Saturday, November 16, 2019

सराभा के शहीदी दिवस पर सीपीआई ने कराया विशेष आयोजन

आयोजन में व्यक्त की देश में बढ़ रही साप्रदायिक ज़हर पर गहरी चिंता
लुधियाना: 16  नवंबर 2019: (पंजाब स्क्रीन टीम)::
करतार सिंह सराभा। आज़ादी के लिए शहादतों का मर्ग दिखने वाला महान योद्धा। छोटी सी उम्र लेकिन कामों का रेकार्ड बहुत बड़ा। रंगीन सपने देखने की उम्र थी। घर परिवार और बजुर्ग माता पिता को संभालने की उम्र थी। इन ज़मीनी हकीकतों के बावजूद करतार सिंह ने सपना भी देखा तो एक अलौकिक सा सपना। हर किसी के बस में नहीं होता घर के सुख आराम को त्याग कर कर देश और देश की जनता के सुख का सपना  देखना। लेकिन सराभा ने सपना देखा-देश को आज़ाद कराने का सपना। सिर्फ सपना ही नहीं देखा बल्कि इसे साकार करने के लिए देश भक्ति की इसी शमा पर हंसते हंसते अपनी जान न्योछावर कर दी। अपने अपने नाम के आगे गांव सराभा का नाम लगाने वाले सभी लोग काश इस भावना और त्याग को भी अपनी ज़िंदगी में उतार सकें। काश कोई तो हो जो उस रास्ते पर फिर चलने का साहस सके और बता सके कि अभी उन शहीदों के सपने अधूरे हैं। अभी बहुत काम बाकी हैं। अभी रात बाकी है। 
यूं तो आज भी सिंह सराभा का शहीदी दिन बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। बहुत ज़ोर शोर से आयोजन होते हैं। ये आयोजन सरकारी भी होते हैं और गैर सरकारी भी। इन सभी आयोजनों में देश के ठेकेदार बन बैठे सियासतदानों से कोई नहीं पूछता कि आख़िर आप देश पर कुर्बान होने वाले शहीदों को शहीद का दर्जा क्यूं नहीं देते? क्यों बेचते हो उनका नाम और उनकी शहादत? क्यों करते हो उनके नाम पर आडम्बर? अफ़सोस कि वाम दलों ने शहीदों को शहीद का दर्जा दिलवाने के लिए उन दिनों में भी कुछ नहीं किया जब दिल्ली में वाम की तूती बोलती थी और कामरेड हरकिशन सिंह सुरजीत किंग मेकर गिने जाते थे। परिणाम यह हुआ कि शहीदों का नाम एक आडंबर बन कर रह गया। वे लावारिस से हो गए। कोई भी उनके नाम पर कुछ भी करने को स्वतंत्र  महसूस करने लगा। काश शहीदों के नाम का दुरपयोग रोकने के उनके वारिस आगे आएं। दुःख की बता है की ऐसा दुरपयोग हर बार देखने को मिलता है। 
बड़ी हैबोवाल लुधियाना के एक सरकारी स्कूल में तो हद ही हो गयी जब सराभा के नाम पर स्कूलों बच्चों से हुस्न इश्क के गीत संगीत प्रस्तुत कराए गए जिनका देश भक्ति से कोई लेना देना ही नहीं था।  व्यापारी और साम्प्रदायिक सियासतदान इन आयोजनों के मुख्य मेहमान बने होते हैं। इसका मुद्दा कामरेड एम एस भाटिया ने सीपीआई के उस सेमिनार में भी उठाया जो सराभा की याद में आयोजित हुआ।
सीपीआई के पार्टी कार्यालय में हुए इस कार्यक्रम जहां करतार सिंह सराभा को याद किया गया वहीं देश में तेज़ी से बढ़ रहे साप्रदायिक ज़हर वाले माहौल पर भी गहरी चिंता व्यक्त की गई।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की जिला इकाई ने आज पार्टी आफिस में शहीद करतार सिंह सराभा का शहीदी दिवस मनाया। इस मौके पर जहां गदर लहर और अन्य शहीदों की चर्चा की गई वहीं अंग्रेज़ सरकार से कई कई बार क्षमा याचना करके रिहा होने वाले लोगों की भी चर्चा हुई। इस मौके पर वीर सावरकर और संघ परिवार को विशेष तौर पर निशाना बनाया गया। इस श्रद्धांजलि सभा में जिला सचिव डी पी मौड़ के साथ साथ डॉक्टर अरुण मित्रा, रणजीत सिंह, केवल सिंह बनवैत, गुरनाम सिंह सिद्धू, गुलज़ार गोरिया और कई अन्य स्थानीय नेता भी शामिल हुए।
                       --(पंजाब स्क्रीन टीम में  इस कवरेज पर थे-कार्तिका सिंह//एम एस भाटिया//रेक्टर कथूरिया)

Thursday, November 14, 2019

नोटबंदी,कश्मीर और गौरी लंकेश पर भी हुए कविता में इशारे

कविता पहुंची कालेजों तक:GCG  में हुआ विशेष आयोजन
लुधियाना: 14 नवंबर 2019: (पंजाब स्क्रीन टीम)::
युग बदले तो वक़्त के साथ साथ बहुत कुछ बदल गया। रीति रिवाज तक बदलते देखे गए। लोगों ने अपने धर्म बदल लिए, मज़हब बदल लिए, ईमान बदल लिए। इस सब कुछ के बावजूद एक शायर ही बाकी बचा था वह भी बदल गया लेकिन फिर भी कुछ कलमकार थे जो नहीं बदले। उनकी कविता न खरीदी जा सकी और न ही किसी अंकुश से दबायी जा सकी।   
ऐसे में एक साज़िश हुई और ऐसी कविता को बंधक बना लिया गया। उनकी कविता को वर्ग विशेष से सबंधित लोगों ने अपने अपने गट से सबंधित विशेष हाल कमरों तक महदूद कर लिया। बस उनकी कविता वहीँ तक गूंजती। उसका लोगों से मिलना जुलना बंद हो गया। बंधक वर्ग से जाने अनजाने में जुड़े लोग आते, अपनी रचना सुनाते और जब दुसरे की बारी आती तो बाहर चले जाते या सो जाते। 
कविता दम तोड़ने लगी थी। किसी नई कविता का जन्म भी होता तो आम लोगों को इसका पता ही न चलता। ऐसे में आगे आए कुछ शिक्षण संस्थान।  सहयोग दिया पंजाब कला परिषद जैसे संस्थानों ने। कविता उन वर्ग विशेष के बड़े बड़े हाल कमरों से निकल कर कालेजों में आने लगी जहाँ उसे नयी पीढ़ी के लोग मिले। शायरी में ये लोग कच्चे हो सकते हैं लेकिन तिकड़मों से कोसों दूर थे। इन्होने ने भी जानेमाने शायरों को नज़दीक से देखा। नज़दीक से उनका कलाम सुना। उनके साथ चाय पी खाना खाया और उन्हें अपने नज़दीक महसूस किया।  
यह सब हमारी टीम ने देखा लुधियाना में लड़कियों के सरकारी कालेज में जिसे ज़्यादातर लोग जीसीजी के नाम से जानते हैं। इसी तरह के आयोजन सतीश चंद्र धवन राजकीय कालेज लुधियाना और जीजीएन खालसा कालेज लुधियाना जैसे संस्थानों में भी देखने को मिले। 
दिन था 14 नवंबर 2019 का। समय रहा होगा कोई सुबह 11 बजे। पंजाब कला परिषद के महासचिव डाक्टर लखविंदर जौहल किसी वजह से नहीं आ पाए। उनकी गैरमौजूदगी खटकती भी रही। हाल में औपचारिक सम्मान के बाद मंच पर सुशोभित हो चुके थे शिमला से आये जनाब कुमार कृष्ण जो हिंदी के बहुत अच्छे शायर हैं, लुधियाना से पंजाबी में बहुत गहरी बात करने वाले जनाब जसवंत सिंह ज़फ़र, चित्रों और शब्दों का जादू भरा सुमेल करने की  वाले जनाव स्वर्णजीत सवी, जनता और जनचेतना से जुड़े हुए हिंदी के शायर डा. राकेश कुमार और पंजाबी की शायरा मोहतरमा जसलीन कौर। 
कुमार कृष्ण साहिब ने जहाँ अपनी गुल्ल्क की लूट पर कविता पढ़ते हुए नोटबंदी पर अपना निशाना साधा वहीँ चींटियों और उनके सतत संघर्ष की चर्चा भी बहुत गहरे अर्थों में की। डाक्टर राकेश ने कश्मीर में फौजी वर्दी और बूटों के आतंक की चर्चा बहुत सादगी और खूबसूरती से की। जनाब जसवंत ज़फ़र साहिब ने अपने चिरपरिचित अंदाज़ में कहा कि जो मां की गालियां देता है, जो बहन की गालियां देता है उसे कोख में होती हत्यायों पर कविता लिखने का कोई अधिकार नहीं। मंच संचालन कार्तिका सिंह ने बहुत खूबसूरती से निभाया। इसके साथ ही उसकी गौरी लंकेश पर पढ़ी कविता भी छायी रही। 
--(पंजाब स्क्रीन टीम में इस कवरेज पर थे-एम एस भाटिया//प्रदीप शर्मा //रेक्टर कथूरिया)