Sunday, September 25, 2011

"अहिल्या "// अलका सैनी की नयी नज़म


कल जब मै तुम्हारे घर की तरफ आई
तो देखा दरवाजे  और खिड़कियाँ खुले थे
मेरे  अंतर्मन में हजारों पुष्प  खिल गए    
पर  देखते-देखते  दरवाजे और खिड़कियाँ बंद हो गए
यह  देख  मेरी रूह गहराई तक  काँप गई   
खुश्क आहों में  मैं   थर्रथर्राती रही 
दर्द से बिलखकर सुबकती  रही 
गिड़गिडाकर इन्तजार करती रही 
दरवाजा खुलने का 

पर कोई  दरवाजा नहीं खुला 
मै बहुत देर तक बाहर सामने की रेलिंग पर बैठी सोचती रही 
शायद समय देखकर तुम आओगे 
मुझे उठाओगे, मुझे अपने सीने से लगाओगे 
पर तुम नहीं आए 
मै वहीँ नीचे घास पर बैठे- बैठे सोने लगी 
सारी रात तुम्हारी राह देखती रही 

आसमान मेरे आँसुओं का गवाह था 
वो भी मेरे साथ पानी बरसा रहा था
धरती का आँचल भी मेरे साथ भीग रहा था 
पेड़- पौधों की हालत भी मेरे जैसी थी 
पास में बैंच के नीचे एक कुत्ता भी 
बीच- बीच में अपनी नजर उठा लेता था 
दूर एक गाय शायद प्रसव पीड़ा से तड़प रही थी 
हम सब मिलकर एक दूसरे का दुःख बाँट रहे थे   
कई राह चलते मुझ पर बेचारी सी नजर डाल कर आगे बढ़ गए 
जैसे ठंडी हवाएँ मेरे तन को छूकर जाती रही 
मै बारिश के तूफ़ान  में भीगती रही हमेशा की तरह 
पर वहाँ कोई नहीं था मेरे आंसू पोंछने वाला 
जब भी अँधेरे में कोई आकृति नजर आती 
मै उठ कर बैठ जाती कि शायद तुम आए होंगे 
फिर अपना वहम समझ कर वहीँ लेट जाती
मुझे पहली बार उस अँधेरी भयानक रात से भी डर नहीं लगा 
सुबह होते -होते 
आसमान भी  बरस कर थक गया 
धरती की प्यास भी बुझ गई 
पेड़- पौधे भी उजली किरण में खिल  गए 
कुत्ते को कहीं से एक हड्डी मिल गई 
बछड़ा अपनी माँ का दूध पीने लगा 
परन्तु मेरे नैनों का नीर कहाँ सूखा था ?
फिर मै भी मुक्त  हो गई और 
तब  मेरी रूह आँसुओं के सैलाब में विलीन हो गई  
पीछे छोड़ गई   एक बेजान पत्थर का बुत  
जो आज तक अहिल्या की तरह 
किसी राम के आने का इन्तजार कर रहा है 
पर कलयुग में कोई राम हो सकता है ?
     
                                --अलका सैनी

3 comments:

mridula pradhan said...

bahut achchi lagi......

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है! आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

रविकर said...

सुन्दर प्रस्तुति पर
बहुत बहुत बधाई ||