Thursday, February 04, 2010

कोई बढ़ते हुए दरिया के कानों में कहे जाकर, बहुत मुश्किल से मिटटी का मकां तैयार होता है.

टीवी चैंनेल के लिए काम के दौरान इतना वक्त भी नहीं मिलता था कि कोई पूरी अखबार या पूरी किताब एक ही बैठक में पढ़ ली जाये. सुबह जाना और फिर आने का कुछ पता नहीं. कभी आधी रात और कभी उसके भी बाद. ....चलो रात को आकर पढ़ेंगे.... उस अख़बार या किताब को सम्भाल कर रख देना और साथ ही परिवार को भी कह देना...इसे कोई छेड़े न..बस इस तरह करते करते पूरे का पूरा कमरा भर गया. यार दोस्त मजाक करने लगे क्यूं भाई कबाड़ की दुकान किस के लिए खोल रहे हो...? कई बार फैसला किया बस आज छांटी करते हैं कल करते हैं...पर बात बनी नहीं....कुछ को चूहों ने कुतर दिया और कुछ का बरसात का पानी ख़राब कर गया...हालत देख कर परिवार के लोगों ने बहुत कुछ किसी रद्दीवाले को चुकवा भी दिया जिसका पता मुझे बहुत ही देर से लगा. आज सुबह जब किसी काम से उस कमरे में गया तो वहां एक ढेरी में गुरुवारी जनसत्ता पड़ी थी. उस पर पेन से निशान भी लगा हुआ था जिस से ज़ाहिर था कि वह किसी काम का अखबार था. उठा कर देखा तारीख थी 2 मई 1989. उन दिनों मैं जनसत्ता के लिए काम करता था. उस समय जनसत्ता के सम्पादक थे जितेन्द्र बजाज.  गुरुवारी जनसत्ता में मैंने एक स्तम्भ भी शुरू किया था जिसका नाम था--दस्तावेज़- यह स्तम्भ हर गुरुवार को छपता था. इस गुरुवारी जनसता में भी यह मौजूद था. पर तभी मेरी नज़र एक और छोटे से निशान पर पड़ी. यह निशान पाठकों के पत्रों वाले स्तम्भ -पाती-  पर था और कैथल से अनुपम गुलाटी के एक पत्र की ओर भी संकेत कर रहा था. ध्यान से देखा तो पत्र का आरंभ कुछ यूं था....16 फरवरी की गुरुवारी जनसत्ता अपने आप में एक वशिष्ठता लिए हुए था और वह वशिष्ठता थी दस्तावेज़ का प्रकाशन.  इस पत्र में बहुत  ही अहम मुद्दे उठाये गए जिसकी चर्चा अलग से की जाएगी क्योंकि यही करना उचित होगा. आज की पोस्ट में बात करते हैं केवल गुरुवारी जनसत्ता की. जिसमें कुछ गजलें भी थीं जिनका अंदाज़ ओर तेवर कमाल का है. ज़रा देखिये माधव कौशिक की ग़ज़ल....


यहां शबनम के सीने में छिपा अंगार होता है.
दिलों की बदसलूकी से ज़ेहन बीमार होता है.


कोई बढ़ते हुए दरिया के कानों में कहे जाकर, 
बहुत मुश्किल से मिटटी का मकां तैयार होता है. 


उसी को वक्त देता है सजाएं काले पानी की,
जो गुलशन में बहारों का असल हक़दार होता है.


सी तरह उसी अंक में एक ग़ज़ल नवीन कमल  की भी थी देखिये वह भी कमाल की बात कह गए:-


 रह गयी प्यासी जमीं' पानी समंदर ले गया;
बागबां ही खुद हमें सहरा के अंदर ले गया.


सिर्फ नेकी और बदी से आदमी का ज़िक्र है,
वर्ना इतनी सल्तनत से क्या सिकंदर ले गया.


जब किसी की एकता में कुछ कमी आयी "कमल",
बिल्लीयां लड़ती रहीं, रोटी को बंदर ले गया. 


र अंत में पुष्प कुमार सिंह "कुमार" की कलम का जादू भी देखिये...


आप इतने हो गए मगरूर ये अच्छा नहीं.
कर दिया है दिल का शीशा चूर ये अच्छा नहीं.


साथ चल कर अब सनम पीछे कदम क्यूं रख लिया, 
हो गए किस बात से मजबूर ये अच्छा नहीं.


हालांकि बहुत कुछ और भी है जिसकी चर्च फिर कभी  अवश्य की जाएगी पर फ़िलहाल आप केवल इतना बताने की कृपा करें कि रद्दी और कबाड़ के कमरे में से कुछ काम का निकला या नहीं?  जवाब दें तो आपकी मेहरबानी होगी.....! 

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