*Reetu Kalsi on Friday 5th November 2026 at 16:00 Regarding November 1984
FIR में बीजेपी और संघ से संबंधित 49 व्यक्तियों के नाम शामिल हैं
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1984 के सिक्ख विरोधी कत्लेआम में बीजेपी और संघ के नेता सीधे तौर पर शामिल रहे हैं। जिसे संघ या बीजेपी के नेता चुनाव के समय मगरमच्छ के आंसू लिए छुपाते देना चाहते हैं। दिल्ली सिटी पुलिस स्टेशन में दर्ज 14 एफआईआर में बीजेपी और संघ से संबंधित 49 व्यक्तियों के नाम शामिल हैं। इस मामले में श्रीनिवासपुर पुलिस स्टेशन दक्षिण दिल्ली में ज्यादा मामले दर्ज हैं।एफआईआर से पता लगता है कि हरिनगर, आश्रम, भगवाननगर और सन लाईट कालोनी में बीजेपी और आरएसएस के नेताओं के खिलाफ हत्या, आगजनी, लूटपाट के मामले दर्ज हैं।जिन व्यक्तियों के नाम एफआईआर में दर्ज हैं उनमें से एक नाम है राम कुमार जैन का भी है।इस पर FIR No. 315/92, 18 जून 1992 — दंगा, डकैती और हत्या के प्रयास का मामला। इसी राम कुमार जैन ने 1980 के लोकसभा चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी के लिए खूब काम किया।यह तब सब अच्छे से सामने आया जब अगस्त 2005 में संसद के सत्र में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 1984 की दुखद घटना के लिए माफी मांगी थी, उसी सत्र में बहस के दौरान कांग्रेस के नेता कपिल सिब्बल ने दावा किया था कि बीजेपी और संघ के नेताओं के खिलाफ भी सिखों के कत्लेआम की में शिकायत दर्ज है।
अगर याद हो तो नेता अमरिंदर सिंह ने 2014 में कहा था 1984 के सिख विरोधी दंगों में भी कई भाजपा नेता शामिल हैं मुझे इन नेताओं के बारे में तब पता चला जब मैंने और पंजाब विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष रवि इंदर सिंह ने दंगा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया था। राजनीति इस कद्र दलदल की तरह है इस सब के बावजूद अमरिंदर ने भाजपा का साथ दिया।इसमें कोई शक नहीं प्रकाश सिंह बादल सब जानते थे।
भाजपा का सिक्ख हितैषी होना इस खबर से भी पता चलता है।
1991 में बीजेपी की कल्याण सिंह सरकार के समय उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में 10 सिख श्रद्धालुओं को आतंकवादी कह कर पुलिस ने मार दिया था।अगर नहीं याद तो याद दिला देती हूं। यह सब रिकॉर्ड में भी है कि 12 जुलाई 1991 को विभिन्न तीर्थस्थलों (जैसे पटना साहिब, हुजूर साहिब) की यात्रा कर लौट रहे सिख श्रद्धालुओं से भरी एक बस को पीलीभीत के कछाला घाट के पास पुलिस ने रोका था। पुलिस ने बस में से 11 सिख पुरुषों को जबरन नीचे उतार लिया, जबकि महिलाओं और बच्चों को पास के एक गुरुद्वारे भेज दिया गया।
उसी रात और अगले दिन (13 जुलाई) की सुबह के बीच, पुलिसकर्मियों ने इन पुरुषों को तीन अलग-अलग समूहों में बांटा और पीलीभीत के तीन थाना क्षेत्रों (बिलसंडा, न्यूरिया और पूरनपुर) के जंगलों में ले जाकर गोली मार दी। घटना के बाद स्थानीय पुलिस प्रशासन और तत्कालीन पुलिस अधीक्षक (SP) आर.डी. त्रिपाठी ने दावा किया था कि मारे गए लोग 'खालिस्तानी आतंकवादी' थे और पुलिस ने आत्मरक्षा में जवाबी फायरिंग की थी।
हिरासत में लिए गए 11वें व्यक्ति (एक 15 वर्षीय किशोर) का बाद में कोई सुराग नहीं मिला और वह लापता घोषित कर दिया गया। इस घटना पर जब सवाल उठे, तो सुप्रीम कोर्ट ने 15 मई 1992 को मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंप दी। सीबीआई जांच में पुलिस की कहानी झूठी पाई गई। जांच रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस कर्मियों ने केवल 'पुरस्कार और वीरता पदक' पाने के उद्देश्य से इस फर्जी एनकाउंटर को अंजाम दिया था।
अप्रैल 2016 में, सीबीआई की विशेष अदालत ने इस एनकाउंटर को 'फर्जी' करार देते हुए 47 दोषी पुलिसकर्मियों को उम्रकैद की सजा सुनाई। कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि यह पूरी तरह से कानून का उल्लंघन था।इस घटना के खिलाफ लंबा कानूनी संघर्ष लड़ा यह पीड़ित परिवार वाले ही जानते।
मोदी जी जो बेहद हितैषी बन रहे इन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए सिक्ख किसानों का जो भला करने जा रहे थे वह भी सभी जानते हैं। सन 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद, तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के आह्वान पर पंजाब और राजस्थान से करीब 5,000 सिक्ख किसान कच्छ क्षेत्र में आकर बसे थे। उन्होंने वहां की बंजर और रेतीली जमीन को अपनी कड़ी मेहनत से उपजाऊ बनाया।1973 के एक पुराने कांग्रेस-शासित सरकार के सर्कुलर का हवाला देते हुए, गुजरात की नरेंद्र मोदी सरकार इन किसानों की जमीनें लेने की कोशिश की यह कहकर यह दूसरे राज्यों से आकर कब्जा कर रह रहे।
द कारवां जो कि एक मासिक पत्रिका है इसमें खोजी लेख ज्यादा छपते हैं मेहनत की होती है जिन पर। इसी पत्रिका कारवां में निकीता सक्सेना की एक लेख में बताया गया है कि सरकारी दस्तावेजों में मोदी सरकार आज भी सिक्ख आतंकवाद शब्द का प्रयोग कर रही है। इसके के अनुसार, आतंक को मिलने वाले वित्तपोषण पर स्थाई फोकस समूह का उद्देश्य इस्लामिक और सिक्ख आतंकवाद पर काम करना है। यह लेख 2019 में छपा था। मोदी का सिक्ख प्रेम एक ऐसा राजनीतिक जुमला है जो चुनाव में ही बाहर आता है बिल्कुल बरसाती मेंढकों की तरह।
यही नहीं मोदी सरकार ने जिन नानाजी देशमुख को ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया, अपने एक लेख ‘मोमेंट ऑफ सोल सर्चिंग’ जो कि 8 नवंबर 1984 को लिखा था उसमें दरबार साहब में की गई फौजी कार्रवाई के लिए इंदिरा गांधी की प्रशंसा की थी और 1984 के सिक्ख कत्लेआम को सही ठहराया।
असल में मोदी केवल मुसलमानों के ही नहीं बल्कि तमाम अल्पसंख्यकों के विरोधी हैं बस चुनाव के समय खुद को नॉन बायलॉजिकल कहने वाले यह जहां जाते वहीं का बच्चा खुद को कहने लग जाते हैं। पठान का बच्चा हूं यह तो आज तक किसी को नहीं भुला उसी तरह जैसे गुजरात के दंगे।
--रीतू कलसी एक जानीमानी लेखिका और पत्रकार हैं



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