Friday, August 02, 2013

INDIA: देश की गरीबी बनाम सरकार का नैतिक दिवालियापन:

An Article by the Asian Human Rights Commission                         Thu, Aug 1, 2013 at 11:40 AM
सन्दर्भ – योजना आयोग द्वारा जुलाई 2013 को जारी गरीबी का नया आंकलन)
Contributors: सचिन कुमार जैन
भारत में 2011 से 2012 के बीच में 8.49 करोड़ लोग गरीब नहीं रहे. वे उस रेखा के ऊपर आ गए हैं जिसमे लोग उलझे रहते हैं पर वह सरकारों को दिखाई नहीं देती. अब तक यह कहा जाता रहा है कि देश की बड़ी आबादी निरक्षर है, परन्तु भारत का योजना आयोग मानता है कि देश की आबादी गंवार और बेवक़ूफ़ है. इसे गुलामी की आदत है, इसलिए इस पर शासन किया जाना चाहिए. वह मानता है कि गरीबी को वास्तविक रूप में कम करने की जरूरत नहीं है, कुछ अर्थशास्त्रियों ने आंकड़ों को बाज़ार की भट्टी में गला कर एक नया हथियार बनाया है, जिसे वे गरीबी का आंकलन (ESTIMATION OF POVERTY) कहते हैं. उन्होंने यह तय किया है कि सच में तो लोग गरीबी से बाहर नहीं निकलना चाहिए परन्तु दिखना चाहिए कि गरीबी कम हो रही है. तो वे बस एक व्यक्ति द्वारा किये जाने वाले खर्चे को इतना तंग करते चले जा रहे हैं कि भारतीय नागरिक का गला दबता जाए.
क्या हम नीतियों के जरिये से किये जा रहे धीमे जनसंहार के दौर में हैं? एक ऐसा दौर जहाँ हथियार का वार होने पर खून शरीर के बाहर नहीं, शरीर के भीतर के हर एक अंग में रिसता रहता है. जिस दौर में एक किलो दाल 60 रूपए किलो, दूध 40 रूपए लीटर, टमाटर 50 रूपए किलो, लौकी 40 रूपए किलो हो. एक बार की सामान्य बीमारी का खर्च 350 रूपए और एक दिन अपने काम के लिए की जाने वाली यात्रा पर 20 रूपए का न्यूनतम खर्च जरूरी हो. वहीं योजना आयोग ने एक बार फिर 22 जुलाई 2013 को अपना आंकड़ों से बना हथियार चला दिया. उनका आंकलन कहता है कि मंहगाई की दर (जो वास्तविक कम और काल्पनिक ज्यादा होती है), लोगों की बढ़ती क्रय क्षमता और व्यय के आधार पर 2004-05 से 2011-12 के बीच 2 करोड़ लोग गरीबी की रेखा से बाहर आ गए हैं. हालांकि इस अवधि में जरूरी सामान और सेवाओं की कीमतों में 40 से 160 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, पर वे इसे माने को तैयार नहीं है क्योंकि उनके आंकड़े यह नहीं बता रहे हैं.
योजना आयोग के नए आंकलन के मुताबिक 2004-05 में देश में 37.2 प्रतिशत लोग गरीब थे, 2009-10 में ये घट कर 29.8 प्रतिशत और 2011-12 में और कम हो कर 21.9 प्रतिशत हो गए. वास्तव में जिस तरह से योजना आयोग गरीबी कम कर रहा है, उसी के मान से गरीबों की मृत्यु दर (पूअर्स डेथ रेट) में हो रही बढ़ोतरी को मापे जाने की जरूरत है. आयोग ने माना है कि शहरों में एक व्यक्ति पर रोज 33.33 रूपए से ज्यादा और गांवों में 27.2 रूपए से ज्यादा करने वाले परिवार को गरीब नहीं माना जाएगा. उनके लिए सामाजिक भेदभाव, बहिष्कार, व्यापक वंचितपन, विकलांगता, विस्थापन और बदहाली का पलायन गरीबी का कोई सूचक नहीं है. इसके पहले 2009 में योजना आयोग ने इसी व्यय के आधार पर गांव में 22.42 रूपए और शहरों में 28.65 रूपए को गरीबी की रेखा माना था. बड़ा ही रोचक मामला यह है कि शौचालय बनवाने से लेकर पंचायत व्यवस्था को बेहतर बनाए के लिए विश्व बैंक की चरण वंदना करने वाला योजना आयोग उसके द्वारा दी गयी 1.25 डालर (यानी 80 रूपए) की मानक परिभाषा को नकार देता है. सच तो यह है कि इसे भी आंकड़ों के जाल में फंसा दिया जाता है. योजना आयोग द्वारा जारी वक्तव्य के मुताबिक़ 1993-94 से 2004-05 के बीच जब उदारीकरण की पूंजीवादी नीतियां अच्छे से काम कर रही थीं तब गरीबी में 0.74 प्रतिशत सालाना की दर से कमी हो रही थी. 2004-05 से 2011-12 के बीच जब पूरी दुनिया में तथाकथित विकास टप्प पड़ गया था, देशों की अर्थव्यवस्थाएं दिवालिया हो रही थीं तब भारत में 2.18 प्रतिशत सालाना की दर से गरीबी कम हो रही थी. कभी सरकार कहती है कि दुनिया में हालात बुरे हैं इसलिए हमारे हालात भी बुरे हैं, गरीबी के आंकलन में तो ठीक उल्टा हुआ. जिस दौर में देश में पेट्रोल-डीज़ल, दाल, सब्जियों की कीमतें सबसे ज्यादा बढ़ीं, बेरोज़गारी बढ़ी, थी उसी दौर में योजना आयोग में गरीबी कम कम करने का चमत्कार कर दिखाया.
राज्य और देश में गरीबी – ताज़ा आंकलन के मुताबिक वर्ष 2012 और 2013 के बीच बिहार में गरीबों की संख्या 53.5 प्रतिशत से घटकर 33.74 प्रतिशत हो गयी है. बिहार में एक साल में 185.35 लाख लोग गरीबी से बाहर आ गए हैं. आंध्रप्रदेश में गरीबी 21.1 प्रतिशत से कम होकर 9.20 प्रतिशत पर आ गयी है. वहाँ 97.8 लाख लोग अब गरीब नहीं रहे. गुजरात में 33.97 लाख लोग गरीबी के रेखा से बाहर आ गए हैं. राजस्थान में 64.08 लाख, उत्तरप्रदेश में 139.71 लाख लोग गरीब नहीं रहे. सब सोते रहे और देश में क्रान्ति हो गयी. उत्तराखंड में गरीबी 18 प्रतिशत से कम हो कर 11.26 प्रतिशत रह गयी है. आकंडे और भी बहुत से हैं, पर यहाँ उनका उल्लेख करने की जरूरत नहीं है.
गरीबी की रेखा व्यक्ति के सिर के ऊपर से नहीं गर्दन के सामानांतर होकर गुज़रती है. योजना आयोग के निष्कर्षों के मुताबिक गांव में 27.20 और शहर में 33.33 रूपए प्रतिव्यक्ति व्यय गरीबी की रेखा है. यह रेखा सभी प्रदेश में एक जैसी नहीं है. कुछ राज्यों में यह गर्दन से नीचे से गुज़रती है. ओडिसा में 23.16 रूपए (गांव) और 28.70 रूपए (शहर) से कम खर्च करने वाले ही गरीब माने गए हैं. ग्रामीण क्षेत्रों की बात करें तो मध्यप्रदेश में 25.70 रूपए, बिहार में 25.93 रूपए, झारखंड में 24.93 रूपए और छत्तीसगढ़ में 24.60 रूपए पर गरीबी की रेखा है. शहरी क्षेत्रों के सन्दर्भ में मध्यप्रदेश में 29.90 रूपए, बिहार में 30.76 रूपए, ओडिसा में 28.70 रूपए और छत्तीसगढ़ में 28.30 रूपए प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन के व्यय को गरीबी की रेखा माना गया है.
गरीबी में खाना – भारत में प्रति व्यक्ति औसत उपभोग खर्च 1053.64 (ग्रामीण) है, इसमे से 600.36 रूपए (56.98%) का खर्चा केवल भोजन पर होता है. शहरी भारत में 1984.46 रूपए के मासिक उपभोक्ता व्यय में से 880.83 रूपए (44.39%) भोजन की व्यावस्था में जाते हैं. बिहार में 780.15 रूपए के मासिक उपभोग (MONTHLY PERCAPITA CONSUMER EXPENDITURE) में से 504.81 रूपए (64.71%) रोटी की जुगाड में जाते हैं. दिक्कत यह है कि भारत में यह आधारभूत सिद्धांत बनाया ही नहीं गया है कि पहले हम जीवन की बुनियादी जरूरतों और वंचितपन के पैमाने तय कर लेन और फिर देखें कि उन पैमानों के मान से कौन और कितने गरीब हैं!
इन आंकड़ों के साथ जुड़े संकट – आप जानते हैं कि भारत में वर्ष 1973-74 में पहली बार ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के लिए गरीबी की रेखा तय की गयी थी. तब व्यय को आधार माना गया था यानी एक व्यक्ति कितना कमाता है और उसमे उसकी जरूरत पूरी होती है या नहीं, उसे कोई महत्त्व नहीं दिया गया. कई बार तो प्राकृतिक संसाधनों से मुफ्त मिलने वाली सामग्री को भी खर्चे में जोड़ कर गरीबी कम की गयी. अब भी यही हो रहा है. ठीक 40 साल पहले जो जो लोग गांव में एक माह में 48.90 रूपए या 1.63 रूपए प्रतिदिन और शहरों में 57 रूपए या 1.90 रूपए प्रतिदिन से कम खर्च करते थे, विशेषज्ञों ने उन्हें उन्हें ही गरीब माना था. व्यय का यह आधार तब की वास्तविक मूल्य पर तय किया गया था, परन्तु उसके बाद से अब तक कभी भी गरीबी की रेखा का आंकलन करते समय वास्तविक मूल्य (CURRENT PRICE) का आधार नहीं लिया गया. इसमे खपत और वास्तविक जरूरत का भी कोई मानक शामिल नहीं है. 40 साल पहले तय की गयी व्यय की राशि में मंहगाई की दर (INFALTION RATE) (जो अपने आप में एक धोखा है) के आधार पर कुछ-कुछ बढ़ोतरी की जाती रही. ये रेखा वस्तुओं या सेवाओं के वास्तविक मूल्यों पर आधारित न होकर कुछ निहित नीतिगत स्वार्थों पर आधारित होती है, जिसमे व्यवस्था गरीबों के ठीक खिलाफ खड़ी होती है. योजना आयोग और ग्रामीण विकास मंत्रालय के पूर्व सचिव डाक्टर एनसी सक्सेना कहते हैं कि यह आंकड़ों का खेल है. जैसे ही आप 27 रूपए के व्यय को 40 रूपए कर देंगे, वैसे ही 26 प्रतिशत गरीबी का आंकड़ा बढ़ कर 50 प्रतिशत हो जाएगा. 27 रूपए से जीवन की बुनियादी जरूरतें बिलकुल पूरी नहीं हो सकती हैं. इतने कम व्यय के मानकों के बाद भी 27 करोड़ लोग गरीब माने गए हैं. हमें इसका विरोध करने के बजाये यह मांग करना चाहिए कि यह राशि बनी रहने दें पर इसे भुखमरी की रेखा (STARVATION LINE) के रूप में स्वीकार किया जाए.
अब यह भी उठेगा कि कि जब यही सरकार कह रही है कि जब 21.9 प्रतिशत लोग ही गरीबी की रेखा के नीचे हैं तो वह राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून में 67 प्रतिशत जनसँख्या को सस्ता अनाज देने की बात क्यों कर रही है? सच तो यह है कि यह स्वीकार करना सरकार की बाध्यता है कि गरीबी की रेखा से ऊपर होने का मतलब यह नहीं है कि लोगों को गुणवत्ता पूर्ण सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं या शिक्षा के अधिकार की जरूरत नहीं है. नॅशनल सेम्पल सर्वे आर्गनाइजेशन के जिस अध्ययन के आधार पर गरीबी की रेखा तय की है वही अध्ययन यह भी बताता है कि हमारे ही देश में स्वास्थ्य पर एक महीने का व्यय 51.91 रूपए (गांव में) और 99.06 रूपए (शहर में) है. स्वास्थ्य पर योजना आयोग की अपनी एक समिति ने बताया था कि स्वास्थ्य पर होने वाले पूरे व्यय में से 80 प्रतिशत व्यय लोगों को अपनी जेब से करना पड़ता है. उन्हे कुछ मुफ्त नहीं मिलता है. जब यह वास्तविक व्यय इतना कम है तो क्या इन अर्थशास्त्रियों को यह जोड़ समझ नहीं आता कि लोगों को अच्छी सरकारी सेवाएं तो मिलती नहीं हैं, पहिर भी वे 51 और 99 रूपए जितनी कम राशि खर्च क्यों कर रहे हैं? केंद्र सरकार द्वारा चलाई जा रही लगभग 150 योजनायों में से एक समय पर हमारे देश की 30 योजनाएं गरीबी की रेखा के मापदंड पर संचालित होती थी. अब केवल वृद्धावस्था पेंशन योजना में यह मापदंड है. भारत सरकार को पिछले 10 सालों में इस मापदंड को हटाना पड़ा क्योंकि योजना आयोग का यह आंकलन किसी ने कभी भी स्वीकार नहीं किया. हमारी शासन व्यवस्था पर भी सवाल उठाना चाहिए क्योंकि वहाँ संसद के विशेषाधिकार (DISCREATIONARY POWERS) को बचाने के लिए सभी राजनीतिक दल खड़े हो जाते हैं, पर गरीबी की परिभाषा और आंकलन पर संसद में कभी चर्चा नहीं हुई. मतलब साफ़ है कि योजना आयोग को इस मामले में संसद से ज्यादा विशेषधिकार दिए गए हैं. स्वास्थ्य की तरह ही शिक्षा का भी हाल है. गांव में शिक्षा पर 99.06 और शहरों में 160.5 रूपए खर्च होते हैं.
देश की विकास दर की चमक से हमारी आँखें इतनी चौंधिया चुकी हैं कि हमें नॅशनल सेम्पल सर्वे आर्गनाइजेशन का यह तथ्य भी दिखाई नहीं दिया कि वास्तव में देश के व्यय के हिसाब से सबसे ऊपर वाले 10 फीसदी लोग भी 155 रूपए प्रतिदिन के आसपास खर्च करते हैं, मतलब यह कि सरकार और संसद बदहाली को ढंकने की कोशिश कर रही है.
हमें यह भी पता है कि योजना आयोग के इन आंकलनों से लोगों के हकों पर ज्यादा फरक नहीं पड़ेगा, परन्तु सवाल केवल उस बात का नहीं है. इस अमानवीय और अन्यायोचित गरीबी की रेखा का रणनीतिगत उपयोग यह साबित करने के लिए किया जाएगा कि निजीकरण के कार्यक्रम, ढांचागत समायोजन, राज्य की जनकल्याणकारी भूमिका का दायरा सीमित करने और संसाधनों की लूट को प्रोत्साहित करने वाली नीतियों के कारण भारत में गरीबी कम हो गयी. यह सवाल अपना दिमाग साफ़ करने का है कि गरीबी कम नहीं हो रही है गरीब कम किया जा रहे हैं. इसलिए योजना आयोग की भूमिका और मंशा को समझना जरूरी है. 
 
राज्य
 
गरीबी की रेखा (रूपएप्रतिमाह/व्यक्ति व्यय)प्रतिशत जनसँख्या (गरीबी)प्रति व्यक्ति कुल मासिक उपभोग (औसत)भोजन पर व्यय (प्रति व्यक्तिमासिक)कुल व्यय में से भोजन पर व्यय(प्रतिशत)

 
उत्तरप्रदेशग्रामीण76830.4899.1520.8257.93
शहरी94126.061573.91728.4646.28
राज्य में गरीब>>>>>>>>>>29.43%
 

 

 
मध्यप्रदेशग्रामीण77135.74902.82503.5855.78
शहरी897211665.77693.8941.66
राज्य में गरीब>>>>>>>>>>31.65%
 

 

 
बिहारग्रामीण77834.06780.15504.8164.71
शहरी923211237.54654.9752.93
राज्य में गरीब>>>>>>>>>>33.74%
 

 

 
झारखंडग्रामीण74840.84825.15502.8160.94
शहरी97424.831583.75816.0451.53
राज्य में गरीब>>>>>>>>>>36.96%
 

 

 
हिमाचलप्रदेशग्रामीण9138.841535.75792.5851.61
शहरी10644.332653.881100.3141.46
राज्य में गरीब>>>>>>>>>>8.06%
 

 

 
दिल्लीग्रामीण114512.922068.491115.7153.94
शहरी11349.842654.461117.1542.09
राज्य में गरीब>>>>>>>>>>9.91%
 

 

 
उत्तराखंडग्रामीण88011.621747.41788.4445.12
शहरी108210.481744.92847.148.55
राज्य में गरीब>>>>>>>>>>11.26%
 

 

 
राजस्थानग्रामीण90516.051179.4646.5554.82
शहरी100211.691663.08798.0946.22
राज्य में गरीब>>>>>>>>>>14.71%
 

 

 
ओड़िसाग्रामीण69535.65818.47506.7561.91
शहरी86117.291548.36749.1348.38
राज्य में गरीब>>>>>>>>>>32.59%
 

 

 
गुजरातग्रामीण93221.541109.76640.157.68
शहरी115210.141909.06882.346.22
राज्य में गरीब>>>>>>>>>>16.63%
 

 

 
केरलग्रामीण10189.141835.2284345.93
शहरी9874.972412.58969.7640.20
राज्य में गरीब>>>>>>>>>>7.5%
 

 

 
छतीसगढ़ग्रामीण73844.61783.57456.0458.20
शहरी84924.751647.32719.9743.71
राज्य में गरीब>>>>>>>>>>39.93%
 

 

 
हरियाणाग्रामीण101511.641509.91815.253.99
शहरी116910.282321.491001.2643.13
राज्य में गरीब>>>>>>>>>>11.16%
 

 

 
जम्मू-कश्मीरग्रामीण89111.541343.88776.8257.80
शहरी9887.21759.45901.851.25
राज्य में गरीब>>>>>>>>>>10.35%
 

 

 
भारतग्रामीण81625.71053.64600.3656.98
शहरी100013.71984.46880.8344.39
देश में गरीब>>>>>>>>>>21.93%
 

 

 
स्रोत –
  1. http://www.indiaenvironmentportal.org.in/files/Key_Indicators-Household%20Consumer%20Expenditure.pdf
  2. http://www.indiaenvironmentportal.org.in/files/file/Household%20Consumer%20Expenditure%20across%20Socio-Economic%20Groups.pdf












































About the Author: Mr. Sachin Kumar Jain is a development journalist, researcher associated with the Right to Food Campaign in India and works with Vikas Samvad, AHRC's partner organisation in Bophal, Madhya Pradesh. The author could be contacted at sachin.vikassamvad@gmail.comTelephone: 00 91 9977704847
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About AHRC: The Asian Human Rights Commission is a regional non-governmental organisation that monitors human rights in Asia, documents violations and advocates for justice and institutional reform to ensure the protection and promotion of these rights. The Hong Kong-based group was founded in 1984.

Thursday, August 01, 2013

ई-ट्रिप और अवैध कालोनियों के मामले

सभी मामले दोनों पार्टियों के मंत्री करेंगे हल-मुख्यमंत्री
अमृतसर (गजिंदर सिंह किंग) पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल आज गुरु नगरी अमृतसर पहुंचे और सचखंड श्री हरमंदिर साहिब में नतमस्तक हुए। सचखंड श्री हरमंदिर साहिब में नतम्सतक होने के बाद पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि व्यापारियों और आम लोगों की ई-ट्रिप और अवैध कालोनियों के संबंध में जो आपत्तियां हैं, उन्हें दूर करने के लिए शिरोमणि अकाली दल और भाजपा के मंत्रियों की कमेटियां बनाई गई हैं, जो जल्द ही इन समस्याओं का हल निकाल लेंगी। मुख्यमंत्री ने सरहिंद के निकट हुए बस हादसे पर अफसोस व्यक्त किया और कहा कि हादसे में मरने वालों को एक-एक लाख रुपये की सहायदा राशि देने की घोषणा की गई है। इसके अलावा उन्होंने कहा, कि राज्य में बाढ़ आने जैसे कोई हालात नहीं है। क्योंकि भाखड़ा डैम ने गेट खोलने से फिलहाल इंकार कर दिया है। इसके अलावा काला कच्छा गिरोह और नाइजीरियन गिरोह की सक्रियता की अफवाहों के बारे में उन्होंने कहा, कि पूरे देश में पंजाब ही एक ऐसा राज्य है, जहां क्राइम सबसे कम है। उन्होंने कहा, कि केंद्र सरकार देश की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा करने में पूरी तरह से असमर्थ रही है। जबकि पंजाब में परमात्मा की कृपा से ऐसी कोई स्थिति नहीं है। तेलांगना राज्य के गठन पर अपनी खुशी व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा, कि यह एक अच्छी बात है। उन्होंने कहा, कि चूंकि केंद्र राज्यों के अधिकारों का हनन कर रहा है, इसीलिए अन्य स्थानों पर भी अलग राज्य की मांग बढ़ती जा रही है। इस मौके पर मुख्यमंत्री ने गुजरात सरकार की ओर से कच्छ इलाके में बसे सिख परिवारों को वहां से निकाले जाने की घटना के संबंध में कहा, कि उन्होंने भी इस समाचार को अखबार में पढ़ा है और वह कल ही गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंदर मोदी से इस संबंध में बात करेंगे।

चोरी करने वाले गिरोह का पर्दाफाश-चार आरोपी काबू

पर्दाफाश किया जीआरपी ने-रेलवे स्टेशन और अन्य स्थानों से 4 पकड़े 
अमृतसर: 31 जुलाई 2013: (गजिंदर सिंह किंग) अमृतसर रेलवे पुलिस ने रेलवे स्टेशन, ट्रेनों और अन्य स्थानों पर चोरी और लूटपाट करने वाले गिरोह के चार सदस्यों को काबू करने का दावा किया है। जीआरपी थाना प्रभारी इंस्पेक्टर धर्मेंद्र कल्याण के मुताबिक उक्त आरोपियों के बारे में पिछले कुछ समय से गुप्त सूचनाएं मिल रही थी। उक्त सूचना के आधार पर रेलवे स्टेशन के निकट से इन चारों को दबोचा गया। इसके बाद हुई पूछताछ में आरोपियों ने अपने कारनामो का खुलासा किया। इसके बाद आरोपियों की निशानदेही पर एक एलसीडी, दो लैपटाप, डीवीडी और सीडी प्लेयर के अलावा एक कमानीदार चाकू और एक खिलौना पिस्तौल बरामद की गई है। पुलिस के मुताबिक आरोपियों ने अपने गिरोह के कुछ अन्य सदस्यों के बारे में भी जानकारी दी है। जिन्हें जल्द ही काबू कर लिया जाएगा।

पैतृक गांव में रफी को उनकी बरसी के मौके पर किया गया याद

रफ़ी की याद में लगा पैतृक गाँव में चाहनेवालों का मेला
अमृतसर: 31 जुलाई 2013 (गजिंदर सिंह किंग//पंजाब स्क्रीन): तुम मुझे यूं भुला न पाओगे, मोहम्मद रफी की आवाज में गुनगुनाते इस गानेके स्वर सुन कर आज भी उनके पैतृक गांव में मौजूद रफी को जानने वाले लोगों की आंखें नम हो जाती हैं। लेकिन इसके साथ उनके चेहरे पर रफी के इस गांव से संबंधित होने का समरण कर रौणक आ जाती है। हालांकि आज रफी के दोस्त इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनसे मोहम्मद रफी के किस्से सुनने वालों का कहना है कि उन्हें यह जान कर काफी खुशी होती है कि दुनिया के सबसे बेहतरीन गायक मोहम्मद रफी उन्हीं के गांव के हैं।   रफी का नाम सुनते ही हर किसी के मन में उनकी मधुर आवाज घनघना जाती हैं। आज भी जब हम इस सदाबहार गायक की आवाज में गाए गए गानों को सुनते हैं, तो एक अजीब सी दुनिया में पहुंच जाते हैं। आज रफी की बरसी हैं और उनके पैतृक गांव कोटला सुल्तान सिंह में उन्हें श्रद्धा सुमन भेंट कर रहे हैं। उनके दोस्त बख्शीश सिंह और कुंदन सिंह इस दुनिया में नहीं रहे। लेकिन उनके बच्चे और गांव के अन्य निवासियों का कहना है कि उन्हें इस बात का मान है कि वे उस गांव के रहने वाले हैं, जहां सुरों के सरताज ने जन्म लिया था।

Wednesday, July 31, 2013

INDIA: लोकतंत्र को ढकेलते न्यायालय

Wed, Jul 31, 2013 at 12:33 PM
An Article by the Asian Human Rights Commission                        --प्रशान्त कुमार दूबे
पिछले साठ सालों में भारतीय लोकतंत्र मजबूत हुआ है। हमारा चुनाव आयोग दुनिया का सबसे बेहतर आयोग है। इस लोकतंत्र में जहां एक ओर तो दलित और वंचित वर्गों को प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला है वहीं दूसरी ओर बड़ी संख्या में महिलाएं आगे आई हैं।'' अरविन्द मोहन
पिछला सप्ताह राजनीतिक दलों और राजनीतिज्ञों के लिए एक बड़े ही कठिन समय की दस्तक लेकर आया | माननीय उच्चतम न्यायालय का वह फैसला जिसमें कहा गया था कि यदि मौजूदा सांसदों और विधायकों को किसी आपराधिक मामले में दो साल से ज्यादा और भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत कोई भी सजा दी जाती है, तो उनकी सदस्यता तत्काल प्रभाव से खत्म कर दी जाएगी।
दूसरे ही दिन सर्वोच्च अदालत ने एक अन्य निर्णय में कहा कि यदि कोई व्यक्ति जेल में है तो वह वहां से चुनाव भी नहीं लड़ सकता है। इस सम्बन्ध में इस बात का हवाला दिया गया कि जब उस व्यक्ति को जेल से मतदान करने का अधिकार नहीं है, तो फिर उसे चुनाव लड़ने का भी अधिकार नहीं है। इस आदेश की व्याख्या में अदालत ने पटना उच्च न्यायालय के वर्ष 2004 में दिए गए फैसले का हवाला भी दिया है। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति ए.के. पटनायक और एस.जे. उपाध्याय की दो सदस्यीय पीठ ने यह दोनों आदेश लिली थामस, चुनाव आयोग, लोकप्रहरी और बसंत कुमार चैधरी की जनहित याचिकाओं पर दिए।
तीसरा और अंतिम फैसला उत्तरप्रदेश उच्च न्यायालय ने दिया। अदालत ने कहा कि राजनैतिक दल जाति के आधार पर रैलियां आय¨जित नहीं कर सकते हैं। ज्ञात हो कि पिछले सालों में उत्तरप्रदेश में जातिगत रैलियों का बोलबाला रहा है। यहां तक कि वे दल (बसपा, सपा) जो कि स्वयं जाति के इस कुचक्र को तोड़ने आये थे, उन्होंने ही सबसे ज्यादा जातिगत रैलियां कीं। कभी ब्राहमण रैली तो कभी यादव और कभी दलित रैली ......।
इन तीनों फैसलों ने जहां एक ओर राजनैतिक दलों को तो सांसत में डाला ही है, वहीं दूसरी ओर जिन मंत्री-विधायकों पर आपराधिक मुकदमे की तलवार लटक रही है, उनकी जान भी आफत में डाल दी है। मध्यप्रदेश में सत्ताधारी तीन विधायकों पर यह तलवार लटक रही है, जिनमें से पूर्व मंत्री राघव जी भी शामिल हैं। एक के बाद एक आए इन तीन फैसलों ने प्राईम टाइम को नया मसाला दे दिया। यह खबर खबरी चैनलों पर गन्ने की चरखी के उस गन्ने की तरह चली, जिसे सूखा और रूखा होने तक निचोड़ा जाता है।
इस पूरे दौर में राजनैतिक दल मजबूरी के चलते फैसलों को लोकतंत्र की मजबूती के लिए बढि़या कदम बताते रहे। चैनलों और अखबारों का एक्सपर्ट पैनल इसका फौरी विश्लेषण करता रहा। लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि क्या इससे लोकतंत्र मजबूत होगा ? क्या राजनीति का अपराधीकरण या अपराध का राजनैतिकीकरण खत्म हो जाएगा? क्या राजनैतिक दल जिस तरह से इस फैसले का स्वागत कर रहे हैं क्या उसी तरह से ही इसे स्वीकार कर लेंगे? इसे राजनीति में सुधार की दिशा में कदम माना जाएगा? इन सभी सवालों का जवाब केवल न में ही है?
हम सभी जानते हैं कि आजकल अधिकांश पार्टियां अपराधियों से परहेज नहीं करतीं या अपराधी चुनाव जीतने लगे हैं। इस संदर्भ में किसी भी दल की तात्कालिक सरकारों के ग्राफ भी देख लें तो हम पाते हैं कि लगभग एक चैथाई नेता दागी हैं। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म (एडीआर) के आंकड़ों को देखें तो हम पाते हैं कि देश के 543 सांसदों में से 162 पर आपराधिक प्रकरण दर्ज हैं। इतना ही नहीं उनमें से भी 14 प्रतिशत सांसदों पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। इसी प्रकार देशभर के 4032 विधायकों में से 1258 विधायकों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं और उनमें से भी 15 प्रतिशत विधायकों पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें से यदि 10 प्रतिशत नेता ऐसे भी मान लिए जाएं जिन पर राजनैतिक द्वेष के चलते झूठे मुकदमे चल रहे हैं तो भी बची हुई संख्या भी काफी है।
मध्यप्रदेश में भी 217 विधायकों में से 55 विधायकों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं व इनमें से 25 विधायकों पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। गौरतलब है कि इनमें से अधिकांश या तो मंत्री हैं या मंत्री रह चुके हैं। हद तो यह है कि झारखंड में तो 74 प्रतिशत विधायकों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं।
जो राजनैतिक दल इन निर्णयों का अभी स्वागत कर रहे हैं यदि उन्हें राजनीति में सुधार इतने ही वांछित लगते हैं तो फिर उन्होंने अभी तक अपने-अपने दलों में यह प्रक्रिया क्यूं नहीं अपनाई? जबकि चुनाव आयोग ने तो वर्ष 2004 में ही इन सुधारों को लेकर सिफारिशें की थीं। तबसे लेकर आज तक न तो इन दलों ने जाति जैसे प्रश्न पर कुछ बात की और ना ही इन्होंने अपराध पर लगाम लगाने के लिए कोई पहल की। पिछले दिनों इन दलों के पास स्वयं के लोकतांत्रिक होने और लोकतंत्र का सम्मान करने वाले दल के रूप में प्रस्तुत करने का बेहतर अवसर मिला था तब ये दल अपने आंतरिक तंत्र को सूचना के अधिकार के दायरे में ला सकते थे। यहां भी इन दलों ने ऐसा नहीं किया, बल्कि तमाम परस्पर विरोधी दल आपस में एक साथ आकर राष्ट्रीय सूचना आयोग के निर्णय के विरुद्ध अध्यादेश लाने पर सहमत हो गए हैं। यही लोकतंत्र में आस्था रखने का स्वांग रचने वाले इन दलों का असली चेहरा है।
विचारणीय है कि राजनीतिक दलों को लोकतंत्र में इतनी ही गहरी आस्था होती तो फिर ये गैर संवैधानिक तरीके से जनप्रतिनिधित्व कानून को संशोधित करके धारा-8 (4) क्यों बनाते? जब एक आम नागरिक के लिए इस कृत्य की सजा तय है तो फिर राजनेता इससे कैसे बच सकते हैं? अमेरिका के मशहूर न्यायाधीश फेलिक्स फ्रेंकफर्टर का कहना है कि दुनिया का कोई भी पद नागरिक से बड़ा नहीं होता है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म (एडीआर) के राष्ट्रीय समन्वयक अनिल बैरवाल कहते हैं दरअसल में यह फैसले राजनीतिक दलों के मुंह पर तमाचा है। वे कहते हैं कि लोकतंत्र की खूबसूरती तो यही है कि सभी घटक अपने-अपने हिस्से का काम बखूबी करें, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। राजनीतिक दलों ने अपनी ओर से कोई भी ठोस कदम नहीं उठाये हैं और जिसके चलते ही न्यायालय को इस भूमिका में आना पड़ा।
मध्यप्रदेश इलेक्शन वॉच की समन्वयक रोली शिवहरे कहती हैं कि अधिक न्यायालयीन हस्तक्षेप से लोकतंत्र कमजोर होता है। यह न्यायालय की मजबूरी है कि वह हस्तक्षेप करे। बेहतर तो तब होता जब कि वे (राजनीतिज्ञ) खुद इस प्रकार की पहल करते और लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करते।''
सवाल उठता है कि क्या हम एक ऐसे लोकतंत्र की ओर बढ़ रहे हैं जहां कि हर राजनैतिक या किसी और प्रकार के सुधार के लिए हमें अदालती डंडे का सहारा लेना पड़ेगा। यानी हर वो समूह जिसके पास पैसा है, ताकत है, वह तो इसे हासिल कर लेगा, लेकिन उनका क्या जो कि दो जून की रोटी के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं। और रही बात न्याय में देरी की व न्यायालयों के गड़बड़ निर्णयों की तो उनकी तो बात करना ही बेमानी है। शायद यही कारण है कि दक्षिण भारत के अनेक आदिवासी समुदायों ने तो न्यायालय जाना बंद ही कर दिया है।
अंत में सिर्फ इतना ही कि क्या केवल न्यायालय के निर्णयों एवं जनहित याचिकाओं के जरिये ही लोकतंत्र पटरी पर दौड़ेगा या फिर इस लोकतंत्र को सही मायने में बचाने के लिए राजनैतिक दल कुछ ईमानदार कोशिश करेंगे? आज राजनीति सुधार की नहीं बल्कि दवाब की राजनीति बनकर रह गई है। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि प्रत्येक राज्य सरकार को अभी तक यह अधिकार प्राप्त है कि वह किसी भी अपराधी के खिलाफ प्रकरणों को निरस्त कर सकती है।
About the Author: Mr. Prashant Kumar Dubey is a Rights Activist working with Vikas Samvad, AHRC's partner organisation in Bophal, Madhya Pradesh. He can be contacted at prashantd1977@gmail.com
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About AHRC: The Asian Human Rights Commission is a regional non-governmental organisation that monitors human rights in Asia, documents violations and advocates for justice and institutional reform to ensure the protection and promotion of these rights. The Hong Kong-based group was founded in 1984.

Tuesday, July 30, 2013

लोग अफवाहों से करें परहेज-अमृतसर पुलिस

Tue, Jul 30, 2013 at 7:30 PM
काला कच्छा गिरोह और नाइजीरियन गिरोह का कोई वजूद नहीं
अमृतसर (गजिंदर सिंह किंग//पंजाब स्क्रीन): पिछले कुछ दिनों से सीमावर्ती गांवों, कस्बों और शहरों में फैली काला कच्छा गिरोह और नाइजीरियन गिरोह की सक्रियता की बातों का खंडन करते हुए जिला पुलिस ने आज दावा किया है, कि उक्त सभी सूचनाएं सिर्फ अफवाहें हैं, इसके सिवा कुछ भी नहीं। आज अमृतसर सिटी और देहाती पुलिस के साथ-साथ सीमा रेंज के डीआईजी ने सांझे तौर पर प्रेस कांफ्रेंस कर लोगों को अफवाहों से बचने और गुरेज करने की अपील की। इसके साथ ही उन्होंने यह भी आश्वासन दिया कि लोगों की सुरक्षा पंजाब पुलिस का पहला फर्ज है और इसके लिए पुलिस पूरी तरह से मुस्तैद है। इस मौके पर अमृतसर के पुलिस कमिश्नर राम सिंह और बार्डर रेंज के डीआईजी ने कहा, कि अफवाहों की सूचनाएं उन्हें भी मिली थी, जिनकी वेरिफिकेशन कराने पर वे झूठी निकली। डीआईजी बार्डर रेंज ने कहा, कि इन्हीं अफवाहों का फायदा उठाते हुए लोग अपनी रंजिश भी निकाल रहे हैं। उन्होंने इसके लिए पंडोरी वड़ैच गांव में कुलवंत सिंह हत्याकांड के साथ-साथ कुछ और घटनाओं का भी उल्लेख किया। उक्त दोनों पुलिस अधिकारियों ने बताया, कि इन अफवाहों से निपटने के लिए पंजाब पुलिस के डीजीपी सुमेध सैनी ने पीएपी की पांच कंपनियों को यहां भेजा है। इसके अलावा नाइट पुलिसिंग शुरू की गई है। इसके अलावा ठीकरी पहरे के दौरान हथियारबंद लोगों को भी समझाया जा रहा है कि वे इस तरह की अफवाहों को और बढ़ावा न दें। अमृतसर के कमिश्नर राम सिंह ने बताया, कि यदि इस अपील के बावजूद ठीकरी पहरे पर हथियारबंद युवक खड़े रहते हैं, तो इस पर आगे की कार्रवाई पर विचार किया जाएगा। हालांकि उन्होंने कहा, कि वह ठीकरी पहरे का विरोध नहीं करते हैं।

शहीद उधम सिंह को श्रद्धांजलि

Tue, Jul 30, 2013 at 7:40 PM
आतंकवाद विरोधी संगठन ने शहीद उधम सिंह को दी श्रद्धांजलि
अमृतसर (गजिंदर सिंह किंग//पंजाब स्क्रीन): शहीद उधम सिंह की शहादत दिवस की पूर्व संध्या पर आल इंडिया आतंकवाद विरोधी फ्रंट के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने जलियां वाला बाग में शहीद को श्रद्धांजलि अर्पित की। इस मौके सभी ने अमर ज्योति के सामने खड़े होकर प्रण भी लिया कि वे शहीद उधम सिंह की विचारधारा को पूरे देश में फैलाएंगे, ताकि युवा पीढ़ी जो देश को आजाद कराने के लिए कुर्बानियां देने वाले शहीदों को भूल चुकी है, उन्हें उनके बारे में जागरूक किया जा सके।
   शहीद उधम सिंह का 31 जुलाई को शहीदी दिवस है। शहीद उधम सिंह को उनकी शहादत पर श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए आल इंडिया आतंकवाद विरोधी फ्रंट ने शहीदी दिवस की पूर्व संध्या पर जलियां वाला बाग में शहीद को नमन किया और इस मौके पर प्रण भी लिया, कि वे शहीदों के सपने के मुताबिक देश बनाने के लिए युवा पीढ़ी को इस संबंध में जागरूक करेंगे। इतना ही नहीं, फ्रंट के नेता ने कहा, कि अन्ना हजारे ने आज पूरे देश को भ्रष्टाचार के खिलाफ जागरूक किया है और फ्रंट अन्न हजारे के साथ खड़ा है।

सरोजिनी साहू एक विशिष्ट नाम-कमलेश्वर

Mon, Jul 29, 2013 at 7:45 AM
इनकी कहानियां मन को झकझोरती हैं               -नब्बे के दशक में  कहा था 
प्रिय मित्र,
नब्बे के दशक में कमलेश्वर ने ओडिया की लेखिका सरोजिनी साहू के सन्दर्भ
में लिखा था:
"प्रखरतम लेखिका के रूप में और यथार्थ स्पष्टवादिता के लिए सरोजिनी साहू
एक विशिष्ट नाम है. इनकी कहानियां मन को झकझोरती है. मध्यमवर्ग के
पारिवारिक जीवन की समस्याएं, उलझाने, सुख-दुःख, आशा-निराशा, संजोए-बिखरते
सपने, आम जिन्दगी के संघर्षशील अनुभवों को लेकर वे बड़े ही प्रखर शैली
में अपनी बात कहती हैं. ओडिया कथा-साहित्य में सरोजिनी साहू एक विशिष्ट
प्रतिभा का नाम है. अबतक उनका एक ही संकलन 'सुखर मुहाँ-मुहिं' प्रकाशित
हुआ है. यों नियमित रूप से पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कहानियां प्रकशिओत
होती रहती हैं और बहु-चर्चित कथा लेखिका के रूप में उनकी ख्याति है."
देखें: भारतीय शिखर  कथा कोष   (http://bit.ly/13Rs1MB)
नब्बे के दशक की उस प्रतिभाशाली लेखिका आज भारतीय साहित्य में न केवल
शीर्ष स्थान पर हैं, बल्कि भारतीय नारीवाद को उन्होंने एक नया आयाम दिया
है. हिंदी में, इस प्रखरतम प्रतिभा के, अबतक दो उपन्यास और दो कहानी
संग्रह प्रकाशित हो चुके है.

राजपाल & संस की ओर से उपन्यास 'बंद कमरा' (ISBN :9788170289548 ) तथा
कहानी संग्रह 'रेप तथा अन्य कहानियां' (ISBN: 9788170289210 )प्रकाशित हो
चूका है.

यश प्रकाशन, दिल्ली ने प्रकाशित किया है उनका उपन्यास 'पक्षिवास' तथा
कहानी संग्रह 'सरोजिनी साहू की दलित कहानियां'.

लेखिका के सन्दर्भ में अधिक जानकारी के लिए उनके होमपेज
सरोजिनीसाहू.कॉम (http://www.sarojinisahoo.com/ )' पर मित्रों का सादर
निमंत्रण है.

सादर प्रणाम
उमा शिवप्रिया

बेरी साहिब के पास और बढ़ेगा पूजा पाठ का अखंड सिलसिला

Mon, Jul 29, 2013 at 8:55 PM
गुरुद्वारा बेरी साहिब में अखंड पाठ के भोग के लिए होंगें दस कमरे
अमृतसर (गजिंदर सिंह किंग/पंजाब स्क्रीन) सचखंड श्री हरमंदिर साहिब स्थित गुरुद्वारा बेरी साहिब में होने वाले अखंड पाठों के लिए अब अलग से कमरे तैयार किए जाएंगे। आज इस कारसेवा को श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार, सचखंड श्री हरमंदिर साहिब के मुख्य ग्रंथी और कार सेवा वाले बाबा ने टक लगा कर आरंभ किया। इस मौके पर श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार ज्ञानी गुरबचन सिंह ने कहा, कि माहिरों के कहने के बाद ही इन कमरों का निर्माण कार्य शुरू किया गया है। 
        सचखंड श्री हरमंदिर साहिब परिसर स्थित गुरुद्वारा बेरी साहिब में होने वाले अखंड पाठों के लिए अब अलग से कमरे तैयार होंगे। इन कमरों की कारसेवा का आज श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार ज्ञानी गुरबचन सिंह, सचखंड श्री हरमंदिर साहिब के मुख्य ग्रंथी ज्ञानी मल सिंह और कार सेवा वाले बाबा कश्मीर सिंह भूरी वालों ने टक लगा कर शुभारंभ किया। इस मौके पर श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार ने बताया, कि माहिरों के कहे अनुसार ही एसजीपीसी की ओर से श्री  अखंड पाठ साहिब के लिए अलग से कमरे तैयार करने का निर्णय लिया गया है। उन्होंने बताया, कि इस कार्य की कारसेवा संत बाबा कश्मीर सिंह जी को सौंपी गई है। वहीं, कार सेवा वाले बाबा संत कश्मीर सिंह भूरी वालों ने कहा, कि करीब चार महीनों के अंतराल में दस कमरे तैयार कर संगत के सुपुर्द कर दिए जाएंगे।

भगत पूरण सिंह जी को श्रद्धांजलि के कार्यक्रम

पहली से पांच अगस्त तक चलेगा विभिन्न आयोजनों का सिलसिला 
अमृतसर:29 जुलाई, 2013: (गजिंदर सिंह किंग//पंजाब स्क्रीन) पिंगलवाड़ा सोसायटी की ओर से भगत पूरण सिंह जी की   21 वीं बरसी के मौके पर विभिन्न कार्यक्रम कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की जाएगी। यह जानकारी पिंगलवाड़ा सोसायटी की मुखी डा. इंद्रजीत कौर ने आज प्रेस कांफ्रेंस में दी। 
         पिंगलवाड़ा सोसायटी की ओर से भगत पूरण सिंह जी की 21 वीं बरसी के मौके पर विभिन्न कार्यक्रम कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की जाएगी। यह जानकारी पिंगलवाड़ा सोसायटी की मुखी डा. इंद्रजीत कौर ने आज प्रेस कांफ्रेंस में दी। उन्होंने बताया, कि इन पांच दिनों में मेडिकल कैंप लगाया जाएगा। इसके अलावा पिंगलवाड़ा सोसायटी के तीनों स्कूलों के बच्चों की ओर से सभ्याचारक कार्यक्रम भी पेश किया जाएगा। उन्होंने बताया, कि तीन अगस्त को सोसायटी कार्यालय में श्री अखंड पाठ रखवाए जाएंगे। जिनका पांच अगस्त को भोग डाला जाएगा। उन्होंने कहा, कि इन पांच दिनों के दौरान लगाए जाने वाले मेडिकल कैंप में जहां सोसायटी के बच्चों का चेकअप किया जाएगा, वहीं आम संगत का भी चेकअप किया जाएगा।

अमृतसर में रंजिशन हत्या

अफवाहों का फायदा उठाते हुए निकाली चुनावी रंजिश
गोली मार कर एक की हत्या, दो को किया जख्मी
अमृतसर:29 जुलाई,2013: (गजिंदर सिंह किंग//पंजाब स्क्रीन) पूरे राज्य में इस समय काला कच्छा गिरोह और नाइजीरियन गिरोह के हमलों की अफवाहों का दौर जारी है। इन्हीं अफवाहों का फायदा उठाते हुए कुछ लोग अपनी निजी रंजिशों को निकालने में जुटे हुए हैं। ऐसा ही एक मामला अमृतसर के पंडोरी वड़ैच गांव में सामने आया है। जहां पंचायती चुनावों की रंजिश निकालने के लिए एक पक्ष ने अपने विरोधी पक्ष से संबंधित कुलवंत सिंह नामक व्यक्ति को गोली मार कर मौत के घाट उतार दिया, जबकि दो लोगों को घायल कर दिया। घटना की जांच में जुटे पुलिस अधिकारी सुखदेव सिंह के मुताबिक बीती रात पंडोरी वड़ैच गांव में कुछ लोगों अफवाह फैला दी कि उनके गांव में काला कच्छा गिरोह के लोग घुस गए हैं। उक्त अफवाह सुनते ही पूरा गांव घरों से बाहर निकल आया। इसी दौरान गांव निवासी कुलवंत सिंह और उनका बेटा बलजीत सिंह भी बाहर आए। दूसरी ओर गांव का ही रहने वाला सोनू और उसका साथी भी हथियारों के साथ बाहर आया और कुलवंत सिंह पर गोलियां दाग दी। जिससे कुलवंत सिंह की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि उसके साथ खड़े गांव के ही निवासी दो लोग घायल हो गए। उन्होंने बताया कि इस संबंध में केस दर्ज कर लिया गया है। लेकिन आरोपी अभी फरार है। उन्हें गिरफ्तार करने के लिए छापेमारी की जा रही है। जांच अधिकारी ने दावा किया है कि आरोपियों को जल्द ही गिरफ्तार कर लिया जाएगा।

Sunday, July 28, 2013

अमृतसर में नौसरबाज साधु गिरफ्तार

Sun, Jul 28, 2013 at 5:21 PM
महिलाओं से ठगी गई तीन सोने और हीरे की अंगूठियां बरामद
अमृतसर (गजिंदर सिंह किंग//पंजाब स्क्रीन) अक्सर लोगों के घरों में साधु के भेष में घुस कर भोली-भाली महिलाओं को अपनी ठगी का शिकार बनाने वाले गिरोह का पर्दाफाश करते हुए अमृतसर पुलिस ने एक नौसरबाज को गिरफ्तार करने में कामयाबी हासिल की है। पुलिस ने आरोपी के कब्जे से दो हीरे की और एक सोने की अंगूठी भी बरामद कर ली है। डीएसपी सोहन सिंह ने इस संबंध में बताया, कि 17 जुलाई को अमृतसर के रानी का बाग इलाके की एक कोठी में दो साधु पहुंचे और घर में मौजूद महिलाओं से भोजन की मांग की। भोजन ग्रहण करने के बाद साधुओं ने महिलाओं से कहा, कि वे उनके शारीरिक कष्ट को दूर कर देंगे और यह कह उन्होंने महिलाओं से उनके गहने उतरवा लिए। इसके बाद मंत्र मारने का बहाना बना कर उक्त साधुओं ने कागज में छोटी ईंट लपेट कर दे दिया और वहां से चले गए। महिलाओं ने जब कागज खोल कर देखा, तो उसमें गहने नहीं थे। इस बीच महिलाओं में से एक ने साधुओं की फोटो खींच ली थी। जिसके आधार पर पुलिस ने कार्रवाई करते हुए नौसरबाजों में से एक राजीनाथ को काबू कर लिया, जबकि उसका साथी बूटा सिंह उर्फ डैनी अभी भी फरार बताया जाता है। पुलिस ने गिरफ्तार आरोपी के कब्जे से दो हीरे की और एक सोने की अंगूठी बरामद कर ली है।

मामला अमृतसर में ई-ट्रिप के खिलाफ आन्दोलन का

Sun, Jul 28, 2013 at 5:03 PM
 कांग्रेस लोगों को कर रही है गुमराह-बुलारिया
अमृतसर:28 जुलाई 2013: (गजिंदर सिंह किंग//पंजाब स्क्रीन) ई ट्रिप के खिलाफ चल रहे राज्य व्यापी आन्दोलन का सामना करने के लिए अब अकाली नेतायों ने राजनीतिक मोर्चे पर भी लोहा लेना शुरू कर दिया है। अकाली नेतायों ने अमृतसर में इस आन्दोलन को लेकर कांग्रेस को निशाना बनाया और कहा कि कांग्रेस इस मुद्दे पर लोगों को गुमराह कर रही है अकाली दल के मुख्य संसदीय सचिव इंद्रबीर सिंह बुलारिया ने दावा किया है, कि ई-ट्रिप के मुद्दे पर कांग्रेस पार्टी लोगों को और व्यापारियों को गुमराह कर रही है। उन्होंने कहा, कि इस सिस्टम के तहत सिर्फ छह वस्तुओं को शामिल किया गया है। जिसमें व्यापारियों को सिर्फ अपने कारोबार की जानकारी विभाग को देनी है। वह आज अमृतसर में व्यापारियों के साथ एक बैठक करने के बाद पत्रकारों को संबोधित कर रहे थे। बुलारिया ने कहा, कि आज की बैठक में व्यापारियों की कई मुश्किलें उनके सामने आई हैं। उन्होंने कहा, कि इन परेशानियों  से व्यापारियों को रोजाना दो-चार होना पड़ रहा है। उन्होंने कहा, कि वह जल्द ही उप मुख्यमंत्री सुखबीर बादल से मिल कर इन मुश्किलों के हल के लिए बात करेंगे।