Saturday, July 11, 2015

लुधियाना में स्वयंभु टीम की तानाशाही जारी

सिद्धांतों पर चोट होती देख हुयी सर्कट हाऊस में मारपीट 
लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ मीडिया, 
देश को आज़ाद कराने की जंग में अहम योगदान देने वाला मीडिया,
पंजाब में खूनी दौर आया तो अहम भूमिका निभाने वाला मीडिया,
और अब----खुद ही कुर्सी के लिए अपने ही भाईचारे में नफरत फैलाता मीडिया। 
कहां से कहां पहुँच गया मीडिया? 
इतनी गिरावट केवल नाशवान पदों के लिए?  जब से पता पता चला तब से शर्म आने लगी है। 
इस कड़वी हकीकत का अंदाजा हुआ उन लोगों को जो लुधियाना के सर्कट हाऊस में मौजूद थे।  शायद अब मीडिया के किसी दुश्मन को कोई वसाज़िश रचने की ज़रूरत नहीं रही। मीडिया ने अपनी तबाही की राह चुन ली है। "प्रेस क्लब" के नाम मीडिया को गुंडा गिरोह कहलाने की कवायद शुरू है। किसी क्लब की प्रधानगी या कोई अधिकार किसी को मिलेगा या नहीं लेकिन आम जनता के साथ साथ ख़ास लोगों के दिलों में भी जो ख़ास जगह मीडिया के लिए बानी हुयी थी वह ख़ास जगह आज की घटना के कारण मीडिया से छी चुकी है। आज की घटना  किस ने मारपीट की और किसके साथ हुयी यह कोई महत्व नहीं रखता लेकिन यह बात महत्वपूर्ण अवश्य है कि उकसाहट और तानाशाही का अंदाज़ इन बुद्धिजीवियों की कलम में नज़र ही क्यों आया? क्या मिल रहा है प्रेस क्लब के नाम पर कि ये लोग सभी संबंध भूल कर आँखें दिखने पर उतारू हो गए। जब बुलाकर आँख दिखाई जाएगी तो उस घूरती हुयी आँख को निकालने वाले हाथ भी ज़रूर उठेंगे। 
शर्म का ज़रा सा भी अहसास हो तो स्वयंभु टीम के सभी सदस्यों को अपने पद से त्यागपत्र दे देना चाहिए।  एक संभावित क्लब के प्रधानगी की काल्पनिक कुर्सी के साथ फेविकोल की तरह चिपक कर ये लोग क्या संदेश देना चाहते हैं। 
  किसी मित्र ने तो यहाँ तक साफ़ कहा:एक अंग्रेज पिट्ठू अख़बार के रिपोर्टर व एक जालंधर के नए हिंदी अख़बार के रिपोर्टर ने परधान बनने के चक्कर में  प्रेस क्लब के नाम पर ऐसी नफरत फलाई जिसका दुष्परिणाम रिपोर्टर्स के आज सर्किट हाउस में मारपीट के रूप में सामने आया। शेम ऑन यूँ परधानगी के लालचियों। तुमने तो अपनी ही बिरादरी को नहीं छोडा। अब आगे जाकर पता नहीं क्या करोगे।
वरिष्ठ पत्रकार अश्वनी जेटली सड़क हादसे में बुरी तरह घायल होने के बाद अब तक बीएड रेस्ट पर हैं। आज सुबह ही उन्होंने एक संदेश वाटसअप पर शेयर किया जिसका दर्द आप उसे पढ़ कर ही महसूस कर सकते हैं। वह लिखते हैं:  I am on bed rest and unable to force my fingers to write much... Even I came to know about this newly formed association a few days ago and after that have gone through the fact that the newly formed body is on the fire of controversies due to its discriminatory acts and behavior.... I salute all those media persons (including CAN :s Manoj Dhiman) who raised their voice against or carried out a detailed story about discriminatory acts of the newly formed body. In fact we have been waiting since long back that some organization for the welfare of the journalists should be formed and seniormost and sincere comrades shall come forward for this cause. Thank God some effort is initiated but it was unfortunate that the body came under fire in the very beginning... Their efforts are appreciating but if they have had taken their time to make all points cleared already without so much hurry, then this effort would have created a history rather than creating a mystery
  हैं,"मुझे जिस बात का डर था, वही हुआ। कुछ लोग सरकार की शह पर प्रेस में नफरत फ़ैलाने में सफल हो गए। आज की मारपीट की घटना के बाद मुझे लगता है कि अगर सेनिओरिटी को यूं ही नजरअंदाज की जाता रहा तो दरार बढेगी और आज की घटना की पुनरावृति होगी। जेटली साहिब व धीमान जी जैसे साथियों /डेस्क/ येल्लो कार्ड धारक/ 5 साल वाले साथियों को भी साथ लेकर आगे चलना चाहिए। इसके लिए संगर्ष जारी रहेगा।"
एक और मित्र कहते हैं:Jaitely saab tusi jaldi theek ho jao apan sare mil ke etihas banavange. Baki ajj ta vade dukh di gl eh hai ke circuit house vich ek purane paterker ne sacruteni commetee de kise member naal voting de mamle te os da adhikar khoe jaan te jdo galbat karni chahi ta member os di gal da jwab den di bajae os nu dhamkaon lg pia jis te voting de adhikar to vanjhe keete os paterkar de sr camraman ne os member nu kharhka ditta. Bhave eh gal meri krni nhi si banadi pr es sacruteni commetee de ena members nu voting de adhikar to vanjhe keete ja rahe paterkara dia bhavnava nu samajh hi koei agla faisla lena chaheeda hai nhi ta ena nu kadam kadam te es guse da sikar hona pavega. Khair hove......
मीडिया के सभी जागरूक मित्र इस घटनाक्रम से द्रवित हैं। आयो दुआ करें कि भगवान इन सभी को सद्धबुद्धि दे। काश ये समझ सकें कि पहले एकता और प्रेम होना आवशयक है बाकी सब कुछ अपने आप चला आता है। ये लोग तो ऐसे कर रहे हैं जैसे किसी राज सिंघासन का युद्ध कर रहे हों। अगर यह लोग असूल पर रहते तो आज की शर्मनाक घटना नहीं घाटी। इनके तानाशाही रवैये ने मारामारी को न्योता दिया। उकसाहट इन्हीं की थी। 

Thursday, July 09, 2015

पूँजीवाद की मुसीबतों के चक्तव्यूह में घिरी पारुल कालिया

मीडिया के सामने रो पड़ी पारुल अपनी दास्तान सुनाते सुनाते 
लुधियाना: छोटी सी उम्र लेकिन दुःख शायद उसकी तक़दीर बन चूका है।  राहत मिलने की उम्मीद में जहाँ भी जाती है वहीँ उस पर शोषण की नज़र पड़नी शुरू हो जाती है। छोटी सी उम्र में ही बड़ी बड़ी मुसीबतों को गले लगा चुकी पारुल कालिया दुगरी थाने के सामने मीडिया को रो रो कर अपनी दास्तान सुना रही थी। किसी न किसी तरह अपने एकलौते बेटे के पालन पोषण में लगी पारुल के लिए अब वही है जीने की उम्मीद। अपने बेटे को पाल कर बड़ा करना ही शायद उसका अब एकमात्र मकसद है। उसकी तरफ जो भी नज़र उठती है गलत इरादे से उठती लगती है। उसके खिलाफ खड़े लोगों में जो चेहरे हैं उनके नाम सुनकर शायद आप भी चौंक जाएं। इन नामों का ज़िक्र बाद में पहले बात करते हैं पारुल के लिए मुसीबत बने हालात की। आम तौर पर घरों में समस्या होती है गरीबी के कारण, लालच के कारण, स्वार्थ के कारण पर यहाँ मामला ही कुछ और है। यह मुद्दा पैदा हुआ है पूँजीवाद के साथ पैदा होती शर्मनाक समस्यायों के साथ। जिस समाज में पैसा ही सब कुछ बन जाये तो भगवान बना पैसा समाज को किस गिरावट तक ले जाता है शायद इसका अनुमान भी न लगाया जा सके। पारुल भी पूंजीवाद के साथ पैदा होती मुसीबतों का ही शिकार हो रही है। पारुल को अपने विदेशी रिश्तेदारों से आता पैसा ही उसके लिए समस्याएं लेकर आया। पारुल को देख कर याद आती हैं जनाब साहिर लुधियानवी साहिब के एक लम्बे गीत की पंक्तियाँ
कहते हैं जिसे पैसा बच्चो यह चीज़ बड़ी मामूली है 
लेकिन इस पैसे के पीछे सब दुनिया रस्ता भूली है। 
साहिर साहिब ने यह हकीकत दश्कों पहले बयान की थी लेकिन इसने बार बार खुद को साबित किया। पैसे ने दुनिया भर को भटका कर अपने रास्तों से हटा दिया। सभी रिश्ते-नाते, संबंधी एक दुसरे के साथ प्यार या संबन्ध  से नहीं केवल पैसे के नफे नुक्सान से देखने लगे। किसी से बुखार का हाल पूछो तो जवाब मिलता है अभी तो बस चवन्नी आराम आया है।  बारह आना अभी भी तबीयत खराब है। किसी युवा से पूछो तो भाई क्या बनोगे तो जवाब मिलता है--जिसमें चार पैसे बनें। किसी लड़की से पूछ लो कि किस से शादी करोगी तो अक्सर कई लड़कियां खुल कर कहती हैं जो खूब ऐश कराये जिसके पास ढेर सारा पैसा हो। स्कूल की पढ़ाई पूरी करनी हो या कालेज की शिक्षा--पैसा अपना जलवा दिखा रहा है। शिक्षा और काम के बावजूद नौकरी चाहिए तो वहां भी नौकरी दिलवाने का पैसा खर्च करो वो भी एक नंबर में। इलाज कराना हो तो भी पैसा।  मरीज़ अस्पताल में मर जाये तो शव लेने के लिए भी पैसा। शव घर आ जाये तो श्मशान घात वाले भी पैसा मांगते हैं। पैसे की सोच से दूषित हो चुके इस शर्मनाक समाज में आखिर पारुल भी क्या करे?
तलाक के बाद जब पारुल अपने बच्चे को लेकर कुछ चिंतित हुई तो उसकी मौसी ने उसके लिए कुछ पैसे अपनी बहन के पास भेजे। मकसद था परुल के सर की छत बन सके। मौसी चाहती थी कि पारुल उन पैसों से अपना घर खरीद ले। इन पैसों से एक प्लाट भी लिया गया तो आखिर रजिस्ट्री भी होनी थी और पैसे की अदायगी भी। इसी पड़ाव पर आकर सारे मामले ने एक नया मोड़ लिया और पारुल पहुँच गयी दुगरी थाने में अपनी शिकायत लेकर।  
थाने के बाहर उसने मीडिया को बताया कि जब उसने अपने पैसे या रजिस्ट्री वापिस मांगी तो सबंधित डीलर ने उस पर हमला कर दिया। पारुल का आरोप था कि पुलिस ने उसकी सुनवाई नहीं की।  मीडिया ने जब पुलिस से सम्पर्क किया तो पुलिस ने मीडिया के सामने उसकी पूरी सुनवाई की और पूरी सुरक्षा का आश्वासन भी दिया। 
किसी निजी कम्पनी में काम करके अपना गुज़ारा चला रही पारुल परेशान है उन धमकियों से जो उसे राह आते जाते दी जातीं हैं। 
कौन हैं पारुल को धमकियां देने वाले?
कौन है उसके विरोधी? 
कौन है उसका हमदर्द?
क्या बनेगा पारुल कालिया का?
इन सभी सवालों के जवाब आपको मिल सकें हमारी अगली पोस्ट में जिसमें कुरेदा जायेगा पारुल कालिया के लिए खतरा बने लोगों का हर पहलू।
आज पारुल की कहानी देख सुन कर याद आते हैं  ओशो जिन्होंने अमेरिका में जा कर बहुत सफलता से अपना कम्यून चला कर दिखाया था। वहां कोई करंसी नहीं थी लेकिन हर किसी को हर सुविधा उपलब्ध थी। इसकी सफलता देख कर ही पूंजीवादी समाज हिल गया और ओशो की जान का दुश्मन बन बैठा।
पूंजीवादी समाज में पैसे के असंतुलित बटवारे ने ही जन्म दिया जुर्मों को और जुर्मों से भरा समाज बन गया जीने के लिए नरक से भी बदतर। आज लावारिस फिल्म का गीत भी याद आ रहा है-- जिसकी एक पंक्ति थी---यही पैसा तो अपनों से दूर करे है--- . आज पारुल जिस हालात में पहुँच चुकी है उसके लिए पूंजीवादी सिस्टम पूरी तरह ज़िम्मेदार है। आईये इस सितम को बदल कर पारुल जैसी अनगिनत लड़कियों को बचाने का यज्ञ शुरू करें। 

Sunday, July 05, 2015

दर्द को ही हिम्मत बनाया एसिड अटैक का शिकार लड़कियों ने


फोर्टिस ने कराया एसडी अटैक के खिलाफ एक शानदार आयोजन 
लुधियाना: 4 जुलाई 2015: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो):
गीतों के बोल दिल को हिला देने वाले थे और संगीत दर्द से भरा हुआ। दिल को छूने वाले इस संगीतक जादू के साथ झिलमिलाती रोशनियाँ और मंच पर लहराती जज़्बाती सी युवतियों बार बार सबितकर रही थी कि वे एसिड अटैक के बाद फिर नए सिरे से उठ खड़ी हुयी हैं। बारी-बारी स्टेज पर रैंपवॉक करती युवतियां हैरानीजनक हद तक आत्मविश्वास से सराबोर थी। हॉल में बैठे दर्शक तालियों की गड़गड़ाहट से युवतियों की हौसला अफजाई करते रहे पर वे इसके बिना भी पूरे होंसले में थी। गुरु नानक भवन में शनिवार 4 जुलाई की रात को एक ऐसा मंच बना जिससे आवाज़ उठी कि हम किसी से कम नहीं। जिसमें रैंप पर चलने वाली 9 युवतियां वो थी, जिन्होंने तेजाबी हमलों से चेहरा झुलस जाने के बावजूद अपनी न जिंदगी को झुलसने नहीं दिया और न ही अपने आत्म विश्वास को। 

इन बहादुर लड़कियों ने अपने चेहरों के दाग को पर्दो के पीछे नहीं छुपाया बल्कि प्रोफैशनल्स मॉडल्स की तरह रैंप पर उतरकर पूरी दुनिया को न केवल अपनी अंदरूनी खुबसूरती दिखाई बल्कि यह संदेश दिया कि तेजाब उनके शरीर को झुलसा सकता है, लेकिन जिंदगी जीने के जज्बे को नहीं। फोर्टिस अस्पताल लुधियाना द्वारा एसिड अटैक पीड़ितों के पुनर्वास के लिए काम कर रही एन.जी.ओ. छांव फाऊंडेशन के सहयोग से यह चैरिटी शो ‘ब्यूटीफुल यू’ आयोजित किया गया। इन लड़कियों ने वहां मेहमानों के साथ साथ मीडिया से भी आँख मिला कर बात की। 
यह शो उन लोगों की शर्मनाक हार थी जिन्होंने सोचा था कि इस हमले के बाद ये लड़कियां कहीं मुँह दिखने लायक नहीं रहेंगी। इसमें लुधियाना में कुछ साल पहले एसिड अटैक की शिकार हुई राजवंत के अलावा दिल्ली, यू.पी. व राजस्थान की 9 युवतियां इंडो वैस्ट्रन ड्रैस पहनकर उतरीं। पूरे उत्साह से लबरेज युवतियों के जज्बे को देखकर दर्शक थोड़े से भावुक भी हुए लेकिन तालियों की गड़गड़ाहट से उनके हौंसले को सलाम भी किया।
यह ख़ास आयोजन, यह फैशन शो डाक्टर्स डे के उपलक्ष्य में हुआ था। सो फोर्टसि अस्पताल के सीनियर डाक्टर्स ने भी इन पीड़ितों के जज्बे को सलाम करते हुए उनके साथ रैंपवॉक किया। इस दौरान एक कोरियोग्राफी ने दर्शकों को भावुक किया। इसमें दिखाया गया कि किस तरह कुछ लोगों की सनक में किया गया तेजाबी हमला किसी की जिंदगी में तूफान ला देता है। लागा चुनरी में दाग दिखायुं कैसे--- गीत के बोल बार बार भावुक कर रहे थे। 
रूपा भी मौजूद थी:
यहाँ वे लोग नायक थे जिन्होंने असली ज़िंदगी में भी पीड़ा झेली और इसका दत कर सामना किया। इन्हीं में से एक थी रूपा। इस शो के वैस्ट्रन ड्रेस राऊंड में युवतियों की ड्रेस को रूपा ने डिजाइन किया था। रूपा खुद एसिड अटैक की शिकार है, और आगरा में रहती है। रूपा के मुताबिक उसने जिंदगी में यह सीखा है कि कभी डरकर मत जियो, और आगे बढ़कर जिंदगी की लड़ाई लड़ो। हालांकि इसमें समाज का प्रोत्साहन जरूरी है। कुल मिलकर दर्शकों ने इन लड़कियों की हिम्मत को सलाम किया और एसिड फेंकने वालों को लानत भेजी। 
फोर्टिस विवान सिंह गिल खुद भी भावुक हुए 
फैशन शो का उदघाटन डिप्टी कमिश्नर रजत अग्रवाल ने कियाऔर कुछ देर खुद भी वहां रुक कर कार्यक्रम का आनंद लिया। अस्पताल के फैसिलिटी डायरैक्टर विवान सिंह गिल व एडमिन हैड हरप्रीत बराड़ ने डी.सी. रजत अग्रवाल का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि यह उनके लिए ताउम्र यादगार लम्हा रहेगा। उन्होंने कहा कि समाज को एसिड अटैक जैसे घृणित अपराध को खत्म करना होगा, लेकिन साथ ही एसिड अटैक के बावजूद जिंदादिली का सबूत देने वाली युवतियों का भी प्रोत्साहन करना होगा। शो के आयोजन में लक्ष्मी स्टोर फाऊंटेन चौक, ऑल इंडिया रेडियो एफएम गोल्ड लुधियाना, लुधियाना साइकिलिंग क्लब, वी.एल.सी.सी., एक्टेंसी द डांस स्टूडियो बाय गौतम, भंगड़ा जंक्शन ने भी खूब योगदान दिया।
डाक्टर अविनाश शर्मा ने पूरे समाज को आड़े हाथों लिया
वहां विशेष तौर पर कार्यक्रम देखने के लिए आये हुए डाक्टर अविनाश शर्मा ने डाक्टरों के साथ साथ पूरे समाज को आड़े हाथों लिया।  उन्होंने कहा का जहाँ डाक्टर केवल पैसे के मुरीद बन रहे हैं वही समाज भी शादी ब्याह जैसे पावन रिश्तों को केवल पैसे से टोल कर देख रहा है।