Saturday, June 02, 2012

स्‍वस्‍थ मॉं और स्‍वस्‍थ शिशु

जननी-शिशु सुरक्षा कार्यक्रम के जरिए नि:शुल्‍क प्रसव
विशेष लेख                                                                                 *एस.बी. शरण **वरुण भारद्वाज   स्‍वास्‍थ्‍य और परिवार कल्‍याण मंत्रालय द्वारा जननी-शिशु सुरक्षा कार्यक्रम (जेएसएसके) नामक एक अद्वितीय पहल पहली जून, 2011 को शुरू की गई थी। इसने पहली बार सर्वाधिक जोर ‘’पात्रता’’ पर दिया है। इस विचार के पीछे गर्भवती महिला और बीमार नवजात शिशु दोनों के लिए खर्चे को समाप्‍त करना है। यह पहल सार्वजनिक स्‍वास्‍थ्‍य संस्‍थान में प्रसव करने वाली सभी गर्भवती महिलाओं को एकदम मुफ्त और बिना खर्चे के प्रसव कराने का अधिकार देती है। इसमें सीजेरियन ऑपरेशन भी शामिल है। सार्वजनिक संस्‍थान में प्रसव से सम्‍बन्धित सभी खर्चे पूर्णत: सरकार द्वारा वहन किये जाते हैं और उपयोग सम्बन्‍धी कोई शुल्‍क नहीं लिया जाता। किसी प्रकार की पेचीदगी होने की स्थिति में गर्भवती महिला घर से सरकारी स्‍वास्‍थ्‍य संस्‍थान तक ले जाने की नि:शुल्‍क सुविधा दी जाएगी और प्रसव के 24 घन्‍टे बाद वापस घर भी छोड़ा जाएगा।
जीएसएसके क्‍यों?  
   गर्भावस्‍था के दौरान रक्‍तस्राव, संक्रमण, उच्‍च रक्‍तचाप, असुरक्षित प्रसव जैसी विभिन्‍न जटिलताओं से जच्‍चा-शिशु की मृत्‍यु हो सकती है। हालांकि भारत में जच्‍चा म़ृत्‍यु दर (एमएमआर) और बच्‍चा मृत्‍यु दर (आईएमआर) में कमी लाने में काफी प्रगति की है, लेकिन जिस गति से स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी ये संकेतक कम हो रहे हैं, उसमें तेजी लाने की आवश्‍यकता है। सन 2005 में जननी सुरक्षा योजना (जेएसवाई) शुरू किये जाने के बाद स्‍वास्‍थ संस्‍थानों में प्रसव की संख्‍या में उल्‍लेखनीय वृद्धि हुई है, तथापि स्‍वास्‍थ संस्‍थानों में प्रसव के लिए राज़ी होने वाली अनेक महिलाएं वहां 48 घंटे तक रूकने के लिए तैयार नहीं होती, इससे माता और नवजात शिशु दोनों के लिए आवश्‍यक सेवाएं उपलब्‍ध कराने में बाधा पहुंचती है। प्रसव के बाद के पहले 48 घन्‍टे नाजुक होते हैं, क्‍योंकि इस अवधि के दौरान कोई भी परेशानी हो सकती है।
  जच्‍चा–बच्‍चा स्‍वास्‍थ्‍य देख-रेख सेवाओं तक पहुंच में ओपीडी, दवाईयों, जांच परीक्षणों आदि पर अधिक ख़र्चे के कारण भी बाधा पहुंचती थी। कुछ मामलों में गंभीर एनीमिया अथवा रक्‍त चढ़ाने की आपात स्थिति जैसी परिस्थितियों से तात्कालिक ख़र्चे बढ़ जाते हैं। और यदि कोई सीजेरियन मामला हो जाता है तो उस स्थिति में खर्चा और बढ़ जाएगा।
  इन सब बातों को देखते हुए जेएसएसके योजना शुरू की गई है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि प्रत्‍येक और सभी गर्भवती महिलाओं और एक महीने तक के बीमार नवजात शिशु को मुफ्त स्‍वास्‍थ देख-रेख सेवाएं समय पर उपलब्‍ध हो सकें। जेएसएसके के अ‍धीन राज्‍य सरकारें पात्रता आदेश जारी करती हैं, जिसमें सुविधाओं की मुफ्त पात्रता का ब्‍यौरा दिया जाता है। पात्रता में मुफ्त दवाईयों और उपभोक्‍ता वस्‍तुओं, जांच की मुफ्त सेवाओं, आवश्‍यकता अनुसार रक्‍त चढ़ाने की मुफ्त सेवा तथा स्‍वास्‍थ्‍य संस्‍थान में महिला के रूकने की अवधि के दौरान के लिए मुफ्त आ‍हार शामिल हैं। ये सेवाएं प्रसव और अन्‍य खर्चों को समाप्‍त करने के लिए मुफ्त उपलब्‍ध की जाती हैं।
पात्रताएं
गर्भवाती महिलाओं के लिए पात्रताएं   

जेएसएसके योजना के अधीन स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी सरकारी संस्‍थानों में सीजेरियन ऑपरेशन सहित प्रसव की सभी सुविधाएं मुफ्त उपलब्‍ध कराई जाती हैं। गर्भवती महिलाओं को आयरन फोलिक एसिड जैसी पूरक दवाइयों सहित सभी औषधियां मुफ्त उपलब्‍ध कराए जाने की व्‍यवस्‍था  हैं।
  इसके अलावा गर्भवती महिलाएं आवश्‍यक और वांछित जांच जैसे रक्‍त, यूरेन जांच और अल्‍ट्रा सोनोग्राफी आदि की भी पात्र हैं। साथ ही स्‍वास्‍थ्‍य संस्‍थानों में उन्‍हें अपने प्रवास के दौरान (सामान्‍य प्रसव के लिए तीन दिन तक और सीजेरियन मामले में 7 दिन तक) मुफ्त आहार उपलब्‍ध कराया जाता है। इतना ही नहीं, आवश्‍यकता पड़ने पर मुफ्त रक्‍त ट्रान्‍सफ्यूजन का भी प्रावधान है।

   गर्भवती महिलाओं को समय पर परिवहन सुविधा उपलब्‍ध कराकर अनेक मामलों में माताओं और नवजात शिशुओं के जीवन की रक्षा की जा सकती है। गर्भवती महिलाएं घर से स्‍वास्‍थ्‍य केन्‍द्र तक और आवश्‍यकता पड़ने पर उच्‍च स्‍वास्‍थ्‍य सुविधा तक ले जाने और वापस लाने की भी पात्र हैं।
  इसके अलावा, जेएसएसके योजना के अधीन गर्भवती महिलाओं को ओपीडी फीस और भर्ती शुल्‍क सहित सभी प्रकार के उपभोक्‍ता शुल्‍क से भी छूट है।
बीमार नवजात शिशु की पात्रता
    जन्‍म के बाद 30 दिन तक बीमार नवजात शिशु को मुफ्त इलाज और सभी दवाईयां तथा अन्‍य उपभोग की अन्य वस्‍तुएं मुफ्त उपलब्‍ध कराई जाती हैं। माता की तरह नवजात शिशु को भी जांच की मुफ्त सेवा उपलब्‍ध कराई जाती है और आवश्‍यकता पड़ने पर मुफ्त रक्‍त ट्रांस्‍फ्यूजन का भी प्रावधान है। घर से स्‍वास्‍थ्‍य केन्‍द्र तक और वापसी की मुफ्त परिवहन सुविधा भी उपलब्‍ध है।
जेएसएसके का कार्यान्‍वयन
    जेएसएसके योजना के कार्यान्‍वयन के लिए पात्रता सम्‍बन्‍धी एक सरकारी आदेश राज्‍य स्‍तर पर जारी किया जाता है और एक राज्‍य नोडल अधिकारी भी मनोनीत किया जाता है। राज्‍य सरकार आवश्‍यक उपाय करती है और यह सुनिश्चित करती है कि लाभार्थी जिन सुविधाओं का पात्र है, वे उसे उपलब्‍ध कराई जाएं।
    सरकारी अस्‍पतालों और स्‍वास्‍थ्‍य केन्‍द्रों में जच्‍चे-बच्‍चे की पात्रताएं/अधिकारों के प्रचार को भी बराबर महत्‍व दिया जाता है। सभी सरकारी सुविधा केन्‍द्रों में नोटिस बोर्डों और अन्‍य सूचना पट्टों पर इन्‍हें मोटे अक्षरों में प्रचारित करना होता है, ताकि वे दूर से दिखाई दे सकें। वास्‍तव में, एनआरएचएम के अधीन एक सूचना, शिक्षा संचार स्‍थल होता है, जिसका इस कार्य के लिए प्रयोग किया जाता है।

शिकायत निवारण
 स्‍वास्‍थ्‍य सुविधा केन्‍द्रों, जिला स्‍तर और राज्‍य स्‍तर पर शिकायत निवारण प्राधिकारियों के नाम, पते, ई-मेल, टेलिफोन, मोबाइल और फैक्‍स नम्‍बर मोटे अक्षरों में दर्शाए जाने चाहिए। कुछ राज्‍यों ने सरकारी स्‍वास्‍थ्‍य केन्‍द्रों में सहायता डेस्‍क और सुझाव/शिकायत बक्‍से भी लगाए हैं। स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी सभी केन्‍द्रों पर मुफ्त पात्रता से संबंधित शिकायतों को सुनने के लिए एक सप्‍ताह में किन्‍ही दो कार्य दिवसों पर निश्चित समय (कम से कम एक घन्‍टे) की व्‍यवस्‍था करना भी अनिवार्य है।
    राष्‍ट्रीय स्‍तर पर स्‍वास्‍थ्‍य एवं परिवार कल्‍याण मंत्रालय के मातृत्‍व स्‍वास्‍थ्‍य विभाग ने जेएसएसके योजना के लिए मार्ग निर्देश जारी किये हैं। तथापि, योजना का वास्‍तविक कार्यान्‍वयन राज्‍य सरकारों की सक्रिय भूमिका पर निर्भर करता है। योजना की सफलता का निर्धारण राज्‍य सरकार के अधिकारियों द्वारा कार्यक्रम के कार्यान्‍वयन के आधार पर किया जाता है।

(जेएसएसके का एक वर्ष पूरा होने पर जारी)
*निदेशक (एम एण्‍ड सी) पसूका नई दिल्‍ली
**सहायक निदेशक, पसूका नई दिल्‍ली


01-जून-2012 14:14 IST

Friday, June 01, 2012

श्रमिकों के हित

श्रमिकों के हितों के संरक्षण और सुरक्षा के लिए तत्‍पर श्रम एवं रोजगार मंत्रालय
विशेष लेख                                                                                            * सुधीर तिवारी
     श्रम एवं रोजगार मंत्रालय का व्‍यापक दायित्‍व श्रमिकों के हितों का संरक्षण और सुरक्षा करना है जिनमें समाज के गरीब, वंचित एवं शोषित तबका शामिल है।वैधानिक पहल
पिछले तीन वर्ष के दौरान निम्‍नलिखित कानूनों में संशोधन किए गए हैं :-
·        रोजगार क्षतिपूर्ति अधिनियम, 1923
·        ग्रेच्‍युटि भुगतान अधिनियम, 1972
·        कर्मचारी राज्‍य बीमा अधिनियम, 1948
·        बागान श्रम अधिनियम, 1951
·        औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947
निम्‍नलिखित कानूनों में संशोधन के लिए विधेयक संसद में प्रस्‍तुत किए गए हैं:-

·        खान अधिनियम, 1952
·        श्रम कानून ( विशिष्‍ट स्‍थापनाओं को रिटर्न्‍स भरने और अनुरक्षण रजिस्‍टर से छूट) अधिनियम, 1988
·        अंतर-राज्‍य विस्‍थापित कामगार (रोजगार और सेवा शर्तों का विनियमन) अधिनियम, 1979
प्रमुख पहल

राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य बीमा योजना
·        यह योजना 30,000 रुपये तक कैशलेस लेनेदेन सुगम बनाने के लिए लाभार्थियों को स्‍मार्ट कार्ड जारी करने का प्रावधान करने पर बल देती है। राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य बीमा योजना की कवरेज का विस्‍तार कर निर्माण श्रमिक, रेहड़ी विक्रेता, रेलवे कुली और विक्रेता, मनरेगा श्रमिक, घरेलू  श्रमिक और बीड़ी श्रमिक इसके दायरे में लाए गए हैं। 17 मई, 2012 तक 2 करोड़ 96 लाख कार्ड जारी किए जा चुके हैं।
कर्मचारी भविष्‍यनिधि संगठन

·        कर्मचारी भवष्यिनिधि संगठन के कम्‍प्‍यूटरीकरण  की योजना लागू की गई है जिससे सदस्‍य वास्‍तविक समय के आधार पर “किसी भी समय कहीं भी“ अपने खाते और सेवाओं की पोर्टैबिलिटी हासिल करने में सक्षम हो सकेंगे।
कर्मचारी राज्‍य बीमा निगम

·        कर्मचारी राज्‍य बीमा निगम (ईएसआईसी) ने ईएसआई योजना के तहत सेवा उपलब्‍ध कराने में सुधार के लिए नई पहल शुरू की है। मार्च, 2012 के आखिर तक बीमित व्‍यक्तियों की संख्‍या एक करोड़ 55 लाख हो गई, जबकि लाभार्थियों की संख्‍या छह करोड़ दो लाख हो गई।

बाल मजदूरी

·        मंत्रालय के प्रयासों से देश में बाल मजदूरी के मामले कम हो रहे हैं। राष्‍ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन के आंकड़ों के अनुसार 2004-05 में बाल मजदूरों की संख्‍या 90 लाख 75 हजार थी, जो करीब 45 प्रतिशत घटकर 2009-10 में 49 लाख 84 हजार रह गई।
रोजगार और प्रशिक्षण

·        9,480 औद्योगिक प्रशिक्षण संस्‍थानों के नेटवर्क के जरिए व्‍यवसायिक प्रशिक्षण  उपलब्‍ध कराया जा रहा है, जहां करीब 13 लाख 38 हजार प्रशिक्षण सीटे उपलब्‍ध हैं। घरेलू संसाधनों से 100 औद्योगिक प्रशिक्षण संस्‍थानों के उन्‍नयन की योजना पूरी कर ली गई है। विश्‍व बैंक की सहायता से 400 औद्योगिक प्रशिक्षण संस्‍थानों तथा सार्वजनिक निजी भागीदारी के तहत 1396 औद्योगिक प्रशिक्षण संस्‍थानों के उन्‍नयन की योजना चलाई जा रही है।
·        कौशल विकास पहल योजना के तहत करीब 13 लाख 68 हजार लोगों को प्रशिक्षण उपलब्‍ध कराया गया है तथा 10 लाख 22 हजार लोगों को प्रमाणित किया जा चुका है। कौशल विकास पहल की इस योजना ने मॉड्यूलर रोजगार योग्‍य कौशल ढांचा शामिल हैं।
·        देशभर में इस योजना के तहत 6951 व्‍यावसायिक प्रशिक्षण प्रदाताओं का पंजीकरण कराया गया है तथा 35 मूल्‍यांकन निकायों को पैनल में शामिल किया गया है।
·        कौशल विकास योजना के तहत 1500 नये औद्योगिक प्रशिक्षण संस्‍थानों की स्‍थापना तथा पांच हजार कौशल विकास केंद्रों की स्‍थापना की जा रही है।
·        वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में युवकों के‍ लिए कौशल विकास योजना, पूर्वोत्‍तर राज्‍यों तथा सिक्किम में औद्योगिक प्रशिक्षण संस्‍थानों में बुनियादी ढांचे की कमी को पूरा करने तथा देश में सभी रोजगार कार्यलय के आधुनिकीकरण का कार्य ई-गवर्नेंस योजना के तहत चलाया जा रहा है।
औद्योगिक संबंध

·        पिछले तीन वर्ष के दौरान मुख्‍य श्रम आयुक्‍त के कार्यालय के हस्‍तक्षेप से केंद्रीय परिपेक्ष में औद्योगिक संबंधों की स्थिति कुल मिलकार शांतिपूर्ण बनी रही।
***

* उपनिदेशक (मीडिया एवं संचार), पसूका, नई दिल्‍ली  (PIB)

01-जून-2012 19:11 IST

हरित अर्थव्‍यवस्‍था : क्‍या आप इसमें शामिल हैं?

विशेष लेख                                                                                                         *ए.एन.खान

     इस वर्ष विश्‍व पर्यावरण दिवस का विषय है ‘’हरित अर्थव्‍यवस्‍था’’। हरित अर्थव्‍यवस्‍था वह है जिसमें पर्यावरण को होने वाले खतरों और पारिस्थितिक कमियों को दूर करते हुए लोगों की भलाई हो सके और सामाजिक समानता कायम हो सके। हरित अर्थव्‍यवस्‍था वह है जिसमें सार्वजनिक और निजी निवेश करते समय इस बात को ध्‍यान में रखा जाए कि कार्बन उत्‍सर्जन और प्रदूषण कम से कम हो, ऊर्जा और संसाधनों की प्रभावोत्‍पादकता बढ़े और जो जैव विविधता और पर्यावरण प्रणाली की सेवाओं के नुकसान को रोकने में मदद करे।

   अगर हरित अर्थव्‍यवस्‍था सामाजिक समानता और सभी को मिलाकर बनती है तो तकनीकी तौर पर आप भी इसमें शामिल हैं। इसलिए हमें एक ऐसी आर्थिक प्रणाली बनानी चाहिए जिसमें यह सुनिश्चित हो सके कि सभी लोगों की एक संतोषजनक जीवन स्‍तर तक पहुंच हो और व्‍यक्तिगत तथा सामाजिक विकास का अवसर मिले।

   दुनिया पहले ही अपनी जैव विविधता का बहुत सा अंश खो चुकी है। वस्‍तुओं और खाद्य वस्‍तुओं की कीमतों पर दबाव समाज पर इसके नुकसान को बताते हैं। इसका जल्‍द से जल्‍द निदान किया जाना चाहिए क्‍योंकि प्रजातियों को नुकसान और पर्यावरण की दुर्दशा का सीधा सम्‍बन्‍ध मानवता की भलाई से है। आर्थिक वृद्धि और प्राकृतिक पारिस्थि‍की तंत्र का कृषि उत्‍पादन में रूपांतरण जारी रहेगा, लेकिन यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि इस तरह का विकास प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र के वास्‍तविक मूल्‍य को ध्‍यान में रखकर किया जाए।

  द इकोनॉमिक्‍स ऑफ इकोसिस्‍टम एंड बायोडायवर्सिटी (टीईईडी) की रिपोर्ट के मुख्‍य निष्‍कर्ष थे कि कृषि के लिए रूपांतरण, बुनियादी ढांचे के विस्‍तार और जलवायु परिवर्तन के परिणामस्‍वरूप 2000 में बचे हुए प्राकृतिक क्षेत्र का 11 प्रतिशत हम गंवा सकते हैं। इस समय जमीन का करीब 40 प्रतिशत कृषि के कम प्रभाव वाले स्‍वरूप में है। हो सकता है कि जैव विविधता के कुछ और नुकसान के साथ इसे गहन खेती में रूपांतरित कर दिया जाए। एक अनुमान के मुताबिक अकेले संरक्षित क्षेत्र में 45 अरब अमरीकी डॉलर का वार्षिक निवेश किया जाएगा।

   कुछ क्षेत्रों में शहरों का तेजी से विकास हो रहा है, जबकि अन्‍य में, ग्रामीण इलाके शहरों का रूप ले रहे हैं। शहरों के भीतर प्राकृतिक वृद्धि और नौकरियों तथा अवसरों की तलाश में बड़ी संख्‍या में गांवों से शहरों की और पलायन का महत्‍वपूर्ण हिस्‍सा विकासशील देशों में देखने को मिल रहा है।

   समृद्ध अर्थ्‍व्‍यवस्‍थाओं में शहरी इलाके धन-दौलत और संसाधनों के उपभोग और कार्बनडाइक्‍साइड के उत्‍सर्जन पर संकेन्द्रित रहे हैं। विश्‍व भर में सिर्फ 50 प्रतिशत आबादी पृथ्‍वी के 2 प्रतिशत से भी कम भाग पर रह रही है, शहरी इलाके 60 से 80 प्रतिशत ऊर्जा के इस्‍तेमाल और 75 प्रतिशत कार्बनडाइक्‍साइड उत्‍सर्जन पर संकेन्द्रित कर रहे हैं। इमारतें, परिवहन और उद्योग जिनसे शहर और शहरी इलाके बनते हैं- वैश्विक ऊर्जा-सम्‍बद्ध जीएचजी उत्‍सर्जनों का 25,22 और 22 प्रतिशत योगदान देते हैं।

   कम घने शहर-जो कम प्रति व्‍यक्ति उत्‍सर्जन में मदद करते हैं- आर्थिक वृद्धि के लिए अच्‍छे हैं। विश्‍व की सबसे महत्‍वपूर्ण महानगरीय अर्थव्‍यवस्‍थाएं मात्र 12 प्रतिशत वैश्विक आबादी के साथ वैश्विक जीडीपी का 45 प्रतिशत बनाती है। घनीकरण पूंजी और बुनियादी सुविधाओं सड़कों, रेलवे, पानी और सीवेज प्रणाली की संचालन लागत को कम करती है। हरित शहरी कृषि में नगर निगम के बेकार पानी और अपशिष्‍ट का दोबारा इस्‍तेमाल किया जा सकता है, परिवहन लागत को कम किया जा सकता है, जैव विविधता और आर्द्र भूमि को संरक्षित किया जा सकता है और हरित पट्टी का बेहतर इस्‍तेमाल किया जा सकता है।

    लेकिन शहरों के विकास ने स्‍थानीय पर्यावरण की गुणवत्‍ता पर असर डाला है, साफ पानी और स्‍वच्‍छता के अभाव के कारण गरीब लोग प्रभावित हुए हैं। इसके परिणामस्‍वरूप बीमारियां बढ़ी हैं और आजीविका पर असर पडा है।

    जोखिम को कम करने के उपायों में पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएं महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। मुंबई में 2005 में आई बाढ़ का कारण शहर की मीठी नदी का पर्यावरण संरक्षण नहीं करना माना जा रहा था। बाढ़ में 1000 से ज्‍यादा लोग मारे गए थे और शहर का जनजीवन अस्‍त-व्‍यस्‍त हो गया था।

    गांवों से शहरी इलाकों की तरफ पानी भेजने के दौरान पानी का लीकेज गंभीर चिंता का विषय है। पाइपों के उन्नयन और उन्‍हें बदल देने से अनेक औद्योगिक शहरों में 20 प्रतिशत पीने का पानी बचाया जा सकता है। दिल्‍ली में पानी की जबरदस्‍त किल्‍लत से निपटने के लिए नगर निगम ने उन इमारतों में बारिश का पानी जमा करना अनिवार्य बना दिया जिनकी छत का क्षेत्र 100 वर्ग मीटर से ज्‍यादा है। अनुमान लगाया गया है कि प्रति वर्ष 76,500 मिलियन लीटर पानी जमीन पुर्नभरण के लिए उपलब्‍ध हो सकेगा। चेन्‍नई में शहरी जमीन के पानी के पुर्नभरण ने 1988 से 2002 के बीच जमीन के पानी का स्‍तर चार मीटर बढ़ा दिया।

   हरित अर्थव्‍यवस्‍था में नवीकरणीय ऊर्जा उत्‍पादन और बिजली ऊर्जा वितरण, ऊर्जा दक्षत और भंडारण, आर्गेनिक खेती, हरित परिवहन और हरित इमारत जैसे विविध उद्यम शामिल हैं। ऊर्जा दक्ष विद्युत से लेकर बिजली से चलने वाली यात्री ट्रेनों, जैव ईंधन सभी कुछ इसमें सम्मिलित है। यह विभिन्‍न उद.यमों का विविध समूह है जो कम नुकसान पहुंचाने वाले हैं और अधिक समय तक टिक सकते हैं।


*5 जून 2012 को विश्‍व पर्यावरण दिवस है।    (PIB) (01-जून-2012 20:31 IST)

नपुंसक विरोध

केन्द्र सरकार का तुगलकी - फरमान एकाएक २३-०५-२०१२ को पेट्रोल की कीमत ७-५४ रुपये पैसे प्रति लीटर बढ़ा दी गयी। देश के हर पेट्रोल पम्पों पर अपनी अपनी गाड़ियों के साथ रात १२ बजे तक ग्राहकों की भारी भीड़ ताकि अपने अपने संसाधन और वाहन के हिसाब से वे अधिक से अधिक पेट्रोल भराकर बढ़ी हुई कीमत को कुछ दिन के लिेए "मात" दे सकें। वैसे भी दूरगामी परिणामों के बारे में सोचने की फुर्सत किसे है? उस भारी भीड़ में पेट्रोल पम्प वाले ने अपनी "आसन्न व्यावसायिक क्षतिपूर्ति" के लिए किसको कितना कम पेट्रोल दिया यह एक अलग प्रसंग है। मगर यह भीड़ "स्वतः-स्फूर्त" थी जिसमें कितनों को खाली हाथ भी लौटना पड़ा।
आज ३१-०५-२०१२ को तमाम विपक्षी दलों और संगठनों द्वारा पेट्रोल की मूल्य-वृद्धि के खिलाफ "भारत बन्द" का आयोजन किया गया है। उम्मीद है २३-०५-२०१२ की रात में मूल्य-वृद्धि से पहले भराये गए पेट्रोल अब तक खत्म हो गए होंगे। क्या वही "स्वतः-स्फूर्त" जनता की भीड़ विरोध में आज सड़कों पर उतरेगी? कभी नहीं। सम्भव ही नहीं है क्योंकि राजनैतिक दलों और आम जनता के बीच मे सिर्फ "वोट" का व्यावसायिक सम्बन्ध ही तो रह गया है।

हाँ सड़कों पर उतरेगी वो प्रायोजित भीड़ जिनका स्वार्थ राजनैतिक दलों और संगठनों से जुड़ा हुआ है। फिर सड़कों पर होगा वही गुण्डई का नंगा नाच, सरकारी (जनता) सम्पत्ति का नुकसान और दिहाड़ी मजदूरों की मजदूरी छीनने का खेल जिसे हम वातानुकूलित कमरों में बैठकर टी० वी० में देखेंगे। शाम में तथाकथित बुद्धिजीवियों की टीम के साथ "प्राइम टाइम" में आकर न्यूज चैनल वाले अपने अपने ज्ञान का पिटारा खोलेंगे, चैनल का टी० आर० पी० बढ़ेगा। सबेरे देश के हर हिस्से में स्थानीय "प्रभावशाली लोगों" की प्रमुखता के साथ अखबारों में फोटो और उनके "कारनामे" का समाचार जो सम्बन्धित दल के आकाओं तक पहुँचे। शाम तक हम सब भूल जायेंगे और अगली सुबह से "फिर वही बात रे वही बात"।

केन्द्र सरकार का कई राजनैतिक दलों द्वारा दिल्ली में दिलो जान से समर्थन के बावजूद वे इस भारत बन्द में शामिल होने का जोर शोर से विज्ञापन भी कर रहे हैं ताकि "आमलोगों" को पुनः बेवकूफ बनाने में वे सफल हो सकें। इस नपुंसक विरोध का क्या मतलब? आम जनता क्यों नहीं है राजनैतिक दलों के साथ? यह सवाल भी कम मौजूं नहीं है। देश के रहनुमाओं द्वारा छः दशकों से लगातार छली गयी जनता की स्थिति उस रेगिस्तानी शुतुरमुर्ग की तरह है जो तूफान आने से पहले अपने सर को बालू में यह सोचकर छुपा लेता है कि "अब मेरा तूफान कुछ नहीं बिगाड़ सकता"। खैर--- जय हो भरतवंशी सन्तान - मेरा भारत महान।
श्यामल सुमन
09955373288