Saturday, September 11, 2010

सब के कंधों पर है बोझ गुनाहों का; नेकी तो दो चार उठाये फिरते हैं...!

ब्लॉग जगत में नए नए हस्ताक्षर आ रहे हैं. एक नया ब्लॉग आया है. जिसमें पेंटिंगज़ भी हैं, तस्वीरें भी और कविता भी.  कविता का कुछ झलक यहां आप भी देख सकते हैं :

शायद कुछ ऐसे उत्तर हैं, जिन के प्रश्नों पर भी सवाल आया,
सब भूल गयी, बस भूल गयी,
बीता लम्हा जब याद आया.......
पूरी कविता के लिए क्लिक करें  
एक और काव्य अंश देखिये...: 
अन्दर थे जो जज़्बात , जुबान पर न आ सके...
साथ बैठे वो यूँ ही मुस्कुरा दिए...
शायद इन आँखों का भी मौसम वही था...
थिरकते होठों का जवाब वही था...
जो बात चाहते हुए भी लब तक न आ सकी...
हमारी इक नज़र ने उन्हें ये खबर पहुँच दी...
पूरी रचना देखिये 
हर पल गुज़रता गया, इंतज़ार में तेरे
ख्वाब था या हकीकत, जो अब तक याद है मुझे
कैसे दिन गुज़र गए, शायद उम्मीद थी कहीं
दस्तक देगा कोई, दबा अरमान था कहीं
जितना भुलाना चाहा,उतना गहरा उतर गया
जो अजनबी सा था, वो वजूद है अभी

पूरी कविता के लिए यहां चटखा लगायें.  रोमा जैन का यह ब्लाग आपको कैसा लगा अवश्य बताएं. Soul-Mate नाम के इस ब्लॉग में अंग्रेजी की कवितायें भी हैं. आज जब माता पिता को वृद्ध आश्रमों में रखने वाले बेटे लोगों की आलोचना का शिकार हो रहे हैं उस समय एक नया विचार प्रस्तुत किया गया है की जब बहुत से माता पिता अपने बचों की परवरिश के लिए किसी बाल घर, अपना घर या बेबी सिट्टर की तलाश में रहते हैं तो फिर वे अपने बच्चों से कैसे यह आशा कर  सकते हैं कि वे उन्हें बुढापे में आश्रय दें. आप यह सभी कुछ पढ़ सकते हैं ब्लॉग पगडंडी में.वहां आपको और भी बहुत कुछ मिलेगा. अहंकार से इन्सान की बहुत सी खूबियां नष्ट हो जाती हैं. उसकी प्रगति रुक जाती है और वह उंचाईयां छूने की बजाये नीचे, और नीचे  और नीचे पहुंच कर गुमनामी और असफलता की गर्त में खो जाता है. इस तरह के बहुत से सवालों की चर्चा कर रहा है एक और नया ब्लाग सोच-परख़. हिंदी के ब्लॉग जगत में फ़िल्मी ब्लागों की कमी अक्सर खटकती थी.लकुलीश शर्मा इस कमी को पूरा करते हुए बहुत ही सुंदर ब्लॉग लेकर आयें हैं: अनजान सी राहों में: इसमें आपको दबंग की चर्चा भी मिलेगी, पीपली लाइव की भी, लफंगे परिंदे की भी  और बहुत कुछ और भी. आपको बस यहां एक चटखा लगाना होगाइसी तरह स्पोर्ट्स की चर्चा कर रहा है एक नया ब्लाग गायत्री जिसमें आपको काफी नया अंदाज़ मिलेगा.कुमेंत्री जैसे अंदाज़ में प्रस्तुत की गयीं कई रचनाएँ तुरंत अपना प्रभाव  डालती हैं. बस यहाँ क्लिक करें और खुद ही अनुभव करें.अब चर्चा करते हैं गज़ल की. एक बहुत ही खूबसूरत शेयर मुलाहजा फरमाइए. 
सब के कंधों पर है बोझ गुनाहों का; 
नेकी तो दो चार उठाये फिरते हैं...!
आप इस गज़ल के सभी शेयर पढ़ सकते हैं शकील जमाली के ब्लॉग धुप तेज़ है पर चटखा लगा कर.
बच्चों पर बहुत ही कम लिखा गया है. जितना लिखा गया है उसमें भी जियादातर  तो वही है जो बड़ों ने बड़े बन कर लिखा. ऐसी रचनायें बहुत कम हैं जो किसी बड़े ने बच्चा बन कर, उनके मन में बैठ कर, उनके दिमाग की तरंगों को महसूस करके लिखीं हों. एक ऐसी ही रचना का अंश आप भी देखिये.....यह उस बच्ची की कहानी है जिस होस्टल में छोड़ दिया गया है और वह परिवार से बिछुड़ कर बहुत उदास है और कहती है.:
मेरा दिल है बड़ा उदास.
आओ पापा मेरे पास
मेरा दिल है बड़ा उदास
मम्मी की भी याद सताती

भैया को मैं भूल न पाती.
तुमसे मैं कुछ न मांगूगी
पढने मे प्रथम आउंगी
रखो मुझको अपने पास
मेरा दिल है बड़ा उदास.
नहीं सहेली संग खेलूंगी
गुडिया को भी बंद कर दूंगी
बैठूंगी भैया के पास
मेरा दिल है बड़ा उदास.
जाओगे जब कल्ब मे आप
मम्मी को ले कर के साथ
रह लूंगी दादी के पास
मेरा दिल है बड़ा उदास.

नहीं चाहिए चॉकलेट टाफी
नहीं चाहिए मुझको फ्राक
मम्मी पापा मुझे चाहिए
मेरा दिल है बड़ा उदास.

पूरी कविता पढ़िए ऐ. कीर्ति वर्धन के ब्लॉग मेरी उड़ान में बस यहां क्लिक करके. वहां आपको बहुत सी खूबसूरत कवितायें और भी मिलेंगी. कभी किसी समय जानेमाने शायर जावेद अख्तर ने लिखा था :
धर्म तो आया था दुनिया में मोहब्बत के लिए, 
फिर इनके हाथों में यह तलवार ये भाले क्यूं हैं.....
अब जब धर्म स्थलों के विवाद अदालतों और सड़कों तक पहुंच रहे हैं उस दौर में अख्तर साहिब की सोच को आगे बढाने के लिए जो काफिला चल रहा है उसमें शामिल हुआ है एक और शायर जो इन्डियन के नाम से लिख रहा है. अभय नाम के ब्लॉग में कविता है नींव जिसमें लिखा है:  
मेरी सांसों में यही दहशत समाई रहती है
मज़हब से कौमें बँटी तो वतन का क्या होगा।
यूँ ही खिंचती रही दीवार ग़र दरम्यान दिल के
तो सोचो हश्र क्या कल घर के आँगन का होगा।
जिस जगह की बुनियाद बशर की लाश पर ठहरे
वो कुछ भी हो लेकिन ख़ुदा का घर नहीं होगा।
मज़हब के नाम पर कौ़में बनाने वालों सुन लो तुम
काम कोई दूसरा इससे ज़हाँ में बदतर नहीं होगा।
मज़हब के नाम पर दंगे, सियासत के हुक्म पे फितन
यूँ ही चलते रहे तो सोचो, ज़रा अमन का क्या होगा।
अहले-वतन शोलों के हाथों दामन न अपना दो
दामन रेशमी है "दीपक" फिर दामन का क्या होगा ..............???????????

इस ब्लाग को देखिये यहां चटखा लगा कर. वहां आपको इस तरह की बहुत सी और सामग्री भी मिलेगी.
अब गज़ल के साथ साथ आप तकनीक, समाज या विज्ञान पर भी कुछ पढ़ना चाहते हैं तो बसयहां चटख लगा कर इंटरनेट दुनिया को भी अवश्य देखिये. आखिर में अब अगर हम चिटठा चर्चा की बात न करें तो बात बनेगी नहीं.  हिंदी भाषा और ब्लॉग जगत के विकास में लगातार नयी से नयी जानकारी जुटा कर सभी तक पहुंचाने वाले चिटठाजगत का योगदान ऐतिहासिक है. 
आप भी अपने ब्लॉग की जानकारी हमें भेजें. अगर आपने किसी मित्र के ब्लॉग पर कुछ अच्छा देखा है तो उसकी सूचना भी दें. हम उसे आपके नाम के साथ प्रकाशित करेंगे.--रेक्टर कथूरिया.


क्या आपको यह लेख पसंद आया? अगर हां, तो ...इस ब्लॉग के प्रशंसक बनिए ना !!

2 comments:

S.M.MAsum said...

एक अच्छा लेख़, जो बहुत दिनों बाद पढने को मिला. धन्यवाद्

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
काव्यशास्त्र (भाग-1) – काव्य का प्रयोजन, “मनोज” पर, आचार्य परशुराम राय की प्रस्तुति पढिए!