Monday, October 11, 2010

खुशियों को ढूँढ़ते हैं पत्थर की दीवारों में.


यूपी  के मुज़फ्फरनगर की बात चले तो डॉ अ कीर्तिवर्धन का ज़िक्र छिड़े बिना बात बन ही नहीं सकती. वह लिखते हैं और बहुत ही अच्छा लिखते हैं.सागरों सी गहरायी...आकाश छूने वाली ऊँचाई... उनकी एक कविता के कुछ अंश पंजाब स्क्रीन में भी विशेष तौर पर दिए गए थे.इस कविता से मेरी आँखें भीग गयी थीं.मुझे अपने बचपन के दिन याद आ गये थे.मेरी छोटी बेटी और उसकी सहेलियों ने भी जब यह कविता पढ़ी तो उन्हें इसमें अपने मन की बात महसूस हुई. बच्चों के लिए तो बहुत कुछ लिखा गया है पर एक बच्चा बन कर उनकी अंतर आत्मा में बैठ कर बहुत ही कम लिखा गया. पापा के बिन एक बेटी के मन की क्या हालत होती है उसे उन्होंने बहुत ही खूबसूरती से प्रस्तुत किया है.देखिये ज़रा एक झलक.
पापा तुम घर कब आओगे?
मम्मी मुझको रोज बताती
चंदामामा भी दिखलाती
क्यों रहते तुम चंदा पास?
नहीं आती क्या मेरी याद?
दादी भी मुझको बहकाती
भगवान् की बात सुनाती
खेल रहे तुम उसके साथ
नहीं आती क्या मेरी याद?
पापा तुम जल्दी आ जाओ
वर्ना मैं खुद आ जाउंगी
भगवान् से बात करुँगी
तुमको घर ले आउंगी.
पापा तुम जब घर आओगे
मैं संग आपके खेलूंगी
खाना खाऊं दूध पीउंगी
कभी नहीं मैं रोउंगी.

रात को जब मम्मी सोती है
बिस्तर मे वह रोती है
करती वह तुमसे जब बात
आती मुझको आपकी याद.

उनकी इस मर्मस्पर्शी कविता के ऊपर दिए गए अंश मुझे अचानक ही इंटरनैट पर किसी और चीज़ की खोज के दौरान  मिले थे. जब उनसे बात हुई तो बहुत सी और बातें भी निकली. कलम की इस यात्रा के बारे में उन्होंने बताया कि लेखन की शुरुयात हुई थी 1972 में. उन दिनों उन्होंने कई कवितायें लिखीं पर एक कविता...जो एक मुखड़े पर थी वह अब तक दिल में बसी है. वह कहीं छपी भी नहीं पर फिर भी उन्हें जुबानी याद है. दिल के कागज़ पर प्रकाशित इस कविता के बोल कुछ यूं थे. 
हम तुमसे जुदा हो कर
रोते हैं बहारों में

दिन में चांद(साभार:EGU

चंदा को ढूँढ़ते हैं
दिन के उजालों में
पक्षी जो चहकते थे
जंगल की बहारों में
खुशियों को ढूँढ़ते हैं
पत्थर की दीवारों में.
गर कहीं तुम मिल जाओ
आंसू पोंछ लें हम
आँचल के किनारों में.

 
 बस इसी तरह यह सिलसिला जारी रहा. फिर कुछ दोस्तों ने प्रेरणा दी. वर्ष 2005 में उनकी पहली किताब छप कर सब के सामने आई. नाम था...मेरी उड़ान....उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. एक के बाद एक...छह किताबें उनके नाम को साहित्य के आकाश में चमका रही हैं. उनकी कवितायें वास्तव में शोषित वर्ग की बातें होती है.बहुत तीखी और बहुत ही गहरी बात करने की कला में उन्हें मुहारित हासिल है. डाक्टर कीर्तिवर्धन से आप उनके ब्लॉग पर भी मिल सकते हैं. उनकी पुस्तकें आप पढना चाहें या डायूनलोड करना चाहें तो आप यहाँ क्लिक कर सकते हैं. उनका मोबाईल फोन नम्बर है:09911323732
और मेल आई डी है a.kirtivardhan@gmail.com
a.kirtivardhan@rediffmail.com



2 comments:

मनोज कुमार said...

सच मन् अंदर् तक् भींग् गया।
रोटी को रोती कर् दें।

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
नवरात्र के पावन अवसर पर आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!

दुर्नामी लहरें, को याद करते हैं वर्ल्ड डिजास्टर रिडक्शन डे पर , मनोज कुमार, “मनोज” पर!

Navin C. Chaturvedi said...

मान को भावों को झंक्रत करती कविता|