्क्रीन):
आम आदमी पार्टी के लुधियाना से प्रत्याशी एडवोकेट हरविंदर सिंह फूल्का ने आज जगराओं विधान सभा में पड़ते विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों का सघन दौरा कर चुनाव प्रचार किया। श्री फूल्का ने रोड शो को अखाडा से प्रारम्भ कर रंधीरगढ़, भामिपुर कलां, बासुवाल, मानुके, ह्थूर, चकर, माला, रसूलपुर, दंगियाँ, कायोंके कलां, अगवाड़ लोपो, लेह्दी भानी होते हुए जगराओं में समाप्त किया। भरी दोपहरी  में आयोजित इस रोड शो के दौरान श्री फूल्का को स्थानीय लोगों का भारी सहयोग और समर्थन मिला। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय नागरिकों को संबोधित करते हुए श्री फूल्का ने कहा कि किसानों के द्धारा जिस कर का भुगतान सरकार को किया जाता है उस कर का खर्च ग्रामीण क्षेत्रों के विकास पर ही होना चाहिए। पंजाब के ग्रामीण क्षेत्र मूलभूत सुविधाओं से अभी तक वंचित हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में पानी, स्वास्थ्य और बिजली कि मूलभुत सुविधाओं का आभाव है जिसके कारण ग्रामीण क्षेत्र के लोग शहरी क्षेत्रों के लोगों से कई मायनों में पिछड़े हुए हैं। अंत में पत्रकारों को संबोधित करते हुए श्री फूल्का ने कहा, वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में परिवर्तन लाना आज के समय की मांग है, अगर पंजाब की, पंजाब के लोगों की तरक्की और खुशहाली यहाँ के लोग चाहते हैं तो उन्हें हर हाल में वर्तमान भ्रष्ट राजनीतिज्ञों को सदा के लिए सत्ता से बाहर करना होगा, उन्होंने आम लोगों से भी अपील की है कि आम आदमी पार्टी का खुल कर साथ दें और पंजाब के साथ साथ देश को खुशहाल बनाने में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दें। 
गौरतलब है कि हर जगह लोग उनसे ऐसे मिलने आते जैसे उनके गहर परिवार का कोई देर से बिछड़ा आत्मीय व्यक्ति किसी लम्बी विदेश यात्रा से लौटा हो। न कहीं कोई औपचारिकता--न ही कोई अन्य ड्रामेबाज़ी---बस कुछ लोगों की आँखों में आंसू थे।  पूछने पर कुछ देर बाद बोले अब लगता है उनके दुखों का अंत होगा। उनकी भी सुबह आयेगी। कुछ लोगों की आँखों में शोले थे। कह रहे थे अबकी बार हम सब बदल देंगें। 

अब पहरावों पर भी चढ़ा चुनावी रंग

गोशा की देखरेख में बंटीं अयाली और मोदी की तस्वीर छपी टीशर्टें
लुधियाना:: 9 अप्रैल 2014: (रिपोर्ट- रेकटर कथूरिया//हरदीप हरजस और कैमरा-मोहन लाल):
गर्मी के सीज़न में लुधियाना की रैडीमेड होलसेल मार्कीट अकालगढ़ मार्कीट में एक होलसेल टी-शर्ट विक्रेता ने तैयार करवा मुफ्त बांटी और बिकने के लिए भी रखीं। एक पर पार्टी चुनाव चिन्न तकड़ी और कमल  के साथ मनप्रीत अयाली की तस्वीर है जबकि दूसरी पर मनप्रीत अयाली के साथ भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की तस्वीर है। अकाली और भाजपा समर्थक परिवारों के युवक इन टीशर्ट पर टूट पड़े। देखते ही देखते पहला लाट समाप्त हो गया।  कीमत 100/-रूपये प्रति शर्ट थी। इस अवसर पर सियासी नारे भी लगे। लोगों ने मनप्रीत अयाली के साथ साथ नरेंद्र मोदी ज़िंदाबाद के नारे भी लगाये और ये भी कि गोशे तेरी सोच ते पैहरा दियांगे ठोक के। इस पर श्री गोशा ने उन्हें नारेबाज़ी से रोका और पंथ व जनता की जय जयकार करने को कहा। पूरी मार्किट के माहौल में एक नया उत्साह और जोश था। यूं लग रहा था जैसे यहां टीशर्टों का लंगर लगा हो। 
टी-शर्ट के सीज़न और चुनावी मौसम के चलते लुधियाना के एक होलसेल टी-शर्ट विक्रेता ने गर्मी के मौसम और लोक सभा चुनाव को मद्देनज़र रखते हुए अच्छा खासा नाम भी कमाया और कारोबार भी। इस व्यापारी ने राजनीतिक पार्टियो के चुनाव चिन्न और उनके नेताओं के फोटो वाली टी-शर्ट त्यार की हैं। टी-शर्ट पर अकाली-भाजपा के राजनेताओं की फोटो को आकर्षिक रंगों में बनाया गया है। एक टी-शर्ट पर प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी सहित लुधिआना लोकसभा सीट से शिरोमणि अकाली दल और भारतीये जनता पार्टी के सांझे उम्मीदवार मनप्रीत सिंह अयाली के किसी रैली में हँसते हुई मुद्रा में फोटो लगे हुए हैं तथा दूसरी 
एक अन्य रंग-बिरंगी टी-शर्ट पर दोनों पार्टिओं के चुनाव चिन्न और मनप्रीत सिंह अयाली का फोटो है जिसपर लिखा है के मनप्रीत सिंह अयाली हम तुम्हारे साथ हैं। होलसेल टी-शर्ट विक्रेता गुरदीप सिंह गोशा ने बताया के गर्मी के सीज़न और चुनावी दिनों के चलते उन्होंने और अकालगढ़ मार्कीट प्रधान मनप्रीत सिंह बंटी ने मिलकर यह टी-शर्ट तयार करवाई हैं। उन्होंने अकाली-भाजपा उम्मीदवार और नरेंद्र मोदी की बढ़ती लोक-प्रियता के चलते यह टी-शर्ट की बहोत डिमांड है। उन्होंने बताया के पहले भी वह कुछ शर्ट कर समर्थको को बाँट चुके हैं जिसके बाद अब डिमांड को देखते हुए उन्होंने आज 1000 के करीब टी-शर्ट मुफ्त बांटी है। मुफ्त टी-शर्ट छोड़ कुछ युवा अपने पसंदीदा नेता की फोटो वाली टी-शर्ट खरीदते भी नज़र आये।उन्होंने बताया को दिल को सम्भालने वाले सीने पर इस टीशर्ट का अर्थ ही यही है कि वह किसे अपना नेता मानते हैं और किस से प्रेम करते हैं।  राजननीतिक पार्टियो के चुनाव चिन्ह और राजनेताओं के फोटो वाली इन टी-शर्ट को पहनने वाले समर्थको का भी मानना है के आज परधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी ही देश की सबसे पहली पसंद है और नरेंद्र मोदी को जिताने के लिए वेह अपने लोकसभा क्षेत्र से अकाली-भाजपा के सांझे उम्मीदवार मनप्रीत सिंह अयाली को जिताकर लोकसभा में भेजेंगे तांकि वह नरेंद्र मोदी को वोट कर देश का अगला प्रधानमंत्री चुनने में अपना योगदान दे सकें। 

Thursday, April 03, 2014

माणेकशॉ हमारे दौर के सबसे रहस्यमय व्यक्तित्वों में से एक

03-अप्रैल-2014 15:35 IST
सैम बहादुर-कर्मयोगी फील्ड मार्शल और मौत से उनकी मुलाकात
फीचर//रक्षा                                                                          --तरूण कुमार सिंगा*
फील्ड मार्शल सैम हॉरमसजी फ्रामजी जमशेदजी माणेकशॉ हमारे दौर के सबसे रहस्यमय व्यक्तित्वों में से हैं। 
     सैम बहादुर के नाम से लोकप्रिय - उन्हें इस नाम से एक गोरखा सैनिक ने पुकारा था, जो उनका कठिन पारसी नाम बोल पाने में असमर्थ था। सैम शब्द का अर्थ - निर्भय है और उनका यह नाम आज तक याद है।
     सैम ने कई अवसरों पर मौत को चकमा दिया था, जंग के मैदान और उससे परे भी। हालांकि वे 90 वर्ष से ज्यादा जिए। सैम अपने मिलिट्री डॉक्टर पिता की तरह डॉक्टर ही बनना चाहते थे, लेकिन वे फील्ड मार्शल के पद तक पहुंचे।
     सन 1942 में नौजवान कैप्टेन के रूप में बर्मा में तैनाती और जापान के साथ जंग के दौरान वे गंभीर रूप से घायल हो गए। नौ गोलियां उनके शरीर को छलनी कर गईं। जब वे मौत से संघर्ष कर रहे थे, तो उनके जांबाज सिख अर्दली सिपाही शेर सिंह ने आकर उन्हें मौत के मुंह से बचा लिया।
     उनकी पलटन के जांबाज सिख जवानों ने घोषणा की थी : " कैप्टेन माणेकशॉ हमारे सिर का ताज हैं और उन्हें किसी भी कीमत पर बचाना होगा"। सैम का अर्दली शेर सिंह उन्हें अपनी पीठ पर लाद कर काफी दूर स्थित चिकित्सा सहायता चौकी तक ले गया, जहां सेना के डॉक्टरों ने प्राथमिकता से उनका इलाज किया।
     सैम माणेकशॉ को उनके अदम्य साहस के लिए मिलिट्री क्रॉस से नवाज़ा गया और वे 94 वर्ष की आयु तक जीवित रहे।
     अपने परिवार के सदस्यों और शुभचिंतकों से घिरे सैम ने नीलगिरी हिल्स के अपने कोन्नूर गृह - स्तवका में 27 जून, 2008 को इस दुनिया को शांतिपूर्वक अलविदा कह दिया।
     शुरूआती जीवन में लगी गंभीर चोटों के बावजूद सेहतमंद जिंदगी बिताने वाले सैम माणेकशॉ को जीवन के बाद के वर्षों में सांस की तकलीफ से निपटने के लिए चिकित्सा सहायता की जरूरत पड़ी। 
     उस समय मेजर जनरल बीएनबीएम प्रसाद, जो फेफड़ों से संबंधित विशेषज्ञ थे, को फील्ड मार्शल की देखभाल का दायित्व सौंपा गया।
     दोनों के बीच साधारण डॉक्टर - मरीज के रिश्ते से बढ़कर एक रिश्ता कायम हो गया, जो उनकी मौत तक और उसके बाद भी कायम रहा।
     मेजर जनरल प्रसाद जो अभी हाल तक कोलकाता में पूर्वी कमान के अस्पताल के कमांडेंट थे, फील्ड मार्शल के निधन तक उनके साथ थे। उन्होंने सैम की दृढ़ता, निडरता और तो और निधन से पहले के लम्हों की दुर्लभ जानकारी दी।
     सैम माणेकशॉ अक्सर अपने डॉक्टर को अपनी जिंदगी की कई कहानियां सुनाते थे, क्योंकि इलाज के दौरान दोनों ने काफी समय एक साथ बिताया था। वे अकसर अपनी पत्नी सिल्लू के बारे में बात करते थे, जिनका संक्षिप्त बीमारी के बाद 13 फरवरी, 2001 को निधन हो गया था।
     वे अपनी प्रिय पुत्रियों शैरी और माजा, दामाद डिंकी बाटलीवाला और धुन दारूवाला और नातियों के बारे में भी बताया करते थे। वे भी प्यार से उन्हें "सैम" कह कर ही पुकारते थे।
     सबसे बढ़कर, फील्ड मार्शल की बातचीत का पसंदीदा विषय हमेशा उनके प्रिय गोरखा जवानों के इर्दगिर्द घूमता था, जो उनके लिए परिवार से बढ़कर थे। ये गोरखा लोगों के साथ उनके प्यार का ही नतीजा था कि उनके घर और स्तवका की अलौकिक गरिमा को सैम की इच्छा के मुताबिक ही उऩके क्वार्टर में रहने वाले विश्वासपात्र गोरखा परिवारों द्वारा संजोकर रखा गया है। 
     मेजर जनरल प्रसाद को 1971 की याद आज भी ताजा है, जब वे मैसूर मेडिकल कॉलेज में पढ़ा करते थे। वह दौर देशभक्ति से ओत-प्रोत था। सैम बहादुर के रहस्यमय आभामंडल से प्रभावित "मेरे जैसे अनेक लोग अपने शुरूआती वर्षों में किसी अन्य क्षेत्र में शानदार करियर बनाने की जगह सशस्त्र बलों से जुड़ने के लिए प्रेरित हुए।"
     प्रसाद कहते हैं, "मैं 1977 में डॉक्टर के रूप में सेना से जुड़ा। मुझे उन्हें पहली बार देखने और सुनने का मौका 90 के दशक के आरंभ में देहरादून में भारतीय सैन्य अकादमी की पासिंग आउट परेड के दौरान मिला, जहां उन्हें नौजवान अधिकारियों को संबोधित करने के लिए आमंत्रित किया गया था।"
     मेजर जनरल प्रसाद को हालांकि अपने जीवन के इस महानायक से मिलने का अवसर पाने में पूरा दशक भर लग गया। यह मुलाकात वर्ष 2003 में उस वक्त हुई, जब फील्ड मार्शल नई दिल्ली में अपनी सांस की बीमारी का इलाज कराने सेना के अस्पताल ( रिसर्च एंड रैफरल) आए।
     मेजर जनरल प्रसाद याद करते हैं, "पहली निजी मुलाकात में मुझे उनके करिश्माई आकर्षण ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया। अस्पताल के गलियारों से जब वे धीमे-धीमे गुजर रहे थे, तो वे सभी की निगाहें उन्हीं पर टिकी थी। लोग उन्हें दम साधे देख रहे थे और उनकी उम्र तथा अस्वस्थता के बावजूद खामोश रहकर उनकी सराहना कर रहे थे।"
     "पिछले तीन दशकों से भारतीय सशस्त्र बलों में बतौर चिकित्सक तैनाती के दौरान मेरा वास्ता कई तरह के मरीजों से पडा है। कुछ बेहद अपेक्षाएं रखते थे, जबकि कुछ बहुत विनम्रता से बिना एक भी शब्द कहे मेरी सलाह को मानते थे। फील्ड मार्शल उन सबसे हटकर थे।"
     वे आखिर तक दृढ़ता लड़ते रहे।
     एक साल बाद मुंबई के एक होटल में रुके फील्ड मार्शल को एयर कंडीशनर की ठंडक के कारण सीने में गंभीर संक्रमण हो गया। उन्हें विमान से दिल्ली लाकर सेना के अस्पताल (आर एंड आर) पहुंचाया गया।
     "अस्पताल पहुंचने पर जब मैंने उनका मुआयना किया, तो मैंने पाया कि वे बहुत बीमार और कमजोर थे, वे बहुत मुश्किल से चल पा रहे थे।"
     अपनी बीमारी के बावजूद उन्होंने व्हील चेयर इस्तेमाल करने से बहुत शालीनता से इंकार कर दिया और छाती का एक्सरे करवाने के लिए रेडियोग्राफी विभाग तक चलकर गए। उन्हें सीने में गंभीर संक्रमण हुआ था और उऩ्हें फौरन अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत थी।
     मेजर जनरल प्रसाद बताते हैं, "वे उसी समय अस्पताल में भर्ती नहीं होना चाहते थे। मैंने अस्पताल के अधिकारियों को उनका इलाज घर में करने के लिए राज़ी करके दिल्ली में उनकी छोटी पुत्री के घर पर उनके इलाज का जोखिम लिया।"
     सैम माणेकशॉ ने अपने डॉक्टर को अपनी सेहत के बारे में अपने पिता की चिंताओं के बारे में बताया था। उन्होंने डॉक्टर से अपने पिता के उस खत का भी उल्लेख किया था, जिसमें उनके पिता ने उन्हें धूम्रपान करना और पीना बंद करने की कड़ी चेतावनी देते हुए लिखा था, "बेटे अगर तुम ज्यादा पियोगे और धूम्रपान करोगे तो जल्दी ही मर जाओगे।"
     सैम मजाक करते थे : "डॉक्टर अगर अपने पिता की बात मान कर पीना और धूम्रपान करना बंद कर दिया होता, जो मैंने अस्पताल में रहने के दौरान शुरूआत में बंद कर दिया था, तो शायद मैं काफी पहले ही मर गया होता।" वे अपनी तीमारदारी में लगे लोगों के साथ मजाक करने के रास्ते में अपनी बीमारी को बाधा नहीं बनने देते थे।
     बढ़ती उम्र और कमजोर फेफड़ों की वजह से अब लगातार उनकी सेहत गिरने लगी थी। वे अपने जीवन का आखिरी समय अपने पसंदीदा घर कोन्नूर के - स्तवका में बिताना चाहते थे।
     उन्हें अपने गोरखा अर्दलियों, पालतु जानवरों, बागीचे और स्थानीय लोगों से घिरे रहना ज्यादा सुविधाजनक लगता था।
     अपने डॉक्टर के साथ अंतिम दिन
     " 22 जून, 2008 को, अचानक उनकी हालत बिगड़ने पर मैंने दिल्ली से आपातस्थिति में सैन्य अस्पताल वेलिंग्टन, नीलगिरी पहुंच कर उन्हें आखिरी बार देखा।"
     इस बारे मैंने बुजुर्ग फील्ड मार्शल को काफी कमजोरी की हालत में देखा। उन्हें सांस लेने में तकलीफ हो रही थी और वे बिस्तर पर थे तथा आंखे बहुत कम खोल पाते थे।
     मेजर जनरल प्रसाद बताते हैं, "ऐसे मामले, जिनमें फेफड़ों की पुरानी बीमारी, घातक ब्रॉन्को निमोनिया के साथ मिलकर और जटिल रूप धारण कर चुकी हो और जिससे 94 वर्ष के फील्ड मार्शल पीड़ित थे, से निपटने के अपने लंबे अनुभव से मैंने खतरा भांप लिया और सभी को सतर्क कर दिया कि अगले कुछ घंटों में ही अनहोनी घट सकती है।"
     उऩकी हालत को देखते हुए मेजर जनरल प्रसाद को आशंका हो गई कि उनके सबसे ज्यादा विख्यात मरीज अगले 24 घंटों तक नहीं बच सकेंगे। घातक निमोनिया, इस दृढ़ योद्धा को परास्त कर रहा था।
     उनके नाती जेहान और दामाद धुन दारूवाला ने सारी उम्मीदें छोड़ दी थी और वे उनके सिरहाने खड़े होकर किसी चमत्कार की प्रार्थना कर रहे थे। उनकी बेटियां, शैरी और माजा चेन्नई और दिल्ली से पहुंच रही थीं।
     सभी प्रार्थना और उम्मीद कर रहे थे कि वे अपनी पुत्रियों के आने तक सांसों की डोर थामे रखेंगे। जैसे अतीत में फील्ड मार्शल ने तमाम विपरीत हालात से टक्कर ली थी, वैसे ही उन्होंने इस जानलेवा संक्रमण को अपनी पुत्रियों के आने तक, अगले कुछ दिन तक खदेड़ दिया।
     दोनों पुत्रियों के आने पर फील्ड मार्शल ने उन्हें पहचान लिया और आखिरी बार उनसे बात की। उन्होंने अपनी मौत की योजना भी अपने किसी प्रसिद्ध सैन्य अभियान की तरह बनाई और वे अपने जीवन और मौत, दोनों में विजेता बनकर उभरे।
     उनकी मौत से कुछ क्षण पहले वहां मौजूद लोग एक आश्चर्यजनक घटना के गवाह बने।
     सैम माणेकशॉ की छोटी पुत्री माजा दारूवाला ने खुद पर काबू पाने की कोशिश करते हुए बेहोश पड़े अपने विख्यात पिता के जीवन और समय के बारे में बोलना शुरू किया।
     जैसे ही उन्होंने अपनी मां सिल्लू का नाम लिया, फील्ड मार्शल ने अपनी उस हालत के बावजूद प्रतिक्रिया दिखाई। जो मॉनिटर उनके ऑक्सीजन सेचुरेशन को बहुत कम दर्शा रहा था, अचानक कुछ देर के लिए वृद्धि दर्शाने लगा, जबकि उनकी सांस और नाड़ी की गति स्थिर बनी रही।
     27 जून, 2008, प्रभात के समय उन्होंने शांतिपूर्वक इस दुनिया को अलविदा कह दिया। उस समय उनकी बेटियां उनका हाथ थाम कर प्रार्थना कर रही थीं।
     उन्हें शायद अपनी मौत का पूर्वाभास हो गया था। मौत से कुछ दिन पहले उन्होंने अपना इलाज कर रहे एक डॉक्टर को अपनी बाजू की त्वचा पर बने एक निशान की ओर इशारा करके कहा था कि इसके गायब होते ही उनकी मौत हो जाएगी। सचमुच वह निशान मिट गया और इस महान हस्ती का वजूद भी।
     बीमारी के बावजूद फील्ड मार्शल ने एक बार उनसे पूछा, "डॉक्टर तुम मेरे नाम पर स्कॉच क्यों नहीं लेते ? आपका साथ नहीं देने के लिए मैं तहेदिल से माफी चाहता हूं, जिसकी वजह आप बखूबी जानते हैं"
     उनके निधन के एक हफ्ते बाद, मेजर जनरल प्रसाद अपने यहां एक  मेहमान को देखकर दंग रह गए। फील्ड मार्शल के नाती ने नई दिल्ली में उनके कार्यालय आकर उन्हें अपने नाना की हिदायत पर - एक स्कॉच की बोतल उपहार में दी। उस पर लिखा था "कर्नल प्रसाद फील्ड मार्शल ने क्षमा मांगी है कि वे आपके साथ पी नहीं सकते......" (पसूका फीचर)

उपरोक्त लेख मेजर जनरल बी.एन.बी.एम प्रसाद की कोलकाता में पूर्वी कमान के अस्पताल के कमांडेंट के रूप में तैनाती के दौरान लेखक के साथ हुई बातचीत पर आधारित है। वे वेलिंग्टन में सैन्य अस्पताल के भी कमांडेंट रह चुके हैं। मेजर जनरल प्रसाद इस समय रक्षा मंत्रालय, नई दिल्ली में डीजीएएफएमएस कार्यालय में सीनियर कंसल्टेंट (मेडीसिन) हैं।

3 अप्रैल, 2014, बृहस्तपतिवार फील्ड मार्शल एस.एच.एफ.जे. माणेकशॉ की जन्म शताब्दी है।
*ग्रुप कैप्टेन, सीपीआरओ, रक्षा मंत्रालय, कोलकाता
    

वि.कासोटिया/एएम/आरके/एमएस-80
पूरी सूची-03.04.2014

Wednesday, April 02, 2014

अकाली नेता अदालतीवाल साथिओं सहित “आप” में शामिल

 Wed, Apr 2, 2014 at 6:38 PM
अकाली नीतियों से दुखी और केजरीवाल से प्रभावित
लुधियाना, 02  अप्रेल 2014: (रेकटर कथूरिया//पंजाब स्क्रीन):
अकाली दल बादल को आज उस समय बड़ा झटका लगा जब अकाली दल के अग्रणी नेता हरजीत सिंह अदालतीवाल अपने सैकड़ों साथिओं सहित आम आदमी पार्टी में शामिल हो गए। श्री अदालतीवाल आम आदमी पार्टी के अग्रणी नेताओं एडवोकेट हरविंदर सिंह फूल्का व डॉ. धर्मवीर गाँधी  की उपस्तिथि में आम आदमी पार्टी का दामन सम्भाला। इस अवसर पर श्री अदालतीवाल ने कहा कि मैं अरविन्द केजरीवाल जी की नीतिओं से प्रभावित और अकाली दल की नीतियों से दुखी होकर, आम आदमी पार्टी का सहयोग करना चाहता हूँ और अगर मेरी सेवाएँ देश के काम आ सकी तो अपने आप को भाग्यशाली समझूंगा।

वर्णन करने योग्य है की श्री
अदालतीवाल पिछले 36 वर्षों से अकाली दल से सम्बन्धित हैं और वर्तमान समय में पार्टी के संगठन सचिव का पदभार संभाले हुए थे। इससे पूर्व श्री अदालतीवाल पंजाब प्रदेश पिछड़ा वर्ग आयोग के वाइस चेयरमेन भी रह चुके हैं। श्री अदालतिवाल कम्बोज समुदाय के सबसे बड़े संगठन “ कम्बोज आर्गेनाइजेशन ऑफ़ इंडिया ” के संस्थापक अध्यक्ष भी रह चुके हैं।

अन्त में पत्रकारों को सम्बोधि करते हुए श्री अदालतिवाल ने कहा, पंजाब सरकार की पंजाब विरोधी नीतियों ने पंजाब और पंजाबियों का सर्वनाश कर दिया है
। अब मौका आ गया है सारे पंजाबियों को देश हित में और  प्रदेश हित में आम आदमी पार्टी का समर्थन कर दिल्ली में आम आदमी की सरकार बनाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देना चाहिए।

Tuesday, April 01, 2014

जब औरतें वेश्यालयों में हमेशा के लिए दफ़न हो गयीं


Tue, Apr 1, 2014 at 4:43 PM

हर्ष मंदर, गौतम नवलखा आदि ने प्रजा के निम्नतम वर्ग की पीड़ा पर भावनापूर्ण लेख लिखे
Kanhaiya Jha (Research Scholar)
Makhanlal Chaturvedi National Journalism and Communication University,
Bhopal, Madhya Pradesh
+919958806745, (Delhi) +918962166336 (Bhopal)
Email : kanhaiya@journalist.com
            Facebook : https://www.facebook.com/kanhaiya.jha.5076

भारतीय विकास प्रतिमान की आवश्यकता
आज़ादी के बाद देश को 15 वर्ष से भी कम समय में विकसित करने के लिए सिंचाई एवं बिजली उत्पादन के लिए बड़े बाँध, नहरें, निजी एवं सरकारी औद्योगिक क्षेत्र, आदि अनेक योजनाओं को प्रारंभ किया गया। इसके लिए किसानों की जमीन को सरकार ने सस्ते दामों पर ले लिया. इससे असंख्य देशवासियों को अपनी कृषि भूमि एवं जंगल छोड़ मजदूरी के लिए अपने ही देश में शरणार्थी बनना पड़ा। सन 1985 में अमिया राव द्धारा लिखी गयी भारत देश के विकास की यह कहानी कुछ सोचने पर अवश्य मजबूर करेगी। 
उपरोक्त योजनाओं के कारण विस्थापन का सबसे बुरा असर घर की गृहणी पर पड़ा. प्रायः घर के अन्दर ही काम करने की अभ्यस्त औरतों को मजदूरी के लिए जब दूर-दराज़ क्षेत्रों में जाना पड़ा।इसके कारण वर्षों से चली आ रही परिवार परंपरा टूटती गयी. ऐसे में पुरुष को रोजी रोटी की व्यवस्था के लिए अपनी पत्नी-बच्चों का साथ छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ता है। बिना किसी धरोहर, जमीन-जायदाद के अकेले मजदूरी कर बच्चों को पालना किसी भी तपस्या से कम नहीं था। भूख से पीड़ित अनेकों औरतें बड़े शहरों के वेश्यालयों में हमेशा के लिए दफ़न हो गयीं थीं। सन 1985 में अनियोजित क्षेत्र में मजदूरी करने वाली ऐसी औरतों की संख्या 7.5 करोड़ से ज्यादा थी।  
आजादी के 67 वर्ष पश्चात सन 2014 में भी देश के हरेक राज्य में कमोवेशी विकास की दिशा में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है. हर्ष मंदर, गौतम नवलखा आदि लेखकों ने प्रजा के निम्नतम वर्ग की पीड़ा पर भावनापूर्ण लेख लिखे हैं। 
प्रश्न उठता है कि क्या आज़ादी के बाद देश के शासकों ने विकास का सही प्रतिमान चुना था ? क्या वह प्रतिमान भारतीय लोकतंत्र की परिभाषा के अनुरूप था?, जिसके अनुसार राजा अथवा शासक वर्ग ईश्वर रूपी प्रजा का सेवक है, अथवा वह अंग्रेजों का ही शासन तंत्र था, जिसे देश ने कुछ फेर-बदल कर अपना लिया था ? प्रमाण इसी ओर इंगित करते हैं कि हमारे शासकों ने पर-तंत्र अथवा दूसरों के तंत्र को चुना था तथा स्व-तंत्र अथवा भारतीय तंत्र को अपनाने का साहस नहीं किया था।  
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान एवं आज़ादी के बाद भी जनता में एक नया, सुन्दर देश बनाने का जज्बा था, जिसके लिए उन्हें किसी भी त्याग के लिए तत्पर किया जा सकता था. परंतू पिछले 67 वर्षों में शासन में आये अनेक स्वतन्त्रता सेनानियों का त्याग का वह जज्बा प्रोत्साहन न मिलने के कारण धीरे-धीरे समाप्त होता चला गया।
राजनितिक दल चुनाव के मैदान में अपनी पार्टियों को विजयी बनाने के लिए कार्य कर रही है. पिछले कुछ महीनों से देश में एक युद्ध की स्थिति बनी हुई है. चुन के आने वाले लगभग सभी सांसद एक विजेता की भाँती संसद में प्रवेश करेंगे और फिर जनता को भूल हमेशा की भाँती अपने वर्चस्व के लिए जोड़-तोड़ में लिप्त हो जायेंगे। भारत की राजनीती की दिशा को समझने के लिए चाणक्य के विचार बहुत उपयोगी रहे हैं. चाणक्य सीरिअल शुरू से आखिर तक शिक्षा एवं शिक्षक के मानक ही तय करता है. मगध की राजधानी पाटलिपुत्र में चाणक्य बालक चन्द्रगुप्त को खेलते देख प्रभावित होता है और उसे शिक्षित करने के लिए तक्षशिला गुरुकुल ले जाने का संकल्प करता है (२/८). चन्द्रगुप्त की माँ के यह कहने पर कि उसके बेटे के बारे में निर्णय लेने का अधिकार केवल उसका है, चाणक्य प्रत्युत्तर में कहता है:
"मैं उसका आचार्य हूँ, मैं इसे गर्भ में धारण कर चुका हूँ, तूने एक संभावना को जन्म दिया है, मैं उसे संभव बनाना चाहता हूँ. तू एक माँ है, तुझे अपने पुत्र के बारे में विचार करना है, मैं एक शिक्षक हूँ, मुझे राष्ट्र एवं समाज का ध्यान करना है. मेरा स्वार्थ तेरे स्वार्थ से बड़ा है।"
यवनों के भारत में घुसने का मार्ग तक्षशिला से था. जब वहाँ के राजा ने यवनों से संधि कर उनकी सेना को भारत में प्रवेश करने दिया तो गुरुकुल ने निश्चय किया:
      "यदि शासन राष्ट्र के सम्मान की रक्षा नहीं कर सकता तो शिक्षक करेगा."
तक्षशिला के गुरुकुल में छात्रों को शस्त्र विधा सिखाई जाती थी। राजा के विरोध में छात्रों ने गुरुकुल से निकल जन-जन को जगाने का अभियान छेड़ा। इस पर राजा ने गुरुकुल पहुँच कटाक्ष किया:
राजा: ओह ! तो अब गुरुकुल भी राजनीति से अछूता नहीं रहा.
चाणक्य: जब प्रश्न पूरे राष्ट्र का हो तो गुरुकुल उससे कैसे अछूता रह सकता है. मेरी प्रार्थना है कि आप अलक्षेन्द्र से कोई संधि न करें.
राजा: तक्षशिला मेरी भूमि है, मेरी भूमि पर पर मुझे ही आदेश देने वाले आप कौन हैं ?
राजा को चेतावनी देते हुए चाणक्य ने कहा:
      "जाओ आम्भी कुमार, एक दिन तुम्हें गुरुकुल की सत्ता का परिचय मिल ही जाएगा".
तक्षशिला के गुरुकुल में राजनीति की शिक्षा दी जाती थी। यह शास्त्र की सामर्थ्य थी जो शस्त्र को चुनौती दे रहा था। 
उस समय जनपद क्षुद्र स्वार्थों के लिए आपस में लड़ रहे थे. आज देश भर की राजनीतिक पार्टियां राष्ट्र को भूल आपस में एक दूसरे पर दोषारोपण कर रही हैं। विभिन्न जनपदों को यवन आक्रमण के विरुद्ध एकजुट करने के लिए उनके मुखियाओं को प्रताड़ित करते हुए कहा:
चाणक्य: हिमालय से समुद्र पर्यंत भारत एक है. यदि कोई आपके मस्तक पर आक्रमण करे तो क्या आपके हाथ नहीं उठेंगे, क्या आपके पैर गति करना बंद कर देंगे ?
मुखियाओं ने एकजुट होना तो स्वीकार किया, परंतू किसी को भी दूसरे का नेतृत्व स्वीकार नहीं था.
प्रश्न आज भी नेतृत्व का ही है, जिसके लिए एक दूसरे के प्रति विष-वमन हो रहा है. विडम्बना यह है कि आम चुनाव में यदि जनता ने किसी एक के पक्ष में निर्णय ले भी लिया तो भी यह संघर्ष थमने वाला नहीं है, बल्कि अगले पांच वर्ष यह संसद में जारी रहेगा.
जनपदों के आपसी वैमनस्य से हताश चाणक्य के उदगार:
"समस्त भारत युद्ध की विभीषिका से ग्रस्त है. वह कैसे अलक्षेन्द्र के आक्रमण का उत्तर देगा। कहीं विवाद सीमा का है, तो कहीं विवाद व्यक्तिगत स्वार्थों के संरक्षण का, कहीं जन्म की श्रेष्ठता का तो कहीं धर्म की श्रेष्ठता का। राष्ट्र पतन के कगार पर आ खड़ा है और लोगों को राष्ट्रीयता का कोई बोध नहीं, कोई गर्व नहीं कोई सम्मान नहीं।"
स्थिति आज भी कोई ख़ास भिन्न नहीं है. आज भोगवादी विदेशी संस्कृति का आक्रमण है, जिसके कारण सदियों से संजोये भारतीय मूल्य नष्ट हो रहे हैं. यह राष्ट्र युवा जरूर है, परन्तु नवयुवकों में नशीले पदार्थों का सेवन बढ़ता जा रहा है. शासन अपने खर्चे को नियंत्रित करने का इच्छुक नहीं है. अप्रत्यक्ष करों के बोझ से पिसी जा रही जनता के कुशलक्षेम की परवाह नहीं. कोई गर्व नहीं, कोई सम्मान नहीं, क्योंकि  भोगवादी आयात के लिए विदेशों से उनकी शर्तों पर क़र्ज़ लेना एक मजबूरी.

यह कैसा लोकतंत्र हमारे शासकों ने स्वीकार किया हुआ है जिसमें शासक वर्ग हमेशा बिना प्रयोजन के संघर्ष में रत है. शिक्षक की अवहेलना की गयी और शिक्षा को धर्म से च्युत कर निरंकुश हो सत्ता का भोग किया जा रहा है। 

लुधियाना: चुनावी मौसम में पकड़ी 25 पेटी अंग्रेजी शराब

आरोपी बोले-हमें मोटा मुनाफा होता है 
लुधियाना: 31 मार्च 2014: (सतपाल सोनी//पंजाब स्क्रीन):
प्रचार चाहे कितना ही हो पर बुरी आदतें आसानी से नहीं छूटती। चुनावों का वक़त हो और लोग पीने-पिलाने का मौका छोड़ दें कैसे हो सकता है। ठेके बंद भी हों तब भी पीने वाले कोई चोर मोरी ढूड कर बोतल ले ही आते हैं। इस तरह के सभी प्रयासों पर पानी फेरते हुए लुधियाना पुलिस ने जीटी रोड पर 25 पेटी अंग्रेजी शराब बरामद की है। जिला पुलिस के एंटी नारकोटिक्स सैल ने शराब तस्करी करने के आरोप में लग्जरी कार डस्टर में 2 युवकों को काबू करके उनके कब्जे से  पकड़े गए आरोपियों में जालंधर के न्यू सूरजगंज का सतीश कुमार उर्फ सन्नी (24) व लाडोवाली रोड, दशमेश नगर का जतिंद्र सिंह उर्फ गैरी (26) है। सन्नी की जालंधर में बेकरी है जबकि गैरी की नैटवर्किंग कंपनी है। इनके विरुद्ध सलेम टाबरी थाना में एक्साइज एक्ट के तहत मामला दर्ज हुआ है। 
सैल प्रभारी सब इंस्पैक्टर हरबंस सिंह ने बताया कि दोनों आरोपियों को रविवार जालंधर हाईवे पर बैस्ट प्राइज के पास से ए.एस.आई. तरसेम सिंह की पुलिस पार्टी ने सूचना के आधार पर काबू किया। डस्टर पर टैंपरेरी नंबर लगा हुआ था। तलाशी के दौरान उसके बीच में से अलग-अलग ब्रांड की 25 पेटी अंगे्रजी शराब बरामद हुई, जो कि लुधियाना से सस्ते भाव में खरीदकर जालंधर में महंगे भाव में बेची जानी थी। पकड़े गए लोगों का कहना है कि उन्हें इस "कारोबार" में मोटा मुनाफा होता है।  उनका यह बयान सच है या शराब के चुनावी दुरपयोग को छुपाने की कोशिश इसका पता भी पुलिस को आगे की जाँच पड़ताल में जल्द ही लग जायेगा लेकिन आरोपियों की बात पर यकीन भी किया जाये तो यह मामला गंभीर है। इन लोगों से सस्ती शराब लेने वाले भी अक्सर असर  रसूख वाले सफेदपोश लोग ही होते हैं जिन्हें शराब की बोतल बाज़ार से आधे से भी कम भाव पर मिलती है।