हर व्यक्ति के बेहतर जीवन की दिशा में पीएमआर की भूमिका
राष्ट्रीय पीएमआर दिवस पर विशेष: 6 जुलाई, 2026:
पीजीआई में डॉ. सौम्या सक्सेना के आधारित कार्तिका कल्याणी सिंह पंजाब स्क्रीन की विशेष प्रस्तुति -::
आज के आधुनिक चिकित्सा युग में उपचार का उद्देश्य केवल बीमारी को ठीक करना नहीं, बल्कि व्यक्ति को फिर से सक्रिय, आत्मनिर्भर और सम्मानजनक जीवन जीने योग्य बनाना भी है। यही कार्य *फिजिकल मेडिसिन एवं रिहैबिलिटेशन (पीएमआर) या पुनर्वास चिकित्सा का मूल उद्देश्य है। इस वर्ष राष्ट्रीय पीएमआर दिवस का विषय “रेहाबिलिटेशन इज एसेन्शियल, नॉट ऑप्शनल” इस संदेश को और अधिक सशक्त बनाता है कि पुनर्वास कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि समग्र उपचार का अनिवार्य अंग है।
आधुनिक चिकित्सा में पुनर्वास (रिहैबिलिटेशन) को अब उपचार के बाद की वैकल्पिक सुविधा नहीं, बल्कि समग्र स्वास्थ्य सेवा का अनिवार्य हिस्सा माना जा रहा है। राष्ट्रीय फिजिकल मेडिसिन एवं रिहैबिलिटेशन (पीएमआर) दिवस के अवसर पर पीजीआई, चंडीगढ़ के शारीरिक चिकित्सा एवं पुनर्वास विभाग की एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ. सौम्या सक्सेना ने कहा कि समय पर पुनर्वास न केवल व्यक्ति की कार्यक्षमता और आत्मनिर्भरता बढ़ाता है, बल्कि उसे पुनः सम्मानजनक एवं सक्रिय जीवन जीने में भी सक्षम बनाता है। उन्होंने कहा कि इस वर्ष राष्ट्रीय पीएमआर दिवस की थीम ‘पुनर्वास आवश्यक है, विकल्प नहीं’ समाज में इसी संदेश को सशक्त बनाने का प्रयास है।
बीमारी से आगे, व्यक्ति को देखने की चिकित्सा
पीएमआर केवल रोग का उपचार नहीं करता, बल्कि व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और व्यावसायिक आवश्यकताओं को भी ध्यान में रखता है। यह चिकित्सा पद्धति विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू एच ओ) के इंटरनेशनल क्लासिफिकेशन ऑफ फंक्शनिंग, डिसेबिलिटी एंड हेल्थ (आई सी ऍफ़) मॉडल पर आधारित है, जिसे बायोप्साइकोसोशल मॉडल भी कहा जाता है।
अर्थात, किसी व्यक्ति की बीमारी का प्रभाव उसके शरीर, मानसिक स्थिति, पारिवारिक जीवन, सामाजिक भागीदारी और कार्यक्षमता पर किस प्रकार पड़ रहा है, इसका समग्र मूल्यांकन कर उपचार एवं पुनर्वास की योजना बनाई जाती है। यही कारण है कि पीएमआर रोग नहीं, बल्कि पूरे व्यक्ति और उसकी जीवन-परिस्थितियों को केंद्र में रखकर कार्य करता है।
कब आवश्यक होती है पुनर्वास चिकित्सा?
पुनर्वास की आवश्यकता केवल दिव्यांग व्यक्तियों तक सीमित नहीं है। किसी भी ऐसी स्थिति में, जहाँ दर्द, कमजोरी, चलने-फिरने, दैनिक कार्यों या सामाजिक सहभागिता में बाधा उत्पन्न हो, पीएमआर विभाग महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
इससे लाभान्वित होने वाले प्रमुख रोगों एवं स्थितियों में शामिल—
* स्ट्रोक एवं मस्तिष्क की चोट
* स्पाइनल कॉर्ड इंजरी
* सेरेब्रल पाल्सी एवं बच्चों की विकास संबंधी समस्याएँ
* ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर
* न्यूरोमस्कुलर विकार
* गठिया एवं जोड़ों के रोग
* कमर और गर्दन का दर्द
* खेल चोटें
* अंग विच्छेदन एवं कृत्रिम अंग पुनर्वास
* वृद्धावस्था में चलने-फिरने और संतुलन की समस्याएँ
* ऑपरेशन के बाद पुनर्वास
* दीर्घकालिक दर्द एवं अन्य पुरानी बीमारियाँ
प्रारम्भिक पुनर्वास से बेहतर परिणाम
वैज्ञानिक अध्ययनों से स्पष्ट है कि यदि बीमारी या चोट के शुरुआती चरण में ही पुनर्वास प्रारम्भ कर दिया जाए, तो कार्यक्षमता में सुधार, जटिलताओं में कमी तथा जीवन की गुणवत्ता में उल्लेखनीय वृद्धि संभव होती है।
समय पर पुनर्वास से—
* दर्द एवं विकलांगता कम होती है,
* बेड सोर, कॉन्ट्रैक्चर और गिरने जैसी जटिलताओं की रोकथाम होती है,
* अस्पताल में रहने की अवधि घट सकती है,
* व्यक्ति शीघ्र अपने परिवार, समाज और कार्यस्थल से पुनः जुड़ पाता है,
* आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।
आधुनिक तकनीक बदल रही है पुनर्वास का स्वरूप
आज पुनर्वास चिकित्सा में अत्याधुनिक तकनीकों का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। रोबोटिक रिहैबिलिटेशन, कंप्यूटर आधारित गेट एवं मोशन एनालिसिस, एक्सोस्केलेटन सहायता प्राप्त चाल प्रशिक्षण, मायोइलेक्ट्रिक एवं बायोनिक कृत्रिम अंग, वर्चुअल रियलिटी और स्मार्ट पुनर्वास उपकरणों ने उपचार को अधिक प्रभावी और सटीक बनाया है।
इन तकनीकों की सहायता से मरीजों की कार्यक्षमता, संतुलन, गतिशीलता और स्वतंत्र जीवन जीने की क्षमता में महत्वपूर्ण सुधार संभव हो रहा है।
दिव्यांगता की रोकथाम में भी महत्वपूर्ण योगदान
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, उचित समय पर उपचार एवं पुनर्वास के माध्यम से अनेक मामलों में विकलांगता की गंभीरता को कम किया जा सकता है। पुनर्वास व्यक्ति को केवल बीमारी के बाद संभालने का माध्यम नहीं, बल्कि जटिलताओं और दीर्घकालिक निर्भरता को रोकने का भी सशक्त साधन है।
वृद्धजन और पुनर्वास
बढ़ती आयु के साथ उच्च रक्तचाप, मधुमेह, गठिया, कमर दर्द, सुनने की कमी और संतुलन संबंधी समस्याएँ सामान्य हो जाती हैं। नियमित शारीरिक गतिविधि, संतुलन प्रशिक्षण, मांसपेशियों को मजबूत करने वाले व्यायाम तथा समुचित पुनर्वास कार्यक्रम वृद्धजनों को स्वतंत्र और सक्रिय जीवन बनाए रखने में सहायता करते हैं। अच्छी संतुलन क्षमता के लिए शरीर के विभिन्न तंत्रों का समन्वय अत्यंत आवश्यक होता है, और पीएमआर इस दिशा में वैज्ञानिक एवं व्यक्तिगत समाधान प्रदान करता है।
पुनर्वास: मानव अधिकार और सामाजिक आवश्यकता
डॉ. सौम्या सक्सेना ने कहा कि आधुनिक चिकित्सा में पुनर्वास (रिहैबिलिटेशन) को उपचार के बाद की वैकल्पिक सुविधा नहीं, बल्कि समग्र स्वास्थ्य सेवा के अनिवार्य अंग के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी भी बीमारी, दुर्घटना या शारीरिक अक्षमता के बाद व्यक्ति को पुनः कार्यक्षम, आत्मनिर्भर और सम्मानजनक जीवन जीने योग्य बनाना ही पुनर्वास चिकित्सा का प्रमुख उद्देश्य है। डॉ. सक्सेना के अनुसार, इस वर्ष राष्ट्रीय पीएमआर दिवस की थीम ‘पुनर्वास आवश्यक है, विकल्प नहीं’ इस बात का संदेश देती है कि उपचार तभी पूर्ण माना जा सकता है, जब व्यक्ति को उसकी अधिकतम कार्यक्षमता प्राप्त करने और परिवार तथा समाज में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए आवश्यक पुनर्वास सेवाएँ समय पर उपलब्ध कराई जाएँ।



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