Saturday, January 25, 2014

माझा में बिक्रम सिंह मजीठिया के इशारे के बिना नहीं उड़ती कोई मक्खी

पूर्व डीजीपी शशिकांत ने शुरू की खुली सियासी पारी 
कहा-यदि आम आदमी पार्टी और अकाली दल में कोई फर्क नहीं है, तो SAD भंग कर आप में शामिल हो जाएं
नशों की रोकथाम के लिए कई उपयोगी कदम उठाने जा रही है आप
अमृतसर 24 जनवरी 2014: (गजिंदर सिंह किंग//पंजाब स्क्रीन):
हाल ही में आम आदमी पार्टी में शामिल हुए पंजाब पुलिस के पूर्व डीजीपी शशिकांत ने कहा है, कि वर्ष 2007 में उन्होंने नशे के कारोबिरियों और नेताओं के नाम की जो सूचि और रिपोर्ट तैयार की थी, उसमें बिक्रम सिंह मजीठिया का नाम नहीं था। लेकिन आज पंजाब के माझा इलाके में बिक्रम सिंह मजीठिया के इशारे के बिना एक मक्खी भी उड़ान नहीं भर सकती, तो ऐसे में जगदीश भोला के आरोप सही भी हो सकते हैं। लेकिन वह बिना सबूत के ऐसा दावा नहीं कर सकते। उन्होंने कहा, कि यदि इस मामले की सीबीआई जांच हो जाए, तो दूध का दूध और पानी का पानी हो सकता है। प्रेस कांफ्रेंस में शशिकांत ने बताया, कि आम आदमी पार्टी जल्द ही पंजाब में नशों के खिलाफ जागरूकता अभियान शुरू करने जा रही है। जिसके तहत नशों की रोकथाम के अलावा नशे के आदि हो चुके नौजवानों को इस गर्त से निकालने के लिए विभिन्न विभागों के सहयोग से जनांदोलन चलाएगी।
    पूर्व डीजीपी ने कहा, कि यदि मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल मानते हैं, कि आम आदमी पार्टी उन्हीं की पार्टी की लाइन पर चल रही है, तो मुख्यमंत्री को चाहिए की वह तुरंत शिरोमणि अकाली दल को समाप्त कर आम आदमी पार्टी में शामिल हो जाएं। आम आदमी पार्टी ऐसे में शिअद का स्वागत करेगी। उन्होंने कहा, कि पंजाब में ड्रग तस्करी में माझा, दोआबा और मालवा सभी इलाकों से संबंधित सभी पार्टियों के नेता और मंत्री तक शामिल हैं। लेकिन पंजाब सरकार जानबूझ कर इन आरोपों की जांच कराने से कतरा रही है।

बबीता कलेर को हाईकोर्ट की अवमानना के आरोप में नोटिस जारी

Fri, Jan 24, 2014 at 8:45 PM
पूर्व पार्षद राजू थापर की पत्नि इंदू थापर ने दायर की थी याचिका
लुधियाना: 24जनवरी 2014:  (पंजाब स्क्रीन):
इलेक्शन ट्रिब्यूनल कम डिप्टी डायरेक्टर अर्बन लोकल बाडी बबीता कलेर को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने अदालती आदेशों की अवमानना  के आरोप में अवमानना नोटिस जारी किया है।
इस संबंधी वार्ड नंबर 29 से कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लडऩे वाली इंदू थापर ने प्रिजाइंडिग अधिकारी बबीता कलेर के समक्ष 28 जून 2012 शिकायत देकर आरोप लगाया था कि वार्ड नंबर 29 की पार्षद रेणू शर्मा द्वारा फर्जी दस्तावेजों के सहारे अपना नोमिनेशन फार्म भरा गया है। जिसमें उसके द्वारा दो पैन कार्ड, तीन अलग अलग जन्म तिथियां, तीन अलग अलग पिता के नाम इत्यादी दर्ज करवाए गए है। अपनी शिकायत में इंदू थापर ने चुनाव अधिकारी बबीता कलेर से रेणू शर्मा को चुनाव के लिए अयोगय घोषित करने की मांग की थी। शिकायत का निपटारा न करने पर इंदू थापर द्वारा 8 अप्रैल 2013 पंजाब एवं हाईकोर्ट का सहारा लिया गया था जिसके आधार पर माननीय अदालत द्वारा बबीता कलेर को सेक्शन 80 के तहत छह माह के भीतर इस शिकायत का निपटारा करने के निर्देश दिए साथ ही यह भी लिखा कि इस शिकायत को जल्द निपटाए और कहीं इसी प्रकार तिथि डालते डालते अगलेचुनाव न आ जाएं। लेकिन अब सात महीने बीतने के बाद भी बबीता कलेर द्वारा कोई कदम नहीं उठाया गया है। अब याचिकाकर्ता के पुन: अदालत का द्वार खटखटाने पर माननीय पंजाब एवं हरियाणा हाइकोर्ट ने प्रिजाइडिंग आफिसर इलेक्शन टिब्यूनल कम डिप्टी डायरेक्टर अर्बन लोकल बाडिज बबीता कलेर को कोर्ट की अवमानना के आरोप पर नोटिस जारी करते हुए नोटिस आफ मोशन की तिथि 28 मई 2014 नियत की है।
बबीता कलेर को हाईकोर्ट की अवमानना के आरोप में नोटिस जारी 

Friday, January 24, 2014

दल खालसा ने किया अमृतसर में रोष प्रदर्शन

Fri, Jan 24, 2014 at 7:55 PM
सिक्खों के साथ हमेशां भेदभाव का आरोप दोहराया 
अमृतसर: 24 जनवरी 2014: (गजिंदर  सिंह किंग/पंजाब स्क्रीन):
दल खालसा की ओर से आज अमृतसर में रोष प्रदर्शन किया गया और इस दौरान 26 जनवरी 1950 में जारी भारतीय संविधान में सिखों की उपेक्षा किए जाने का आरोप लगाया गया। इस मौके पर दल खालसा की ओर से एक रोष मार्च भी निकाला गया और भंडारी पुल पर रोष प्रदर्शन भी किया गया। 
   दल खालसा की ओर से आज अमृतसर में भारतीय संविधान में सिखों की उपेक्षा किए जाने के आरोप लगाते हुए रोष मार्च और प्रदर्शन किया गया। इस दौरान दल खालसा के कार्यकर्ताओं ने संविधान में सिखों के अस्तित्व को स्वीकार न किए जाने, पंजाब के पानी की लूट करना, सिख पर्सनल ला न बनाए जाना और सिखों को स्व-निर्णय की छूट न दिए जाने का विरोध किया। दल खालसा के प्रवक्ता कंवरपाल सिंह ने कहा कि जब तक सिखों की यह चारों मांगे पूरी नहीं की जाती, तब तक देश के सिख 26 जनवरी और 15 अगस्त जैसे आजादी के कार्यकर्मों में हिस्सा नहीं ले सकते। उधर, इस मौके पर दमदमी टकसाल के मुखी भाई हरनाम सिंह खालसा भी पहुंचे। इस मौके पर उन्होंने कहा कि 1947 से पहले देश की आजादी के लिए और आजादी के बाद देश की सीमा की सुरक्षा के लिए सिखों ने काफी बलिदान दिया है। लेकिन सिखों के साथ हमेशा ही भेदभाव किया गया। उन्होंने कहा कि नवंबर 1984 में सिखों का सरेआम कत्लेआम किया गया। इतना ही नहीं, इसके बाद भी कई तरह से सिखों को प्रताड़ित किया गया। उन्होंने बताया कि सिख कौम को अलग धर्म के रूप में पहचान देने के लिए धारा 25 के तहत कई बार मांग की गई। लेकिन जैन और बौद्ध धर्म को तो अलग धर्म के रूप में मान्यता दे दी गई। परंतु सिखों की मांग को आज तक दरकिनार किया जा रहा है। 

राजनायिका देवयानी खोबरागढ़े,उनके पिता उत्तम खोबरागढ़े

Fri, Jan 24, 2014 at 3:55 PM
साथ में आर पी आई के राष्ट्रीय अध्यक्ष राम दास अठावले  और अम्बेडकरी नेता सुभाष दिसावर 
दिल्ली के महाराष्ट्रा सदन में पूर्व सांसद और आर पी आई (रिपब्लिकन पार्टी आफ इण्डिया )के राष्ट्रीय अध्यक्ष राम दास अठावले,राजनायिका देवयानी खोबरागढ़े,उनके पिता उत्तम खोबरागढ़े, अम्बेडकरी नेता सुभाष दिसावर एक विशेष मुलाकात के दौरान।   

शिरडी साईं धाम में द्वारका माई की स्थापना

 Thu, Jan 23, 2014 at 10:48 PM

26 घण्टे तक चला साईं सचरित्र अखंडपाठ 
अमृतसर: 23 जनवरी 2014: (गजिंदर सिंह किंग//पंजाब स्क्रीन):
अमृतसर के ग्रीन एवेनू में शिरड़ी के पद चिन्हों के अनुसार मंदिर शिरड़ी साईं धाम में द्वारका माई की स्थापना की गई, जो कि  365 दिन 24 घण्टे चलती रहेगी और इस की भस्म भक्तों को प्रसाद के रूप में बांटी जाए गी, 


  इस समारोह का आरभ्भ 22 जनवरी को साईं चरित्र के अखण्ड पाठ जो कि करीब 26 घण्टे के करीब चला और साईं भक्तों ने इस अखण्ड पाठ में साईं चरित्र का पाठ किया और भजन किया 
  मंदिर शिरड़ी साईं धाम के अध्ययक्ष श्री पवन मेहरा ने बताया, कि अखण्ड पाठ के पश्चात विधि पूर्वक वेद मन्त्रों के उच्चारण के साथ द्वारका माई की स्थापना सम्पूर्ण के बाद बाबा के स्वरूप और चरण स्थापित होने के बाद बाबा की अखण्ड घुनी की भी शुरूआत की गई, जो 365 दिन 24 घण्टे चलती रहेगी और इस की भस्म भक्तों को प्रसाद के रूप में बांटी जाए गी, इस समारोह में शहर के कई गणमान्य हस्तियों ने हिस्सा लिया, समारोह के समापन के बाद विशाल लंगर आयोजन किया गया 
  इस कार्यं की प्रमुख सयोजिका श्री मति पंकज मेहरा के अतिरिक्त श्री श्याम खन्ना, श्री विनय कुमार, श्री अनुभव मेहरा, श्री दीपू, श्री लाला निहाल चंद, भजन गायक श्री सचिन गुप्ता, श्री मति कामना गुप्ता ने विशेष योगदान दिया    

Thursday, January 23, 2014

चाईनीज डोर बेचने वालों पर दर्ज किया जाए धारा 307 के तहत मामला-प्रेस कल्ब

 Thu, Jan 23, 2014 at 9:10 PM
चाईनीज डोर पर सख्ती से पाबंदी लगाने के लिए सौंपा डीसी को ज्ञापन
अमृतसर: 23 जनवरी 2014: (गजिंदर सिंह किंग//पंजाब स्क्रीन):
चाईनीज डोर बेचने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए। इस मामले को लेकर दी प्रेस कल्ब आफ अमृतसर(पीसीए) की ओर से गुरुवार को एक ज्ञापन अमृतसर के डीसी रवि भगत को सौंपा गया। पीसीए की ओर से मांग की गई है कि जो भी व्यक्ति चाईनीज डोर बेचता है उसके खिलाफ सरकार धारा 307 एंव हत्या का प्रयास के तहत मामला दर्ज होना चाहिए। यह भी मांग की गई, कि जिला प्रशासन प्रेस कल्ब की इस मांग को देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति तक पहुंचाए। ताकि देश के अंदर इस मामले में कानून बनाया जा सके।
    डीसी को पीसीए के अध्यक्ष राजेश गिल के नेतृत्व में  ज्ञापन सौपते हुए प्रतिनिधियों ने कहा, कि अमृतसर जिले में चाईनीज डोन के कारण आधी दर्जन के करीब मौतें हो चुकी है। इस डोर के कारण कई परिंदों और पक्षियों की जाने भी जा चुकी है। सरकार की ओर से इस डोर पर बैन लगाने के लिए सख्त कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए। वहीं जो भी इस डोर को बेचते है, उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाए। इस अवसर पर डीसी रवि भगत ने प्रेस कल्ब आफ अमृतसर को आश्वासन दिया, कि जिला प्रशासन इस संबंध में कानून को सख्ती से लागू करेंगा। इस संबंध में कुछ लोगों की ओर से अदालत में भी पटीशन दायर की गई है। जिला प्रशासन इस पटीशन को लेकर भी कार्रवाई कर रहा है।

Wednesday, January 22, 2014

श्री हिन्दू न्याय पीठ ने उठाया क्रन्तिकारी कदम

Tue, Jan 21, 2014 at 6:36 PM
मन्दिरों के पुजारियों के लिए आरम्भ की दुर्घटना बीमा योजना
टूटीयां वाले मन्दिर के पुजारियों को सौंपे तीन तीन लाख रुपये के बीमा पालिसी के कागज 
लुधियाना: 21 जनवरी 2014: (रेकटर कथूरिया//पंजाब स्क्रीन):
श्री हिन्दू न्याय पीठ ने मन्दिरों के पुजारियों व हिन्दू धर्म के प्रचारकों को जीवन रक्षा कवच प्रदान करने के लिए तीन तीन लाख रुपये का बीमा करवाने की योजना के तहत आज शिवपुरी स्थित टूटीयां वाला मन्दिर के पुजारियों का तीन तीन लाख रुपये का दुर्घटना बीमा करवा पुजारियों को कागज सौंपे। श्री हिन्दू न्याय पीठ के प्रवक्ता प्रवीण डंग ने बताया कि न्याय पीठ ने धर्म प्रचारकों व पुजारियों के लिए दुर्घटना बीमा योजना आरम्भ की है। मन्दिरों के पुजारियों के लिए दुर्घटना बीमा के लिए हैल्पलाइन न. 92561-09700 मोबाइल नंबर जारी किया है। इस नंबर पर मन्दिरों में हिन्दू धर्म का प्रचार करने वाले पुजारी संपर्क करके अपना दुर्घटना बीमा करवा सकते है। भविष्य की योजनाओ का जिक्र करते हुए उन्होनें कहा कि मन्दिरों में कार्यरत पुजारियो को हिन्दू धर्म के प्रचार के लिए परिपक्व बनाने के उद्देश्य से न्यायपीठ के माध्यम से वेदों व शास्त्रों के प्रचार का प्रशिक्षण देकर धर्म प्रचार को बढ़ावा देने की निति के तहत अंधविश्वास में घिरते जा रहे हिन्दू धर्म के अनुयायियों को वेदों व शास्त्रों के साथ जोडऩे के प्रयास किए जाएंगे। इससे पूर्व सैंकड़ों बच्चों ने हनुमान चालीसा का पाठ करके हनुमान को भोग लगवाया। इस अवसर पर शिवपुरी मन्दिर कमेटी के अध्यक्ष वेद प्रकाश शर्मा, विशाल शर्मा,महेश शर्मा, सुरजीत जैन,कपिल देव,बिशन दास सहित अन्य भी मौजूद थे। 

Tuesday, January 21, 2014

INDIA: मृत्युदंड: वह सुबह कभी तो आएगी...

Tue, Jan 21, 2014 at 2:41 PM
An Article by the Asian Human Rights Commission                  -प्रशांत कुमार दुबे
Magan’s wives Basanti Bai and Santu Bai with his youngest son Vinod
सुप्रीम कोर्ट का शानदार फैसला तमाम और लोगों के साथ मगन के लिए भी राहत लाया है| उच्चतम न्यायालय के फैसले ने मानवाधिकार संरक्षण की दिशा में एक लंबी छलांग लगा दी है| भले ही मृत्युदंड को कानूनी रूप से उचित ठहराया जाएलेकिन क्या इसे सभ्य समाज का ध्योतक माना जा सकता हैñमृत्युदंड की सजा एक अत्यंत शांत और अहिंसक मनुष्य में थोड़ी देर के लिए ही सही पर हिंसा का भाव पैदा कर देती है। धीरे-धीरे यह हिंसा समाज का अनिवार्य अंग भी बनने लगती है। मृत्युदंड की विषाक्तता को समाप्त करने की दिशा में आज का निर्णय एक महतवपूर्ण भूमिका निभाएगा लेकिन यह फैसला अभी आधी ही खुशी देता है क्यूंकि अभी भारत ने मृत्युदंड की सजा को पूरी तरह से खतम नहीं किया है|
आज आया सुप्रीम कोर्ट का यह शानदार फैसला तमाम और लोगों के साथ मगन के लिए भी राहत लाया है| उच्चतम न्यायालय के फैसले ने मानवाधिकार संरक्षण की दिशा में एक लंबी छलांग लगा दी है| कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि मृत्युदंड पाए अपराधियों की दया याचिका पर अनिश्चितकाल की देरी नहीं की जा सकती और देरी किए जाने की स्थिति में उनकी सजा को कम किया जा सकता है। इसके साथ हीशीर्ष अदालत ने 15 दोषियों की फांसी की सजा को उम्रकैद में तब्दील करने का आदेश दिया। कोर्ट ने यह भी कहा कि मृत्युदंड का सामना करने वाला कैदी यदि मानसिक रूप से अस्वस्थ हैतो उसे फांसी नहीं दी जा सकती और उसकी सजा कम करके आजीवन कारावास में बदली जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार मृत्युदंड का सामना करने वाले अपराधी और अन्य कैदियों को एकांत कारावास में रखना असंवैधानिक है।
इन पूरे 15 प्रकरणों में मध्यप्रदेश के सीहोर जिले के इछावर ब्लॉक के कनेरिया गांव के मगनलाल का भी एक प्रकरण था | 11 जून 2010 को मगनलाल ने अपनी 5बेटियों को मौत के घाट उतारा था । उसका प्रकरण दर्ज हुआ। 3 फरवरी 2011 को सीहोर अदालत से उसे फांसी की सजा सुनाई थी। 12 सितम्बर 2011 को उच्च न्यायालय ने भी यह सजा बरकरार रखी और 9 जनवरी 2012 को उच्चतम न्यायालय ने इसकी पुष्टि कर दी। यही नहीं 22 जुलाई 2013 को राज्यपाल और राष्ट्रपति के यहां से भी इसकी दयायाचिका खारिज हुई और तुरत-फुरत 8 अगस्त 2013 को फांसी का दिन मुकर्रर कर दिया गया। यानी केवल तीन साल में ही प्रकरण का निपटारा। जबलपुर सेंट्रल जेल में बंद इस कैदी को फांसी देने के लिए जल्लाद भी लखनऊ से आ गयारिहर्सल भी हो गई थीलेकिन 7 अगस्त को फांसी की सजा को लेकर दिल्ली के कुछ प्रगतिशील वकीलों युग चौधरी, रिषभ संचेती, कॉलिन गोंजाल्विस और सिद्धार्थ ने रात 11 बजे इस पर स्थगन लिया।
एक नजर में यह त्वरित निपटारा था लेकिन यह त्वरित निपटारा हमारी न्यायिक व्यवस्था के ऊपर एक तमाचा भी है। यह दर्शाता है कि जो व्यक्ति आर्थिक रूप से कमजोर हैजिसके पास एक अच्छा वकील खड़ा करने की हिम्मत न होउसे पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव में भी धड़धड़ाते हुए फांसी के तख्ते तक पहुंचा दिया जाता है। मगनलाल के इस प्रकरण में उसे विधिक सहायता तो मिलीलेकिन उसकी गुणवत्ता अच्छी नहीं थी और मगन का पक्ष कहीं भी ठीक से नहीं रखा गया। इस पूरे प्रकरण में न्याय व्यवस्था से कई जगह चूक हुई है। साधारणतया फांसी दिए जाने का कारण सहित लंबा आदेश आता है। शायद यह पहला ही ऐसा प्रकरण है जिसमें केवल एक शब्द में फैसला आया है जिसमें लिखा है ‘‘बर्खास्त”।
यहां पर हमें अमेरिका के कार्लोस डेलुना के प्रकरण को भी नहीं भूलना चाहिए| डेलुना आज फांसी की सजा के तमाम समर्थकों के आगे एक अनुत्तरित प्रश्न बन कर खड़ा है। और बार-बार उन्हें यह चेताता है कि कहीं इस गलत न्याय के चक्कर में किसी निर्दोष को सजा तो नहीं दे रहे हैं| 1983 में डेलुना अभी सिर्फ 20 वर्ष का थाजब उसे वांडा लोपेज नाम की नौजवान महिला की हत्या के आरोप में अमेरिका के टेक्सास राज्य में गिरफ्तार किया गया। अदालत ने उसे दोषी पाया और मृत्युदंड सुना दिया। दिसंबर 1989 को सूई लगाकर उसे मौत की नींद सुला दिया गया। मुकदमे के दौरान डेलुना और उसके वकील बार-बार कोर्ट को बताते रहे कि लोपेज की हत्या उसने नहींबल्कि उससे मिलते-जुलते शारीरिक गठन वाले कार्लोस हर्नांदेंज नाम के व्यक्ति ने की है। मगर उनकी दलीलें ठुकरा दी गईं। अब कोलंबिया विश्वविद्यालय के कानून विभाग के एक अध्ययन से यह सामने आया है कि डेलुना सच बोल रहा था। यानी उसको दी गई मृत्युदंड की सजा गलत थी| पर अब कुछ नहीं हो सकता है क्यूंकि डेलुना मर चुका है|
हरहाल मगन के प्रकरण और आज के फैसले ने देश में फांसी के जिन्न को फिर से बाहर लाकर खड़ा कर दिया है। अजमल कसाब की फांसी ने इस बहस को फिर सुलगाया था कि भारत को मृत्युदंड बरकरार रखना चाहिए या नहीं। एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार भारत में पिछले दो दशक में केवल चार व्यक्तियों को फांसी दी गई हैलेकिन इस कतार में चार सौ पैंतीस नाम हैं। मानवाधिकार समूहों ने भी भारत में मृत्युदंड खत्म किए जाने की मांग फिर दोहराई है। वैसे 110 देश मृत्युदंड को नकार चुके हैं।
उच्चतम न्यायालय ने 1982 में ही कहा था कि मृत्युदंड बहुत विरल (रेअरेस्ट ऑफ रेयर) मामलों में ही दिया जाना चाहिए। मृत्युदंड के विरोध को लेकर संयुक्त राष्ट्र ने ऐसा प्रस्ताव पहली बार 2007 में पास किया थाजब उसके पक्ष में 104 और विरोध में 54 देशों ने वोट डाले थे| स्पष्ट है कि दुनिया की धारा अब मृत्युदंड के खिलाफ है और अधिक से अधिक देश अब इसका विरोध करने लगे है| भारत ने यहां पर मतदान के दौरान इस तर्क के आधार पर सजा-ए-मौत खत्म करने का विरोध किया कि हर देश को अपनी कानूनी व्यवस्था तय करने का संप्रभु अधिकार है| हम सभी इसके पक्ष में हैं लेकिन भारत देश को यह भी नहीं भूलना चाहिए उसने मानवाधिकारों के संरक्षण वाली अंतरराष्ट्रीय संधियों पर हस्ताक्षर किए हैं|
मृत्युदंड को लेकर हमारे यहां कानूनवेत्ताओं में भी बहस छिड़ी है| जाने-माने वकील प्रशांत भूषण और दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश राजेन्द्र सच्चर ने जहां मृत्युदंड को समाप्त करने की वकालत की है|भूषण ने फांसी की सजा को सरकार की तरफ से की गई हिंसा करार देते हुए कहा कि इससे हिंसा की प्रवृत्ति बढ़ती है. उन्होंने कहा, ‘‘दरअसल हम ऐसा मान लेते हैं कि फांसी की सजा के डर से हिंसा कम होगीलेकिन ऐसा नहीं होता| उन्होंने कहा कि सजा का उद्देश्य सुधारात्मक होना चाहिएन कि जीवन की इहलीला समाप्त करना|
न्यायमूर्ति सच्चर ने भी कुछ इसी तरह के पक्ष रखे. उन्होंने कहा कि 1950 के बाद से अब तक केवल 57 अपराधियों को फांसी के फंदे से लटकाया गया है और ऐसा नहीं कि इसे समाप्त कर देने से अपराध की घटनाओं में बढोतरी होगी| उन्होंने सजा की इस पद्धति को अमानवीय करार देते हुए कहा कि दुनिया के जिन देशों ने मृत्युदंड को समाप्त करने का फैसला लिया हैवहां भी अपराध नियंत्रित हैं| जबकि वहीं जाने-माने संविधान विषेशज्ञ सुभाष कश्यप तथा आपराधिक मामलों के विषेशज्ञ वकील के. टी. एस. तुलसी ने मृत्युदंड को जारी रखने को जायज ठहराया है|
महात्मा गांधी ने कहा था कि मैं मृत्युदंड को अहिंसा के खिलाफ मानता हूंअहिंसा से परिचालित व्यवस्था हत्यारे को सुधारगृह में बंदकर सुधरने का मौका देगी। अपराध एक बीमारी हैजिसका इलाज होना चाहिए। आंबेडकर ने भी कहा था कि मैं मृत्युदंड खत्म करने के पक्ष में हूं। एक मानवाधिकार कार्यकर्ता होने के नाते मुझे लगता है कि जब भी कहीं कोई व्यक्ति फांसी पर चढ़ाया जाता है तो वह अकेला नहींबल्कि उसके साथ उसके मानवाधिकार भी सूली पर टांग दिए जाते हैं।
हमें यह तो अवश्य ही समझना होगा कि मृत्युदंड लोगों को सुधार का कोई भी अवसर प्रदान नहीं करता। हमें समझना होगा कि मृत्युदंड कभी भी न्याय का पर्यायवाची नहीं हो सकता। हाल ही में गृह मंत्री सुशील कुमार शिन्दे ने एक इंटरव्यू में इस सजा के प्रावधान पर पुनर्विचार की जरूरत बताई थी लेकिन इन्होने ही कसाब को दी गई फांसी के समबन्ध में कहा था कि यह फांसी तो जनमत पर दी गई थी| उन्होंने कहा कि इस बारे में अपने गणमान्य व्यक्तियों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की तरफ से भारत के कई पत्र प्राप्त हुए हैं. उन्होंने कहा- कई वर्षों से इस बात में चिंतन प्रक्रिया चल रही है. हमें इस पर पुनर्विचार करने की जरूरत है.” लेकिन यह पुनर्विचार कब होगायह कहना कठिन है|
मगनलाल भी इस जटिल प्रक्रिया में फंसा था और उसके मामले में आज अंतिम सुनवाई हुई बहरहाल देर से ही सही पर देश में मगन और उस जैसे कई लोगों की फांसी की सजा को उम्र कैद में बदले जाने की मांग ने जोर पकड़ा और आज के इस फैसले से मृत्युदंड को खतम करने की दिशा में मील का एक और पत्थर गाड़ दिया है| लेकिन यह फैसला अभी आधी ही खुशी देता है क्यूंकि अभी भारत ने मृत्युदंड की सजा को पूरी तरह से खतम नहीं किया है|
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About the Author: Mr. Prashant Kumar Dubey is a Rights Activist working with Vikas Samvad, AHRC’s partner organisation in Bhopal, Madhya Pradesh. He can be contacted at prashantd1977@gmail.com
About AHRC: The Asian Human Rights Commission is a regional non-governmental organisation that monitors human rights in Asia, documents violations and advocates for justice and institutional reform to ensure the protection and promotion of these rights. The Hong Kong-based group was founded in 1984.

रावी के बाद नर्मदा किनारे लिया गया पूर्ण स्वराज का संकल्प

Mon, Jan 20, 2014 at 7:29 PM
राजनैतिक  संस्कृति  बदलने  के  लिए  हम घर-घर  तक जायेंगें
नर्मदा  बचाओ  आंदोलन  द्वारा  आम  आदमी  पार्टी   का  सदस्यता  अभियान  राजघाट  स्थित  महात्मा  गाँधी की समाधि  से  प्रारंभ    किया  गया। बड़वानी  शहर  के  अलावा  अंजड़,  राजपुर  तहसीलों  तथा  धार   जिले के सैकड़ों  कार्यकर्ताओं  ने  आज  सदस्यता  ग्रहण  की।

उल्लेखनीय  है  कि  आजादी की लड़ाई  के  दौरान  जनवरी 1930 को  कांग्रेस के  लाहौर  अधिवेशन  में  रावी नदी के  किनारे  पूर्ण  स्वराज्य  का संकल्प  लिया  था। गाँधी जी  के  सपनों  का स्वराज  देश  में  लाने  के  लिए महात्मा  गाँधी  की समाधि  से  सदस्यता  अभियान  की  शुरूआत  की।  इस अभियान  को  गाँव-शहरों  तक ले  जाया जाएगा।

नर्मदा  बचाओ  आंदोलन  कार्यकर्ताओं  द्वारा  आम  आदमी की सदस्यता  ग्रहण  करने  के  संबंध  में  चर्चाओं का लम्बा दौर चला। अंत में तय किया गया कि आम आदमी पार्टी देश में राजनैतिक शुचिता  और सादगी की पैरोकार  बन कर एक जन आंदोलन  बन कर उभरी  है  इसलिए  देश  में  बदलाव  की  इस लड़ाई  में  सहयोग किया जाना  चाहिए।

भागीरथ  धनगर ने  अभियान  की रूपरेखा  बताते  हुए  कहा  कि  आज  से  शुरू हुआ  सदस्यता  अभियान अनवरत  रूप से  जारी रहेगा।  राजनैतिक  संस्कृति  बदलने  के  लिए  हम घर-घर  तक जायेंगें।  शीघ्र  ही  ब्लॉक स्तर  पर पार्टी  संगठन का  गठन भी   किया जाएगा।

इस अवसर पर संबोधित  करते  हुए  नर्मदा  बचाओ  आंदोलन  की  नेत्री  सुश्री  मेधा   पाटकर ने  कहा  कि देश  के  आम  नागरिकों  की  सामाजिक  बदलाव  की  लड़ाई  कई  मोर्चों  पर जारी  है।   अब इस सकारात्मक  ऊर्जा को   बदलाव के  लिए  इस्तेमाल  किया  जाना चाहिए।  उन्होंने  आम  आदमी पार्टी  को  आंदोलन  का एक छोटा हिस्सा  बताते हुए  कहा  कि  देश  में  आंदोलन  की जरूरत  हमेशा  बनी रहेगी।  हालांकि  सुश्री  पाटकर  ने  अभी  आम आदमी पार्टी  की सदस्यता  नहीं  ली है  क्योंकि  देशभर  के  जनसंगठनों  की  राय  लेने  की प्रक्रिया जारी  है।

कैलाश अवास्या ने कहा कि देश के  संसाधनों पर वंचित वर्गों का भी    समान अधिकार है और इसके समानतापूर्वक  वितरण  की जरूरत है।  शिक्षा,  स्वास्थ्य  और  पानी  जैसी  बुनियादी  सुविधाएँ  सबको  उपलब्ध  होनी चाहिए।  किसानों  और  आदिवासियों  की जमीनों  को  छीनने  की प्रक्रिया  को  रोकना  जरूरी  है।  कमला  यादव ने कहा  कि  गाँधी  जी ने  कहा  कि  देश  में  सुराज  लाने  के  लिए  गाँवों  को  बदलने की जरूरत  है।

महेश  पटेल ने  कहा  कि  आजादी  के  बाद  स्वार्थी  राजनैतिक  दलों  ने  देश  को  रसातल में  पहुँचा  दिया है। जनहित  के  मुद्दों  की अनदेखी  की जा रही  है  और  भ्रष्टाचार  चरम  सीमा  पर पहुँच  गया है।  सच्चा  स्वराज  सपना बनकर  रह गया है।

इंदौर   से आए अमूल्य  निधि  ने  कहा  कि देश  में  ईमानदारों  की  कमी  नहीं  है।   पार्टी   को  देशभर  में विभिन्न   वर्गों  का  भरपूर   समर्थन  मिल  रहा  है    जो  बेहतर  भविष्य  की  उम्मीद  जगाता  है।   सभा  को   सुभाष कानूनगो,  डॉ॰  हेमंत  बार्चे,  प्रकाश  यादव, आशुतोष  सेन,  मीरा आदि ने  भी   संबोधित  किया।

अंत में  उपस्थित  कार्यकर्ताओं  ने  संकल्प  लिया  कि  वे   सत्ता  की नहीं  बल्कि  सत्य  की लड़ाई  लड़ेंगें  और निहित स्वार्थों  की  राजनीति को  बदलकर रहेंगें।  कार्यक्रम का संचालन  मुकेश  जाट  ने किया।
(भागीरथ  कवचे)                                                        (रेहमत)
संपर्क-नर्मदा  बचाओ  आंदोलन,  ‘नर्मदा  आशीष’,  नवलपुरा  बड़वानी  (म॰प्र॰) फोन-  9179148973   (मीरा),  9826811982  (मुकेश  भगोरिया
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Monday, January 20, 2014

गणतंत्र दिवस-2014: लुधियाना में तिरंगा लहराएंगे मुख्य मंत्री

Mon, Jan 20, 2014 at 6:47 PM
डिप्टी कमिश्नर ने लिया सभी तैयारियों का पूरा जायज़ा 
लुधियाना: 20 जनवरी 2014: (सतपाल सोनी//पंजाब स्क्रीन)::
26 जनवरी के राष्ट्रिय त्यौहार को मनाने के लिए प्रशासन ने ज़ोरशोर से तैयारियां शुरू कर दी हैं। उस दिन बड़ा समारोह होगा लड़कों के राजकीय कालेज में जहाँ मुख्य मंत्री राष्ट्रिय ध्वज लहराएंगे। सभी विभागों के साथ साथ आम जनता कि भागीदारी भी इसमें बड़े और सुनियोजित ढंग से हो इस मकसद के लिए एक विशेष बैठक भी हुई जिसमें डिप्टी कमिश्नर रजत अग्रवाल सभी तैयारियों का जायज़ा लेने के लिए पहुंचे। सभी विभागों के अधिकारी भी इसमें मौजूद थे। एडीसी (ज) नीरू कत्याल, एडीसी (विकास) बलदेव सिंह और एडीसीपी (हैडक्वाटर) सुखपाल सिंह बराड़ ने अपने अपने कशेत्रों और विभागों कि और से की जा रही व्यापक तैयारियों का विवरण देते हुआ आश्वासन दिया कि वे इस समारोह को यादगारी बनाने के लिए कोई कसर बाकि नहीं छोड़ेंगे। मेहमानों के बैठने से ले कर सुरक्षा तक के सभी मुद्दों पर गहन विचारें हुईं।   
उप ज़िला शिक्षा अधिकारी ने सांस्कृतिक कार्यक्रमों के बारे में बताया कि कैसे भांगड़ा, गिद्दा और अन्य रंगारंग आईटमों कि तैयारियां जोरशोर से जारी हैं। अपाहिजों को ट्राईसाइकल मिलेंगे, विधवा महिलायों को सिलाई मशीनें दी जाएंगी और कई अन्य आयोजन भी होंगें।एसडीएम कुलजीत सिंह माही,एसडीएम, अजय सूद और सिवल सरजन डाकटर सुभाष बत्ता ने भी इस मौके पर कि जा रही विशेष तैयारियों का संक्षिप्त विवरण दिया और इस दिन को यादगारी बनाने का आश्वासन भी। 

दिल्ली विधानसभा में विकेंद्रीकृत विकास

Mon, Jan 20, 2014 at 5:34 PM
विकास हेतु
संचार प्रतिमान की आवश्यकता  


       ----कन्हैया झा 


Kanhaiya Jha
(Research Scholar)
Makhanlal Chaturvedi National Journalism and Communication University, Bhopal, Madhya Pradesh
विकेंद्रीकृत शासन के लिए देश में किये गए प्रयास
      भारत में सदियों से पंचायतों ने ही स्वायत्त ग्राम इकाईयों द्वारा पूरे देश का शासन चलाया था. ये पंचायतें गाँव वाले स्वयं ही बिना किसी चुनाव के बना लेते थे. गांधीजी ने केंद्रीकृत (Centralized)  ब्रिटिश संसद प्रणाली को एक "बिना आत्मा की मशीन" कहा था. आज़ादी के पहले की कांग्रेस सरकारों के अनुभव से उनका यह निश्चित मत बना था की सत्ता के केन्द्रीकरण से भ्रष्टाचार बढेगा. इसलिए उन्होंने स्वायत्त ग्राम इकाईयों के आधार पर विकेंद्रीकृत (Decentralized)  शासन तंत्र स्थापित करने की बात कही थी.
      संविधान के पार्ट IV में पंचायतों की भूमिका गांधीजी के "ग्राम स्वराज" से भिन्न रखी गयी. डाक्टर अम्बेडकर के अनुसार गाँवों के जाती-पांति आदि आधारों पर बंटे होने के कारण पंचायतें स्वराज के लिए सक्षम नहीं थी.  सन 1958 में राष्ट्रीय विकास परिषद् ने बलवंत राय मेहता कमेटी की सिफारिशों को मानकर त्रि-स्तरीय पंचायती राज्य संस्था के गठन को स्वीकृति दी. शासन के इस तीसरे स्तर पर सबसे नीचे गाँवों में ग्राम-पंचायत तथा नगरों में नगरपालिकाएं एवं वार्ड्स रखे गए. मध्य स्तर पर ग्रामीण क्षेत्र के लिए ग्राम-समितियां तथा शहरों में नगर निगम अथवा नगर पंचायत को बनाना था. पंचायती राज्य संस्था के शीर्ष पर जिला परिषद् बनाने का प्रावधान था. यह पूरी पंचायती राज संस्था (PRI) राज्य सरकार के नियंत्रण में रखी गयी.
सन 1993 में 73 तथा 74 वें संविधान संशोधन से चुनाव द्वारा पंचायतों के गठन को अनिवार्य किया गया. इस क़ानून में उन्हें विकास तथा सामजिक न्याय के लिए सत्ता एवं जिम्मेवारी देने का प्रावधान था. इसके अलावा संविधान के 11 वें शिडयूल में दिए गए 29 विषयों के क्रियान्वन की जिम्मेवारी भी उन्हें दी गयी परन्तु पंचायतों के अधिकारों का मामला राज्य सरकारों पर ही छोड़ दिया गया. देश के 15 राज्यों में किये गए एक अध्ययन (EPW: July 5,2003) के अनुसार राज्यों द्वारा पंचायतों को जिम्मेवारियां तो दी गयीं परंतू सत्ता का उचित हस्तांतरण नहीं किया गया है.
            शहरों में भी आज़ादी के समय से आज तक ब्रिटिश शासन से विरासत में मिला केंद्र-राज्य-नगरपालिका ढांचा ही चल रहा है. राज्य सरकारें वो ही नीतियाँ चला रही जो ब्रिटिश सरकार चलाती थी. नगरपालिकाओं के चुनाव होते हैं, मेयर का भी चुनाव होता है, सत्ता राज्य सरकार के अधीन एक प्रशासनिक अधिकारी कमिश्नर के हाथ में रहती है. जनता के प्रति जबाब  देही से बचने के लिए ब्रिटिश सरकारें ट्रस्ट आदि बनाती थीं, जिन्हें भूमि अधिग्रहण क़ानून 1894 के अंतर्गत किसी भी मजदूर बस्ती (slums) को उजाड़ने का अधिकार होता था. आज राज्य सरकारें भूमि विकास, पानी की सप्लाई एवं निकासी, औद्योगिक क्षेत्र, विशिष्ट निर्यात सेज (SEZs) आदि अनेक विषयों के लिए नए संस्थान बना कर प्रशासनिक अधिकारी कमिश्नर आदि  के नियंत्रण में रखती हैं, जिनकी नगर पालिका में चुने हुए प्रतिनिधिओं के प्रति कोई जिम्मेवारी नही होती.
      केन्द्रीकरण की जो प्रक्रिया राज्य स्तर पर है वही केंद्र स्तर पर भी आज़ादी के समय से ही चल रही है. सन 1991 में नव-उदारवाद अपनाने के बाद तो इसमें और गति आयी. केंद्र से राज्यों को उनके बजट में सहयोग एक फार्मूले के तहत मिलता है. इस राशि में केंद्र की अपनी महत्वपूर्ण (Flagship)  योजनाओं का भी पैसा होता है. 11वीं पंचवर्षीय योजना में यह राशि बढ़ते-बढ़ते कुल बजट सहयोग के 42 प्रतिशत तक पहुँच गयी थी. केन्द्रीकरण राष्ट्रीय विकास परिषद् में भी केंद्र एवं राज्यों के बीच टकराव का विषय बना रहा है. फिर सरकार द्वारा गठित अनेक कमीशनों ने भी इस विषय पर अपनी चिंता व्यक्त की है.
विकास के कुछ प्रतिमान
            1930 के दशक में पश्चिमी राष्ट्रों में मंदी का दौर था. सामान्य उपयोग की वस्तुओं के दाम आसमान छू रहे थे. ऐसे में विश्व प्रसिद्ध अर्थशास्त्री कीन्स ने आने वाली पीढ़ियों के बारे में सोचकर यह कहा कि वह दिन दूर नहीं जब सभी अमीर होंगे. और जब सब अमीर हो जायेंगे तो अमीर-गरीब का झगड़ा भी ख़त्म होगा और सब जगह शान्ति हो जायेगी. उनका यह विश्वास उत्पादन तंत्र की शक्ति पर आधारित था. इसके लिए त्याग, चरित्र आदि भली चीज़ों की कोई आवश्यकता नहीं होगी. बल्कि लालच, ईर्ष्या, सूदखोरी पर आधारित उत्पादन तंत्र उपभोग की सभी वस्तुएं प्रचुर मात्रा में और सस्ते दामों में उपलब्ध कराएगा. कीन्स की थीसिस के 80 वर्ष पश्चात भी सभी के अमीर होने की कोई सम्भावना नज़र नहीं आती.
      सन 1993 विश्व प्रसिद्ध अर्थशास्त्री शूमाखर ने अपनी थीसिस Small is Beautiful में विकास के लिए आवश्यक तीन पूंजियों की चर्चा की जो पृथ्वी पर केवल सीमित मात्रा में उपलब्ध हैं. ये पूँजियाँ हैं खनिज ईंधन, प्राणियों की प्रदूषण सहन करने की क्षमता तथा मनुष्य का स्वयं का सत्व. आधुनिक उत्पादन तंत्र इस तीनों को पूंजी न मानकर आय मानता है और भविष्य की चिंता न करते हुए लगातार उनका उपभोग कर रहा है. शुमाखर ने एक नए उत्पादन तंत्र की कल्पना दी जिसमें बड़ी पूँजी एवं बड़ी योजनाओं के स्थान पर छोटी पूँजी तथा छोटी योजनाओं को अपनाने की सलाह दी. बिजली उत्पादन, सिंचाई आदि के लिए उन्होनें बड़े बांधों की जगह छोटी परियोजनाओं के निर्माण पर बल दिया. घरेलु उपयोग की वस्तुओं का उत्पादन एवं उपभोग स्थानीय स्तर पर सीमित कर माल की ढुलाई को कम किया जाए. उन्होनें सिद्ध किया कि इस प्रकार के विकेन्द्रित विकास से उपरोक्त तीनों पूंजियों का कुछ हद तक संरक्षण हो सकेगा.
      जल्दी से अमीर बनने के लोभ में लगभग सभी राष्ट्रों ने पश्चिमी देशों द्वारा सुझाए गए नव-उदारवाद को चुना. उत्पादन तंत्र की विनाशकारी गति को खनिज ईंधन के उपयोग के आंकड़ों से ही सिद्ध किया जा सकता है. सत्तर के दशक में विश्व में प्रतिवर्ष 700 करोड़ टन कोयले के बराबर ईंधन का उपयोग होता था जो लगभग 30 वर्ष में अर्थात सन 2000 में तिगुना होकर 2100 करोड़ टन कोयले के बराबर हो गया और सन 2030 तक यह फिर तिगुना हो कर 6300 करोड़ टन प्रतिवर्ष हो जाएगा.
      पिछले दो दशकों के नव-उदारवाद (Neo Liberalism) ने विकासशील देशों को लगभग उपनिवेश ही बना ही दिया है. उपनिवेश पूंजीपतियों के लिए कई महत्वपूर्ण संसाधन जैसे कि सस्ते मजदूर, जमीन, जंगल, आदि उपलब्ध कराते थे. साथ ही पूंजी के लिए निवेश तथा "बहु संख्या उत्पादन" अर्थात mass production के लिए बाज़ार भी उपलब्ध कराते थे. आज  पश्चिमी देश मनचाहा लाभ कमाने के लिए बड़ी पूंजी से पूरे विश्व के बाज़ार पर अपना वर्चस्व बनाने में लगे है. साथ चीन आदि कुछ देशों में वहाँ के सस्ते मजदूरों का उपयोग कर घरेलु उपयोग की वस्तुओं का mass scale पर उत्पादन कर पूरे विश्व में बेच रहे हैं.
जनता का शासन
      उपरोक्त वैश्विक सन्दर्भ में भविष्य को ध्यान में रखते हुए उपरोक्त तीनों पूंजियों के संरक्षण के लिए जनता को भी कुछ अधिक जिम्मेवारी ले सरकार की सहायता करनी होगी. जनता वोट देकर राज्यों तथा केंद्र में सरकार बनाती है और फिर अगले चुनावों तक उसका किसी भी सरकार से कोई संवाद नहीं रहता. सरकारें अपने हिसाब से विकास की प्राथमिकताएं तय करती, वार्षिक बजट में उनके लिए धन निश्चित करती हैं और राजस्व के लिए नए टैक्स लगाती हैं. यद्यपि सरकार के सभी खर्चों का नियमित रूप से प्रशासनिक लेखा-जोखा अर्थात audit होता है, इसके बाद भी भ्रष्टाचार बढ़ता ही जा रहा है, जिसमें जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों की लिप्तता भी बढ़ती जा रही है.
      यह पैसा जनता के विकास के लिए खर्च होता है, इसलिए यह जनता का कर्तव्य बनता है कि वह प्रशासन की उपरोक्त प्रक्रिया पर सतत नियंत्रण रखे. जनता सरकार का चुनाव अवश्य ही पार्टी आधार पर करती है, किन्तु यह आवश्यक है कि प्रशासन पर उपरोक्त नियंत्रण      अ-राजनैतिक हो. नियंत्रण के लिए धन अथवा खर्चे की राशि जितनी छोटी होगी उतना ही अच्छा होगा. इस प्रकार देश के विकास के किये ऐसे जन-संचार तंत्र का स्वरुप भी विकेंद्रीकृत होगा.
संचार के लिए उपयुक्त प्रतिमान   
      विकेंद्रीकृत विकास के लिए यह जनता तथा सरकार के बीच संचार की समस्या है. बड़ी एवं घनी आबादी वाले इस देश में प्रत्येक व्यक्ति सरकार से संवाद करे यह संभव नहीं है. दिल्ली प्रदेश की आबादी लगभग 1.5 करोड़ है. विधानसभा क्षेत्र में भी औसतन 2 लाख लोग रहते हैं. प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र कुछ 8 से 10 कालोनियों में बंटा हुआ है. यदि कालोनियों को संवाद के लिए एक यूनिट मानें तो प्रति यूनिट लगभग बीस हज़ार की आबादी बनती है. उसी प्रकार प्रत्येक ग्राम को भी एक यूनिट मानें तो भी अधिक से अधिक इतनी ही आबादी बनेगी. सरकार से संवाद की सुविधा के लिए इन्टरनेट टेक्नोलोजी का उपयोग कर सूचना को कांट-छांट के लिए कालोनी, क्षेत्र तथा प्रदेश के स्तर पर एकत्रित करना होगा.
      जनता के सन्देश को सरकार गंभीरता से ले इसके लिए प्रत्येक यूनिट में कुछ निःस्वार्थी एवं प्रबुद्ध व्यक्तियों का होना जरूरी है जो पहले तो कालोनी के विकास की दीर्घ-कालीन जरूरतों को समझें और फिर आपस में विचार विमर्श कर वार्षिक योजनायें बनाएं. इन्टरनेट के माध्यम से वे कालोनी के अन्य लोगों से अपनी योजनाओं पर राय भी ले सकते हैं. एक कालोनी में एक से अधिक समूह होने से सन्देश की गहनता में बढ़ोतरी ही होगी. 
      कालोनी के स्तर पर योजनायें बनाने के लिए यूनिटों को सरकार की विकास योजनाओं के बारे में अनेक सूचनाओं की आवश्यकता होगी जिन्हें वे सूचना अधिकार (RTI) के अंतर्गत सरकार से प्राप्त कर सकते हैं. सरकार को भी बजट का विवरण बनाते हुए उसे अधिक विस्तृत बनाना पडे.
      दिल्ली विधानसभा के दिसंबर 2013 के चुनावों में एक नयी पार्टी ने शासन सम्भाला है जिन्होनें घोषणा की है कि वे प्रदेश में जनता का शासन स्थापित करेंगे. पिछले कुछ वर्षों में देश में अनेक घोटाले हुए जिनमें जन-प्रतिनिधियों की भी लिप्तता साबित हुई. प्रतिक्रिया रूप में लोकपाल बिल के लिए आन्दोलन हुआ, जिसके बिल के तहत लोकपाल को शासन के किसी भी अधिकारी के खिलाफ जनता की शिकायत पर कार्यवाही करने का अधिकार दिया जाना था. इस बिल को केंद्र सरकार ने पारित कर दिया है. दिल्ली विधानसभा के लिए भी लोकपाल बिल लाने की बात हो रही है. इसी सन्दर्भ में किसी भी जन-प्रतिनिधि को वापिस बुलाने का अधिकार अर्थात Right to Recall की भी बात चल रही है. इस प्रकार दिल्ली क्षेत्र में उपरोक्त शोध के लिए अनुकूल राजनीतिक वातावरण उपलब्ध है. अन्य प्रदेशों के मुकबले राजधानी क्षेत्र होने से जनता में अपने अधिकारों को लेकर सजगता भी अधिक है. तकनीकी द्रष्टि से आम जनता में इन्टरनेट का उपयोग भी उचित है.

      प्रयोग के लिए प्रदेश के 70 विधानसभा क्षेत्रों में कुछ पर यह प्रयोग हो सकता है. यह प्रयोग ग्रामीण तथा शहरी दोनों स्तरों पर होना आवश्यक है. विधानसभा क्षेत्र की दीर्घकालीन एवं वार्षिक योजना बनाने के लिए पूरे क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक जानकारी आसानी से एकत्रित की जा सकती है. प्रदेश की विभिन्न योजनाओं एवं बजट प्रक्रिया को समझ यूनिटों की रचना की जानी चाहिए. सरकार एवं क्षेत्रों के बीच संवाद के लिए एक वेबसाइट बनायी जा सकती है. इस प्रक्रिया के दौरान प्राप्त हुए अनुभवों से अन्य प्रदेशों के लिए उपयुक्त जन-संचार तंत्र का निर्माण संभव है.
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Sunday, January 19, 2014

सांप्रदायिक व अलगाववादी ताकतों का एकजुटता से मुकाबला करें-तिवारी

Sun, Jan 19, 2014 at 5:34 PM
लोग अकालियों से इसका हिसाब मांगें कि उन्होंने क्या-क्या दावे किए थे 
लुधियाना: 19 जनवरी 2014: (सतपाल सोनी/पंजाब स्क्रीन):
सूचना एवं प्रसारण मंत्री श्री मनीष तिवारी ने पार्टी के सभी नेताओं व कार्यकर्ताओं को सांप्रदायिक व अलगाववादी ताकतों का एकजुटता से मुकाबला करने को कहा है। उन्होंने कहा कि पंजाब में राजनीतिक वातावरण कांग्रेस के हक में है, क्योंकि अकाली-भाजपा गठबंधन के 7 सालों के शासन में लोग तंग हो चुके हैं।
लुधियाना लोकसभा क्षेत्र के दौरे दौरान एक समारोह को संबोधित करते हुए श्री तिवारी ने कहा कि अकाली-भाजपा गठबंधन ने झूठे वादे किए हैं और वास्तव में कुछ भी नहीं किया। उन्होंने लोगों को कहा कि वह अकालियों से इसका हिसाब मांगें कि उन्होंने क्या-क्या दावे किए थे और वास्तव में उन्होंने क्या किया है?
उन्होंने कहा कि अकाली-भाजपा गठबंधन ने एक ही मील पत्थर कायम किया है और पंजाब अब कंगाली की ओर बढ़ रहा है। श्री तिवारी ने कहा कि लोग यू.पी.ए सरकार की 10 सालों में महान उपलब्धियों से अच्छी तरह अवगत हैं और केन्द्र सरकार ने राष्ट्र को एक नया रूप दिया है।
श्री तिवारी ने पार्टी कार्यकर्ताओं को कहा कि आगामी लोकसभा चुनाव उनको सरकार के विरूद्ध अपनी नाराजगी जाहिर करने का अवसर देंगे और अकाली यह न समझें कि यह वोटें उनके लिए पक्की हें। उन्होंने कहा कि लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की जीत राज्य सरकार के लिए चेतावनी होगी और उनको जनकल्याण की तरफ ध्यान देना ही होगा।
श्री तिवारी ने लोगों को देश में सिर उठा रही अलगाववादी ताकतों के खिलाफ आगाह किया। उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं को कहा कि वह लोगों को इन तत्वों के खिलाफ जागरूक करें कि ऐसे तत्वों का सत्ता में आना देश के हित में नहीं होगा।