Friday, May 17, 2013

कलाकृतियों में असली सोने और चांदी का वर्क

08-मई-2013 16:26 IST
तंजौर और मैसूर की कलाकृतियां -विशेष लेख//आलोक देशवाल*
दक्षिण भारत के तलिनाडु राज्‍य में तंजौर (तंजावूर) के मंदिर में उकेरी गई चित्रकला को तंजौर कलाकृतियों का नाम दिया गया। शैलीगत ढंग से यह माना जाता है कि यह 16वीं शताब्‍दी में नायक शासकों के शासन के दौरान उभर कर आई। 17वीं सदी में मराठा शासन में इस कला को नया प्रोत्‍साहन और संरक्षण प्राप्‍त हुआ।मराठा शासकों के समय तंजौर  कला, वास्‍तुकला, शिक्षण, संगीत और प्रदर्शन कला के एक म‍हान केंद्र के रूप में उभर कर आया।
स्‍थानीय तौर पर पालागई (लकड़ी का तख्‍त) और पदम (चित्र) का तात्‍पर्य लकड़ी के तख्‍तों पर चित्र बनाने की पद्धति से है जो इस क्षेत्र की विशेष शैली है। ऐसा माना जाता है कि पहले इस कला को दीवारों पर बनाया जाता था और फिर उसे ऐची चीज़ों पर बनाया जाने लगा जिसे आसानी से ले जाया जा सकता हो। इन चित्रों में दृश्‍य हिंदू धर्म की वैष्‍णव और शैव परंपरा से उत्‍पन्‍न हुए हैं। हालांकि इसमें अन्‍य धर्मों और धर्मनिरपेक्ष विषयों पर भी कई चित्र मिलते हैं। इन चित्रों में दरबार के दृश्‍य और संतों तथा शासकों के चित्र शामिल हैं।
तंजौर कलाकृतियों में असली सोने और चांदी का वर्क, बहुमूल्‍य मोती, शीशे और रत्‍नों विशेष रूप से सोने का बखूबी इस्‍तेमाल होता है। देवी-देवताओं की कलाकृतियों में लाल, हरे, नीले, काले और सफेद रंगों के इस्‍तेमाल के अलावा श्री कृष्‍ण के बाल रूप की कलाकृति में संगमरमर के साथ अक्‍सर गुलाबी जबकि भगवान विष्‍णु और उनके अवतारों के चित्रों में अक्‍सर हरे रंग की झलक दिखती है।
मैसूर कलाकृति शैली महाराजा कृष्‍णराजा वदियार (1799-1868) के शासन मे दक्षिण कनार्टक में शुरू हुई। इनके शासन में संगीत, नृत्‍य, साहित्‍य और कला‍कृतियों जैसे पुरानी कलात्‍मक परंपराओं को फिर से उभारा गया। अधिकतर पारंपरिक कलाकृतियों को जीवित रखने में इस शासन को श्रेय दिया जा सकता है। दीवारों से लेकर मैसूर की शैलीगत ढंग से कपड़े, कागज़ और लकड़ी पर कलाकृतियां बनाने तक व्‍यापक कृतियों मिलती हैं।
हालांकि देखने वालों को यह कलाकृतियां अक्‍सर एक जैसी लगती हैं लेकिन दोनों की शैलियां में में अंतर है और यह अंतर इन कलाकृतियों को बनाने में इस्‍तेमाल हुई तकनीक और जिस तरह से यह प्रस्‍तुत की गईं उसमें है। तंजौर के मुकाबले मैसूर कलाकारों द्वारा अपनाई गई तकनीक में मामूली फर्क है। तंजौर में सफेदा (मक्‍खीसफेदा) का इस्‍तेमल होता है वहीं मैसूर कलाकार  स्‍वदेशी पेड़ (रेवाना चिन्‍नीहालू) के रस से निकला गंबोज (पीला) का इस्‍तेमाल करते हैं जिसे इन कलाकृतियों में एक सुनहरे रंग की झलक दिखती है। तंजौर के ‘गैसो’ कार्य के हाई रिलीफ के मुकाबले मैसूर में लो रिलीफ को वरीयता दी जाती है और तंजौर कलाकारों द्वारा अपनाए जाने वाले चांदी की परत वाली सोने की पत्‍ती के मुकाबले मैसूर में खरे सोने की पत्‍ती का इस्‍तेमाल होता है। तंजौर शैली में उपयोग हुए शीशे और रत्‍न भी मैसूर कलाकृतियां में दिखाई नहीं देते। मैसूर में तंजौर के बजाए प्राकृतिक दृश्‍य अधिक विस्‍तारपूर्वक नज़र आते हैं हालांकि दोनो शैलियों में अक्‍सर पारंपरिक  मंदिरों के पवैलियन और टावर दिखाई देते हैं।
तंजौर और मैसूर कलाकृतियां में हिंदू पुराणों, महाकाव्‍यों और पुराणों के दृश्‍य दर्शाती हैं। इन कलाकृतियां को जो अलग करता है वो है कि इसमें उत्‍तर भारत, डेक्‍कन और मैसूर के दक्षिण भागों की अलग-अलग संस्‍कृतियों की झलक । यह कलाकृतियां दीवारों/सूक्ष्‍म चित्रों, तथा लो रीलिफ की मूतिर्यों की दो भारतीय पंरपराओं के बीच की हैं।  दोनों कलाकृतियों में जैसी कि रैखिकता दिखती है वो रोशनी और शेड के जरिए तीन परिमाणिक का रूप देती है। लो रिलीफ माडलिंग- गोंद की मोटी परत, रंगों , तरीके से कटे हुए पत्‍थरों के जरिए हासिल की जाती है। कलाकृतियों को सजाने के लिए अनिवार्य रूप से सजावटी तत्‍वों का काफी इस्‍तेमाल किया जाता था जिसे ‘कोर्ट स्‍टाइल’ कहते हैं।
पारंपरिक रूप से व्‍यक्तिगत पूजा और सम्राटों को सम्‍मान देने में इस्‍तेमाल की जानी वाली मैसूर और तंजौर कला‍कृतियों ने संग्रहालय की उत्‍कृष्‍ट दुनिया में काफी देर से कदम रखा है। नई दिल्‍ली में राष्‍ट्रीय संग्रहालय की तंजौर और मैसूर कलाकृतियों की नवीनीकृत दीर्घा में इन दोनों कलाकृतियों के कुछ बेहतरीन ऐतिहासक उदाहरण मिलते हैं जो परंपरा, आध्‍यात्‍म और उदार उपभेदों का भरपूर मिश्रण दर्शाते हैं।
दीर्घा में 88 कलाकृतियों शामिल हैं।  हालांकि हर कलाकृति विशिष्‍ट है लेकिन कुछ श्रेष्‍ठ  कृतियों की कोई तुलना नहीं है।
इन कलाकृतियों में उत्‍कृष्‍ट कार्य को देखकर यह आसानी से समझा जा सकता है कि दुनियाभर में इनका प्रसार कैसे हुआ।    
*उप निदेशक, पसूका नई दिल्‍ली
मीणा/इ अहमद/प्रियंका -92
पूरी सूची -08.05.2013 

Thursday, May 16, 2013

आयकर लोकपाल:

07-मई-2013 16:22 IST
अपनी शिकायतें दूर करने के लिए इनकी मदद लें--विशेष लेख
एक करदाता के रूप में मुआवज़े के निपटारे संबंधी आयकर मामले को लेकर आपकी कुछ जायज़ शिकयतें हो सकती हैं।  उदाहरण के तौर पर आपको लग सकता है कि आयकर विभाग को आपके कर का कुछ हिस्‍सा रिफंड करना है लेकिन न ही वह आपकी शिकायतों को सुन रहा है और न ही उसके निपटारे के लिए कुछ खास कदम उठा रहा है। आप अधिकारियों के रूखे व्‍यवहार या   उनके द्वारा बोर्ड के निर्देशों और परिपत्रों का पालन नहीं करने पर खिन्‍न हो सकते हैं। ऐसे सभी मामलों के लिए आप आयकर लोकपाल के पास जा सकते हें। ऐसा करने से पहले आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि कुछ शर्तें पूरी कर ली गई हैं। लोकपाल, आयकर लोकपाल दिशा-निर्देश,2006 के ढांचे के तहत और उसके द्वारा शासित होता है।
  लोकपाल की धारणा मूल रूप से स्‍कैंडिनेविया से ली गई है।लोकपाल सार्वजनिक क्षेत्र के प्राधिकरण के कामकाज के खिलाफ शिकायतों की जांच करता है। हमारे देश में लोकपाल की नियुक्ति केंद्र सरकार करती है। वे आम तौर पर एक ऐसा व्‍यक्ति होता है जिसे कर प्रशासन का काफी अनुभव होता है लकिन वह कामकाज स्‍वतंत्र रूप से करता है। वर्तमान में सरकार ने नई दिल्‍ली, मुम्‍बई, चेन्‍नई, कानपुर, चंडीगढ़, पुणे, भोपाल, कोच्चि, कोलकाता, हैदराबाद, बैंगलोर और अहमदाबाद में लोकपाल नियुक्‍त किए हैं।
शिकायतें जो आप लोकपाल के समक्ष रख सकते हैं:
आप निम्‍नलिखित मुआवज़े के निपटारे या उनकी देरी से मिलने संबंधी शिकायतें लोकपाल के समक्ष रख सकते हैं:
क. रिफंड जारी करना;
ख. ब्‍याज छूट संबंधी याचिकाएं;
ग. अपील इफेक्‍ट्स
घ. सुधार संबंधी आवेदन
ड. लेखा और संपित्‍त्‍यों की जब्‍त पुस्‍तकें जारी करना ;
च.   पैन नंबर देना/ पैन कार्ड जारी करना
निम्‍नलिखित कार्य नहीं होने पर भी आप शिकायत कर सकते हैं:
क. स्रोत पर काटे गए कर सहित भुगतान किए गए करों के लिए ऋण देना;
ख. जांच के लिए मामलों के चयन में पारदर्शिता बरतना;
ग. केंद्रीय प्रत्‍यक्ष कर बोर्ड के दिशा-निर्देशों, परिपत्रों और अनुदेशों का अनुपालन करना;
घ. आयकर अधिकारियों के सही कार्य-समय पर नज़र रखना;
ड. कर निर्धारिती द्वारा भेजे गए पत्रों और दस्‍तावेज़ों को स्‍वीकार करना;
च. उत्‍पीड़न संबंधी घटनाओं का रिकार्ड और रजिस्‍टर रखना। ‘एक व्‍यक्ति कर निर्धारिती के साथ आयकर अधिकारियों के अनुचित रूखे बर्ताव के बारे में भी शिकायत कर सकता है।’
अधिक जानकारी के लिए कृपया दिशा-निर्देशों की धारा 9 देंखे।
शिकायत के लिए प्रक्रिया
शिकायत मिलने पर लोकपाल इसकी जांच करेगा कि दिशा-निर्देशों में उल्लिखित कुछ मूल शर्तें पूरी की गई हैं की नहीं। यह शर्तें पूरी नहीं होने तक वह शिकायत पर गौर नहीं कर सकता। यह शर्तें इस प्रकार हैं:
        i.            अधिकृत प्रतिनिधि द्वारा शिकायत पेश किए जाने पर उस पर शिकायतकर्ता के साथ-साथ उस अधिकृत प्रतिनिधि के हस्‍ताक्षर होने चाहिए।
      ii.            शिकायत में स्‍पष्‍ट रूप से निम्‍नलिखित चीज़ें उल्लिखित होनी चाहिए:
                       ii.क. शिकायतकर्ता का नाम, पता और पैन नंबर।
                       ii.ख. जिसके खिलाफ शिकायत की गई है उस अधिकारी का नाम और पदनाम (यह निरपवाद रूप से सबसे कनिष्‍ठ कम से कम आयकर रैंक का अधिकारी होना चाहिए जिसने शिकायत को आगे बढ़ाया है)
ग. शिकायत संबंधी तथ्‍य;
घ.  समर्थन में दस्‍तावेज़ ; और
ड. लोकपाल से अपेक्षित राहत
iii. लोकपाल इलैक्‍ट्रॉनिक तरीके से भेजी गई शिकायत को तभी स्‍वीकार करेगा यदि अन्‍य प्रकार से पूरी तरह व्‍यवस्थित है लेकिन ऐसी शिकायत के प्रिंटआउट पर जल्‍दी से जल्‍दी शिकायतकर्ता के हस्‍ताक्षर होने चाहिए। ऐसे करने के बाद शिकायत को उसी तारीख पर दर्ज किया जाएगा जिस दिन वो इलैक्‍ट्रॉनिक तरीके से भेजी गई थी।
लोकपाल के समक्ष शिकायत तब तक नहीं रखी जाएगी जब तक पहले दृष्‍टांत में शिकायतकर्ता ने उस अधिकारी जिसके खिलाफ शिकायत दर्ज की है उसके वरिष्‍ठ अफसर को भी लिखित अभिवेदन नहीं दिया है। साथ ही शिकायतकर्ता तभी शिकायत कर सकता है यदि उसे इस संबंध में कोई जवाब नहीं मिला है और इस बात को एक महीने से अधिक समय बीत गया है। वैकल्पिक रूप से वह तब भी शिकायत कर सकता है यदि उसे जवाब मिला है लेकिन वो उससे संतुष्‍ट नहीं है या उसके अभिवेदन को रद्द कर दिया गया है।
कोई शिकायत नहीं हो सकती यदि:
        i.            वरिष्‍ठ अधिकारी का जवाब मिले 12 महीने बीत गए हैं;
      ii.            वरिष्‍ठ अधिकारी को सौंपे गए अभिवेदन को 13 महीने बीत गए हों लेकिन कोई जवाब न मिला हो।
याद रखें कि लोकपाल शिकायत का संज्ञान नहीं लेगा यदि वे इस विषय से जुड़े हैं:
क. लोकपाल द्वारा पूर्व में किए गए मामले का निपटान
                     या
ख. आयकर प्रशासन या अदालत के समक्ष कोई अपील, संशोधन, रेफरेंस या रिट।
शिकायत मिलने पर लोकपाल इसे उस अधिकारी को भेज देगा जिसके खिलाफ शिकायत की गई है और उसे सुलह या बातचीत के ज़रिए समझौते के साथ निपटाने की कोशिश करेगा। यदि अधिकारी शिकायतकर्ता के साथ समझौते के जरिए शिकायत का निपटारा एक महीने के भीतर या लोकपाल द्वारा तय की गई समय-सीमा में नहीं करता तो लोकपाल इसमें मध्‍यस्‍थ बनेगा और किसी समझौते पर पहुंचने की कोशिश करेगा। अगर इसमें भी सफल नहीं हो पाता तो वे यह मामले पर फैसला दे सकता है।
शक्तियां

लोकपाल के पास निम्‍नलिखित अधिकार हैं-

1. वह दिशानिर्देश की धारा 9 में शामिल मामलों पर शिकायत प्राप्‍त कर सकते हैं।

2. वह इन शिकायतों पर विचार कर सकता है और सुलह एवं मध्‍यस्‍थता तथा उचित निर्णय से निपटा सकता है।

3. वह आयकर प्राधिकरण से कोई सूचना अथवा आवश्‍यक संबंधित दस्‍तावेजों की प्रमाणित प्रतियां प्राप्‍त कर सकता है।

4. यदि आयकर प्राधिकरण ऐसी कोई जानकारी या दस्‍तावेज (उपर इंगित अनुच्‍छेद तीन में) प्रस्‍तुत करने में चूक करता है, तब लोकपाल प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।

5. वह शिकायतों के निपटान के लिए सुधारात्‍मक उपायों का सुझाव कर सकता है।

6. वह सचिव, राजस्‍व विभाग और सीबीडीटी के अध्‍यक्ष को अपने जांच परिणामों का विवरण दे सकता है।

कर्तव्‍य

लोकपाल के कर्तव्‍य :

1. अधिक्षण शक्तियों का प्रयोग करना और अपने कार्यालय का संचालन करना।

2. स्वयं को प्राप्‍त होने वाले जानकारी को गोपनीय रखना तथा ऐसी जानकारी देने वाले व्‍यक्ति की सहमति को छोड़कर उन्‍हें तीसरे पक्ष को प्रकट नहीं करना। हालांकि यथोचित प्राकृतिक न्‍याय के सिद्धांत का अनुपालन करने के क्रम में ऐसी सूचना विपक्ष को दे सकता है।

3. करदाताओं के अधिकारों की रक्षा तथा उनके अनुपालन के बोझ को कम करना।

4. अनुपालन के बोझ को बढ़ाने वाले मामलों की पहचान करना तथा उन्‍हें सीबीडीटी और वित्‍त मंत्रालय के सामने लाना।

5. सीबीडीटी के अध्‍यक्ष और राजस्‍व विभाग के सचिव को दोषी कर्मचारियों के खिलाफ उचित कार्रवाई की सलाह देते हुए मासिक रिपोर्ट प्रस्‍तुत करना।

6. कर प्रशासन की वार्षिक रिपोर्ट सीबीडीटी के अध्‍यक्ष और राजस्‍व विभाग सचिव को देना।

7. उसके द्वारा वित्‍त वर्ष में दिये गये निर्णयों  की सूची बनाना तथा उनकी संबंधित मुख्‍य आयुक्‍तों और सीबीडीटी के अध्‍यक्ष को जानकारी देना ताकि संबंधित अधिकारियों की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट बनाने के समय उन्‍हें ध्‍यान में रखा जा सके। 

कार्यवाही का स्‍वरूप  

     लोकपाल के सामने कार्यवाही की प्रकृति अर्ध न्यायिक होता है। वह सबूतों के किसी भी कानूनी नियमों से बाध्‍य नहीं होता है। उससे उम्‍मीद की जाती है कि वह अपने कार्य के निष्‍पादन में हमेशा निष्‍पक्ष और विवेकपूर्ण हो।

निर्णय का स्‍वरूप  

     जैसा कि पहले संकेत दिया जा चुका है, वह सबसे पहले शिकायत का निपटारा समझौते के द्वारा करने की कोशिश करेगा। यदि इस तरह के समझौता का पालन एक महीने के अंदर या लोकपाल द्वारा दिये गये अधिक समय में निपटारा नहीं हो पाता है तब वह निर्णय ले सकता है। यह एक कथित आदेश होगा और संबंधित प्राधिकरण के लिए स्‍पष्‍ट रूप से निर्देश निर्दिष्‍ट करेगा, जिसमें माफी मांगना भी शामिल होगा। हालांकि एवार्ड आय की कुल राशि या निर्धारित कर या पहले से लगाये गये जुर्माने को प्रभावित नहीं कर सकती। शिकायत कर्ता के नुकसान के एवज में लोकपाल हजार रूपये तक का मुआवजा प्रदान कर सकता है। इस तरह का मुआवजा शिकायतकर्ता के खिलाफ आवंटित बजट पर चार्ज किया जाएगा। विभाग के लिए निर्णय बाध्‍य होगा, परंतु ये कर निर्धारिती के लिए सिर्फ तब बाध्‍य होगा, जब वह उसके प्राप्‍त होने के 15 दिन के भीतर स्‍वीकृति जारी करता है। यदि शिकायतकर्ता निर्णय स्‍वीकार नहीं करता है या 15 दिन के अंदर स्‍वीकृति पत्र देने में असमर्थ होता है, या लोकपाल द्वारा दी गई 15 दिन की अतिरिक्‍त अवधि समाप्‍त होने पर वह रद्द हो जाएगा और प्रभावी नहीं रहेगा। यदि वह निर्णय निर्धारिती द्वारा स्‍वीकार कर लिया जाता है तो जिस प्राधिकरण के खिलाफ शिकायत दर्ज की गई है उसको उसे एक महीने के भीतर लागू करना होगा। ऐसा होने का अनुपालन लोकपाल को सूचित करना होगा।

जांच सूची

    आपको शिकायत दर्ज करने में मदद देने के लिए एक जांच सूची बनाई गई है। ये नीचे दी गई है:-

1. शिकायतकर्ता द्वारा शिकायत पर हस्‍ताक्षर न किये गये हों।

2. अधिकृत प्रतिनिधि द्वारा इस पर हस्‍ताक्षर नहीं किये गये हो।

3. इसमें शामिल नहीं हैं:-

(क) शिकायतकर्ता का नाम और पता

(ख) सहायक दस्‍तावेज

(ग) प्रशासनिक शिकायत जाँच अधिकारी से मांगे गये कर छूट के विवरण

4. इलेक्‍ट्रोनिक तरीके से तैयार परंतु हार्ड कॉपी (मुद्रित अभिलेख) में शिकायतकर्ता के हस्‍ताक्षर न हों।

5. ऐसा प्रतीत न हो कि शिकायत अधिकारी से तत्‍काल वरिष्‍ठ अधिकारी को सूचना न दी गई है।

6. तत्‍काल वरिष्‍ठ अधिकारी के सामने अभिवेदन पारित किये हुए एक महीना न बीता हो

7. अपने वरिष्‍ठ अधिकारी से प्राप्‍त उत्‍तर पर शिकायतकर्ता असंतुष्‍ट प्रतीत नहीं होता हो।

8. (क) तत्‍काल वरिष्‍ठ अधिकारी से उत्‍तर प्राप्‍त होने के एक साल बीतने पर शिकायत दायर की गई हो।

                 अथवा

(ख) तत्‍काल वरिष्‍ठ अधिकारी से कोई उत्‍तर न मिला हो।

तत्‍काल वरिष्‍ठ अधिकारी के सामने दायर किये गये अभिवेदन के 13 महीने के बाद शिकायत दर्ज की गई है।

9. शिकायत लोकपाल द्वारा पहले की गई कार्यवाही का विषय है।  

10. इस शिकायत पर किसी अदालत या अपीलीय प्राधिकरण में अपील, संशोधन, संदर्भ  या रिट के रूप में भी कार्रवाई हो रही हो।

11. शिकायत का आधार आयकर लोकपाल दिशानिर्देश 2006 के दिशानिर्देश 9 में शामिल न हो।

12. शिकायतकर्ता का प्रतिनिधित्‍व अधिकृत प्रतिनिधि द्वारा किया गया हो। परंतु शिकायत दर्ज करने के लिए अटर्नी अधिकार लोकपाल के सामने दायर न किया गया हो।

     याद रखें की जांच सूची में हर वक्‍तव्‍य का उत्‍तर नकारात्‍मक होना चाहिए। क्रम संख्‍या एक से सात और 12 के सकारात्‍मक जवाब ये दर्शाते हैं कि, शिकायत दोषपूर्ण है और लोकपाल आपके शिकायत के निवारण के लिए आगे कार्यवाही नहीं कर सकता।

     वहीं क्रम संख्‍या आठ से 11 के लिए सकारात्‍मक प्रतिक्रिया ये दर्शाती है कि, शिकायत दोषपूर्ण होने के साथ-साथ निरुपाय है। ऐसी शिकायत दर्ज करने का कोई फायदा नहीं होगा।

     इस संस्‍था को प्रभावी बनाना हम सभी की वास्‍तविक जिम्‍मेदारी है। हम ऐसा ऊपर दी गई जांच सूची में शामिल दोषों को दूर करके और तुच्‍छ तथा बेकार शिकायतें दर्ज कराने से बचकर कर सकते हैं।
(PIB)
पसूका चंडीगढ़
मीणा/ई अहमद/प्रियंका/शोभा/सोनिका-91
पूरी सूची -07.05.2013 
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