Sunday, July 18, 2010

सबसे अच्छी कविताओं की तलाश

मीडिया के समर्थन और विकास की संस्था के द्वारा एदुआर्द हील जिन्हें “श्रीमान त्रो-लो-लो” भी कहा जाता है, के शब्दविहीन स्वरगान के लिए सबसे अच्छी कविता-प्रतियोगिता का आयोजन किया गया है। 
यह प्रतियोगिता एक ही नामांकन में- संगीतकार अर्कादी अस्त्रोव्स्की के संगीत पर आधारित शब्दविहीन स्वरगान के लिए एक दोहे के रूप में आयोजित की गई है।   
कविता का विषय लेखक द्वारा स्वतंत्र रूप से चुना जाएगा जिसमें जीवन के बारे में कवि का दृष्टिकोण प्रतिबिम्बित होना चाहिए। 
प्रतियोगिता में जाति या उम्र के किसी भिन्नभेद के बिना कोई भी व्यक्ति भाग ले सकता है। 
कविता किसी एक कवि या कुछ कवियों द्वावा मिलकर लिखी जा सकती है। 
इस कविता को इलेक्ट्रॉनिक स्वरूप में इस विशेष ई-मेल पते पर भेजा जा सकता है:  trololo@ruvr.ru 
कविता के साथ साथ लेखक का नाम, ईमेल पता और टेलीफोन नम्बर लिखकर भेजना ज़रूरी होगा। 
मूल्याँकन मापदंड: विषय की मौलिकता, कथावस्तु का चयन और साहित्यिक शैली।  
आप अपनी कविताओं को 15 अगस्त 2010 से पहले किसी भी समय भेज सकते हैं। प्रत्येक सप्ताह में वेब-साइट BaltInfo.ru पर प्रतियोगिता के लिए मिलने वाली कविताओं के बारे में रिपोर्ट प्रकाशित की जाएगी। 
सबसे अच्छी कविताओं को प्रतियोगिता के अंतिम दौर में शामिल किया जाएगा। सभी कविताओं पर एक प्रतियोगिता आयोग  द्वारा  सोचविचार किया जाएगा जिसमें कवियों और संगीतकारों के अलावा सेंट पीटर्सबर्ग में मान्यता प्राप्त वाणिज्य दूतावासों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। इस आयोग की अध्यक्षता एदुआर्द हील करेंगे। 
विभिन्न भाषाओं में लिखे  सर्वश्रेष्ठ दोहों के आधार पर एक गीत की रचना की जाएगी जो अपनी ही तरह का  "विश्व का गान" होगा। 
प्रतियोगिता के अंतिम परिणामों और विजेताओं के नामों की घोषणा मध्य अगस्त में की जाएगी।  
एदुआर्द हील जिनको सोवियत समय में ही एक गायक के रूप में बड़ी लोकप्रियता मिली थी आज भी पूर्व सोवियत संघ के सभी गणराज्यों में  बहुत ही लोकप्रिय गायक हैं। और इस साल के मार्च माह में वे आपने स्वरगान “त्रो-लो-लो” की बदौलत पूरी दुनिया में बड़े लोकप्रिय हो गए। ऐसा लगता है कि गायक ने एक बार फिर इंटरनेट–ओलिंप पर चढ़ाई करने की ठान ली है। उन्होंने अपने स्वरगान “त्रो-लो-लो”  के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय सर्वश्रेष्ठ कविता प्रतियोगिता का आयोजन किया है। जैसा कि स्वयं एदुआर्द हील ने कहा है यह कविताएं प्यार, प्रकृति और तितलियों,- यानी किसी भी विषय पर और दुनिया की किसी भी भाषा में लिखी जा सकती हैं। एदुआर्द हील की अध्यक्षता वाली जूरी में उन सभी भाषाओं के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाएगा जिन भाषाओं में प्रतियोगिता के लिए कविताएं भेजी जाएंगी। 
गायक को इंटरनेट संजाल में लोकप्रियता दिलाने वाले हिट स्वरगान “त्रो-लो-लो” को सन् 1966 में संगीतकार अर्कादी अस्त्रोव्स्की ने स्वरबद्ध किया था और इसको नाम दिया था- "मैं बहुत खुश हूँ क्योंकि मैं आख़िरकार अपने घर में वापस आ गया हूँ।"  44 साल पहले रचे  इस संगीत को अभी तक शब्द नसीब नहीं हुए हैं  हालांकि इस स्वरगान को बहुत लोकप्रियता हासिल हुई है। एदुआर्द हील के अलावा इसे सोवियत गीत-संगीत के "सितारों" मुस्लिम मगमायेव और वलेरी ओबाद्जिन्स्की ने भी कई बार गाया है। "इंटरनेट से पहले" के युग में सन् 1976  में “त्रो-लो-लो” लोकप्रियता की बुलंदी पर था। तब स्वीडन में एदुआर्द हील एक दौरे पर गए और वहाँ पर ही एक रंगीन क्लिप को फ़िल्माया गया था। एदुआर्द हील शब्द-विहीन इस स्वरगान को सभी "भाषाओं" में गा सकते थे। वे जिस किसी देश की यात्रा करने के लिए जाते वहाँ ही यह गीत सुनाते। वे स्थानीय लोगों से सम्बोधित होकर कहते – अब मैं आपकी भाषा में एक गीन सुनाने जा रहा हूँ। श्रोता इस बात की प्रतीक्षा में रहते कि यह ला ला ला कब ख़त्म होगा और उनकी भाषा के शब्द गीत में कब आएंगे जोकि कभी आते ही नहीं थे। जब श्रोता असली बात को समझ जाते तो खूब हंसने लगते। एदुआर्द हील बताते हैं कि हर जगह पर ऐसा ही होता था, लोग बहुत खुश होते थे।  
शब्द-विहीन इस स्वरगान को दूसरा जीवन इंटरनेट ने प्रदान किया है। इंटरनेट में एदुआर्द हील का यह स्वरगान 2010 में बड़ा ही हिट हुआ। यू ट्यूब पर इसको लाखों लोगों ने देखा और सुना। एदुआर्द हील की इंटरनेट अतिथी-पुस्तिका में दुनियाभर के लाखों लोगों ने कई भाषाओं में टिप्पणियाँ लिखी हैं। कई लोगों ने उन्हें अपने देश में आकर यह गीत सुनाने के लिए आमंत्रित किया है। जिन लोगों को यह गीत बहुत ही पसंद आया उन्होंने ख़ुद भी इसको लोगों के समक्ष प्रस्तुत किया। अपनी जवानी के समय से ही ख्याति प्राप्त एदुआर्द हील इंटरनेट में अपनी ऐसी लोकप्रियता के बारे में कहते हैं- लोग इस गीत को सुनते हैं, यह बहुत अच्छा गीत है। आज वे मेरे मुँह से सुनते हैं, कल को किसी दूसरे के मुँह से सुनेंगे। 
जो कुछ भी हुआ है उसको लोगों की जिज्ञासा भी कहा जा सकता है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गायक की प्रतिभा की पहचान भी माना जा सकता है। जैसा भी हो, सोवियत युग के सितारे की इस सफलता पर हमें बड़ी खुशी महसूस हो रही है। एदुआर्द हील का रचनात्मक जीवन बहुत लम्बा और अति रोचक रहा है। वे अपने जीवन में यूरी गगारिन को मिले हैं, ....पेरिस के किसी रेस्तरां में काम करते रहे हैं और "हील एण्ड सन्ज़" नामक रॉक गीत परियोजना भी बना चुके हैं। वे दुनिया को दर्जनों ऐसे हिट गीत प्रदान कर चुके हैं, जैसे "जाड़ा", "गुमनाम बुलंदी पर" "चन्द्रकांत" "मास्को की सड़कों पर चलना " और "मातृभूमि कहाँ से शुरू होती है"। यह कोई संयोग की बात नहीं है कि एदुआर्द हील को अपना कार्यकर्म प्रस्तुत करने के लिए सैकड़ों न्योते मिल रहे हैं। 
क्या अब "त्रो-लो-लो" को सबसे अच्छी कविता के माध्यम से तीसरी बार एक नया जीवन मिल जाएगा? इस सवाल का जवाब भी उचित समय पर मिल जाएगा...!


और विवरण जाने के लिए और उस ख़ास संगीत की धुन सुनने के लिए यहां क्लिक करें:   
रेडियो रूस.

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