Thursday, May 01, 2014

मई दिवस की कहानी

स्पाइस की पुकार पूँजीपतियों के दिलों में ख़ौफ़ पैदा करती रहेगी
मज़दूरों का त्योहार मई दिवस आठ घण्टे काम के दिन के लिए मज़दूरों के शानदार आन्दोलन से पैदा हुआ। उसके पहले मज़दूर चौदह से लेकर सोलह-अठारह घण्टे तक खटते थे। कई देशों में काम के घण्टों का कोई नियम ही नहीं था। ”सूरज उगने से लेकर रात होने तक” मज़दूर कारख़ानों में काम करते थे। दुनियाभर में अलग-अलग जगह इस माँग को लेकर आन्दोलन होते रहे थे। भारत में भी 1862 में ही मज़दूरों ने इस माँग को लेकर कामबन्दी की थी। लेकिन पहली बार बड़े पैमाने पर इसकी शुरुआत अमेरिका में हुई।
मज़दूरों ने अपने अनुभवों से समझ लिया था कि उनकी एकता ही उनकी सबसे बड़ी ताक़त है।
मज़दूरों ने अपने अनुभवों से समझ लिया था कि उनकी एकता ही उनकी सबसे बड़ी ताक़त है।
अमेरिका में एक विशाल मज़दूर वर्ग पैदा हुआ था। इन मज़दूरों ने अपने बलिष्ठ हाथों से अमेरिका के बड़े-बड़े शहर बसाये, सड़कों और रेल पटरियों का जाल बिछाया, नदियों को बाँधा, गगनचुम्बी इमारतें खड़ी कीं और पूँजीपतियों के लिए दुनिया भर के ऐशो-आराम के साधन जुटाये। उस समय अमेरिका में मज़दूरों को 12 से 18 घण्टे तक खटाया जाता था। बच्चों और महिलाओं का 18 घण्टों तक काम करना आम बात थी। अधिकांश मज़दूर अपने जीवन के 40 साल भी पूरे नहीं कर पाते थे। अगर मज़दूर इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते थे तो उन पर निजी गुण्डों, पुलिस और सेना से हमले करवाये जाते थे! लेकिन इन सबसे अमेरिका के जाँबाज़ मज़दूर दबने वाले नहीं थे! उनके जीवन और मृत्यु में वैसे भी कोई फ़र्क नहीं था, इसलिए उन्होंने लड़ने का फैसला किया! 1877 से 1886 तक मज़दूरों ने अमेरिका भर में आठ घण्टे के कार्यदिवस की माँग पर एकजुट और संगठित होने  शुरू किया। 1886 में पूरे अमेरिका में मज़दूरों ने ‘आठ घण्टा समितियाँ’ बनायीं। शिकागो में मज़दूरों का आन्दोलन सबसे अधिक ताक़तवर था। वहाँ पर मज़दूरों के संगठनों ने तय किया कि 1 मई के दिन सभी मज़दूर अपने औज़ार रखकर सड़कों पर उतरेंगे और आठ घण्टे के कार्यदिवस का नारा बुलन्द करेंगे।
1886 में मज़दूरों द्वारा अमेरिका के एक शहर में खड़ा किया गया विशालकाय बैनर। इस पर लिखा है -- 8 घण्टा मेहनत, 8 घण्टा मनोरंजन, 8 घण्टा आराम।
1886 में मज़दूरों द्वारा अमेरिका के एक शहर में खड़ा किया गया विशालकाय बैनर। इस पर लिखा है — 8 घण्टा मेहनत, 8 घण्टा मनोरंजन, 8 घण्टा आराम।
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शिकागो के कारख़ानों के इलाक़ों से गुज़रता मज़दूरों का जुलूस।
शिकागो के कारख़ानों के इलाक़ों से गुज़रता मज़दूरों का जुलूस।
एक मई 1886 को पूरे अमेरिका के लाखों मज़दूरों ने एक साथ हड़ताल शुरू की। इसमें 11,000 फ़ैक्टरियों के कम से कम तीन लाख अस्सी हज़ार मज़दूर शामिल थे। शिकागो महानगर के आसपास सारा रेल यातायात ठप्प हो गया और शिकागो के ज्यादातर कारख़ाने और वर्कशाप बन्द हो गये। शहर के मुख्य मार्ग मिशिगन एवेन्यू पर अल्बर्ट पार्सन्स के नेतृत्व में मज़दूरों ने एक शानदार जुलूस निकाला।
मज़दूरों की बढ़ती ताक़त और उनके नेताओं के अडिग संकल्प से भयभीत उद्योगपति लगातार उन पर हमला करने की घात में थे। सारे के सारे अख़बार (जिनके मालिक पूँजीपति थे।) ”लाल ख़तरे” के बारे में चिल्ल-पों मचा रहे थे। पूँजीपतियों ने आसपास से भी पुलिस के सिपाही और सुरक्षाकर्मियों को बुला रखा था। इसके अलावा कुख्यात पिंकरटन एजेंसी के गुण्डों को भी हथियारों से लैस करके मज़दूरों पर हमला करने के लिए तैयार रखा गया था। पूँजीपतियों ने इसे ”आपात स्थिति” घोषित कर दिया था। शहर के तमाम धन्नासेठों और व्यापारियों की बैठक लगातार चल रही थी जिसमें इस ”ख़तरनाक स्थिति” से निपटने पर विचार किया जा रहा था।
हेमार्केट में मीटिंग में बोलते हुए मज़दूर नेता सैमुअल फ़ील्डेन।
हेमार्केट में मीटिंग में बोलते हुए मज़दूर नेता सैमुअल फ़ील्डेन।
3 मई को शहर के हालात बहुत तनावपूर्ण हो गये जब मैकार्मिक हार्वेस्टिंग मशीन कम्पनी के मज़दूरों ने दो महीने से चल रहे लॉक आउट के विरोध में और आठ घण्टे काम के दिन के समर्थन में कार्रवाई शुरू कर दी। जब हड़ताली मज़दूरों ने पुलिस पहरे में हड़ताल तोड़ने के लिए लाये गये तीन सौ ग़द्दार मज़दूरों के ख़िलाफ़ मीटिंग शुरू की तो निहत्थे मज़दूरों पर गोलियाँ चलायी गयीं। चार मज़दूर मारे गये और बहुत से घायल हुए। अगले दिन भी मज़दूर ग्रुपों पर हमले जारी रहे। इस बर्बर पुलिस दमन के ख़िलाफ़ चार मई की शाम को शहर के मुख्य बाज़ार हे मार्केट स्क्वायर में एक जनसभा रखी गयी। इसके लिए शहर के मेयर से इजाज़त भी ले ली गयी थी।
मीटिंग रात आठ बजे शुरू हुई। क़रीब तीन हज़ार लोगों के बीच पार्सन्स और स्पाइस ने मज़दूरों का आह्वान किया कि वे एकजुट और संगठित रहकर पुलिस दमन का मुक़ाबला करें। तीसरे वक्ता सैमुअल फ़ील्डेन बोलने के लिए जब खड़े हुए तो रात के दस बज रहे थे और ज़ोरों की बारिश शुरू हो गयी थी। इस समय तक स्पाइस और पार्सन्स अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ वहाँ से जा चुके थे। इस समय तक भीड़ बहुत कम हो चुकी थी — कुछ सौ लोग ही रह गये थे। मीटिंग क़रीब-क़रीब ख़त्म हो चुकी थी कि 180 पुलिसवालों का एक जत्था धड़धड़ाते हुए हे मार्केट चौक में आ पहुँचा। उसकी अगुवाई कैप्टन बॉनफ़ील्ड कर रहा था जिससे शिकागो के नागरिक उसके क्रूर और बेहूदे स्वभाव के कारण नफ़रत करते थे। मीटिंग में शामिल लोगों को चले जाने का हुक्म दिया गया। सैमुअल फ़ील्डेन पुलिसवालों को यह बताने की कोशिश ही कर रहे थे कि यह शान्तिपूर्ण सभा है, कि इसी बीच किसी ने मानो इशारा पाकर एक बम फेंक दिया। आज तक बम फेंकने वाले का पता नहीं चल पाया है। यह माना जाता है कि बम फेंकने वाला पुलिस का भाड़े का टट्टू था। स्पष्ट था कि बम का निशाना मज़दूर थे लेकिन पुलिस चारों और फैल गयी थी और नतीजतन बम का प्रहार पुलिसवालों पर हुआ। एक मारा गया और पाँच घायल हुए। पगलाये पुलिसवालों ने चौक को चारों ओर से घेरकर भीड़ पर अन्धाधुन्ध गोलियाँ चलानी शुरू कर दीं। जिसने भी भागने की कोशिश की उस पर गोलियाँ और लाठियाँ बरसायी गयीं। छ: मज़दूर मारे गये और 200 से ज्यादा जख्मी हुए। मज़दूरों ने अपने ख़ून से अपने कपड़े रँगकर उन्हें ही झण्डा बना लिया।
पुलिस के एक एजेण्ट ने मीटिंग में बम फेंक दिया।
पुलिस के एक एजेण्ट ने मीटिंग में बम फेंक दिया। 
आठों गिरफ्तार मज़दूर नेताओं और शिकागो की घटनाओं की जगहों को दिखाने वाला उस समय का एक पोस्टर।
आठों गिरफ्तार मज़दूर नेताओं और शिकागो की घटनाओं की जगहों को दिखाने वाला उस समय का एक पोस्टर।
इस घटना के बाद पूरे शिकागो में पुलिस ने मज़दूर बस्तियों, मज़दूर संगठनों के दफ्तरों, छापाख़ानों आदि में ज़बरदस्त छापे डाले। प्रमाण जुटाने के लिए हर चीज़ उलट-फलट डाली गयी। सैकड़ों लोगों को मामूली शक पर पीटा गया और बुरी तरह टॉर्चर किया गया। हज़ारों गिरफ्तार किये गये। आठ मज़दूर नेताओं — अल्बर्ट पार्सन्स, आगस्ट स्पाइस, जार्ज एंजेल, एडाल्फ़ फ़िशर, सैमुअल फ़ील्डेन, माइकेल श्वाब, लुइस लिंग्ग और आस्कर नीबे — पर झूठा मुक़दमा चलाकर उन्हें हत्या का मुजरिम क़रार दिया गया। इनमें से सिर्फ़ एक, सैमुअल फ़ील्डेन बम फटने के समय घटनास्थल पर मौजूद था। जब मुक़दमा शुरू हुआ तो सात लोग ही कठघरे में थे। डेढ़ महीने तक अल्बर्ट पार्सन्स पुलिस से बचता रहा। वह पुलिस की पकड़ में आने से  बच सकता था लेकिन उसकी आत्मा ने यह गवारा नहीं किया कि वह आज़ाद रहे जबकि उसके बेक़सूर साथी फ़र्जी मुक़दमें में फँसाये जा रहे हों। पार्सन्स ख़ुद अदालत में आया और जज से कहा, ”मैं अपने बेक़सूर साथियों के साथ कठघरे में खड़ा होने आया हूँ।”
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पूँजीवादी न्याय के लम्बे नाटक के बाद 20 अगस्त 1887 को शिकागो की अदालत ने अपना फ़ैसला दिया। सात लोगों को सज़ा-ए-मौत और एक (नीबे) को पन्द्रह साल क़ैद बामशक्कत की सज़ा दी गयी। स्पाइस ने अदालत में चिल्लाकर कहा था कि ”अगर तुम सोचते हो कि हमें फाँसी पर लटकाकर तुम मज़दूर आन्दोलन को… ग़रीबी और बदहाली में कमरतोड़ मेहनत करनेवाले लाखों लोगों के आन्दोलन को कुचल डालोगे, अगर यही तुम्हारी राय है – तो ख़ुशी से हमें फाँसी दे दो। लेकिन याद रखो… आज तुम एक चिंगारी को कुचल रहे हो लेकिन यहाँ-वहाँ, तुम्हारे पीछे, तुम्हारे सामने, हर ओर लपटें भड़क उठेंगी। यह जंगल की आग है। तुम इसे कभी भी बुझा नहीं पाओगे।”
अल्बर्ट पार्सन्स, ऑगस्ट स्पाइस, फ़िशर और एजेंल फाँसी के तख्ते पर। उन्हें फाँसी पर लटकाये जाने का तमाशा देखने के लिए अमेरिका के कई शहरों के अमीर जुटे हुए थे।
अल्बर्ट पार्सन्स, ऑगस्ट स्पाइस, फ़िशर और एजेंल फाँसी के तख्ते पर। उन्हें फाँसी पर लटकाये जाने का तमाशा देखने के लिए अमेरिका के कई शहरों के अमीर जुटे हुए थे।
सारे अमेरिका और तमाम दूसरे देशों में इस क्रूर फ़ैसले के ख़िलाफ़ भड़क उठे जनता के ग़ुस्से के दबाव में अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने पहले तो अपील मानने से इन्कार कर दिया लेकिन बाद में इलिनाय प्रान्त के गर्वनर ने फ़ील्डेन और श्वाब की सज़ा को आजीवन कारावास में बदल दिया। 10 नवम्बर 1887 को सबसे कम उम्र के नेता लुइस लिंग्ग ने कालकोठरी में आत्महत्या कर ली।
8.13 नवम्बर, 1887 को चारों मज़दूर नेताओं की शवयात्रा अमेरिका में दूर-दूर से आये मज़दूरों की एक विशाल रैली में बदल गयी। छह लाख से भी ज्यादा लोग इन नायकों को आख़िरी सलाम देने के लिए शिकागो की सड़कों पर उमड़ पड़े।
13 नवम्बर, 1887 को चारों मज़दूर नेताओं की शवयात्रा अमेरिका में दूर-दूर से आये मज़दूरों की एक विशाल रैली में बदल गयी। छह लाख से भी ज्यादा लोग इन नायकों को आख़िरी सलाम देने के लिए शिकागो की सड़कों पर उमड़ पड़े।
अगला दिन (11 नवम्बर 1887) मज़दूर वर्ग के इतिहास में काला शुक्रवार था। पार्सन्स, स्पाइस, एंजेल और फ़िशर को शिकागो की कुक काउण्टी जेल में फाँसी दे दी गयी। अफ़सरों ने मज़दूर नेताओं की मौत का तमाशा देखने के लिए शिकागो के दो सौ धनवान शहरियों को बुला रखा था। लेकिन मज़दूरों को डर से काँपते-घिघियाते देखने की उनकी तमन्ना धरी की धरी रह गयी। वहाँ मौजूद एक पत्रकार ने बाद में लिखा : ”चारों मज़दूर नेता क्रान्तिकारी गीत गाते हुए फाँसी के तख्ते तक पहुँचे और शान के साथ अपनी-अपनी जगह पर खड़े हो हुए। फाँसी के फन्दे उनके गलों में डाल दिये गये। स्पाइस का फन्दा ज्यादा सख्त था, फ़िशर ने जब उसे ठीक किया तो स्पाइस ने मुस्कुराकर धन्यवाद कहा। फिर स्पाइस ने चीख़कर कहा, ‘एक समय आयेगा जब हमारी ख़ामोशी उन आवाज़ों से ज्यादा ताक़तवर होगी जिन्हें तुम आज दबा डाल रहे हो…’ फिर पार्सन्स ने बोलना शुरू किया, ‘मेरी बात सुनो… अमेरिका के लोगो! मेरी बात सुनो… जनता की आवाज़ को दबाया नहीं जा सकेगा…’ लेकिन इसी समय तख्ता खींच लिया गया।
13 नवम्बर को चारों मज़दूर नेताओं की शवयात्रा शिकागो के मज़दूरों की एक विशाल रैली में बदल गयी। पाँच लाख से भी ज्यादा लोग इन नायकों को आख़िरी सलाम देने के लिए सड़कों पर उमड़ पड़े।
तब से गुज़रे 126 सालों में अनगिनत संघर्षों में बहा करोड़ों मज़दूरों का ख़ून इतनी आसानी से धरती में जज्ब नहीं होगा। फाँसी के तख्ते से गूँजती स्पाइस की पुकार पूँजीपतियों के दिलों में ख़ौफ़ पैदा करती रहेगी। अनगिनत मज़दूरों के ख़ून की आभा से चमकता लाल झण्डा हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता रहेगा।
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मतदान के बाद मतदाताओं का आभार

साथ ही किये सभी ने जीत के दावे 
लुधियाना, 30 अप्रैल 2014: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो):
मतदान के बाद अब मतदाताओं को धन्यवाद देने के सिलसिला शुरु हुआ है। जीत  की होगी लेकिन जीत के दावे सभि कर रहे हैं। 

आम आदमी पार्टी (आप) के प्रत्याशी श्री एच. एस. फूल्का तो लुधियाना चुनाव क्षेत्र के मतदाताओं का समर्थन देख एक बर फ़िर भाव-विभोर हो उठे। उन्होंने कहा कि, “आज युवाओं, महिलाओं और सभी मतदाताओं को ओटनी बड़ी संख्या में देख कर मतदान देते देख सभी को यह अंदाज़ा हो जायेगा कि, समग्र देश की तरह पंजाब में भी क्रांति आ चुकी  है। श्री फूल्का ने जिला आयुक्त का भी आभार प्रकट किया जिनके कार्यालय अधिकारीयों के सहयोग के बिना यह मतदाता अभियान इतने उपयुक्त रूप से सफल होना नामुमकिन था। 
इसी तरह लुधियाना से  कांग्रेस प्रत्याशी रवनीत सिंह बिट्टू ने भी वोटरों का धन्यावाद करते हुए कहा  कि लोग अकाली  दुखी हैं। इस बार मतदान में आई तेज़ रफतार तेजी इस बात का साफ़ सँकेत है कि लोग बदलाव क संकल्प लेकर उठे हैं और उन्होने बदलाव के लिये ही ज़ोरदार मतदान किया है। उन्होंने दावा किया कि इस ज़बरदस्त मतदान लहर ने से ह्मारी जीट सुनिश्चित लगती है। 
अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी मनप्रीत सिंह अयाली ने भी जीत को सुनिश्चित बताते कह है कि कटाई  होने के बावजूद इतना ज़बरदस्त मतदान सीधे सीधे अकाली दल को फायदा देगा। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि अगर कटाई नहीं चल रही होती तो मतदान 90 फीसदी होता। 
न्यू आल इण्डिया कांग्रेस पार्टी के प्रत्याशी मोहम्मद नसीम अन्सारी ने कहा कि इस बार चुनावों में लोगों  ने हमें बहुत गर्मजोशी से अपना प्रेम और सहयोग दिया है। इस ज़बरदस्त मतदान से साफ़ ज़ाहिर है कि फायदा हमे है होगा  ओर जीत ह्मारी है होगी। उन्होंने वोटरों का धन्यवाद करते हुए आश्वासन दिया कि जीत हुई तो वह भ्र्ष्टाचार से मुक्ति दिला देंगे और नशा मुक्त समाज बनायेँगे। 

Wednesday, April 30, 2014

दीक्षांत समारोह में राष्‍ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी का भाषण

30-अप्रैल-2014 19:47 IST
मणिपुर विश्‍वविद्यालय के समारोह में बताये छात्रोँ को जिँदगी के गुर 
The President, Shri Pranab Mukherjee addressing on the occasion of the 14th Convocation of Manipur University, at Canchipur, in Imphal, Manipur on April 29, 2014.
राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी 29 अप्रैल, 2014 को कांचीपुर, इम्फाल, मणिपुर में मणिपुर विश्वविद्यालय के 14वें दीक्षांत समारोह के अवसर पर संबोधित करते हुए। 
पूर्वोत्‍तर भारत में उच्‍च शिक्षा का प्रधान केन्‍द्र मणिपुर विश्‍वविद्यालय के इस 14वें दीक्षांत समारोह में शामिल होकर मुझे बड़ी खुशी है। 

1980 में अपनी स्‍थापना से ही मणिपुर विश्‍वविद्यालय पूर्वोत्‍तर क्षेत्र में शिक्षा को बढ़ावा देने में उत्‍कृष्‍ट भूमिका निभा रहा है। अपने पाठ्यक्रम के जरिए यह भारत के समेकित संस्‍कृति को फैला रहा है। इसके कार्यक्रम और नीतियों का उद्देश्‍य मानवता की भावना, सहनशीलता और जानकारी को बढ़ाना है। मैं इस विश्‍वविद्यालय के प्रणेताओं से अपील करता हूं कि वे पूरी लगन और शिद्दत से विश्‍वविद्यालय का विकास करते रहें। 

प्रिय छात्रों : 
मैं उन सभी छात्रों को बधाई देता हूं, जिन्‍हें आज डिग्री मिल रही है। मैं श्री रिशांग किशिंग और श्री एल. वीरेन्‍द्र कुमार सिंह को बधाई देता हूं, जिन्‍हें डॉक्‍टर ऑफ लॉ और डॉक्‍टर ऑफ लिटरेचर की उपाधि से सम्‍मानित किया गया है। 

किसी भी अकादमिक संस्‍थान के लिए दीक्षांत समारोह अति महत्‍वपूर्ण होता है। छात्रों और अध्‍यापकों के जीवन के जीवन में यह क्षण महत्‍वपूर्ण होते हैं। इस दिन छात्रों को अपनी कड़ी मेहनत का फल मिलता है। आप ज्ञान और मजबूत चरित्र से लैस होकर विश्‍वविद्यालय की सीमा छोड़ेंगे। विश्‍वविद्याल से बाहर जाकर परिवर्तन करें, अपने आस-पास के लोगों के जीवन को छूएं और उसमें बदलाव लाएं और खुशहाल विश्‍व बनाएं। 

मित्रों शिक्षा से अंधकार से प्रकाश की ओर, पिछड़ेपन को छोड़ आगे बढ़ा जाता है और बेहतर जीवन बनता है। भविष्‍य में तरक्‍की के लिए निवेश से अगर किसी को जोड़ा जाता है, तो वह है शिक्षा। शिक्षा की मजबूती से देश का निर्माण होता है और लम्‍बे समय ज्ञान से विकास हासिल किया गया है। ऐसे देशों ने बदलते संसाधनों को बड़ी आसानी से ग्रहण किया है। शिक्षा से ही उन्‍हें संसाधन की कमियों से निपटने की क्षमता हासिल हुई है और उच्‍च तकनीक आधारित अर्थव्‍यवस्‍था तैयार की गई है। अगर भारत दुनिया की कतार में आगे रहना चाहता है, तो यह सुदृढ़ शिक्षा पद्धति के जरिए ही हासिल किया जा सकता है। 

भारत में बड़ी संख्‍या में युवा हैं। दो तिहाई जनसंख्‍या 35 वर्ष से कम आयु के लोगों की है। वे हमारा भविष्‍य है, इसलिए उन्‍हें अच्‍छा नागरिक बनाने की आवश्‍यकता है। भारत में 20 प्रतिशत से कम लोगों का उच्‍चशिक्षा के क्षेत्र में नामांकन है। उच्‍चशिक्षा के सरंचना को बढ़ाने के लिए त्‍वरित प्रयास किये जा रहे है, क्‍योंकि यह पर्याप्‍त नहीं है और इससे हमारी आगे आने वाली पी‍ढ़ी की क्षमता कम हो सकती है। पिछले दशक के दौरान मणिपुर विश्‍वविद्यालय सहित कई केन्‍द्रीय विश्‍वविद्यालयों का निर्माण एक निर्णायक कदम था। मणिपुर विश्‍वविद्यालय को 2005 में केन्‍द्रीय विश्‍वविद्यालय बनाया गया था। ये विश्‍वविद्यालय प्राचीन भारत के उच्‍चशिक्षा केन्‍द्र नालंदा और तक्षशिला जैसा सम्‍मान पाने में सक्षम हैं। 

अगर हम हमारे देश की उच्‍चशिक्षा की स्थिति का ईमानदारी से आंकलन करें, तो यह कह सकते है कि विश्‍वस्‍तर की तुलना में कई उच्‍च अकादमिक संस्‍थान से बेहतर स्‍नातक नहीं निकल पा रहे है। विश्‍व की सर्वोच्‍च 200 विश्‍वविद्यालयों की सूची में एक भी भारतीय विश्‍वविद्यालय नहीं है। इस मुद्दे पर राष्‍ट्रपति भवन में आयोजित केन्‍द्रीय विश्‍वविद्यालयों के उप-कुलपतियों की वार्षिक बैठक में भी विचार-विमर्श किया गया था। 

मुझे यह जानकर खुशी है कि हमारे संस्‍थानों भी रैंकिंग प्रक्रिया को अब गंभीरता से लेना शुरू कर दिया है। पिछले वर्ष सितम्‍बर में आईआईएम कोलकाता को एक सम्‍मानीय एंजेंसी द्वारा प्रबंधन कार्यक्रम में स्‍नातकोत्‍तर की डिग्री देने वाला सबसे अच्‍छा बिजनेस स्‍कूल का दर्जा दिया गया। 

मित्रों: शिक्षा के आधार शिक्षक होते है। अच्‍छे अध्‍यापक शिक्षा मानकों को दर्शाते है। शिक्षकों के विकास के लिए कई उपाय की आवश्‍यकता है। रिक्‍त पड़े अध्‍यापकों के पदों को प्राथमिकता के आधार पर भरना होंगे। शिक्षा के क्षेत्र में विविधता और नये विचार लाने के लिए विदेश से प्रतिभाशाली शिक्षकों की भर्ती की जानी चाहिए। 

हमारे वि‍श्‍ववि‍द्यालय के काम-काज को जि‍न बीमारि‍यों ने घेर रखा है वह अच्‍छे शासन व्‍यवहार के अभाव के कारण है। शासन के ढ़ांचे को नि‍र्णय लेने की तेज पारदर्शी व्‍यवस्‍था वि‍कसि‍त करनी होगी। इस संदर्भ में संस्‍थान के पुराने लोगों को शासन व्‍यवस्‍था में शामि‍ल करके ऐसी गति‍शीलता दी जा सकती है जि‍सकी हमारी संस्‍थानों में कमी है। वर्तमान पाठ्यक्रमों की समीक्षा तथा नए पाठ्यक्रमों को लागू करने में भी संस्‍थान के पुराने लोगों के अनुभवों को लाभ उठाया जा सकता है। 

उद्योग के साथ व्‍यापक स्‍तर पर साझेदारी वि‍कसि‍त करने के लि‍ए ठोस प्रयास करना होगा। उद्योग और शि‍क्षा जगत के बीच आपसी संबंध के लि‍ए संस्‍थागत प्रबंध करना आवश्‍यक है। इससे शोध, पीठ तथा प्रशि‍क्षण कार्यक्रम चलाने के लि‍ए प्रायोजक मि‍ल सकेंगे। 

टैक्‍नोलॉजी बेहतरीन ज्ञान वाहक और सूचना का प्रसारक होती है। ज्ञान के नेटवर्क से बौद्धि‍क सहयोग में मदद मि‍लती है। इससे शारीरि‍क परेशानि‍यां भी समाप्‍त होती हैं। टैक्‍नोलॉजी आधारि‍त मीडि‍या अकादमि‍क आपाद-प्रदान के लि‍ए समय की आवश्‍यकता है। 

हमारे वि‍श्‍ववि‍द्यालयों में शोध की अनदेखी की स्‍थि‍ति‍ बदलनी होगी। हमारी शि‍क्षा प्रणाली में हमें बहु-वि‍षयात्‍मक दृष्‍टि‍ अपनानी होगी क्‍योंकि‍ अधि‍कतर शोधकार्यों में वि‍भि‍न्‍न वि‍षयों के लोगों की आवश्‍यकता होती है। हमें उन क्षेत्रीय वि‍शेषताओं पर जोर देना होगा जहां वि‍श्‍ववि‍द्यालय स्‍थापि‍त कि‍ए गए हैं। मणि‍पुर वि‍श्‍ववि‍द्यालय अपने शोध वि‍शेषज्ञता को इस तथ्‍य को ध्‍यान में रखते हुए प्राथमि‍कता दे सकता है कि‍ मणि‍पुर राज्‍य जैववि‍वि‍धता वाला राज्‍य है। 

हमारे वि‍श्‍ववि‍द्यालयों का कर्तव्‍य है कि‍ वे जि‍ज्ञासा का वातावरण बनाएं और अपने वि‍द्यार्थि‍यों को वैज्ञानि‍क शोध प्रदान करें। वि‍श्‍ववि‍द्यालयों को वि‍द्यार्थि‍यों के वि‍चारों तथा बुनि‍यादी खोजों को पंख लगाना चाहि‍ए। नए वि‍चारों को अच्‍छे उत्‍पाद में बदला जा सकता है और इस काम में वि‍श्‍ववि‍द्यालय अग्रणी भूमि‍का अदा कर सकते हैं। अनेक केंद्रीय वि‍श्‍ववि‍द्यालयों ने इनोवेशन क्‍लब स्‍थापि‍त कि‍ए गए हैं। इसे और आगे बढ़ाने के लि‍ए उस इलाके में स्‍थापि‍त आईआईटी और एनआईटी के इंक्‍यूबेटर्स का सहयोग लेना चाहि‍ए। इंक्‍यूबेटरों के साथ क्‍लबों के जुड़ाव से शोध के अग्रणी केंद्रों और आम आदमी के बीच संपर्क के लि‍ए 'इनोवेशन वेब' बनाने में मदद मि‍लेगी। आशा है कि‍ मणि‍पुर वि‍श्‍ववि‍द्यालय अगले कुछ वर्षों में नए खोज को बढ़ावा देगा। मुझे यह जानकर खुशी हुई है कि‍ वि‍श्‍ववि‍द्यालय ने इस दि‍शा में कदम बढाए हैं। 

मि‍त्रों, मणि‍पुर एक सुंदर राज्‍य है और कला, संस्‍कृति‍ तथा खेल-कुद के क्षेत्र में राष्‍ट्रीय और अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर शानदार प्रदर्शन कि‍या है। मणि‍पुर के युवाओं और महि‍लाओं की उपलब्‍धि‍यों पर भारत को गर्व है। मणि‍पुर भवि‍ष्‍य में देश को और गौरव दि‍लाएगा। यह आवश्‍यक है कि‍ सभी लोग वि‍शेषकर इस राज्‍य के युवा यह मानते हैं कि‍ हिंसा रहि‍त माहौल में ही अर्थव्‍यवस्‍था तथा समाज फल-फूल सकता है। हिंसा से कि‍सी समस्‍या का समाधान नहीं होता। हिंसा दर्द को बढ़ाती है और सभी पक्षों को आहत करती है। 

मैं मणि‍पुर के युवाओं का आह्वान करता हूं कि‍ वे अपने देश का भवि‍ष्‍य संवारने में देश के बाकी हि‍स्‍सों के युवाओं के साथ मि‍लकर काम करें। चाहे व्‍यापार हो, उद्योग हो, शि‍क्षा हो या संस्‍कृति‍ हो हमारे देश के लोग वि‍चारों, उद्यमों तथा युवा आबादी की ऊर्जा के बल पर आगे बढ़ रहे हैं। 

उभरते हुए भारत में मणि‍पुर के युवाओं के लि‍ए अपार अवसर हैं। मैं मणि‍पुर के युवाओं से अपील करता हूं कि‍ वे हिंसा तथा तनाव के काले दि‍नों को पीछे छोड दें और नया सवेरा होने दें। हमें अपने सामूहि‍क भवि‍ष्‍य में वि‍श्‍वास करते हुए आगे बढ़ना होगा। मैं यह आश्‍वस्‍त करना चाहूंगा कि‍ भारत सरकार तथा मणि‍पुर की सरकार यह सुनि‍श्‍चि‍त करने के लि‍ए कर्तव्‍य से बंधे हुए हैं कि‍ प्रत्‍येक मणि‍पुरी का जीवन सम्‍मानजनक हो और उन्‍हें समान अधि‍कार और अवसर मि‍ले। इसी कारण राज्‍य में अनेक प्रमुख आर्थि‍क वि‍कास कार्यक्रम अवसंरचना परि‍योजनाएं शुरू की जा रही है। 

मैं सफल और शांति‍पूर्ण तरीके से चुनाव कराने के लि‍ए मणि‍पुर के लोगों को धन्‍यवाद देता हूं। हमें खुशी मनाने चाहि‍ए कि‍ हम वि‍श्‍व के सबसे बड़ा लोकतंत्र है। 16वीं लोकसभा के लि‍ए चुनाव जारी है और मणि‍पुर सहि‍त हमारे देश के लोग बड़ी संख्‍या में अपना वोट डालने नि‍कल रहे हैं और अपने अधि‍कारों का इस्‍तेमाल कर रहे हैं। 

मुझे यह जानकर खुशी हुई है कि‍ 2009 में प्रति‍बंधि‍त मणि‍पुर वि‍श्‍ववि‍द्यालय छात्र संघ अगले शैक्षि‍क सत्र से फि‍र अस्‍ति‍त्‍व में आएगा। मुझे वि‍श्‍वास है कि‍ छात्र संघ इस वि‍श्‍ववि‍द्याल के वि‍द्यार्थि‍यों के कल्‍याण में महत्‍वपूर्ण और साकारात्‍मक भूमि‍का अदा करेगा। यह दुर्भाग्‍यपूर्ण है कि‍ राजधानी दि‍ल्‍ली में पूर्वोत्‍तर के युवाओं पर हमले की दुखद घटनाएं देखने को मि‍ली है। हमें यह सुनि‍श्‍चि‍त करना होगा कि‍ हमारे देश का बहुलवादी चरि‍त्र तथा भारत की एकता का तार ऐसी घटनाओं से कमजोर न हो। मुझे खुशी है कि‍ केंद्र सरकार तथा दि‍ल्‍ली की सरकार ने अभि‍युक्‍तों को पकड़ने और उन्‍हें सज़ा दि‍लाने में दृढ़ कदम उठाए हैं और ऐसे उपाय सुनि‍श्‍चि‍त कि‍ए हैं कि‍ ऐसी घटनाएं दोबारा न हो। 

मि‍त्रों, भारत नए अवसरों तथा उंची उपलब्‍धि‍यों के चौराहे पर खड़ा है भारत द्वारा वि‍श्‍व का नेतृत्‍व करने की बात अब कोई काल्‍पनि‍क बात नहीं है। आप देश के शि‍क्षि‍त युवा उभरते हुए नए भारत का नि‍र्माण करेंगे। अपनी शि‍क्षा का इस्‍तेमाल समाज में परि‍वर्तन के लि‍ए करें। आप महात्‍मा गांधी की इन शब्दों से प्रेरणा लें 'शि‍क्षा का मूल आप के अंदर की श्रेष्‍ठ बातों को बाहर नि‍कालना है' मैं भवि‍ष्‍य में मणि‍पुर वि‍श्‍ववि‍द्यालय की सफलता और आपके उज्‍जवल भवि‍ष्‍य की कामना करता हू्ं। 

धन्‍यवाद जय हि‍न्‍द 
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वि.के./एजी/ए.एम./वाई.बी/एसकेपी-1451