Thursday, September 27, 2018

अब यह कहने का वक्त आ गया है कि ‘पति महिला का स्वामी नहीं है

व्याभिचार आपराधिक कृत्य नहीं होना चाहिए
नयी दिल्ली: 27 सितंबर 2018: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो):: 
सम्बन्धों के मामले में स्वछंदता और स्वतन्त्रता चाहने वालों के लिए लिए शायद यह खबर खुशखबरी लेकर आई है। अब व्याभिचार शायद अधिकार बन गया है। जो स्वदेशी, संस्कृति और समाजिक बन्धनों से अभी भी प्रेम करते हैं उनके लिए शायद यह दुखद होगा। व्याभिचार को अपराध की श्रेणी से बाहर करते हुए उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को इससे संबंधित भारतीय दंड संहिता की धारा 497 को असंवैधानिक करार देते हुए निरस्त कर दिया और कहा कि यह महिलाओं की व्यक्तिकता को ठेस पहुंचाता है और इस प्रावधान ने महिलाओं को ‘‘पतियों की संपत्ति’’ बना दिया था। इस सम्पति से याद आ रही है प्रोफेसर मोहन सिंह जी की एक कविता-"जायदाद"। कहा जाता है अपनी यह रचना उन्होंने जानीमानी लेखिका अमृता प्रीतम पर लिखी थी जिसे वह मन ही मन चाहते थे।चना की आरम्भिक पंक्तियों का उल्लेख यहाँ आवश्यक लग रहा है जिनका हिंदी अनुवाद है: 
दरवाज़े पर चुप खड़ी थी जायदाद
पास मालिक उसका
सामने आशिक उसका---
इस काव्य रचना में दरवाजे में खड़ी महिला का मालिक अर्थात पति उसके कंधे को पकड़ कर कहता है -
मेरी है यह सम्पति 
मैं हूँ मालिक इसका
मनु का कानून भी मेरी तरफ
वक्त की सरकार भी मेरी तरफ
पैसे की छनकार भी मेरी तरफ
धर्म लोकाचार भी मेरी तरफ
दिल नहीं तो न सही---------
लगता है प्रोफेसर मोहन सिंह की "तड़प" और उनके "दिल की आवाज़" सुन ली गई है। हालांकि उनकी काव्य रचना का मकसद व्याभिचार कभी न रहा होगा लेकिन समाज ने इसे व्याभिचार ही सोचा होगा। इस समस्या पर बहुत सी फ़िल्में बनी---बहुत सी रचनाएँ लिखी गयीं--तिकोने-चिकोने प्यार ने बहुत से घर बर्बाद कर दिए और बहुत सी जिंदगियां इसी तरह समाप्त हो गयीं जिनके सपनो में कोई और था लेकिन बाहों में कोई और। 
प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से व्यभिचार से संबंधित 158 साल पुरानी भारतीय दंड संहिता की धारा 497 को असंवैधानिक करार हुए इस दंडात्मक प्रावधान को निरस्त कर दिया। फैसला ऐतिहासिक है। समाज के एक बड़े हिस्से में यह सब कुछ आम हो ही चूका था। बहुत सी हत्याएं-बहुत सी खुदकुशियां इसी मुद्दे को लेकर एक आम सी बात बन चकी थीं। अब व्याभिचार समानता का अधिकार बनने जा रहा है। 
शीर्ष अदालत ने इस धारा को स्पष्ट रूप से मनमाना, पुरातनकालीन और समानता के अधिकार तथा महिलाओं के लिए समान अवसर के अधिकार का उल्लंघन करने वाला बताया। 
प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति आर. एफ. नरिमन, न्यायमूर्ति ए. एम.खानविलकर, न्यायमूर्ति धनन्जय वाई. चन्द्रचूड़ और न्यायमूर्ति इन्दु मल्होत्रा ने एकमत से कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 497 असंवैधानिक है।

मामला केवल एक छूट देता ही लकिन लग रहा है। लेकिन इसका दूर तक जाने वाला है। बहुत सी पेचीदगियां सामने आने वाली हैं। संविधान पीठ ने जोसेफ शाइन की याचिका पर यह फैसला सुनाया है। यह याचिका किसी विवाहित महिला से विवाहेत्तर यौन संबंध को अपराध मानने और सिर्फ पुरूष को ही दंडित करने के प्रावधान के खिलाफ दायर की गयी थी। "अन्याय और असमानता" के खिलाफ लगे गई गुहार "समानता" की इतनी बड़ी सौगात लेकर आयेगी इसकी तो कल्पना भी नहीं थी। 
सोचना होगा विवाह को सात जन्मों का बंधन और समाज के स्थायित्व का आधार मानने वाले वर्ग के मन कें क्या क्या चल रहा होगा?
व्यभिचार को प्राचीन अवशेष करार देते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि मानव जीवन के सम्मानजनक अस्तित्व के लिए स्वायत्ता स्वभाविक है और धारा 497 महिलाओं को अपनी पसंद से वंचित करती है।
याद करना होगा रामायण और महाभारत का युग जब स्वयम्बर के ज़रिये महिला को अपनी पसंद का वर चुनने का अधिकार होता था। अब यह "अधिकार" विवाह के बाद भी जारी रहेगा। शायद शादी के सात वचनों में आठवां वचन यह भी लिया जायेगा कि पतिदेव अब अपनी पत्नी को अपनी सम्पति समझने की भूल नहीं करेंगे। 
हालांकि प्रधान न्यायाधीश ने अपने फैसले में कहा कि व्याभिचार आपराधिक कृत्य नहीं होना चाहिए लेकिन इसे अभी भी नैतिक रूप से गलत माना जाएगा और इसे विवाह खत्म करने तथा तलाक लेने का आधार माना जाएगा। घरों को तोड़ने के लिये कोई सामाजिक लाइसेंस नहीं मिल सकता। इस  बात के बावजूद उन क्लबों की हकीकत नहीं बदल जाएगी जहाँ कारों की चाबियों के ज़रिये पत्नियों का तबादला बहुत पहले से होता आ रहा है। "शादी" भी बनी रहती है और "मौज मस्ती की स्वतन्त्रता" भी चलती रहती है। 
भारतीय दंड संहिता की धारा 497 के अनुसार यदि कोई पुरूष यह जानते हुये भी कि महिला किसी अन्य व्यक्ति की पत्नी है और उस व्यक्ति की सहमति या मिलीभगत के बगैर ही महिला के साथ यौनाचार करता है तो वह परस्त्रीगमन के अपराध का दोषी होगा। यह बलात्कार के अपराध की श्रेणी में नहीं आयेगा। इस अपराध के लिये पुरूष को पांच साल की कैद या जुर्माना अथवा दोनों की सजा का प्रावधान था। 
इस सम्बन्ध में शाइन की ओर से दायर याचिका में तर्क दिया गया था कि कानून तो लैंगिक दृष्टि से तटस्थ होता है लेकिन धारा 497 का प्रावधान पुरूषों के साथ भेदभाव करता है और इससे संविधान के अनुच्छेद 14 :समता के अधिकारः , 15 : धर्म, जाति, लिंग, भाषा अथवा जन्म स्थल के आधार पर विभेद नहींः और अनुच्छेद 21:दैहिक स्वतंत्रता का अधिकारः का उल्लंघन होता है। इस याचिका पर हुए फैसले ने एक नया इतिहास रचा है। 
न्यायमूर्ति मिश्रा और न्यायमूर्ति खानविलकर ने अपने फैसले में कहा है कि विवाह के खिलाफ अपराध से जुड़ी भारतीय दंड संहिता की धारा 497 और दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 198 को हम असंवैधानिक घोषित करते हैं। अब अदालतों में लटक रहे ऐसे मामलों पर क्या असर पड़ेगा यह देखना अभी बाकी है। जो लोग सजा काट रहे हैं उनका पक्ष भी सामने आना है। 
न्यायमूर्ति नरिमन ने धारा 497 को पुरातनकालीन बताते हुए प्रधान न्यायाधीश और न्यायमूर्ति खानविलकर के फैसले से सहमति जतायी। उन्होंने कहा कि दंडात्मक प्रावधान समानता का अधिकार और महिलाओं के लिए समान अवसर के अधिकार का उल्लंघन है। वहीं न्यायमूर्ति चन्द्रचूड़ ने अपने फैसले में कहा कि धारा 497 महिला के सम्मान को नष्ट करती है और महिलाओं को गरिमा से वंचित करती है।
गौरतलब है कि इस पीठ में शामिल एकमात्र महिला न्यायाधीश न्यायमूर्ति इन्दु मल्होत्रा ने अपने फैसले में कहा कि धारा 497 संविधान प्रदत्त मूल अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है और इस प्रावधान को बनाए रखने के पक्ष में कोई तर्क नहीं है। अपनी और न्यायमूर्ति खानविलकर की ओर से फैसला लिखने वाले प्रधान न्यायाधीश मिश्रा ने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा कि व्यभिचार महिला की व्यक्तिकता को ठेस पहुंचाती है और व्यभिचार चीन, जापान तथा ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में अपराध नहीं है।
उन्होंने कहा कि संभव है कि व्यभिचार खराब शादी का कारण नहीं हो, बल्कि संभव है कि शादी में असंतोष होने का नतीजा हो। बात बहुत गहरी और वजनदार है। न्यायमूर्ति मिश्रा ने कहा कि महिला के साथ असमान व्यवहार संविधान के कोप को आमंत्रित करता है। उन्होंने कहा कि समानता संविधान का शासकीय मानदंड है।
संविधान पीठ ने कहा कि संविधान की खूबसूरती यह है कि उसमें ‘‘मैं, मेरा और तुम’’ शामिल हैं।
शीर्ष अदालत ने कहा कि महिलाओं के साथ असमानता पूर्ण व्यवहार करने वाला कोई भी प्रावधान संवैधानिक नहीं है और अब यह कहने का वक्त आ गया है कि ‘पति महिला का स्वामी नहीं है।’ शायद प्रोफेसर मोहन सिंह की काव्य रचना में उठी आवाज़ अब रंग लायी है। 
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि धारा 497 जिस प्रकार महिलाओं के साथ व्यवहार करता है, यह स्पष्ट रूप से मनमाना है। उन्होंने कहा कि ऐसा कोई सामाजिक लाइसेंस नहीं हो सकता है जो घर को बर्बाद करे परंतु व्यभिचार आपराधिक कृत्य नहीं होना चाहिए।
न्यायमूर्ति चन्द्रचूड़ ने कहा कि धारा 497 को असंवैधानिक घोषित किया जाये क्योंकि व्यभिचार स्पष्ट रूप से मनमाना है। इस सम्बन्ध में यह भी स्पष्ट किया गया है कि व्यभिचार को विवाह विच्छेद के लिये दीवानी स्वरूप का गलत कृत्य माना जा सकता है। अब देखना है समाज इसे कैसे लेता है और समाज पर इसके क्या प्रभाव पड़ते हैं। 

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