Monday, October 21, 2019

सुप्रसिद्ध कवयित्री डॉ. शकुंतला यादव का देहावसान

Monday:Oct 21, 2019, 9:38 PM
बाईपास सर्जरी के बाद अस्वस्थ थीं-साहित्य जगत में शोक की लहर 
लुधियाना: 21 अक्टूबर 2019: (*डा. राजेंद्र साहिल)::
एससीडी गवर्नमेंट कॉलेज , लुधियाना में लंबे समय तक हिंदी साहित्य का अध्यापन करने वाली और हिंदी की समर्थ एवं सुप्रसिद्ध कवयित्री डॉ. शकुंतला यादव आज अपनी जीवन-यात्रा संपूर्ण कर परम पिता परमात्मा के चरणों में जा बिराजीं। वे 73 वर्ष की थीं। उनका अंतिम संस्कार केवीएम के निकट वाले श्मशान घाट में किया गया। इसी महीने अर्थात 1 अक्तूबर 1946 को जन्मीं डॉ. शकुंतला यादव ने लगभग तीस वर्ष तक लुधियाना के सरकारी कॉलेज में अध्यापन किया और हिंदी के अनेक विद्यार्थियों के जीवन का निर्माण किया। डॉ. शकुंतला यादव ने हिंदी साहित्य को 'सूरज की तलाश', 'शब्दों के नील पंछी' और 'गुब्बारा: रौशनी और छिपकली' जैसे काव्य-संग्रहों समेत कुल छह पुस्तकें प्रदान कीं। वर्ष 2004 में सेवा-मुक्त होने के बाद से ही वह पुष्प विहार कॉलोनी, बाड़ेवाल कैनाल रोड, लुधियाना में निवास कर रहीं थीं और पिछले कुछ वर्षों से हृदय की बाईपास सर्जरी के कारण अस्वस्थ रहतीं थीं। डॉ. यादव अपने पीछे एक पुत्र-पुत्रवधू, दो पौत्र और अनेक शिष्य रूपी संतानें छोड़ गईं हैं। 
*-डा. राजेंद्र साहिल स्वर्गीय डा. शकुंतला यादव के बहुत ही नज़दीकी जानकारों/मित्रों में रहे। 

Sunday, September 15, 2019

मेला छपार: यहां कोई गद्दी नशीन नहीं-कहा धर्मेंद्र शर्मा ने

"हम सभी यहां पर सेवादार हैं"
छपार (लुधियाना): 13 सितम्बर 2019: (पंजाब स्क्रीन टीम):: 
आस्था-प्रेम और दोस्ती की कहानी को हर साल याद दिलाने वाला मेला छपार इस बार भी धूमधाम और उत्साह से मनाया गया। इस बार भी बहुत से लोग आये लेकिन पहले जैसी बात नज़र नहीं आ रही थी। मेले में आने वाले लोगों की कमी का ज़िक्र करते हुए सक्रिय सेवादार धर्मेंद्र शर्मा कहते हैं कि वास्तव में पिछली बार बारिशों ने रेकार्ड तोड़ दिया था। राजनैतिक दलों ने भी अपने पंडाल छोड़ कर अपने सम्मेलन कैंसल कर दिए थे जबकि इस बार गर्मी ने बस करा रखी है।  
इसके साथ ही धर्मेंद्र शर्मा कहते हैं कि सब बाबा के रंग हैं। बाबा जब चाहेंगे मेला इतना भरेगा कि सब पिछले रेकार्ड भी तोड़ देगा। इस तरह के उतराव चढ़ाव तो कई बार आये हैं। उन्होंने बहुत ही विश्वास से कहा कि यहाँ जल्द ही वे दिन फिर से आएंगे जब लाखों लाखों लोग यहाँ आएंगे मेला छपार में अपनी आस्था व्यक्त करने। उन्होंने एक सवाल का जवाब देते हुए स्पष्ट कहा कि यह गद्दी पीर बाबा सुलक्खन गुग्गा पीर जी की ही है कोई उनकी जगह नहीं ले सकता। कोई उनकी जगह गद्दी नशीन नहीं हो सकता। हम सभी यहाँ सेवादार हैं। यहाँ के पुजारी कह लो लेकिन यहाँ भगवान तो वही हैं। उनमें आस्था होने के कारण लाखों लोग हर बरस यहाँ माथा टेकने आते हैं वे हमारी वजह से नहीं आते। जो लोग खुद की गद्दी नशीन समझते हैं बाबा ही उन्हें सद्धबुद्धि देंगें।  उन्होंने कहा कि गद्दी नशीनी की यहाँ कोई परम्परा ही नहीं है। यहाँ केवल सेवा की परम्परा है। सेवा का फल बाबा सभी को बिना मांगे दे देते हैं। 

दरअसल मेला छपार की कहानी है आस्था की कहानी। सांप और इन्सान की दोस्ती की कहानी। एक ऐसी मोहब्बत की कहानी जिस पर जल्दी किये विशवास नहीं होता। एक वायदे की कहानी--जो आज तक निभाया जा रहा है। मन्दिर के प्रबन्धक कहते हैं यह कहानी 150 वर्ष से मित्रता का संदेश दे रही है। धर्मेंद्र  यह संख्या 300 वर्ष बताई। लोग अपने अपने हिसाब और यादाशत के  मुताबिक इस के इतिहास की चर्चा करते हैं। 

बात कर रहे थे हम आस्था, दोस्ती और मोहब्बत की। वायदों कीयह कहानी अविश्वनीय लग सकती है लेकिन इसका संदेश आज के युग में भी बहुत बड़ी हकीकत है। आज जब मानव ही मानव का दुश्मन हो गया है। भाई ही भाई की हत्या कर रहा है उस समय सांप और मानव की दोस्ती बहुत बड़ी उम्मीदें जगाती है कि देखो कभी ऐसा स्वर्णिम युग भी था। 

बताया जाता है कि एक किसानी परिवार में एक सांप और एक  लडके का जन्म एक साथ हुआ।  दोनों का प्रेम भी बहुत था। एक दिन जब लडके की मां उसे बीमारी की हालत में लिटा कर कहीं बाहर गयी तो उसके चेहरे पर धुप पड़ने लगी। उसके दोस्त सांप ने उसे धुप से बचाने के लिए ज्यों ही अपना फन फैलाया तो किसी राहगीर ने समझा की सांप उस लड़के को काटने लगा है। उसने तुरंत उस सांप को मार दिया। सांप के मरते ही वो लड़का भी मर गया। परिवार के साथ पूरे गाँव में मातम छा गया। वह सांप ही यहाँ गुग्गा पीर कहलाता है। 
बजुर्गों की सलाह पर इन दोनों के स्मृति स्थल के लिए एक जगह तलाश की गयी। आज इसे गुग्गा माड़ी या मैडी के नाम से जाना जाता है। हर वर्ष मेला लगता है और खूब भरता है। लाखों लोग आते हैं यहाँ मन्नतें मानने। और फिर उस मन्नत के पूरा होने पर शुकराना करने भी आते हैं। गौर हो कि यह मेला गुग्गा जाहिर पीर गुग्गा माड़ी मंदिर गांव छपार में लग रहा है। मालवे के इस प्रसिद्ध मेले में कई बड़ी सर्किस, दर्जन से अधिक झूले, जादूगर शो आदि यहां जाने वाले श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। मालवा क्षेत्र के इस प्रसिद्ध छपार मेले में दस से 12 लाख लोग पंजाब, हिमाचल, हरियाणा व चंडीगढ़ आदि क्षेत्रों से आते हैं और हिंदू, सिख, मुस्लिम सभी वर्ग के लोग एकत्रित होकर गुग्गा माड़ी मंदिर में अपनी मुराद मांगते हैं।
छपार मेले की प्रचलित कथा के अनुसार गुग्गा अपनी मां से क्रोधित होकर बांगड़ा अपने दोस्त खुल्लरियन के पास गांव छपार आ गया। यहां आकर उन्होंने अपने दोस्त से आलोप होने और प्रकट होने की सिद्धि प्राप्त की और दोनों दोस्तों ने यहीं समाधि ली। जब श्रद्धालू यहाँ मिटटी निकालते हैं तो उनके चेहरों पर उम्मीद की चमक देखने वाली होती है। मिटटी निकालते वक्त उनके हाथ कितना अदब से उठते हैं यह खुद वहां जा कर ही देखा जा सकता है।    
उसी समय से इस स्थान की मान्यता है। गुग्गा सर्पो का राजा माना जाता है। इसलिए कहा जाता है कि सर्पदंश का इलाज यहां अपने आप हो जाता है, ऐसी मान्यता है। मान्यता के अनुसार गुग्गा माड़ी मंदिर में माथा टेकने व मिंट्टी निकालने से सांप पूरे वर्ष नजर नहीं आएगा। धर्मेंद्र शर्मा बताते हैं कि वास्तविक शब्द माड़ी नहीं मैड़ी है। 
छपार जैसे मेले से ही निकले हैं आज के पूंजीपतियों और कारपोरेट घरानों के बड़े बड़े फेस्टिवल और मेले जो दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे शहरों में लगते हैं। उन मेलों में बड़ी बड़ी मशीनों के सौदे होते हैं और यहाँ छपार में अब भी ज़िंदगी चलाने के साधन मिलते हैं। यहाँ आने वाले सभी लोग यहाँ से कुछ न कुछ ले कर ही जाते हैं। किसी को साल भर की रोशन का अनाज मिल जाता है तो किसी को साल भर के खर्चे जितना कैश धन। ढोल बजाने वाले से ले कर खजला बेचने वाले तक हर कोई इस मेले से कमाई करता है। अनगिनत लोगों का रोज़गार है यह मेला। ज़रा ध्यान से देखो तो आपको नज़र आएंगे छोटे छोटे परिवार, साधारण से गरीब लोग, कोई नगार बजा रहा है, कोई मोर के पंख ले कर बैठा है, कोई नाच रहा है तो कोई कुल्फी बेच कोई रहा है, कोई गा रहा है, कोई ज़मीन पर सांप की तरह लेटा लेटा घूम रहा है।  

झूले वाले, बीन वाले, मिठाई वाले, ढोल वाले इत्यादि बहुत से लोग हैं जिन्हें यहाँ आ कर रोज़गार मिलता है। करीब कई महीनों की रोटी इन लोगों को यह मेला दे जाता है। इस मकसद के लिए यहाँ बहुत से लोग पंजाब ही नहीं अन्य राज्यों से भी आते हैं। 
मेला कमेटी यहाँ आने वालों के लिए पूरी आवभगत और मूलभूत सुविधाओं का प्रबंध  की तरह करती है। लंगर के साथ साथ कई तरह के पकवान परोसे जाते हैं। पुलिस भी इस अवसर पर लोगों की सुरक्षा के लिए मुकम्मल बन्दोबस्त करती है। तकरीबन हर धर्म के लोग यहाँ आते हैं। हर उम्र के लोग यहाँ आते हैं। ये लोग कितनी आस्था से सात बार मिटटी निकालते हैं इस आस्था को उनके चेहरे और भावों से महसूस किया जा सकता है।

Tuesday, September 10, 2019

सोशल थिंकर्स फोरम ने कराया सोसायटी को दो विद्धानों से रूबरू


संविधान की सभी मूल भावनाओं को बदल कर एक जैसी संस्कृति लागू करना चाहती है भाजपा सरकार

लुधियाना: 10 सितंबर 2019: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो)::
मार्क्सवादी चिंतक,लेखक व CPI 
की राष्ट्रीय परिषद के सदस्य 
अनिल राजिमवाले
जानीमानी खोजी पत्रकार और इतिहास
लेखिका सुश्री कृष्णा झा की बहुचर्चित
पुस्तक का कवर  
लुधियाना के बौद्धिक क्षेत्रों में एक नया रंग देखने को मिला। सियासी लोगों की भीड़ में एक ऐसा आयोजन सामने आया जिसमें चर्चा तो राजनीती पर भी हुई लेकिन चर्चा करने वाले दो विद्धान बौद्धिक क्षेत्रों में अलग सी पहचान रखते हैं। एक तो थीं सुश्री कृष्ण झा जिन्होंने अयोध्या विवाद पर बहुत ही चर्चित पुस्तक लिखी थी। दुसरे थे जानेमाने विद्धान अनिल राजिमवाले जिन्होंने जन संघर्षों में उल्लेखनीय योगदान दिया है। इन लोगों ने आशंका जताई कि देश को एक ही रंग में रंगने का जनून बहुत बड़ी गड़बड़ी खड़ी कर देगा। इन्होने साफ़ कहा कि सत्ता पर मौजूद भारतीय जनता पार्टी देश की सभी विभिन्नताओं को समाप्त करने की ताक में है। अलग अलग इलाकों और अलग अलग समुदायों के रीतिरिवाजों के साथ छेड़छाड़ के गंभीर परिणाम निकल सकते हैं। 

इन लोगों ने कहा कि आर एस एस की शह और सरपरस्ती प्राप्त भाजपा सरकार लोकतंत्र की नृशंस हत्या करके देश भर में एक जैसी संस्कृति लागू करने पर तुली हुई है। यह बात यहाँ सोशल थिंकर्स फोरम की तरफ से कराई गयी एक विचार गोष्ठी में जानीमानी ऐतिहासकार और समाज सेविका सुश्री कृष्णा झा ने कही।  
उन्होंने कहा कि भारत में लोकतंत्र का आधार स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान रखा गया था जिसमें सभी वर्गों, धर्मों और जातियों के लोगों ने हिस्सा लिया।  इसके परिणाम स्वरूप धर्म निरपेक्ष, न्याय, और बराबरी पर आधारित समाज की स्थापना  का संकल्प लिया गया।   देश का संविधान भी इन्हीं आधारों पर ही बनाया गया था और राज्यों को अनेक मामलों में अधिक अधिकार भी दिए।  दबे और कुचले हुए दलित लोगों को भी बहुत सी सुविधाएँ दी गयीं। लेकिन जनसंघ, आर एस एस और इसके सहयोगी संगठनों ने अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ कोई संघर्ष नहीं किया बल्कि तिरंगे का अपमान किया, भारत छोड़ो आंदोलन और नमक सत्याग्रह का केवल विरोध ही नहीं किया बल्कि अंग्रेज़ों का साथ भी दिया। इसी वजह से उनके लिए भारतीय संविधान का कोई महत्व नहीं है। यह सरकार और इसके सहयोगी संगठन संविधान की सभी मूल भावनाओं को बदल कर देश में एक जैसी संस्कृति लागू करना चाहते हैं। इस मकसद के लिए यह लोग देश और विदेश के कार्पोटेस्ट के साथ मिल कर देश के आम लोगों का बुरा हाल कर रहे हैं। सरकारी अत्याचार के खिलाफ उठ रहे जन आंदोलनों को दबाने के लिए यूएपीए जैसे कानून लाये जा रहे हैं।  श्रम सुधारों के नाम पर मज़दूर विरोधी और कारपोरेट समर्थक तब्दीलियां की जा रही हैं।शिक्षा और स्वास्थ्य नीति में परिवर्तन करके कम वेतन वाले लोगों को स्वास्थ्य और शिक्षा  जैसे मूल अधिकारों से भी वंचित किया जा रहा है। अन्य वर्गों के मुकाबले में दलितों की तरफ से दी जाने वाली फीसें तीन गुना बढ़ा दी गयी हैं। उच्च शिक्षा के लिए दी जानेवाली ग्रांट को 602 करोड़ रूपये से कम कर के 283 करोड़ रूपये कर दिया गया है।  किसानों का तो और भी बुरा हाल है। इसीलिए आत्महत्यायों में तेज़ी से वृद्धि हो रही है। आज माध्यम वर्ग भी दबाव में है। इन सब से  ध्यान हटाने के लिए हिन्दू मुस्लिम फसाद  कराये जा रहे हैं और जंग की बातें की जा रही हैं। ग्रह मंत्री ने स्पष्ट कर दिया है कि हिन्दुओं को तो बसाया जा रहा है लेकिन मुस्लिमों को नज़रबंदी की स्थिति में रखा जायेगा।   इकलौते मुस्लिम बहुल राज्य कश्मीर में 370 इसी इरादे से हटाई गयी है। अमित शाह ने साफ़ शब्दों में कहा है कि अन्य राज्यों में 371 को छेड़ा भी नहीं जायेगा। यह खुलमखुल्ला साम्प्रदायिक पक्षपात का रवैया है। कश्मीर में 80 लाख लोगों के अधिकार समाप्त कर दिए गए हैं।  सभी लोकतान्त्रिक संस्थानों की स्वायत्ता समाप्त की जा रही है। सेना का उपयोग राजनैतिक मकसदों के लिए किया जा रहा है।  सैनिक अधिकारीयों से राजनैतिक ब्यान दिलाये जा रहे हैं।इस अवसर जानमाने विद्धान अनिल रजिमवाले ने कहा की इस नाज़ुक घड़ी में सभी प्रगतिशील शक्तियों को एकजुट हो कर इन फासीवादी शक्तियों का मुकाबिला करना होगा वरना देश का भविष्य धुंदला है। इस मौके पर डाक्टर अरुण मित्रा, एम् इस भाटिया, चरण सराभा, एडवोकेट हरिओम जिंदल, शुभदीप कौर, डाक्टर जसविंदर सिंह ने भी बहस में हिस्सा लिया। युवा और छात्र नेता डाक्टर तानिया, डाक्टर विनोद वर्मा, दीपक कुमार, राजीव कुमार, सौरव कुमार, प्रदीप कुमार और ललित कुमार ने अपने विचार व्यक्त किये।

Thursday, August 22, 2019

व्यापारिक संस्थानों में लैंगिक विविधता पर विशेष चर्चा

Thu, Aug 22, 2019 at 3:36 PM
डीडी जैन महिला कालेज में पहुंची फ़्रांस की मिस दीप्ति चंद्र


लुधियाना: 22 अगस्त 2019: (कार्तिका सिंह//पंजाब स्क्रीन):: 
समय तेज़ी से बदल रहा है और इसके साथ ही बदल रहे हैं कामकाज के तौर तरीके। अब महिला चूल्हा चौंका ही नहीं देखती घर, परिवार, देश और समाज की आर्थिक रीढ़ भी मज़बूत करती है। उसकी आमदन भी बढ़ाती है। महिला वर्ग में छुपी हुई खूबियों ने उसे व्यापारिक संस्थानों  महत्वपूर्ण स्थानों तक भी पहुंचा दिया है। जो व्यापार और कारोबार पर कभी पुरुष वर्चस्व हुआ करता था लेकिन अब महिलाएं भी बराबरी पर हैं।  न सिर्फ बराबरी पर बल्कि कई जगहों पर तो उनका अनुपात पुरुषों से भी अधिक है। "व्यापारिक संस्थानों में लैंगिक विविधता" पर एक विशेष चर्चा का आयोजन किया देवकी देवी जैन कालेज के महिला हरासमेंट विरोधी सेल ने। इस चर्चा में भाग लेने पहुंची फ्रांस की जानीमानी ऊधमी मिस दीप्ति चंद्र। 
मिस दीप्ति चंद्र फ्रांस के एक अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त संगठन ई-एम एम ए  की अध्यक्ष हैं। उनका मुख्यालय पैरिस में है। डी डी जैन महिला कालेज में आना हम सभी लुधियाना वालों के लिए एक गौरव की बात रहा। गौरतलब है कि विश्व के विभिन्न देशों में इस संस्थान की 17 शाखाएं हैं। 
मुख्य वक्ता  दीप्ति चंद्र ने अपने वक्तव्य में तक्नोलोजी के क्षेत्र में महिलाओं की स्थिति पर विशेष तौर पर चर्चा की। उन्होंने सुझाव भी दिए कि तक्नोलोजी के क्षेत्र में इस विविधता को कैसे बढ़ाया जा। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह भागीदारी और विविधता जितनी अधिक बढ़ेगी कारोबार उतना ही तेज़ी से और बढ़ेगा। उल्लेखनीय है कि बहुत से रिसर्च अध्ययनों में यह बात कई बार सामने आ चुकी है। इस से प्रॉफिट भी बढ़ता है और उत्पादन भी। 
कालेज की प्रिंसिपल डाक्टर सरिता बहल ने इस बात पर बल दिया कि इस तरह के लेक्चरों और चर्चा से कालेज की छात्राओं को अपनी ज़िंदगी में ऊंचे निशाने निश्चित करने का उत्साह भी मिलेगा और मार्गदर्शन भी जिसके परिणामस्वरूप तकनोलॉजी के क्षेत्र में नए कीर्तिमान भी स्थापित होंगें। 

GCG में विश्व मच्छर दिवस के बहाने से की स्वाथ्य चर्चा

Aug 22, 2019, 2:31 PM
मच्छरों की किस्मों के साथ साथ बीमारियां भी बतायीं
लुधियाना22 अगस्त 2019: (कार्तिका सिंह//पंजाब स्क्रीन):: 
लुधियाना में लड़कियों के राजकीय कालेज की छात्राओं ने आज फिर एक नयी चेतना जागरूक करने का प्रयास किया। आज कालेज के जुयोलॉजी विभाग ने विश्व मास्कीटो दिवस को  अंदाज़ में मनाया। उन्होंने पोस्टर बनाये और इन मच्छरों से होने वाली बिमारियों की चर्चा भी की। कालेज की प्रिंसिपल डा. मंजू साहनी के नेतृत्व में इन छात्राओं ने इस दिन को यादगारी अंदाज़ में मनाया। इस सारे आयोजन में बी इस सी भाग तीसरा मेडिकल की छात्राओं ने बहुत ही आकर्षक पोस्टर बनाये। इन पोस्टरों में जहाँ मच्छरों की किस्मों का उल्लेख था वहीँ इन मच्छरों से होने वाली बिमारियों की जानकारी ही दी गयी थी।  साथ ही इन बिमारियों से बचने के कारगर उपाय भी बताये गए थे।  प्रिंसिपल डा. मंजू साहनी ने साईंस सोसायटी के इस सारे प्रयास की बहुत ही प्रशंसा की। कालेज की वाईस प्रिंसिपल मैडम वरिंदरजीत कौर और इस जागरूकता अभियान की इंचार्ज डा. माधवी वशिष्ठ भी सक्रिय रहीं। मैडम किरपाल कौर, सुश्री किरण गुप्ता और श्री पलविंदर शर्मा भी बहुत उत्साहित करते रहे। कुल मिला कर यह एक यादगारी और लाभप्रद आयोजन रहा।
गौरतलब है कि विश्व मच्छर दिवस प्रतिवर्ष 20 अगस्त को मनाया जाता है। यह दिवस ब्रिटिश चिकित्सक, सर रोनाल्ड रॉस की स्मृति में मनाया जाता है, जिन्होंने वर्ष 1897 में यह खोज की थी, कि ‘मनुष्य में मलेरिया के संचरण के लिए मादा मच्छर उत्तरदायी है’। लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन और ट्रॉपिकल मेडिसिन ने विश्व मच्छर दिवस मनाने की शुरूआत वर्ष 1930 में की थी।इस दिवस के बहाने से मच्छरों से सावधान रहने की जानकारी का आदान प्रदान हो जाता है। इस सारे प्रयास से स्वास्थ्य रक्षा में उल्लेखनीय सहायता मिलती है। 
यहाँ भूलना न होगा कि मच्छर मामूली जीव नहीं हैं। यह विश्व के सबसे प्राणघाती कीटों में से एक हैं। इसमें मनुष्यों के भीतर रोग प्रसारित और रोग संचारित करने की अदभुत क्षमता है, जिसके कारण विश्व में प्रतिवर्ष लाखों लोगों की मृत्यु तक भी हो जाती है। यह बताना भी आवश्यक है कि मच्छर कई प्रकार के होते हैं, जो कि कई प्रकार के रोगों के संवाहक हो सकते हैं। निम्नलिखित रोगों के लिए एडीज, एनोफेल्स, क्यूलेक्स मच्छर (जीवित जीव, जो कि मनुष्यों या कीटों से मनुष्यों के बीच संक्रामक रोग प्रसारित कर सकते हैं) माध्यम के रूप में कार्य करते है। मच्छरों के काटने से बीमारियां बेहद गंभीर और खतरनाक होती हैं। 
एडीज से जो खतरनाक बीमारियां होती हैं उनमें हैं चिकनगुनिया, डेंगू बुख़ार, लिम्फेटिक फाइलेरिया, रिफ्ट वैली बुखार, पीला बुखार (पीत ज्वर), ज़ीका।
इसी तरह एनोफेलीज़ से मलेरिया, लिम्फेटिक फाइलेरिया (अफ्रीका में)। बहुत फैलती हैं। 
क्यूलेक्स से जापानी इन्सेफेलाइटिस, लिम्फेटिक फाइलेरिया, वेस्ट नाइल फ़ीवर हो जाता है जो बेहद खतरनाक भी होता है और पीड़ादायक भी। कालेज के पोस्टरों  जानकारी सचमुच बहुत ज्ञानवर्द्धक थी। 

Saturday, August 03, 2019

जैन गर्ल्ज़ स्कूल लुधियाना में हर्षोउल्लास से मनायी गई तीज

छात्राओं ने दिखाया रंगारंग कार्यक्रम का कमाल 
लुधियाना: 3 अगस्त, 2019: (कार्तिका सिंह// पंजाब स्क्रीन):: 
हिंदी की एक हिट फिल्म 'मिलन' का एक बहुचर्चित गीत है:--
सावन का महीना, पवन करे सोर। 
जियरा रे झूमे रे ऐसे, जैसे बनमा नाचे मोर।
एक ऐसा महीना जिसमे प्रकृति के साथ-साथ मन भी झूम उठता हैं। नई कोपलों के साथ मानवीय शरीर में भी नयी तरंगे उठती हैं। सावन  में जो साध लो जीवन भर के लिए सध जाता हैं।  और जब सावन की बात हो और तीज की चर्चा न हो ऐसा तो हो ही नहीं सकता। कहने को तो मनुष्य जाती ऐसे स्त्रियों का त्यौहार कहती है, परन्तु कोई भी जीव तीज के रंग में रंगने से खुद को रोक नहीं सकता।  ऐसा ही एक रंग चढ़ा जैन स्कूल की छात्राओं और अधियापको पर। स्कूल में +2 की छात्राओं द्वारा तीज के उपलक्ष्य में एक रंगारंग कार्यक्रम पेश किया गया। इसमें +2 की 43 छात्राओं ने 'ट्रेडिशनल ड्रेस कम्पीटीशन' में भाग लिया। मिस तीज का खिताब 'मुस्कान वर्मा' को दिया गया।  इस कार्यकर्म में छात्राओं ने गिद्दा, भंगड़ा और पंजाबी लोक-गीतों के द्वारा पंजाबी सभ्याचार की प्रस्तुति दी। 
इस अवसर पर स्कूल की मैनेजिंग कमेटी के चेयरमैन श्री सुखदेव राज जैन, प्रधान श्री नंद कुमार जैन, सेक्रेटरी श्री राजीव जैन, मैनेजर श्री अरविन्द कुमार जैन और स्कूल के प्रिंसिपल श्रीमती मीना गुप्ता जी मौजूद थे, जिन्होंने बच्चों को तीज की महत्ता बताते हुए उन्हें तीज की बहुत-बहुत बधाई दी। 

Wednesday, July 31, 2019

टैक्स टैरर ने ली वीजी सिद्धार्थ की जान?

36 घंटे तक लापता रहने के बाद मिला नदी में तैरता हुआ शव 
नई दिल्ली: 31 जुलाई 2019: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो)::
कैफे कॉफ़ी डे अर्थात सीसीडी के संस्थापक वीजी सिद्धार्थ का शव उसी नदी से मिल गया है जिसके पास वह लापता हुए थे। साफ़ हो गया है कि उन्होंने ख़ुदकुशी की थी। चर्चा है कि उनकी जान टैक्स टैरर ने ले ली। ख़ुदकुशी  मजबूरी का एक बड़ा कारण शायद यह भी था। वीजी सिद्धार्थ कर्नाटक के पूर्व सीएम एसएम कृष्णा के दामाद थे। खबरों के मुताबिक, सिद्धार्थ का शव मंगलुरू के हुइगेबाज़ार के पास नेत्रावती नदी के किनारे से बरामद हुआ है।
गौरतलब है कि इंडियन कॉफ़ी हाऊस के बाद अगर कॉफ़ी के मामले में किसी ने सबसे ज़्यादा ध्यान खींचा तो वह है "कैफे कॉफ़ी डे" अर्थात सीसीडी। वही सीसीडी जिसके संस्थापक वीजी सिद्धार्थ सोमवार रात को लापता हो गए थे। उनके एक संतुलित लेकिन भावुक पत्र  के बाद इस तरह लापता होने से अनहोनी की आशंका लगातार बढ़ रही थी। नेत्रावति नाम की जिस नदी के पास उन्होंने अपनी कार और ड्राइवर को छोड़ा वहां बहुत बड़े पैमाने पर उनकी तलाश की जा रही है जिनमें पुलिस वाले, गोताखोर और मछुआरे शामिल थे। उनके लापता होने का रहस्य लगातार गहराता जा रहा था।
मंगलुरु के पुलिस कमिश्नर संदीप पाटिल ने कहा कि सिद्धार्थ का शव बुधवार सुबह 6 बजे के आसपास हुइगेबाज़ार के पास बरामद हुआ है। शव हुइगेबाज़ार के पास सुबह तैरता हुआ दिखा था जिसे मछुआरे किनारे तक लेकर आए। सिद्धार्थ के लापता होने के बाद उनका एक पत्र सामने आया था। जिसमें उन्होंने आयकर विभाग पर प्रताड़ना का आरोप लगाया था।
उन्होंने पत्र में लिखा है कि एक पूर्व डीजी ने माइंडट्री के साथ डील ब्लॉक करने के लिए उनके शेयर्स को दो बार अटैच किया, जबकि संशोधित रिटर्न्स उनकी ओर से फाइल किए जा चुके थे। सिद्धार्थ ने आईटी विभाग की इस कार्रवाई को अनुचित बताया है और लिखा है कि इसके कारण पैसे की कमी हो गई थी। शायद यहीं से उनकी वित्तीय परेशानियां शिखर छूने लगीं। 
इसी दौरान मंगलूरू पुलिस ने वीजी सिद्धार्थ के फोन की जांच के बाद खुलासा किया है कि 10 दिनों के अंदर वीजी सिद्धार्थ के पास आयकर की दर्जनों कॉल आई थी। अब देखना है कि कानूनन इस  रुख अख्तियार करता है।