Tuesday, September 10, 2019

सोशल थिंकर्स फोरम ने कराया सोसायटी को दो विद्धानों से रूबरू


संविधान की सभी मूल भावनाओं को बदल कर एक जैसी संस्कृति लागू करना चाहती है भाजपा सरकार

लुधियाना: 10 सितंबर 2019: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो)::
मार्क्सवादी चिंतक,लेखक व CPI 
की राष्ट्रीय परिषद के सदस्य 
अनिल राजिमवाले
जानीमानी खोजी पत्रकार और इतिहास
लेखिका सुश्री कृष्णा झा की बहुचर्चित
पुस्तक का कवर  
लुधियाना के बौद्धिक क्षेत्रों में एक नया रंग देखने को मिला। सियासी लोगों की भीड़ में एक ऐसा आयोजन सामने आया जिसमें चर्चा तो राजनीती पर भी हुई लेकिन चर्चा करने वाले दो विद्धान बौद्धिक क्षेत्रों में अलग सी पहचान रखते हैं। एक तो थीं सुश्री कृष्ण झा जिन्होंने अयोध्या विवाद पर बहुत ही चर्चित पुस्तक लिखी थी। दुसरे थे जानेमाने विद्धान अनिल राजिमवाले जिन्होंने जन संघर्षों में उल्लेखनीय योगदान दिया है। इन लोगों ने आशंका जताई कि देश को एक ही रंग में रंगने का जनून बहुत बड़ी गड़बड़ी खड़ी कर देगा। इन्होने साफ़ कहा कि सत्ता पर मौजूद भारतीय जनता पार्टी देश की सभी विभिन्नताओं को समाप्त करने की ताक में है। अलग अलग इलाकों और अलग अलग समुदायों के रीतिरिवाजों के साथ छेड़छाड़ के गंभीर परिणाम निकल सकते हैं। 

इन लोगों ने कहा कि आर एस एस की शह और सरपरस्ती प्राप्त भाजपा सरकार लोकतंत्र की नृशंस हत्या करके देश भर में एक जैसी संस्कृति लागू करने पर तुली हुई है। यह बात यहाँ सोशल थिंकर्स फोरम की तरफ से कराई गयी एक विचार गोष्ठी में जानीमानी ऐतिहासकार और समाज सेविका सुश्री कृष्णा झा ने कही।  
उन्होंने कहा कि भारत में लोकतंत्र का आधार स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान रखा गया था जिसमें सभी वर्गों, धर्मों और जातियों के लोगों ने हिस्सा लिया।  इसके परिणाम स्वरूप धर्म निरपेक्ष, न्याय, और बराबरी पर आधारित समाज की स्थापना  का संकल्प लिया गया।   देश का संविधान भी इन्हीं आधारों पर ही बनाया गया था और राज्यों को अनेक मामलों में अधिक अधिकार भी दिए।  दबे और कुचले हुए दलित लोगों को भी बहुत सी सुविधाएँ दी गयीं। लेकिन जनसंघ, आर एस एस और इसके सहयोगी संगठनों ने अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ कोई संघर्ष नहीं किया बल्कि तिरंगे का अपमान किया, भारत छोड़ो आंदोलन और नमक सत्याग्रह का केवल विरोध ही नहीं किया बल्कि अंग्रेज़ों का साथ भी दिया। इसी वजह से उनके लिए भारतीय संविधान का कोई महत्व नहीं है। यह सरकार और इसके सहयोगी संगठन संविधान की सभी मूल भावनाओं को बदल कर देश में एक जैसी संस्कृति लागू करना चाहते हैं। इस मकसद के लिए यह लोग देश और विदेश के कार्पोटेस्ट के साथ मिल कर देश के आम लोगों का बुरा हाल कर रहे हैं। सरकारी अत्याचार के खिलाफ उठ रहे जन आंदोलनों को दबाने के लिए यूएपीए जैसे कानून लाये जा रहे हैं।  श्रम सुधारों के नाम पर मज़दूर विरोधी और कारपोरेट समर्थक तब्दीलियां की जा रही हैं।शिक्षा और स्वास्थ्य नीति में परिवर्तन करके कम वेतन वाले लोगों को स्वास्थ्य और शिक्षा  जैसे मूल अधिकारों से भी वंचित किया जा रहा है। अन्य वर्गों के मुकाबले में दलितों की तरफ से दी जाने वाली फीसें तीन गुना बढ़ा दी गयी हैं। उच्च शिक्षा के लिए दी जानेवाली ग्रांट को 602 करोड़ रूपये से कम कर के 283 करोड़ रूपये कर दिया गया है।  किसानों का तो और भी बुरा हाल है। इसीलिए आत्महत्यायों में तेज़ी से वृद्धि हो रही है। आज माध्यम वर्ग भी दबाव में है। इन सब से  ध्यान हटाने के लिए हिन्दू मुस्लिम फसाद  कराये जा रहे हैं और जंग की बातें की जा रही हैं। ग्रह मंत्री ने स्पष्ट कर दिया है कि हिन्दुओं को तो बसाया जा रहा है लेकिन मुस्लिमों को नज़रबंदी की स्थिति में रखा जायेगा।   इकलौते मुस्लिम बहुल राज्य कश्मीर में 370 इसी इरादे से हटाई गयी है। अमित शाह ने साफ़ शब्दों में कहा है कि अन्य राज्यों में 371 को छेड़ा भी नहीं जायेगा। यह खुलमखुल्ला साम्प्रदायिक पक्षपात का रवैया है। कश्मीर में 80 लाख लोगों के अधिकार समाप्त कर दिए गए हैं।  सभी लोकतान्त्रिक संस्थानों की स्वायत्ता समाप्त की जा रही है। सेना का उपयोग राजनैतिक मकसदों के लिए किया जा रहा है।  सैनिक अधिकारीयों से राजनैतिक ब्यान दिलाये जा रहे हैं।इस अवसर जानमाने विद्धान अनिल रजिमवाले ने कहा की इस नाज़ुक घड़ी में सभी प्रगतिशील शक्तियों को एकजुट हो कर इन फासीवादी शक्तियों का मुकाबिला करना होगा वरना देश का भविष्य धुंदला है। इस मौके पर डाक्टर अरुण मित्रा, एम् इस भाटिया, चरण सराभा, एडवोकेट हरिओम जिंदल, शुभदीप कौर, डाक्टर जसविंदर सिंह ने भी बहस में हिस्सा लिया। युवा और छात्र नेता डाक्टर तानिया, डाक्टर विनोद वर्मा, दीपक कुमार, राजीव कुमार, सौरव कुमार, प्रदीप कुमार और ललित कुमार ने अपने विचार व्यक्त किये।

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