Saturday, July 28, 2012

प्रधानमंत्री ने बांटा हिंसा पीड़ित लोगों का दुःख

असम के हिंसा प्रभावित क्षेत्रों में एक जिला कोक्राहार  भी है। इस जिले में जब राहत कैम्प लगा तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह विशेष तौर पर वहां पहुंचे और हिंसा प्रभावित लोगों के दुःख सुने। इस अवसर पर असम के राज्यपाल जे बी पटनायक और मुख्यमंत्री तरुण गंगोई भी मौजूद थे। हिंसा का शिकार हुए इन बेगुनाह लोगों का दुःख उनके चेहरे से ही ब्यान हो रहा था। जब प्रधानमन्त्री ने शनिवार 28 जुलाई 2012 को इन लोगों से यह भेंट की पत्र सूचना कार्यालय के छायाकार ने दुःख की इन घड़ियों को भी कैमरे में कैद कर लिया ता कि जब भी लोग इन तस्वीरों को देखें तो इन तस्व्वेरों में छुपा दर्द उन्हें साम्प्रदायिकता से दूर रहने का संदेश याद दिलाता रहे। 

आखिर ये दंगे होते ही क्यों है // राजीव गुप्ता

धर्म लोगों में नसेड़ी की अफीम की तरह विद्यमान होता है
जो खोखला होने के बावजूद नशा नहीं त्यागना चाहता 
नाईजीरिया के जोस शहर में साम्प्रदायिक हिंसा: साभार चित्र 
1948 के बाद भारत में पहला सांप्रदायिक दंगा 1961 में  मध्यप्रदेश के जबलपुर शहर में हुआ ! उसके बाद  से अब तक  सांप्रदायिक दंगो की झड़ी सी लग गयी !  बात चाहे 1969 में गुजरात के दंगो  की हो , 1984 में सिख विरोधी हिंसा की हो, 1987 में मेरठ के दंगे हो जो लगभग दो महीने तक  चला था और कई लोगो ने अपनी जान गंवाई थी,  1989 में हुए भागलपुर - दंगे की बात हो, 1992 - 93 में बाबरी काण्ड के बाद मुंबई में भड़की हिंसा की हो, 2002 में गुजरात - दंगो की हो, 2008 में कंधमाल की हिंसा की हो या फिर अभी पिछले दिनों ही उत्तर प्रदेश के बरेली में फ़ैली सांप्रदायिक हिंसा की हो अथवा इस समय सांप्रदायिक हिंसा की आग में सुलगते हुए  असम  की हो जिसमे अब तक पिछले  सात दिनों से जारी हिंसा में करीब दो लाख लोगों ने अपना घर छोड़ा दिया तथा इनमें से कइयो के घर जला दिए गए और ज्यादातर लोग सरकार द्वारा बनाए गए 125 राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं !  यह एक कटु सत्य है कि विभिन्न समुदायों के बीच शांति एवं सौहार्द स्थापित करने की राह में सांप्रदायिक दंगे एक बहुत बड़ा रोड़ा बन कर उभरते है और साथ ही मानवता पर ऐसा गहरा घाव छोड़ जाते है जिससे उबरने में मानव को कई - कई वर्ष तक लग जाते है ! ऐसे में समुदायों के बीच उत्पन्न तनावग्रस्त स्थिति में किसी भी देश की प्रगति संभव ही नहीं है !  साम्यवादी चिन्तक काल मार्क्स ने धर्म को अफीम की संज्ञा देते हुए कहा था कि धर्म लोगों में नसेड़ी की अफीक की तरह विद्यमान होता है, जो हर हाल में नशा नहीं त्यागना चाहता है, भले ही वह अन्दर से खोखला क्यों ना हो जाय !  समाज की इसी कमजोरी को राजनेताओ ने सत्ता की लोलुपता में सत्ता हथियाने हथियार बनाया , भले ही इसकी बेदी पर सैकड़ों मासूमों के खून बह जाय !
धर्मनिरपेक्षता और संविधान

भारतीय संविधान के तहत भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है जहां कई मतों को मानने वाले लोग एक साथ रहते है ! ध्यान देने योग्य है कि धर्मनिरपेक्ष शब्द संविधान के 1976 में हुए 42वें संशोधन अधिनियम द्वारा प्रस्तावना में जोड़ा गया ! यह संशोधन सभी धर्मों की समानता और धार्मिक सहिष्णुता सुनिश्चित करता है ! चूंकि भारत का कोई अपना आधिकारिक धर्म नहीं है अतः यहाँ ना तो किसी धर्म को बढावा दिया जाता है और ना ही किसी से धार्मिक - भेदभाव किया जाता है ! भारत में सभी धर्मों का सम्मान किया जाता है और सभी मतानुयायो के साथ एक समान व्यवहार किया जाता है ! भारत में हर व्यक्ति को अपने पसन्द के किसी भी धर्म की उपासना, पालन और प्रचार का अधिकार है !  सभी नागरिकों, चाहे उनकी धार्मिक मान्यता कुछ भी हो कानून की नजर में बराबर है ! साथ ही  सरकारी या सरकारी अनुदान प्राप्त स्कूलों में कोई धार्मिक अनुदेश लागू भी नहीं होता !

सांप्रदायिक हिंसा के कारण

अगर हम बड़े - बड़े साम्प्रदायिक दंगो को छोड़ दे तो भी देश में गत वर्ष हुई सांप्रदायिक हिंसा भड़कने के मूल में किसी भी समुदाय की धार्मिक भावनाओ का आहत होना, सहनशीलता और धैर्य की कमी के साथ - साथ  और क्रिया का प्रतीकारात्मक उत्तर देना ही शामिल है ! अभी हाल ही में  पिछले हफ्ते उत्तर प्रदेश के बरेली में भड़की सांप्रदायिक हिंसा के पीछे पुलिस के मुताबिक मूल वजह यह थी कि शहर के शाहाबाद इलाके में कांवड़ियों द्वारा रात को साउंड सिस्टम बजाने दूसरे समुदाय के लोगो की भावनाए आहत हो गयी थी !  बात चाहे अप्रैल  2011 को  मेरठ में सांप्रदायिक हिंसा की हो अथवा सितंबर 2011 को राजस्थान के भरतपुर के गोपालगढ़ में साम्प्रदायिक हिंसा या फिर सितम्बर 2011 में  मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में दौलतगंज चौराहे पर गणेश - प्रतिमा  की स्थापना को लेकर सांप्रदायिक हिंसा की हो शुरुआत हमेशा छोटे - छोटे दंगो से ही होती है जो कि पूर्वनियोजित नहीं होते ! आखिर ये बिभिन्न समुदाय के लोग एक -  दूसरे की धार्मिक भावनाओं पर कुठाराघात करते ही क्यों है यह एक हम सबके सम्मुख विचारणीय प्रश्न मुह बाए खड़ा है ! इन दिनों असम सांप्रदायिक हिंसा की भेट चढ़ा हुआ है जिसमे लाखो लोग बेघर हो गए है और कई लोग अपनी जान गँवा चुके है तो कई लोग घायल है ! ऐसी ही साम्प्रदायिक हिंसा अगस्त 2008 में उत्तरी असम के उदलगुड़ी और बरांग जिलों में भी हुई थी परन्तु लगता है कि उन दंगों से तरुण गोगोई और उनके मंत्रिमंडल ने कोई सबक नहीं लिया ! असम को आज भी एक गरीब और पिछड़ा राज्य माना जाता है ! योजना आयोग के आकड़ों के मुताबिक 2010 तक असम के 37.9 फीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे रह रहे थे ! असम में गरीबी के आकड़े बढ़े हैं ! 2004-05 में 34.4 फीसदी लोग ही वहा गरीबी रेखा से नीचे रहते थे !

क्या कहते है आंकड़े

गृहमंत्रालय के अनुसार द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबित देश भर में पिछले चार सालो में सांप्रदायिक हिंसा के लगभग 2,420 से अधिक छोटी - बड़ी घटनाएं हुई  जिसमें कई लोगो को अपनी जान से हाथ ढोना पड़ा ! इन आंकड़ों का अगर हम औसत देंखे तो देश में किसी न किसी हिस्से में हर दिन कोई न कोई सांप्रदायिक हिंसा की घटना हो ही जाती है जिसमे कई बेगुनाह लोग मारे जाते है और कई घायल हो जाते है ! गृहमंत्रालय का  भी मानना है कि देश के लिए सांप्रदायिक हिंसा प्रमुख चिंता का विषय बन गया है ! क्योंकि सरकारी तंत्र यह मानता है कि सांप्रदायिक हिंसा का समाज पर दूरगामी प्रभाव छोड़ता है जिससे समाज में कटुता का ग्राफ सदैव बढ़ता है ! परन्तु अगर ऐसा माना जाय कि सरकार का नेतृत्व थामने वाले जनता के प्रतिनिधि ही किसी न किसी रूप में सांप्रदायिकता की आड़ में अपनी राजनैतिक रोटिया सकते है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी, इसका ताज़ा उदाहरण देश की राजधानी दिल्ली ने सुभाष पार्क के स्थानीय विधायक को देखा परन्तु जनता की सहनशीलता एवं धैर्य से कोई बड़ी अनहोनी होते - होते बच गयी ! परन्तु जब यह सहनशीलता जनता नहीं दिखाती तो देश साम्प्रदायिक दंगो की भेट चढ़ जाता है !  अगर हम हाल ही के पिछले कुछ वर्षो के आकड़ो पर नजर डाले तो आकडे इस बात की पुष्टि कर देते है कि जनता ने जहा सहनशीलता नहीं दिखाई वहा सांप्रदायिक दंगे हुए है ! एक आकंड़ो के अनुसार वर्ष 2010 में सांप्रदायिक हिंसा की 651 घटनाओं में जहा एक तरफ 114 लोगों को अपनी जान से हाथ ढोना पडा था तो दूसरी तरफ 2,115 व्यक्ति घायल हो गए थे ! वर्ष 2009 में सांप्रदायिक हिंसा की 773 घटनाओं में लगभग 123 लोगों की मौत हो गई थी जबकि 2,417 लोग घायल हुए थे !  वर्ष 2008 में सांप्रदायिक हिंसा की 656 घटनाओं में 123 लोगों की जान गयी थी और 2,270 लोग घायल हुए थे !

सांप्रदायिक हिंसा रोकने के लिए उपाय    

भारत सरकार को चाहिए कि साफ़ नियति से बिना देरी किये हुए इसी मॉनसून सत्र में सभी दलों के सहयोग एवं सहमति से संसद में कानून बनाकर इस नासूर रूपी समस्या पर नियंत्रण करे ! ध्यान देने योग्य है कि सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा निवारण विधेयक - 2011 का एक प्रारूप सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने तैयार किया था परन्तु इस प्रारूप से सरकार की नियति पर सवालिया निशान खड़े हो गए थे !  सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं अक्सर त्योहारों के नजदीक ही होती है अतः सरकार को त्योहारों के समीप चौकस हो जाना चाहिए और ऐसे क्षेत्र को संवेदनशील घोषित कर कुछ हद तक ऐसी सांप्रदायिक घटनाओ को कम किया जा सकता है ! ध्यान देने योग्य है कि अक्टूबर 2011 को सांप्रदायिक हिंसा की बढ़ती घटनाओं के चलते केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम ने मुख्यमंत्रियों को सचेत रहने को कहा था ! और साथ ही सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को भेजे पत्र में चिदंबरम ने सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील स्थानों की पहचान कर उन पर विशेष नजर रखने को कहा था ! अक्टूबर 2008 को राष्ट्रीय एकता परिषद का उद्घाटन  समारोह में  सांप्रदायिक ताकतों पर प्रहार करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उड़ीसा, कर्नाटक और असम की सांप्रदायिक हिंसा का हवाला देते हुए  कहा था कि यह खतरनाक होने के साथ ही भारत की मिली जुली संस्कृति पर हमला हैं और इनसे कड़ाई से निपटने की जरूरत है ! किसी भी देश के विकास के लिए परस्पर सांप्रदायिक सौहार्द का होना नितांत आवश्यक है ! अतः आम - जन को भी देश की एकता - अखंडता और पारस्परिक सौहार्द बनाये रखने के लिए ऐसी सभी देशद्रोही ताकतों को बढ़ावा न देकर अपनी सहनशीलता और धैर्य का परिचय देश के विकास में अपना सहयोग करना चाहिए ! आज समुदायों के बीच गलत विभाजन रेखा विकसित  की जा रही है ! विदेशी ताकतों की रूचि के कारण स्थिति और बिगड़ती जा रही  है जो भारत की एकता को बनाये रखने में बाधक है ! अतः अब समय आ गया है देश भविष्य में ऐसी सांप्रदायिक घटनाये न घटे इसके लिए प्रतिबद्ध हो !
- राजीव गुप्ता , 9811558925

Wednesday, July 25, 2012

क्रांति आकर रहेगी

दस्तकों का अब किवाड़ों पर असर होगा ज़रूर;
हर हथेली खून से तर और जियादा बेकरार ! 
दुशियंत जी की उपरोक्त पंक्तियाँ अचानक याद आइन, माहौल देख कर बिना जहन पर कोई दबाव डाले होठों से निकल पड़ीं। इसके साथ ही .यह अहसास भी एक बार फिर जगा कि क्रांति  तो अब हर हाल में आकर ही रहेगी. .आयोजन पटियाला में था और लोग अन्ना टीम को सुनने दूर दूर से आये थे वहां अन्ना टीम से जुड़े अरविन्द केजरीवाल,  गोपाल राये  जी , संजय सिंह और कई अन्य लोग भी थे। लोगों की भीड़ कोई ज्यादा नहीं थी पर जो थे वे पूरी तरह समर्पण भाव से आये थे। वहाँ भाड़े पर लाये लोगों का शोरुगुल नहीं था। सभी लोग बहुत ही अनुशासन में थे और वह भी अपने आप. कोई किसी को डांट या घूर नहीं रहा था। कुछ लोग मंच पर रहना चाहते थे; केवल इसलिए कि अन्ना टीम के कुछ अधिक नजदीक  बैठ सकें मंच से आदेश हुआ तो सभी लोग बिना  किसी हील हुज्जत के नीचे उतर गए। 
वहां ऐसे लोगों की भीड़ भी थी जो अपने साथ हुए भ्रष्टाचार का विवरण पूरे सबूतों सहित लेकर वहां पहुंचे थे। इन सभी लोगों को यही लग रहा था अगर आना टीम उनका मामला देख ले तो समस्या हल हो जाएगी। पर सबूतों के बावजूद सभी को एक ही जवाब मिल रहा था की जांच के बाद सही पाए जाने पर ही अन्ना टीम किसी मुद्दे को उठाएगी वरना बिलकुल नहीं। मैं शिकायत कर्तायों की भीड़ और उनका विशवास देख कर हैरान था। आम तौर पर कोई आम कमज़ोर इन्सान सुनवाई न होने पर अपनी शिकायत लेकर किसी वरिष्ठ और बड़े अफसर के पास जाता है। मुझे लगा यहाँ अपनी शिकायत लाने वाले लोग निश्चय ही अन्ना टीम को, इस आन्दोलन को सरकार से कहीं बड़ा समझ कर आये हैं। 
इन लोगों में ही एक लडकी थी जो वीलचेयर पर बैठी थी। जब वह कार्यक्रम खत्म होने के बाद लंगर हाल में पहुंची तो मैंने पुछा कि चलने फिरने की लाचारी के बावजूद तुम यहाँ आई हो।...क्यूं आई हो ? पूछते समय मुझे अटपटा जरूर लगा पर तुरंत और कुछ सूझा ही नहीं। जवाब में वह मुस्करा कर बोली मुझे केजरीवाल जी को सुनना था अन्ना आन्दोलन का एक हिस्सा बनना था सो चली आई। फगवाडा से आई आस्था नाम की इस लडकी के परिजन उसके साथ थे। नुस्के चेहरे पर इतनी दूरी से आने की कोई थकावट और न ही गर्मी के मौसम की कोई बेचैनी। मैंने पूछा क्या तुमने पहले कभी केजरीवाल जी को नहीं सुना ? जवाब था सुना है पर केवल टीवी पर। आज आमने सामने पहली बार सुना। मैंने फिर उसकी वीलचेयर की और देखते हुए पूछा की इतनी गर्मी में और इतनी दूरी से यहाँ आना ज़रूरी था क्या ? तुम्हारी हालत देख कर लगता है तुम्हे काफी तकलीफ हुई होगी। जवाब में वह फिर मुस्करा दी और बोली जी ज़रूर हुई है पर देश को बचना हो तो जाब देने को भी तैयार रहना पड़ता है। मैं इस जवाब के लिए तैयार नहीं था। मेरा मन भी भर आया और आँखें भी। जहन में कौंध गया फिल्म नायक का वह सीन जिसमें एक अपाहिज लड़का अनिल कपूर से कहता है मेरा देश भी मेरी तरह लंगड़ा हो गया इसे उठा कर चला दीजिये। इस लडके की यह बात सुन कर ही अनिल कपूर राजनीति में आने को तैयार होता है। उस दिन फिल्म नहीं थी पर आस्था नाम की यह लडकी मुझे अपनी मौन शब्दों से समजा रही थी कि वास्तविक जिंदगी कहीं अधिक रोमांचिक होती है, कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण जिसमें रीटेक का कोई मौका भी नहीं मिलता मौका गंवा दिया तो गंवा दिया। आखिर में मैंने आस्था से इतना ही पुछा की इस आयोजन का पता कैसे लगा / बोली ललित दीदी हैं न उनहोंने बताया था। मैं फिर हैरान था।  जिस ललित को मैं एक आम सी लडकी समझता था वह इतनी प्रभावशाली है कि आस्था जैसे लोग टांग न होते हुए भी फगवाडा से चलकर पटियाला पहुँच सकते हैं ! मुहे लगा कि अब क्रांति आ कर ही रहेगी ! आस्था को वहां देखकर मेरे मन की आस्था भी भी एक बार फिर मजबूत हो गई।  अचना होठों पर आया।..इतनी शक्ति हमें देना दाता मन का विस्वास कमज़ोर हो न ..रेक्टर कथूरिया 
सबंधित पोस्ट।..अवश्य देखें:
 नींव के पत्थर/देश को बचाने की अल्ख जगाता अन्ना आन्दोलन

Sunday, July 22, 2012

मामला पंजाब के विकास का //बिजली पानी ज़रूरी या मैट्रो ?

मैट्रो की बजाय लोगों को पीने का पानी दें बादल:
  विकास की बातों को परनीत कौर ने लिया आड़े हाथों  
राजपुरा, 21 जुलाई: कांग्रेस पार्टी की सांसद केन्द्रीय विदेश राज्य मंत्री महारानी परनीत कौर ने पंजाब में विकास की लम्बी चौड़ी बातें करने वालों को आड़े हाथों लिया है।  एक शोक सभा के बाद मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा कि सच बात तो यज है कि पंजाब में जो थोडी-बहुत सरकार चल रही है, वह केन्द्र सरकार की सहायता की वजह से ही चल रही है। पंजाब में मैट्रो चलाने के बड़े-बड़े दावे करने वालों का यह हाल है कि यह सारकार लोगों को पीने के लिए साफ-सुथरा पानी भी उपलब्ध नहीं करा सके। 
पंजाब की हालत पर यह विचार केन्द्रीय विदेश राज्य मंत्री महारानी परनीत कौर ने राजपुरा में कांग्रेस कार्यकर्ता नरिन्दर सोनी के पिता बलराज सोनी की मौत के बाद रस्म पगडी के मौके पर पहुंचने के बाद मीडिया   से बातचीत के दौरान रखे।  मौजूदा अकाली-भाजपा सरकार को बिल्कुल फेल सरकार बताते हुए उन्होंने कहा कि पंजाब के लोगों को बिजली की कोई कमी न आने देने वालों का यह हाल है कि लोगों को भारी बिजली कटों के चलते काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। बिजली न दे सकने के बाद सरकार ने बिजली के दरों में बेतहाशा बढ़ोतरी कर दी है, जिससे महंगाई और बढ़ जायेगी। पटियाला की कई कालोनियों में सीवरेज की पाइपें फट जाने से सीवरेज का गंंदा पानी पीने के पानी में मिल जाने से कई कालोनियों के लोग बीमार हो गये हैं।  पटियाला में गराीबों के लिये बना एक मात्र अस्पताल का यह हाल है कि बैड आदि पर चादरें नहीं हैं, केन्द्र सरकार ने  पिछले समय में आठ करोड़ रुपया अस्पताल के लिये दिया था, उसमें से सिर्फ 30 लाख रुपया खर्च किया  है वह भी पता नहीं कहांं खर्च किया है। सरकार से जो कार्य नहीं होता वह केन्द्र के जिम्मे मढ़ देते हैं। कांग्रेसी नेता दीपइन्द्र सिंह ढिल्लों द्वारा कांग्रेस को छोड़कर अकाली दल में शामिल होने के सवाल पर महरानी परनीत कौर ने कहा कि ढिल्लों द्वारा कांग्रेस पार्टी छोडऩे का मुझे बहुत दु:ख है। जिला पटियाला के एकमात्र जंक्शन स्टेशन पर लोगों की लम्बे समय से चली आ रही मांग, जरूरी यात्री गाडिय़ों का ठहराव नहीं करवा सकने के सवाल को अपने चिर परिचित अंदाज़ से टालते हुए उन्होंने कहा कि मैंने कई बार कोशिश की है, शायद कोई तकनीकी दिक्कत होगी। उन्होंने आश्वासन दिया की वह अपनी कोशिश जारी रखेंगी।

मकसद बैंकिंग सुविधाएं उपलब्ध कराना

करीब 74,000 बस्तियों की पहचान वित्तीय समावेश:   विशेष  लेख
              :                                                                               * शमीमा  सिद्दीकी (पीआईबी) 
वर्ष 2010-2011 के आम बजट के समय अपने भाषण में वित्त मंत्री ने सभी बैंकों को निर्देश दिया था कि व्यवसाय साथियों (बिजनेस कॉरिसपॉन्डेंट ) के जरिए शाखाहीन बैंकिंग सहित विविध मॉडलों और प्रौद्योगिकियों के इस्तेमाल से मार्च 2012 तक 2000 से अधिक आबादी वाली बस्तियों को समुचित बैंकिंग सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। इस वित्तीय समावेश अभियान का नाम स्वाभिमान रखा गया । बौंकों ने राज्य स्तरीय बैंकर्स समितियों के तंत्र के जरिए वित्तीय समावेश के लिए अपना खाका तैयार किया है तथा बैंकिंग सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए 2000 से अधिक आबादी वाली देश की करीब 74,000 बस्तियों की पहचान की है। मार्च 2000 तक बैंकिंग सेवाओं के विस्तार के लिए ये बस्तियां सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों, निजी क्षेत्र के बैंकों और सहकारी बैंकों को आवंटित की गई थी। राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति संयोजक बैंकों से प्राप्त जानकारी के अनुसार अभियान के तहत पहचाने गए 74,398 गांवों में से 74,194 गांवों को बैंकिंग सेवाएं उपलब्ध करा दी गई हैं तथा मार्च 2012 के अंत तक 3 करोड़ 16 लाख वित्तीय समावेश बैंक खाते खोले गए हैं।

इसके अतिरिक्त, बैंकों को व्यवसाय साथी मॉडलों के तहत शामिल गांवों में अति लघु शाखाएं खोलने की सलाह दी गई है जहां बैंक की तरफ से नामित अधिकारी सप्ताह में पूर्वनिर्धारित दिन और समय पर लैप टॉप के साथ उपलब्ध होंगे। व्यवसाय साथी एजेंट रोकड़ सेवाएं उपलब्ध कराएंगे जबकि बैंक अधिकारी बैंक द्वारा पेश अन्य सेवाएं उपलब्ध कराएंगे, फील्ड जांच करेंगे और बैंकिंग लेन-देन का अनुवर्ती निरीक्षण करेंगे।

सरकार ने अक्तूबर 2011 में वित्तीय समावेश के बारे में रणनीति और दिशानिर्देश जारी किए हैं जिनके जरिए बैंकों को यह सलाह दी गई कि बैंक वाले जिलों के तहत 5,000 या अधिक आबादी वाली सभी बस्तियों और अन्य जिलों में 10,000 या अधिक आबादी वाली बस्तियों में सितंबर 2012 तक बैंक शाखाएं खोली जाएं। राज्य स्तरीय बैंकर्स समितियों के संयोजक बैंकों से प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार खोली जाने वाली 3,905 बैंक शाखाओं में से अप्रैल, 2012 के आखिर तक 739 बैंक शाखाएं खोली गई हैं।

क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को भी इस तरह से शाखा विस्तार योजना तैयार करने की सलाह दी गई कि 2011-12 में बैंक शाखाओं में 10 प्रतिशत वृद्धि और 2012-13 में भी इतनी ही वृद्धि हो। अनंतिम आंकड़ों के अनुसार 2011-12 के दौरान क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों ने 914 शाखाएं खोली हैं।

सरकार के निरंतर प्रयासों से 31 मार्च, 2011 के अनुसार देश में बिना बैंक वाले 71 विकास खंडों में से सभी विकास खंडों में 31 मार्च, 2012 के आखिर तक बैंकिंग सुविधाएं उपलब्ध करा दी गई हैं। अगले कदम के रूप में ऐसे सभी विकास खंडों में व्यवसाय साथी और अति लघु शाखा उपलब्ध कराने की सलाह दी गई है जहां अब तक सिर्फ मोबाइल बैंकिंग  ही उपलब्ध है।

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’निदेशक (मीडिया एवं संचार) , पसूका, वित्त मंत्रालय से प्राप्त जानकारी के आधार पर

 21-जुलाई-2012 21:07 IST