Friday, June 16, 2017

न्याय के लिए कब तक मिलेगी तारीख दर तारीख ?

पंजाबी भवन लुधियाना में हुआ न्याय व्यवस्था पर सेमिनार 
लुधियाना: 15 जून 2017: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो):: More Pics on Facebook 
अदालत में न्याय पाना हो तो गुज़रना पड़ता है एक लम्बे सिलसिले से जिसमें मिलती है बार बार तारीख..और तारीख और तारीख....। तारीखों के इस चक्रव्यूह में फंसा इंसान तो चल बस्ता है लेकिन न्याय की झलक उसे नहीं मिल पाती। इस अमानवीय सिलसिले के खिलाफ संघर्ष शुरू किया है जज एडवोकेट पीड़ित संगठन (JAPO) ने।
इस संगठन की तरफ से आज एक सेमिनार स्थानीय पंजाबी भवन में करवाया गया। इस मौके पर मुख्य मेहमान थे शहीद भगत सिंह के भान्जे प्रोफेसर जगमोहन सिंह और छत्तीसगढ़ से आये प्रवीण पटेल।  इनके साथ ही मंच पर मुख्य मेहमानों में मौजूद थी बेलन ब्रिगेड प्रमुख अनीता शर्मा और कुछ अन्य लोग।
वक्ताओं ने न्याय व्यवस्था के हालात का दृश्य दिखाते हुए इस सिस्टम के बखिये उधेड़ दिए। एक एक मुद्दे पर बात हुयी।  विस्तार से चर्चा हुई। समस्या को सभी के सामने  रखा गया। इसके साथ ही हल की तलाश पर भी विचार विमर्श हुआ। 
सेमिनार का मुद्दा महत्वपूर्ण था लेकिन हाल में मौजूद लोगों की संख्या बहुत ही कम थी। इस संबंध में प्रबंधन बेहद कमज़ोर साबित हुआ। हाल की खाली कुर्सियां संकेत थी की इस गहन गंभीर मुद्दे पर या तो लोग डर के मरे चुप हैं या फिर उन्हें पता ही नहीं चला की यहाँ इस मुद्दे पर कोई चर्चा आयोजित हो रही है। 
वास्तव में इसके आयोजकों में से प्रमुख सुभाष कैटी और उनकी टीम लम्वे समय से संघर्षशील होने के बावजूद उन लोगों तक पहुँच नहीं कर सकी जिन्होंने न्याय व्यवस्था की पीड़ा को झेला है। इसके बावजूद यह एक सफल आयोजन था क्यूंकि एक ऐसे मुद्दे पर बात तो शुरू हुई जिस पर कहने को बहुत से लोगों के पास बहुत कुछ है लेकिन बात ज़ुबान पर नहीं आ पाती।  उम्मीद है यह मंच और यह आयोजन उन बेबस लोगों की ज़ुबान बनेगा जिनसे न्याय के नाम पर लगातर अन्याय हुआ है। पत्रकारअरविंदर सिंह सराना ने भी इस मुद्दे पर इसी मंच से विस्तृत चर्चा की।  More Pics on Facebook
आखिर में डा. राहत इन्दोरी साहिब का एक शेयर इसी मुद्दे पर:
जो जुर्म करते हैं, इतने बुरे नहीं होते;
सज़ा न दे के अदालत बिगाड़ देती है। 

Wednesday, June 14, 2017

सरकार आज तक महिलाओं को सशक्त नहीं बना सकी-अनीता शर्मा

Wed, Jun 14, 2017 at 2:51 PM

बेलन ब्रिगेड लौटा अपने पुराने विद्रोही रंग में 

पूछा:निगम चुनावों में 50% आरक्षण महिलाओं को या पति को 
                                                                          Courtesy: Poster Women

लुधियाना: 14 जून 2017: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो):: 
संघर्षों की आग में रह कर जन सेवा करने वाले लोगों को सुख सुविधाओं के जाल में फांस कर ज़्यादा देर तक कर्तव्य विमुख नहीं किया जा सकता।  अन्तर आत्मा की आवाज़ सुनाई देते ही वे फिर लौट आते हैं संघर्षों के मैदान में आर पार की जंग लड़ने।  कुछ ऐसा ही होता महसूस हो रहा है बेलन ब्रिगेड प्रमुख अनीता शर्मा और उनकी टीम के साथ जो बहुत से मुद्दों पर पिछले कुछ समय से खामोश चल रही थी या केवल संकेतिक विरोध कर रही थी। सुश्री शर्मा ने एक प्रेस वक्तव्य में पंजाब सरकार के एक फैसले को अपना निशाना बनाया है। मैडम अनीता ने कहा है कि पंजाब  सरकार ने विधान सभा में कानून पास किया है जिसके तहत नगर निगम चुनावों में महिलाओं को 50 प्रतिशत सीटें मिलेंगी। 
इसके साथ ही बेलन ब्रिगेड की राष्ट्रीय अध्यक्ष अनीता शर्मा ने अपनी आशंका को स्पष्ट करते हुए कहा है कि सरकार ने महिलाओं को नगर निगम में 50 प्रतिशत सीटों पर आरक्षण तो दे दिया है लेकिन सरकार आज तक महिलाओं को सशक्त नहीं बना सकी है। उन्होंने साफ़ शब्दों में कहा है कि जो महिलाऐं नगर निगम में पार्षद हैं उनका सारा कार्य उनके पति करते है और उन्हें पति पार्षद का पद  दिया जाता है। कोई भी महिला आज पुरुष प्रधान समाज में अकेले राजनीति नहीं कर सकती। खासकर नगर निगम में महिला पार्षद अपने परिवार व पति के सहारे ही कार्य करती है। मैडम अनीता ने पूछा कि आखिर ऐसा क्यूं?
गौरतलब है कि मंच पर भाषण तो खूब दिए जाते है महिला सशक्तिकरण के लेकिन असलियत बिलकुल इससे परे है। और ये पार्षद प्रतिनिधि की प्रथा कोई नई नहीं है बरसो बरस से चली आ रही है पार्षद पुत्र,पार्षद पिता, पार्षद पति की ये प्रथा आखिर कब खत्म होगी इसका कोई स्थाई हल तो हमारे राजनेताओ को ही ढूंढना होगा। यह पुरुष प्रधान सिस्टम किसी एक ज़िले मैं नहीं तकरीबन देश भर में इसी तरह चल रहा है। 

उन्होंने कहा कि नगर निगम चुनावों में सभी राजनैतिक पार्टियों के नेता चुनाव लड़ने के चाहवान होते है और अपनी पार्टी से पार्षद की टिकट लेने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा देते है। प्रभावशाली लोग चूल्हे चौंके पर काम करने वाली घर की गृहणी को ही पार्षद का चुनाव लड़ा देते हैं और चुनाव जीतने के बाद महिला पर्षद अपने पति के कंधे पर हाथ रख कर काम करती हैं। मैडम ने पूछा कि आखिर क्यूं  छीन ली जाती है उनकी स्वतंत्र सोच और कार्यशैली?

कुछ माह पूर्व राजस्थान में इसी आशय की आवाज़ बुलंद हुई थी। वहां बीकानेर जिले में ऐसे कितने ही वार्ड है जिनमें पार्षद महिलाएं है पर इनकों स्वतंत्र कार्य की अनुमती नहीं मिल रही है क्यूंकि यहां भी पार्षद प्रतिनिधि के दबाव में ही हर कार्य किया जाता है। यह सब इतना ज़ोर पकड़ चूका है कि क्षेत्र के सारे अहम फैसले भी पार्षद प्रतिनिधि ही लेता है। वास्तव में यह देश भर की एक गंभीर समस्या है। एक तरफ केन्द्र एवं राज्य सरकार द्वारा महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और शैक्षणिक रूप से सशक्त बनाने के लिए महत्वपूर्ण निर्णय लिए जा रहे है लेकिन सरकार के इन मंसुबों को पार्षद पति, पिता ,पुत्र (पार्षद प्रतिनधि) ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्र में नहीं लागु होने दे रहे है। आखिर पुरुषों के अपने रसूख होते हैं जिनको संभालना उनकी पहली ज़िम्मेदारी होती है। तों ऐसे में आाखिर कब होगी पार्षद पति, पिता,पुत्र संस्कृति की ये प्रथा खत्म ???
अपने इन लोगों के बारे में तो अक्सर कथा कथाओं में सुना होगा उमापति, रमापति, कमलापति, लक्ष्मीपति, कुंती पति इतियादी। राष्ट्र का संवैधानिक मुखिया आमतौर पर राष्ट्रपति कहलाता है। विश्वविद्यालय में कुलपति और उपकुलपति के पद भी होते हैं। धनवान लोगों को लखपति करोड़पति अरबपति कहने की परम्परा भी सदियों से चलती आ रही है लेकिन यह पार्षद पति, पार्षद पिता, पार्षद पुत्र आखिर क्या बला है? क्या यह सब महुला अधिकारों पर सदियों से चले आ रहे वर्चस्व को और मज़बूत बनाने की कुप्रथा है? अगर इसी तरह महिला को अक्षम, अपाहिज, अज्ञानी साबित करने के लिए यह सब चल रहा है तो मत दो महिला को दया की यह भीख। जब महिला में शक्ति आएगी वह यह सब खुद ही छीन लेगी। इन आडंबरों से महिला के क्रोध को शांत मत करो।

अनीता शर्मा ने साफ शब्दों में कहा कि सभी राजनैतिक पार्टियां केवल उन्ही महिलाओं को टिकट दें जो पहले ही घरों से बाहर रहकर समाज सेवा कर रही है तभी महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण का लाभ मिलेगा नहीं तो इस आरक्षण महिलाओं के नाम पर पुरुष ही इसका लाभ उठाएंगे। इसके साथ हीयहनने यह सब कहा कि  बेलन ब्रिगेड यह सब होने नहीं देगा।  

Monday, June 12, 2017

माछीवाड़ा में हुई वाम छात्र संगठन AISF की बैठक

महंगी शिक्षा के पीछे छुपी साज़िशों को किया गया बेनकाब 
माछीवाड़ा: 11 जून 2017: (कार्तिका सिंह//पंजाब स्क्री):: More Pics on Facebook
जब भी नए समाज के लिए संघर्ष उठेगा तो माछीवाड़ा के जंगल उस वक़्त की याद दिलाएंगे जब श्री गोबिंद सिंह जी महाराज इस पावन भूमि पर पहुंचे थे। माछीवाड़ा एक ऐसी भूमि जिसका सिख इतिहास के साथ गहरा संबंध है। सरबत्त दा भला के मिशन को सफल बनाने के संघर्ष का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है माछीवाड़ा। मित्र प्यारे नूं हाल मुरीद दा कहना... इसी भूमि पर रचा गया शब्द है जिसे सुन कर आज भी दिल और दिमाग उस समय के हालात को बहुत गहन संवेदना से महसूस करने लगता है। More Pics on Facebook
शोषण रहत समाज के निर्माण में लगा शायद ही कोई मानव हो जिसे माछीवाड़ा की भूमि के  जंगलों ने संघर्ष का संकल्प याद कराने की आवाज़ न दी हो। इस बार इस आवाज़ को सुना वामपंथी छात्र संगठन आल इंडिया स्टूडेंटस फेडरेशन ने। मीटिंग बहुत अल्प समय के लिए थी लेकिन जब बात चली तो यह मीटिंग भी लम्बे समय तक चली। मीटिंग दुर्गा शक्ति मंदिर के हाल में हुई लेकिन वाम के वरिष्ठ जिला नेता कामरेड रमेश रत्न ने इस पावन भूमि के इतिहास की चर्चा भी शुरू की। वहां मीटिंग में मौजूद छात्रों से चमकौर की गढ़ी और आनंदपुर साहिब के इतिहास से जुड़े सवाल भी पूछे गए। श्री भैणी साहिब से जुड़े इतिहास की भी चर्चा हुई। 
मीटिंग में मुख्य मुद्दा था दिन-ब-दिन महंगी हो रही शिक्षा का। लगातार कम हो रहे सरकारी स्कूलों का। आम जन साधारण को शिक्षा के मौलिक अधिकार से वंचित करने की साज़िश का तांकि गरीब का बच्चा कभी भी अमर बच्चों के सामने चुनौती न बन सके। More Pics on Facebook
वहां विशेर्ष तौर पर पहुंचे डाक्टर अरुण मित्रा ने लार्ड मैकाले और उसकी शिक्षा पद्धति और शिक्षा नीति की भी विस्तृत चर्चा की। डाक्टर मित्रा ने बहुत ही आसान शब्दों में इस क्षेत्र में काम कर रही गहन साज़िशों का पर्दाफाश किया। मीटिंग में मौजूद छात्र छात्राओं ने यह सब कुछ बहुत ही ध्यान से तकरीबन तकरीबन सांस रोक कर सुना।  शिक्षा के क्षेत्र की अहमियत को समझा और इस मामले में हो रही खतरनाक साज़िशों के खतरों को बहुत नज़दीक से महसूस किया।  More Pics on Facebook
इस युवा वर्ग की समझ आ रहा था कि  क्यों हर बार फीसें बढ़ा दी जाती हैं? क्यों आसमान छूने लगती है किताबों की कीमत? क्यों मुश्किल होता जा रहा है आम छात्र का पढ़ना लिखना। 
इस मीटिंग में आर एस एस और वीर सावरकर के इतिहास की भी विस्तृत चर्चा हुई। शहीद भगत सिंह की कुरबानी और वीर सावरकर द्वारा माफ़ी का इतिहास यहाँ मौजूद छात्र-छात्राओं को आज समझ में आ रहा था। साम्प्रदायिक संगठन क्यों ढून्ढ लेते हैं प्रगतिशील तत्वों के साथ दुश्मनी निभाने का कोई न कोई बहाना यह भी समझ आ रहा था। More Pics on Facebook
कामरेड रमेश रत्न ने छात्र वर्ग को समझाया कि गुरु साहिब की जंग किसी विशेष सम्प्रदाय या धर्म से नहीं थी। उनकी सेना में मुस्लिम वर्ग भी शामिल था।  दूसरी तरह आनंदपुर साहिब का किला घेरने वालों में हिन्दू राजाओं की सेनाएं भी शामिल थी। इस लिए श्री गुरु ग्बिन्द सिंह जी के संघर्ष को हिन्दू-मुस्लिम या सिख मुस्लिम संघर्ष में बाँट कर न देखा जाये। यह शोषण और अन्याय के खिलाफ ऐतिहासिक संघर्ष था।
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महंगाई के चलते कैम्पों से मिलती है आम लोगों को कुछ राहत

श्री दण्डी स्वामी मंदिर के मेडिकल कैम्प में हुई 600 मरीज़ों की जांच 
लुधियाना:11 जून 2017: (कार्तिका सिंह//पंजाब स्क्रीन):: More Pics on facebook 
विकास के दावे सियासत वालों की या उनके समर्थकों की तो मजबूरी हो सकती है पर हमारी नहीं। ज़मीनी हकीकत देखना और दिखाना हमारा कर्तव्य भी है और मकसद भी। दावे कितने सच्चे हैं यह हकीकत हम आपके सामने लाते रहते हैं। इस बार इस हकीकत कोदेखने का बहाना बना है एक मेडिकल कैम्प। जब कहीं मेडिकल कैम्प लगता है तो वहां बहुत से ऐसे लोग भी आते हैं जो कभी कभी उच्च मध्यम वर्गीय परिवारों से भी सबंधित होते हैं। कैम्प में आये हुए इन लोगों के दिल को टटोलने और उनकी आंखों में ध्यान से देखने पर पता चलता है कि कितनी देर हो चुकी है उन्हें यह सोचते हुए कि अपना इलाज  लेकिन लेकिन वे चाह कर भी अपना इलाज नहीं करवा पाए। दिन-ब-दिन महंगे हो रहे इलाज के कारण अस्पतालों में जाने से पहले बार बार सोचना पड़ता है। ऐसे बेबस और मजबूर लोगों के लिए मेडिकल कैम्प आवश्यक इलाज की सुविधा और अवसर का वरदान ले कर आते हैं। 
आज लुधियाना के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल श्री सिद्ध पीठ श्री दंडी स्वामी मंदिर में एक ऐसा ही कैम्प था। बहुत से लोग मिले जो बहुत देर से अपनी शूगर तक चैक नहीं करवा सके थे। बहुत से लोग ऐसे भी थे जिनके लिए बीपी चैक करवाना भी सम्भव न हो सका। बहुत से लोग ऐसे थे जिनको अपनी बीमारी की समझ नहीं आ रही थी। बहुत से लोग आंखों का आपरेशन करवा पाने की स्थिति में भी नहीं थे। हमारी टीम को इस कैम्प में जाने का अवसर मिला गांव मंसूरां वाले डाक्टर रमेश की तरफ से आये निमंत्रण के बहाने से। कैम्प में पहुँच कर मिली बहुत से लोगों की बहुत सी कहानियां जिनको आम तौर पर न तो मीडिया में जगह मिलती है न ही सियासतदानों के दरबार में। यूं भी दुःख सभी को बता पाना आसान कहाँ होता है। हम भी उनके दिलों में छुपा उतना ही दुःख पाए जितना बातों बातों में उनकी आँखों तक झलक आया। हमें लगा अगर इनकी बेबसी और मूलभूत आवश्यकता को नज़र अंदाज़ करके समाज का विकास देखा गया तो विकास के वे आंकड़े सच्चे नहीं होंगें। More Pics on facebook 
शहर के सिविल लाइंस इलाके में स्थित श्री सिद्ध पीठ श्री दंडी स्वामी मंदिर में फ्री मेडिकल कैंप का आयोजन पं. राज कुमार शर्मा की अगुवाई में किया गया था। सफेद वस्त्रों में पंडित राजकुमार जी हर टेबल पर जा कर काम तो बार बार चैक करते हैं पर जल्दी किये मीडिया के सामने नहीं आते। पूछ भी लो तो कहेंगे आप मरीज़ों से बात करो--डाक्टरों के विचार सुनो। मैं तो सेवादार हूँ। इस कैंप में विशेष रूप से आंखों के माहिर डॉ. रमेश मंसूरा, डॉ. वरुण मेहता, डॉ. अमित कांसल, डॉ. संदीप शर्मा, डॉ. सुरिंदर गुप्ता और अन्य डॉ. विशेष रूप से मरीज़ों का इलाज़ करने को सहयोग दिया। कैंप में आंखों के 600 मरीज़ों का चेकअप किया गया। इस मौके पर चौधरी मदनलाल बग्गा, अनिल शर्मा, चंदर मोहन, राजेश गाबा, रवि मल्होत्रा, गुलशन नागपाल, पं. गोपाल शर्मा, राजिंदर नागपाल, धर्मवीर, दीपक शर्मा भी मौजूद थे। तकरीबन हर टेबल पर भीड़ थी। दुःख और मसीबत के मरे लोगों की आँखों में एक चमक भी थी। यह चमक उम्मीद की किरण से आ रही थी। खुद को फिर स्वस्थ महसूस करने की उम्मीद। More Pics on facebook 
शूगर की जाँच टेबल पर जा कर पूछा तो पता चला कि  ज़्यादातर लोग 30 वर्ष से अधिक उम्र के ही आए थे पर शूगर सभी को थी। किसी को कम किसी को ज़्यादा। इसी तरह ब्लड प्रेशर की जाँच कर रही मैडम आशा ने बताया कि ब्लड प्रेशर भी यहाँ जाँच के लिए आये तकरीबन सभी लोगों को था। हाँ हाई बीपी के मरीज़ लो बीपी से कुछ ज़्यादा थे। इसी तरह गैस्ट्रो के मरीज़ भी बहुत ज़्यादा थे। डाक्टर वरुण मेहता बहुत ध्यान से सभी को देख रहे थे। कुछ मरीज़ों ने बताया कि उनके इलाके में पानी शुद्ध नहीं आ रहा। बहुत बार कहा लेकिन पानी शुद्ध नहीं हुआ। आँखों के मरीज़ों की संख्या शायद सभी से अधिक थी। बाद दोपहर तक लम्बी लम्बी लाइनें. नज़र आयी।  सफेद मोतिया, कला मोतिया और बहुत सी अन्य समस्याएं। डाक्टर रमेश से मिल कर इन मरीज़ों को एक नयी ख़ुशी मिली।  दुनिया को फिर से ठीक रूप में देख पाने की उम्मीद जगी। इनकी अँधेरी ज़िंदगी में रौशनी का संदेश लाये डाक्टर रमेश। ये वे लोग थे  जो दोबारा देख पाने की संभावना का सपना भी नहीं लेते थे। More Pics on facebook 
इसी तरह ई एन टी के जांच टेबल पर कम सुनने वाले मरीज़ों की संख्या ज़्यादा थी। डाक्टर संदीप शर्मा बहुत बारीकी से सभी की जाँच कर रह थे। इन मरीज़ों में भी छोटी बड़ी उम्र के मिले जुले मरीज़ ज़्यादा थे। फैक्ट्रियों में चलती बड़ी बड़ी मशीनों के आवाज़ों से पैदा होते शोर के प्रदूषण ने इनके कानों पर बहुत बुरा असर डाला। इन मरीज़ों को भी इसी कैम्प में आ क्र राहत मिली। 
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