Friday, October 03, 2014

हम सब गंदगी से मुक्ति का संकल्प करें--PM Modi:

03-अक्टूबर-2014 13:04 IST
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्धारा रेडियो पर देश को दिए गये पहले संबोधन का मूल पाठ 
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी, 02 अक्टूबर, 2014 को नई दिल्ली में इंडि‍या गेट पर स्‍वच्‍छ भारत अभि‍यान के शुभारंभ के अवसर पर राष्‍ट्र को संबोधि‍त करते हुए। (पसूका)
The Prime Minister, Shri Narendra Modi addressing the Nation on the launch of Swachh Bharat Mission, at Rajpath, in New Delhi on October 02, 2014.
मेरे प्यारे देशवासियो,

आज विजयदशमी का पावन पर्व है। आप सबको विजयदशमी की अनेक- अनेक शुभकामनाएं।

मैं आज रेडियो के माध्यम से आपसे कुछ मन की बाते बताना चाहता हूं और मेरे मन में तो ऐसा है कि सिर्फ आज नहीं कि बातचीत का अपना क्रम आगे भी चलता रहे। मैं कोशिश करूंगा, हो सके तो महीने में दो बार या तो महीने में एक बार समय निकाल कर के आपसे बाते करूं। आगे चलकर के मैंने मन में यह भी सोचा है कि जब भी बात करूंगा तो रविवार होगा और समय प्रात: 11 बजे का होगा तो आपको भी सुविधा रहेगी और मुझे भी ये संतोष होगा कि मैं मेरे मन की बात आपके मन तक पहुंचाने में सफल हुआ हूं।

आज जो विजयदशमी का पर्व मनाते हैं ये विजयदशमी का पर्व बुराइयों पर अच्छाइयों की विजय का पर्व है। लेकिन एक श्रीमान गणेश वेंकटादरी मुंबई के सज्जन, उन्हों ने मुझे एक मेल भेजा,  उन्होंने कहा कि विजयदशमी में हम अपने भीतर की दस बुराइयों को खत्म करने का संकल्प करें। मैं उनके इस सुझाव के लिए उनका आभार व्यक्त करता हूं। हर कोई जरूर सोचता होगा अपने-अपने भीतर की जितनी ज्यादा बुराइयों को पराजय करके विजय प्राप्त करे, लेकिन राष्ट्र  के रूप में मुझे लगता है कि आओ विजयदशमी के पावन पर्व परऔर गंदगी को खत्म  कर कर के विजय प्राप्त करना विजयदशमी के पर्व पर हम ये संकल्प कर सकते हैं।

कल 2 अक्टूबर पर महात्मा गांधी की जन्म जयंती पर “स्वच्छ‍भारत” का अभियान सवा सौ करोड़ देशवासियों ने आरंभ किया है। मुझे विश्वास है कि आप सब इसको आगे बढ़ाएंगे। मैंने कल एक बात कही थी “स्वच्छ  भारत अभियान” में कि मैं नौ लोगों को निमंत्रित करूंगा और वे खुद सफाई करते हुए अपने वीडियो को सोशल मीडिया में अपलोड करेंगे और वे ‘और’ नौ लोगों को निमंत्रित करेंगे। आप भी इसमें जुडि़ए, आप सफाई कीजिए, आप जिन नौ लोगों का आह्वान करना चाहते हैं, उनको कीजिए, वे भी सफाई करें, आपके साथी मित्रों को कहिए, बहुत ऊपर जाने की जरूरत नहीं, और नौ लोगों को कहें, फिर वो और नौ लोगों को कहें, धीरे-धीरे पूरे देश में ये माहौल बन जाएगा। मैं विश्वास करता हूं कि इस काम को आप आगे बढ़ायेंगे।

हम जब महात्मा गांधी की बात करते हैं, तो खादी की बात बहुत स्वाभाविक ध्यान में आती है। आपके परिवार में अनेक प्रकार के वस्त्र  होंगे, अनेक प्रकार के वस्त्र होंगे, अनेक प्रकार के  फैब्रिक्स होंगे, अनेक कंपनियों के products होंगे, क्या उसमें एक खादी का नहीं हो सकता क्या,  मैं अपको खादीधारी बनने के लिए नहीं कह रहा, आप पूर्ण खादीधारी होने का व्रत करें, ये भी नहीं कह रहा। मैं सिर्फ इतना कहता हूं कि कम से कम एक चीज, भले ही वह हैंडकरचीफ,  भले घर में नहाने का तौलिया हो, भले हो सकता है बैडशीट हो, तकिए का कबर हो, पर्दा हो, कुछ तो भी हो, अगर परिवार में हर प्रकार के फैब्रिक्स का शौक है,  हर प्रकार के कपड़ों का शौक है, तो ये नियमित होना चाहिए और ये मैं इसलिए कह रहा हूं कि अगर आप खादी का वस्त्र खरीदते हैं तो एक गरीब के घर में दीवाली का दीया जलता है और इसीलिए एकाध चीज ... और इन दिनों तो 2 अक्टूबर से लेकर करीब महीने भर खादी के बाजार में स्पेशल डिस्काउंट होता है, उसका फायदा भी उठा सकते हैं। एक छोटी चीज…… और आग्रहपूर्वक इसको करिए और आप देखिए गरीब के साथ आपका कैसा जुड़ाव आता है। उस पर आपको कैसी सफलता मिलती है। मैं जब कहता हूं सवा सौ करोड़ देशवासी अब तक क्या हुआ है.... हमको लगता है सब कुछ सरकार करेगी और हम कहां रह गए,  हमने देखा है .... अगर आगे बढ़ना है तो सवा सौ करोड़ देशवासियों को...करना पड़ेगा ….. हमें खुद को पहचानना पड़ेगा, अपनी शक्ति को जानना पड़ेगा और मैं सच बताता हूं हम विश्व में अजोड़ लोग हैं। आप जानते हैं हमारे ही वैज्ञानिकों ने कम से कम खर्च में मार्स पहुंचने का सफल प्रयोग, सफलता पूर्वक पर कर दिया। हमारी ताकत में कमी नहीं है, सिर्फ हम  अपनी शक्ति को भूल चुके हैं। अपने आपको भूल चुके हैं। हम जैसे निराश्रित बन गए हैं.. नहीं मेरे प्यारे भइयों बहनों ऐसा नहीं हो सकता। मूझे स्वामी विवेकानन्द जी जो एक बात कहते थे, वो बराबर याद आती है। स्वामी वि‍वेकानन्द  अक्सर एक बात हमेशा बताया करते थे। शायद ये बात उन्होंने कई बार लोगों को सुनाई होगी।

विवेकानन्द जी कहते थे कि एक बार एक शेरनी अपने दो छोटे-छोटे बच्चों को ले कर के रास्ते से गुजर रही थी। दूर से उसने भेड़ का झुंड देखा,  तो शिकार करने का मन कर गया,  तो शेरनी उस तरफ दौड़ पड़ी और उसके साथ उसका एक बच्चा भी दौड़ने लगा। उसका दूसरा बच्चा  पीछे छूट गया और शेरनी भेड़ का शिकार करती हुई आगे बढ़ गई। एक बच्चा भी चला गया, लेकिन एक बच्चा बिछड़ गया, जो बच्चा बिछड़ गया उसको एक माता भेड़ ने उसको पाला-पोसा बड़ा किया और वो शेर भेड़ के बीच में ही बड़ा होने लगा। उसकी बोलचाल, आदतें सारी भेड़ की जैसी हो गईं। उसका हंसना खेलना,  बैठना,  सब भेड़ के साथ ही हो गया। एक बार, वो जो शेरनी के साथ बच्चा चला गया था, वो अब बड़ा हो गया था। उसने उसको एक बार देखा ये क्या बात है। ये तो शेर है और भेड़ के साथ खेल रहा है। भेड़ की तरह बोल रहा है। क्या‍हो गया है इसको। तो शेर को थोड़ा अपना अहम पर ही संकट आ गया। वो इसके पास गया। वो कहने लगा अरे तुम क्या कर रहे हो। तुम तो शेर हो। कहता- नहीं, मैं तो भेड़ हूं। मैं तो इन्हीं के बीच पला-बढ़ा हूं। उन्होंने मुझे बड़ा किया है। मेरी आवाज देखिए, मेरी बातचीत का तरीका देखिए। तो शेर ने कहा कि चलो मैं दिखाता हूं तुम कौन हो। उसको एक कुएं के पास ले गया और कुएं में पानी के अंदर उसका चेहरा दिखाया और खुद के चेहरे के साथ उसको कहा- देखो, हम दोनों का चेहरा एक है। मैं भी शेर हूं, तुम भी शेर हो और जैसे ही उसके भीतर से आत्म सम्मान जगा, उसकी अपनी पहचान हुई तो वो भी उस शेर की तरह,  भेड़ों के बीच पला शेर भी दहाड़ने लगा। उसके भीतर का सत्व जग गया। स्वामी विवेकानंद जी यही कहते थे। मेरे देशवासियों, सवा सौ करोड़ देशवासियों के भीतर अपार शक्ति है, अपार सामर्थ्य है। हमें अपने आपको पहचानने की जरूरत है। हमारे भीतर की ताकत को पहचानने की जरूरत है और फिर जैसा स्वामी विवेकानंदजी ने कहा था उस आत्म-सम्मान को ले करके, अपनी सही पहचान को ले करके हम चल पड़ेंगे, तो विजयी होंगे और हमारा राष्ट्र भी विजयी होगा, सफल होगा। मुझे लगता है हमारे सवा सौ करोड़ देशवासी भी सामर्थ्यवान हैं, शक्तिवान हैं और हम भी बहुत विश्वास के साथ खड़े हो सकते हैं।

इन दिनों मुझे ई-मेल के द्वारा सोशल मीडिया के द्वारा, फेस-बुक के द्वारा कई मित्र मुझे चिट्ठी लिखते हैं। एक गौतम पाल करके व्यक्ति ने एक चिंता जताई है, उसने कहा है कि जो स्पैशली एबल्ड चाईल्ड होते हैं, उन बालकों के लिए नगरपालिका हो, महानगरपालिका, पंचायत हो, उसमें कोई न कोई विशेष योजनाएं होती रहनी चाहिएं। उनका हौसला बुलन्द करना चाहिए। मुझे उनका ये सुझाव अच्छा लगा क्यों कि मेरा अपना अनुभव है कि जब मैं गुजरात में मुख्यामंत्री था तो 2011 में एथेन्स में जो स्पेशल ओलम्पिक होता है, उसमें जब गुजरात के बच्चे गये और विजयी होकर आये तो मैंने उन सब बच्चों  को, स्पेशली एबल्ड बच्चों  को मैंने घर बुलाया। मैंने दो घंटे उनके साथ बिताये, शायद वो मेरे जीवन का बहुत ही इमोशनल,  बड़ा प्रेरक,  वो घटना थी। क्योंकि मैं मानता हूं कि किसी परिवार में स्पेशली एबल्ड बालक है तो सिर्फ उनके मां-बाप का दायित्व नहीं है। ये पूरे समाज का दायित्व है। परमात्मा ने शायद उस परिवार को पसंद किया है, लेकिन वो बालक तो सारे राष्ट्र् की जिम्मेसदारी होता है। बाद में इतना मैं इमोशनली टच हो गया था कि मैं गुजरात में स्पे‍शली एबल्ड  बच्चों  के लिए अलग ओलम्पिक करता था। हजारों बालक आते थे, उनके मां-बाप आते थे। मैं खुद जाता था। ऐसा एक विश्वास का वातावरण पैदा होता था और इसलिए मैं गौतम पाल के सुझाव, जो उन्होंने दिया है,  इसके लिये मैं, मुझे अच्छा लगा और मेरा मन कर गया कि मैं मुझे जो ये सुझाव आया है मैं आपके साथ शेयर करूं।

    एक कथा मुझे और भी ध्यान आती है। एक बार एक राहगीर रास्ते के किनारे पर बैठा था और आते-आते सबको पूछ रहा था मुझे वहाँ पहुंचना है, रास्ता  कहा है। पहले को पूछा, दूसरे को पूछा, चौथे को पूछा। सबको पूछता ही रहता था और उसके बगल में एक सज्जन बेठे थे। वो सारा देख रहे थे। बाद में खड़ा हुआ। खड़ा होकर किसी को पूछने लगा, तो वो सज्जन खड़े हो करके उनके पास आये। उसने कहा – देखो भाई, तुमको जहां जाना है न, उसका रास्ता इस तरफ से जाता है। तो उस राहगीर ने उसको पूछा कि भाई साहब आप इतनी देर से मेरे बगल में बेठे हो, मैं इतने लोगों को रास्ता पूछ रहा हूं,  कोई मुझे बता नहीं रहा है। आपको पता था तो आप क्यों  नहीं बताते थे। बोले, मुझे भरोसा नहीं था कि तुम सचमुच में चलकर के जाना चाहते हो या नहीं चाहते हो। या ऐसे ही जानकारी के लिए पूछते रहते हो। लेकिन जब तुम खड़े हो गये तो मेरा मन कर गया कि हां अब तो इस आदमी को जाना है, पक्का  लगता है। तब जा करके मुझे लगा कि मुझे आपको रास्ता दिखाना चाहिए।

    मेरे देशवासियों, जब तक हम चलने का संकल्प  नहीं करते, हम खुद खड़े नहीं होते, तब रास्ता दिखाने वाले भी नहीं मिलेंगे। हमें उंगली पकड़ कर चलाने वाले नहीं मिलेंगे। चलने की शुरूआत हमें करनी पड़ेगी और मुझे विशवास है कि सवा सौ करोड़ जरूर चलने के लिए सामर्थ्यवान है, चलते रहेंगे।

    कुछ दिनों से मेरे पास जो अनेक सुझाव आते हैं,  बड़े इण्टरेस्टिंग सुझाव लोग भेजते हैं। मैं जानता हूं कब कैसे कर पायेंगे, लेकिन मैं इन सुझावों के लिए भी एक सक्रियता जो है न,  देश हम सबका है,  सरकार का देश थोड़े न है। नागरिकों का देश है। नागरिकों का जुड़ना बहुत जरूरी है। मुझे कुछ लोगों ने कहा है कि जब वो लघु उद्योग शुरू करते हैं तो उसकी पंजीकरण जो प्रक्रिया है वो आसान होनी चाहिए। मैं जरूर सरकार को उसके लिए सूचित करूंगा। कुछ लोगों ने मुझे लिख करके भेजा है – बच्चों को पांचवीं कक्षा से ही स्किल डेवलेपमेंट सिखाना चाहिए। ताकि वो पढ़ते ही पढ़ते ही कोई न कोई अपना हुनर सीख लें, कारीगरी सीख लें। बहुत ही अच्छा सुझाव उन्होंने दिया है। उन्होंहने ये भी कहा है कि युवकों को भी स्किल डेवलेपमेंट होना चाहिए उनकी पढ़ाई के अंदर। किसी ने मुझे लिखा है कि हर सौ मीटर के अंदर डस्ट बीन होना चाहिए, सफाई की व्यनवस्था  करनी है तो।

कुछ लोगों ने मुझे लिख करके भेजा है कि पॉलीथिन के पैक पर प्रतिबंध लगना चाहिए। ढेर सारे सुझाव लोग मुझे भेज रहे हैं। मैं आगे से ही आपको कहता हूं अगर आप मुझे कहीं पर भी कोई सत्य घटना भेजेंगे,  जो सकारात्मरक हो, जो मुझे भी प्रेरणा दे,  देशवासियों को प्रेरणा दे, अगर ऐसी सत्य घटनाएं सबूत के साथ मुझे भेजोगे तो मैं जरूर जब मन की बात करूंगा, जो चीज मेरे मन को छू गयी है वो बातें मैं जरूर देशवासियों तक पहुंचाऊंगा।

ये सारा मेरा बातचीत करने का इरादा एक ही है – आओ, हम सब मिल करके अपनी भारत माता की सेवा करें। हम देश को नयी ऊंचाइयों पर ले जायें। हर कोई एक कदम चले, अगर आप एक कदम चलते हैं, देश सवा सौ करोड़ कदम आगे चला जाता है और इसी काम के लिए आज विजयदशमी के पावन पर्व पर अपने भीतर की सभी बुराइयों को परास्त करके विजयी होने के संकल्पर के साथ, कुछ अच्छा करने का निर्णय करने के साथ हम सब प्रारंभ करें। आज मेरी शुभ शुरूआत है। जैसा जैसा मन में आता जायेगा, भविष्य में जरूर आपसे बातें करता रहूंगा। आज जो बातें मेरे मन में आईं वो बातें मैंने आपको कही है। फिर जब मिलूंगा, रविवार को मिलूंगा। सुबह 11 बजे मिलूंगा लेकिन मुझे विश्वास है कि हमारी यात्रा बनी रहेगी, आपका प्यार बना रहेगा।

आप भी मेरी बात सुनने के बाद अगर मुझे कुछ कहना चाहते हैं,  जरूर मुझें पहुंचा दीजिये, मुझे अच्छा  लगेगा। मुझे बहुत अच्छा  लगा आज आप सबसे बातें कर के‍और रेडियो का....ऐसा सरल माध्यम है कि मैं दूर-दूर तक पहुंच पाऊंगा। गरीब से गरीब घर तक पहुंच जाऊंगा,  क्योंकि मेरा,  मेरे देश की ताकत गरीब की झोंपडी में है,  मेरे देश की ताकत गांव में है, मेरे देश की ताकत माताओं,  बहनों, नौजवानों में है, मेरी देश की ताकत किसानों में है। आपके भरोसे से ही देश आगे बढ़ेगा। मैं विश्वास व्यक्त  करता हूं। आपकी शक्ति में भरोसा है इसलिए मुझे भारत के भविष्य में भरोसा है।

    मैं एक बार आप सबको बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूं। आपने समय निकाला। फिर एक बार बहुत-बहुत धन्यववाद!   (PIB):
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अमित कुमार / सतीश / तारा / सोनिका

जगदेव सिंह जस्सोवाल अमेरिका रवाना

पंजाबी सांस्कृति की मशाल लेकर सूरत सिंह खालसा भी साथ गए 
लुधियाना: 2 अक्टूबर 2014: (रेक्टर कथूरिया//पंजाब स्क्रीन):
कहते हैं अब कलियुग है। इसीलिए भाई भाई को नहीं पहचानता। दोस्त ही दोस्त की पीठ में छुरा घोंपता है पर सरदार जगदेव सिंह जस्सोवाल ने अपने मूक अंदाज़ से साबित किया कि दोस्ती आज भी ज़िंदा है। वह अपने ख़ास लेखक मित्र प्रोफेसर मोहन सिंह की याद  रख रहे हैं। जब श्री जस्सोवाल ने प्रोफेसर साहिब की याद में यह मेला शुरू तो उनके साथ बहुत ही कम लोग थे। जो थे उनमें से भी कई अपने सौरठों से जुड़े थे। इन कठिन हालातों के बावजूद जब  की स्मृति में पहला मेला लगा तो यह एक चमत्कार था। बहुत से लोग खुश थे---पंजाब में किसी पंजाबी लेखक की कदर का यह शायद पहला मामला था। खुश होने वालों के साथ कुछ लोग निराश भी थे। उनका कहना था-अब अगली बार मेला लगेगा तो देखेंगे। उन सब साज़िशों को नाकाम करते हुए जस्सोवाल साहिब डटे रहे। परिणाम सब के सामने है।  वह मेला आज तक लगता आ रहा है।  इस मेले ने बहुत से लोगों को रोज़गार दिया तो बहुत से कलाकारों को स्थापित होने में भी मदद की। अब यह मेला अमेरिका  में लगेगा। अमेरिका में सैक्रामेंटो के शहर स्टाकटिन में यह मेला 4 और 5 अक्टूबर को लगेगा। जाति, मज़हब, रंग और नस्ल के सभी भेदों से ऊपर उठ कर इस महान शायर ने बहुत पहले ही कह दिया था--
दो धड़ियां विच खलकत वण्डी
इक महिलां दा-इक ढोकां दा। 
अब अपनी वृद्ध अवस्था के बावजूद श्री जस्सोवाल इस संदेश को लेकर अमेरिका जा रहे हैं तांकि इस हकीकत को पूरी दुनिया तक पहुंचा सकें। कहते हैं अमेरिका में कही गे बात पूरी दुनिया के लोग बहुत ध्यान से सुनते हैं। उम्मीद की जनि चाहिए कि जब प्रोफेसर  की क्रांति भरी  शायरी  जस्सोवाल के प्रयासों से पूरी दुनिया तक पहुंचेगी तो एक नयी क्रांति की शुरुआत भी होगी।
पंजाबी सांस्कृति  की मशाल लेकर जगदेव सिंह जस्सोवाल वीरवार को प्रोफैसर मोहन सिंह मैमोरियल फाऊंडेशन अमेरिका के बुलावे पर अमेरिका के लिए रवाना हुए उनके साथ प्रसिद्ध समाज सेवक सूरत सिंह खालसा भी अमेरिका गए। इस अवसर पर जस्सोवाल ने विदेशी धरती पर पंजाबी विरसे, पंजाब मिट्टी व धार्मिक रवायतों को कायम रखने वाले पंजाबी, प्रवासियों की प्रशंसा करते हुए कहा कि पंजाब की पावन भूमि पर जन्म लेने वाले यह लोग वर्षों तक पंजाब की  भूमि  से दूर रहने के बावजूद पंजाबी सभ्याचार को जिंदा रखते हुए उन्होंने अपनी मिट्टी का मोह, सभ्याचार का मोह व धर्म का सत्कार कायम रखा है। इस अवसर पर प्रो. मोहन सिंह मैमोरियल फाऊंडेशन के अध्यक्ष प्रगट सिंह ग्रेवाल सीनियर चेयरमैन साधु सिंह ग्रेवाल, उपाध्यक्ष, कृष्ण कुमार बावा,  निर्मल जोड़ा, पवन गर्ग हरदयाल सिंह अमन, अर्जुन बावा सहित अन्य शामिल थे।

Thursday, October 02, 2014

कंजक पूजन: अहसास ने किया गरीब बच्चियों का अहसास

नवरात्रों पर समाज से किया कन्या भ्रूण हत्या बंद करने का आह्वान
लुधियाना: 2 अक्टूबर 2014: (रेक्टर कथूरिया//पंजाब स्क्रीन):
हमारे समाज में आज भी बहुत से परिवार ऐसे हैं जिनके पास दो वक़्त की रोटी नहीं होती। इन परिवारों के पास अच्छी पढ़ाई-लिखाई की बात एक सुंदर सपने से अधिक कुछ नहीं। पूरी-चने और कड़ाह प्रसाद जैसी स्वादिष्ट वस्तुएं इन बच्चियों की किस्मत में शायद नहीं हुआ करती। कंजक पूजन करने वाले वाले भी आम तौर पर इन गरीब बच्चियों में देवी मां की छवि नहीं देख पाते। लेकिन देवी तो सब देखती है।  यह इन बच्चियों का दर्द समझती है। वही देवी मां किसी न किसी के मन में प्रेरणा पैदा करती है और वह पहुँच जाता इन बच्चियों के पास सारा प्रसाद लेकर। इस बार देवी की यह कृपा अहसास संगठन पर भी हुई। 
भारतीय जनता पार्टी की ऊर्जावान नेत्री संगीता भंडारी के नेतृत्व में अहसास चैरिटेबल संगठन अक्सर सक्रिय रहता है। इस बार नवरात्रों के शुभ अवसर पर भी इस संगठन ने सबसे अलग हटकर कार्य किया। अहसास की टीम ने वहां जाकर दबे-कुचले और पिछड़े होए परिवारों के बच्चों को गले लगाया। वहां बाकायदा कंजक पूजन हुआ  और बच्चियों को खाने पीने की चीज़ों के साथ साथ इन बच्चियों को पढ़ाई लिखाई की ओर भी अग्रसर किया। इस मकसद के लिए बच्चियों को कापी, पैन, पेन्सिल, रबर, शापनर औए अन्य सामान भी भेंट किया। इस भेंट के साथ ही इन गरीब बच्चियों के बेहतर भविष्य की कामना भी की गयी। अहसास की अध्यक्षा संगीता भंडारी ने कहा कि आज की नारी किसी भी तरह कमज़ोर नहीं रही , वह पुरुषों के साथ  कंधा मिलाकर चलती है। कोई भी क्षेत्र देख लो नारी ने अपना लोहा मनवाया है। नारी के कामकाज  को देख कर पूरा पुरुष समाज भी हैरान है। इस लिए हकीकत को देखते हुए सभी को चाहिए कि नारी को बनता सम्मान देने का नैतिक कर्तव्य पूरा करे। नारी से भेदभाव अब सहन नहीं होने वाला इसलिए इसे तुरंत बंद कर दिया जाना चाहिए। कन्या भ्रूण हत्या का कलंक अब जल्द से जल्द अतीत की बात हो जाना चाहिए। इस संबंध में चलाये जा रहे जागरूकता अभियान को सफल बनाने के लिए सभी को बढ़ चढ़ कर आगे आना चाहिए। जब यहाँ नारी का सम्मान होने लगेगा तो पूरे देश और समाज का सम्मान फिर से पैदा हो जायेगा। इस मौके पर शालिनी सूद, नेहा मित्तल, ललित लाम्बा, शशि गुप्ता, श्वेत मनचन्दा, गगन सूद, राधिका सहित कई अन्य सक्रिय सदस्याएं भी मौजूद थीं। 

DMC: डाक्टर सुप्रिया के मामले में आरोपी बख्शे नहीं जाएंगे--डॉ. वेरका

Thu, Oct 2, 2014 at 4:27 PM
पूरी एक्शन टेकन रिपोर्ट 15 दिन में आयोग को सौंपने को कहा
लुधियाना: 2 अक्टूबर 2014: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो):

जमालपुर शूटआऊट मामले के बाद अब डाक्टर राजकुमार वेरका ने डाक्टर सुप्रिया की आत्महत्या के मामले में भी अपने अस्तित्व और शक्ति का अहसास करवाते हुए लोगों में यह विशवास बहाल किया है कि अन्याय करने वाले कानून से बच नहीं सकते। 


राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के उपाध्यक्ष डॉक्टर राजकुमार वेरका ने डी. एम. सी. अस्पताल में डॉक्टर सुप्रिया द्वारा आत्महत्या करने में मामले में सुओ मोटो लेते हुए लुधियाना ने डिप्टी कमिश्नर तथा पुलिस कमिश्नर को नोटिस जारी कर मामले की पूरी एक्शन टेकन रिपोर्ट 15 दिन में आयोग को सौंपने को कहा है। 
डॉक्टर वेरका ने बताया कि सुनने में आया है कि सुप्रिया कॉलेज के लैक्चरार से बहुत परेशान थी। जिसकी वजह से उसे ये कदम उठाना पड़ा। अगर इस मामले में सच्चाई है तो चिंता का विषय है। सुप्रिया एक दलित से सम्बंधित है। उन्होंने कहा कि इस मामले में आरोपी लोगों को बक्शा नहीं जायेगा। 
गौरतलब है कि डी. एम. सी. अस्पताल में डाक्टर सुप्रिया ने अपने होस्टल रूम में फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली थी। वह यहां एम.डी फाइनल ईयर में थी।  
आत्महत्या करने से ठीक पहले उसने अपने पिता को फोन करके कहा था कि वह थक चुकी है। इसके बाद देर रात उसकी लाश पंखे से लटकती हुई बरामद की गई थी। सुप्रिया ने अपने सुसाइड नोट में लिखा है कि, 'पापा मैं अकेली लड़-लड़ कर थक चुकी हूं। मुझे मेरा लैक्चरार बहुत परेशान कर रहा है, जिस कारण मैं आत्महत्या कर रही हूं।' 

आत्महत्या के बाद जब डाक्टर पिता ने अपनी बेटी सुप्रिया का शव लिया तो वह बेहद व्यथित थे। डीएमसी लुधियाना में पीडियाट्रिक्स में एमडी कर रही बेटी सुप्रिया की डेड बॉडी लेने के बाद जिला सेहत अफसर डॉ. बलविंदर सिंह ने कहा कि मैं डीएमसी नूं 18 लक्ख दे के मैं बेटी दी लाश लै के जा रिहा हाँ। यह बयान इन बड़े बड़े संस्थानों की व्यापरिक सोच की पोल भी खोलता है जिन्हें केवल पैसे एकत्र करने की पड़ी होती है और इन्सानी मूल्यों से इन्हें कुछ लेना देना नहीं होता। आत्म हत्या करने वाली सुप्रिया के पिता डाक्टर बलविंदर ने गिनवाया-15 लक्ख रुपये तीन वर्षों की फीस और 3 लक्ख रुपये हॉस्टल का किराया। इस पूरे मामले में न छह कर भी हकीकत का बयान करते हुए उन्होंने बताया कि सुप्रिया चाइल्ड नैटल पर रिसर्च करना चाहती थी। इस अध्यन में उनकी बेटी को डीएमसी के दो डॉक्टर लगातार तंग परेशान कर रहे थे। उन्होंने पुलिस को दोनों डॉक्टरों पर धारा 306 की कार्रवाई करने के लिए बयान भी दे दिए हैं। दूसरी तरफ पुलिस ने धारा 174 के तहत कार्रवाई की है। सुबह लुधियाना के पुलिस कमिश्नर प्रमोद बान से बात हुई है। उन्होंने एफआईआर करने का भरोसा दिया है। पुलिस जांच करे, अगर वे निर्दोष हैं तो फाइल बंद कर दें। पुलिस सीसीटीवी की फुटेज भी देखे कि डॉ. पुनीत ने किस तरह उसकी बेटी को रुलाया है। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में मौत का कारण हैंगिंग से सांस घुटना बताया गया है। अब देखना है कि सुप्रिया और  जैसी बहुत सी लड़कियों को इन्साफ कब मिलता है और साथ ही मेडिकल जैसे पावन पवित्र क्षेत्र में सुरक्षा का आश्वासन भी। 

थैलेसीमिया: मानव रक्त की बजाए अब बकरे का खून

गुजरात में सफलता के बाद अब पंजाब में भी तजर्बे की तैयारी 
डा. अतुल को गले मिल कर सुस्वागतम कहते हुए लवली जैन 
लुधियाना: थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों के लिए एक नया इलाज एक नया चमत्कार बन कर सामने आ रहा है। गुजरात में मान्यता मिल जाने के बाद इसे अब देश के दुसरे राज्यों में ले जाने प्रयास भी जारी हैं। हालांकि इसका विरोध अभी भी हो रहा है लेकिन हर नए तरीके का विरोध होना एक पुराना सिलसिला है। यूँ भी एलोपैथी और आयुर्वेदिक  छत्तीस का आंकड़ा कोई नयी बात नहीं है। जब गेंहूँ के पौदे का जूस  पिलाने की बात चली थी तो उस समय भी इसका विरोध हुआ और इसे तभी स्वीकार किया गया जब  विदेश में इसके सफल परीक्षण सामने आये। इसलिए अब यह भी कहा जा सकता है कि थैलेसीमिया में इंसान को मानव रक्त चढ़ाने की एलोपैथी पद्धति पुरानी हुई, अब तो बकरे का खून चढ़ा कर बच्चों को भला चंगा किया जा रहा है। भारत विश्व का पहला ऐसा देश है,जहां इस पद्धति का  सफल प्रयोग हो रहा है और इसकी शुरुआत गुजरात से हुई। इस प्रक्रिया में एनिमा के जरिए बकरे के खून को बड़ी आंत तक पहुंचाया जाता है, जहां रक्तकणों को अवशोषित कर लिया जाता है। बकरे के खून में ब्लड ग्रुप, एड्स या अन्य किसी प्रकार के संक्रमण की चिंता नहीं रहती। हीमोग्लोबिन घटने की भी फिक्र नहीं रहती। अब तक सेंक्डों रोगी इस प्रक्रिया का लाभ उठा चुके हैं। अब इस पद्धति ने पंजाब में भी दस्तक दे दी है। यहाँ निस्वार्थ सेवा सोसायटी चला रहे एक हिम्मतवर इंसान लवली जैन ने पंजाब स्क्रीन को इसकी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि वह इस सबंध में एक सेमिनार भी करवा चुके हैं जिसका लुधियाना में ही हुआ। 
निस्वार्थ सेवा सोसाइटी की ओर से गुरु नानक पब्लिक स्कूल में अयोयित थेलेसीमिया अवेयरनेस सेमिनार के दौरान गुजरात से आए डॉ.अतुल भावसर ने कहा कि थेलेसीमिया के मरीजों के लिए इंसान की वजाए बकरे का खून ज्यदा फयेदेमंद हैI गुजरात के शहर अहमदाबाद स्थित अखंडानंद आयुर्वेद अस्पताल के पंचकर्मा डिपार्टमेंट के हेड डॉ. भावसर ने कहा के थेलेसीमिया से पीड़ित बच्चों को हर 15-20 दिन बाद ब्लड चढ़ाना पड़ता है क्योंकि इस बीमारी की वजह से ब्लड के आरबीसी (रेड ब्लड सेल) तेजी से टूटते है। जिस कारण मरीज में हिमोग्लोबिन की कमी हो जाती है। थेलेसीमिया के मरीजों के लिए उन्होंने एक नई खोज की है। जिसके तहत बकरे का खून चढ़ाने पर मरीज को 15 -20 दिन की बजाय दो महीने बाद ही ब्लड चढ़ाने की जरुरत पड़ती है। कई मरीजों को 5 महीने बाद ही खून चढ़ाने की जरुरत पडती है। इसका कारण यह है कि बकरे के खून के आरबीसी जल्दी नहीं टूटते। जिससे मरीज में ज्यादा समय तक हीमोग्लोबिन की मात्रा सही बनी रहती है। डॉ. भावसर ने दावा किया कि इस भयंकर बीमारी से निपटने की कैपेसिटी एलोपैथी के मुकाबले आयुर्वेद में ज्यादा है। थेलेसीमिया में बकरे के खून के इस्तेमाल की पद्धति को गुजरात सरकार ने मान्यता दे दी है। इस पद्धति में मरीज को खून वेन की बजाय एनिमिया के  जरिए बड़ी आंत तक पहुंचाया जाता हैं। यह आंत जरुरत के मुताबिक खून को लेने के बाद बाकी बाहर निकाल देती है।  सोसायटी के प्रधान लवली जैन ने आए हुए अतिथियों का स्वागत किया। इस अवसर पर रमेश कपूर, वनीत जैन, मनीष जैन, अम्पिल जैन, अरिहंत जैन, हैप्पी भाटिया, गगन जैन, दर्शित जैन भी मौजूद रहे। 
खुद की अक्षम शरीरक अवस्था के बावजूद इतना बड़ा प्रोजैक्ट और इतने बड़े दान पुण्य और वह भी  स्वार्थ के किसी विशेष मनोबल के सहारे ही हो सकते हैं। हट्टेकट्टे होने के बावजूद  निराश और नाकाम लोगों के  लिए एक नयी मिसाल बन चुके लवली जैन विशेषज्ञों का हवाला देते हुए बताते हैं कि गुजरात सरकार के अहमदाबाद स्थित अखंडानंद आयुर्वेद अस्पताल का यह प्रयोग लाखों रोग ग्रस्त बच्चों और उनके परिजनों के लिए राहत की एक बड़ी खबर है। दरअसल, पीड़ित बच्चों को हर दो हफ्ते में दो-तीन बोतल मानव रक्त चढ़ाना पड़ता है। इसके बिना शायद उनका जीवित रहना  सम्भव न हो। बेहद महंगी और दर्द भरी होने के साथ ही इस प्रक्रिया में कई दिक्कतें भी आती हैं। वहीं, बकरे का खून दो से तीन माह में चढ़ाना पड़ता है। अस्पताल के प्रबंध निदेशक डॉ अतुल भावसार के इस इलाज का संक्षिप्त विवरण बताते हुए लवली जैन बताते हैं- थैलेसीमिया पीड़ित के रक्त में रेड सेल या रुधिर कणिकाएं टूटने लगती हैं जिससे हीमोगलोबीन घटने लगता है। परिणाम घातक होते हैं। इस हालत में किडनी, लीवर व हृदय में जहर फैल जाता है और पीड़ित की मौत हो जाती है। चूंकि बकरे के खून में लाल रक्त कणों की मात्रा अधिक होती है। इसकी संरचना जटिल होने से रक्त कण आसानी से नहीं टूटते हैं और ब्लड ट्रांस फ्यूज़न का समय और बढ़ जाता है जाता है। इससे खर्च और दर्द दोनों में कमी आती है। उन्होंने कहा, अस्पताल के थैलेसीमिया वार्ड में भर्ती गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के बच्चों पर किया गया प्रयोग सफल रहा है। 2010-11 से मार्च 2013 तक 130 बच्चे इस पद्धति का लाभ उठा चुके हैं। उन्होंने कहा,अहमदाबाद नगर निगम के स्लाटर हाउस से बकरे का रक्त मुफ्त मिलता है। अत: मरीजों को यह सेवा मुफ्त में दी जा रही है। भावसार के मुताबिक, यह पद्धति नई नहीं है बल्कि पांच हजार साल पुरानी है। आयुर्वेद में बकरे के रक्त को अजारक्त बस्ती कहा जाता है। महर्षि चरक की संहिता [चरक संहिता] में इसका उल्लेख है। साथ ही थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों के उपचार में इसे उपयोगी बताया गया है।
भावसार ने कहा, गुजरात सरकार ने इस पद्धति को बढ़ावा देने को अहमदाबाद, जूनागढ, भावनगर व वडोदरा में इसके केंद्र खोलने को 25-25 लाख के अनुदान की घोषणा की है। कई अन्य राज्यों ने भी अपने यहां ऐसे केंद्र खोलने का सुझाव मांगा है।
एलोपैथी को सिस्टम को इस पद्धति की वैज्ञानिकता पर शक:
आयुर्वेदिक सिस्टम को एलोपैथी डाक्टर जल्दी से स्वीकार ही नहीं करते। हालांकि खुद एलोपैथी सिस्टम में बहुत बार मरीज़ों की जान जा चुकी है। ऐसे मामले भी हैं जब एलोपैथी सिस्टम को रोग ही समझ में नहीं आया। अब  इस मामले में भी एलोपैथी के डॉक्टर इस पद्धति को ठीक नहीं मानते। उन्हें आयुर्वेद की इस चिकित्सा पद्धति की वैज्ञानिकता पर शक है। उनका कहना है कि बच्चों को बकरे का खून चढ़ाना कतई वैज्ञानिक तथ्यों पर खरा नहीं उतरता। जानवर को संक्रमण हो या कोई वायरस हो तो वह बच्चे के आंत्र से सीधे खून में जाकर अंगों को नुकसान पहुंचा सकता है।  
यह पद्धति पंजाब में भी की जा सकती है लागु
अयुर्वेद विभाग पंजाब के डायरेक्टर डॉ. राकेश शर्मा ने बताया कि सरकार ने इस पद्धति को पंजाब में भी लागु करने की मंजूरी दे दी है।  संबंध में तीन डॉक्टरों की टीम बनाकर अहमदाबाद भेजी जा रही है जो वहां के अस्पताल में चल रही इस पद्धति का जायजा लेकर सरकार को रिपोर्ट देगी। रिपोर्ट आने पर इस बारे में अगला फैंसला लिया जाएगा।