Saturday, May 19, 2012

गौ हत्या पर एक रचना और

गौ माता की ह्त्या कब तक ???????
गौ को माता कह कर उसकी पूजा करने की संस्कृति के साथ साथ गौ की हत्या का निंदनीय सिलसिला भी जारी है। इस पर बहुत बार बहुत कुछ कहा जा चूका  है पर   समस्या लगातार गंभीर  होती जा  है।   एक बहुत ही पुराने मित्र और पत्रकार  विपन कथूरिया ने एक फोटो और रचना शायर/पोस्ट की है. पढिये यह रचना,देखिये यह तस्वीर.
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हाल ही में हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविधालय में गो-माँस
उत्सव का आयोजन हुआ!
मुझे ये जानकर बहुत दुःख हुआ कि इस आयोजन का विरोध
करने की किसी की भी हिम्मत नहीं हुई!
इस गम्भीर और आत्मसम्मान को ठेस... पहुचाने वाले मुद्दे पर भी-
जिस हिन्दू की भुजा न फडकी,
खून न खौला सीने का।
वो "हिन्दू का खून" नहीं,
अरे होगा किसी "कमीने" का!
मैं हैदराबाद के साथ ही सम्पूर्ण विश्व के हिन्दुओं से ये पूछना चाहताहूँ कि-
आखिर कब तक कायरों की भाँति जुल्म सहते रहोगे?
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प्रश्नो का उत्तर मिल जाए और सोये हुए हिन्दू शेर
पुनः जाग्रत हो जायें! वन्देमातरम्! —क्रप्या ईश picपर किसी भि धर्म
या जाति के लोगो को गालिया ना दे — पैज एडमिन :::
भगीरथ भाई मारवाङी

राष्‍ट्रीय ग्रामीण टेली-मेडिसन नेटवर्क

केन्‍द्रीय स्‍वास्‍थ्‍य और परिवार कल्‍याण मंत्री श्री गुलाम नबी आजाद ने आज लोकसभा में एक प्रश्‍न के लिखित उत्‍तर में बताया कि उनके मंत्रालय ने ई-स्‍वास्‍थ्‍य पहल के हिस्‍से के तौर पर राज्‍य सरकारों को 18.78 करोड़ रूपये दिये हैं ताकि वे ग्रामीण और गैर चिकित्‍सा-प्राप्‍त क्षेत्रों में संवद्धित प्राथमिक स्‍वास्‍थ्‍य सेवाएं उपलब्‍ध कराने के लिए राष्‍ट्रीय ग्रामीण टेली-मेडिसन नेटवर्क स्‍थापित कर सकें। इसके अलावा 1.43 करोड़ रूपये ओनकोनेट भारत परियोजना और 3.37 करोड़ रूपये टेली-नेत्र विज्ञान के लिए दिये गये हैं। उन्‍होंने कहा कि मंत्रालय ने समूचे देश में फैले सरकारी चिकित्‍सा कालेजों के नेटवर्क की योजना भी शुरू की है ताकि टेली-शिक्षा, प्रशिक्षण, सुदूर शिक्षण, सतत व्‍यावसायिक विकास और स्‍वास्‍थ्‍य देखरेख, शिक्षा और अनुसंधान संबंधी जानकारी के प्रसार के लिए मंच उपलब्‍ध कराया जा सके।

मंत्री महोदय ने अपने उत्‍तर में यह भी बताया है कि इलेक्‍ट्रानिक और सूचना प्रौद्योगिकी विभाग ने विभिन्‍न राज्‍यों में अनुसंधान और विकास तथा प्रौद्योगिकी प्रोत्‍साहन संबंधी अपनी गतिविधियों के हिस्‍से के रूप में टेली-मेडिसन समाधानों को प्रयोग के तौर पर शुरू करने की कई परियोजनाओं के लिए भी धन उपलब्‍ध कराया है। इनमें से कुछ को राज्‍य सरकारों ने अपना लिया है। उन्‍होंने कहा कि सरकार यह समझती है कि ई-स्‍वास्‍थ्‍य पहल, मौजूदा सार्वजनिक स्‍वास्‍थ्‍य प्रणालियों के अधीन उपलब्‍ध कराई जा रही स्‍वास्‍थ्‍य की देखरेख सेवाओं का विस्‍तार करने के लिए प्रयोग में लाई जा सकती हैं ताकि देश के दूर दराज के क्षेत्रों में गरीब नागरिकों को स्‍वास्‍थ्‍य सेवाएं उपलब्‍ध्‍ कराई जा सकें।

बाबा जयगुरुदेव का महाप्रयाण

लखनऊ: 116 वर्षीय बाबा जयगुरुदेव का शुक्रवार को निधन हो  गया। उनके  महाप्रयाण की खबर सुनते ही उनके अनुयायी बहुत बड़ी संख्या में मथुरा स्थित आश्रम में पहुंचना शुरू हो गए। बाबा के पार्थिव शरीर को भक्तों के दर्शन के लिए आश्रम में रखा गया। बाबा के अंतिम दर्शन करने वालों में प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव एवं समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव भी शामिल थे। गौरतलब है की बाबा के जीवनकाल में भी बड़े बड़े राजनीतिक नेता उनका आशीर्वाद पाने उनके चरणों में नतमस्तक होते रहे थे।जय गुरुदेव पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे बाबा ने शुक्रवार देर रात मथुरा स्थित अपने आश्रम में शरीर का त्याग कर दिया था। आठ मई से गुड़गांव स्थित मेदांता अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था। बाबा की इच्छा पर शुक्रवार दोपहर उन्हें मथुरा स्थित आश्रम पर लाया गया। बाबा के करीबियों का कहना है कि उनकी उम्र 116 साल थी।

कैरियर//कैसे बनें सफल पत्रकार//अनिल कुमार

पैनी दृष्टि, बेबाक नजरिया, भाषा पर पकड़ बनाएगी सफल पत्रकार
सभ्य और सुसंस्कृत समाज के लिए निष्पक्ष एवं निर्भीक पत्रकारिता  एक अपरिहार्यता समझी जाती है। इसलिए विश्व की किसी भी व्यवस्था पद्धति को अपनाने वाले राष्ट्र आज प्रेस के अस्तित्व और आजादी को बनाये रखने के पक्षधर हैं। पत्रकारिकता को लोकतंत्र का तीसरा स्तंभ माना जाता है।
परतों के तले दबी सच्चाई का अन्वेषण तथा उन्हें हूबहू समाज के समक्ष रखना  पत्रकारिता  का मूल धर्म होता है। किसी भी परिघटना को व्यक्तिजनित पूर्वाग्रह से रहित  होकर  वर्णित करना एक दुसाध्य कार्य है। इसके  लिए एक सजग, सचेत और निष्पक्ष दृष्टिï की आवश्यकता होती है। जिस तरह हर व्यक्ति कलाकार नहीं हो सकता उसी तरह हर व्यक्ति पत्रकार नहीं हो सकता। पत्रकारिता एक ऐसी विधा है जो गहरी निरीक्षण शक्ति के साथ अध्ययनशीलता और और कल्पनाशक्ति की मांग करती है।
आप भी चाहें तो पत्रकारिता जैसे कठिन, चुनौतीपूर्ण किन्तु अत्यंत प्रतिष्ठिïत पेशे को करिअर  के रूप में अपना सकते हैं। इसके लिए सर्वप्रथम आवश्यक है कि आप कम से कम स्नातक हों। देश-विदेश और आस-पास के घटनाक्रम पर एक बेबाक नजरिया और पैनी दृष्टिï रखते हों। भाषा पर आपकी अच्छी पकड़ हो तथा किसी घटना विशेष की तह में जाने तथा उन्हें विश्लेषित करने  की क्षमता आपमें विद्यमान हो। अगर इन गुणों को आप धारण करते हैं तो निश्चय ही एक संभावनाशील पत्रकार बन सकते हैं। अगर आपके पास उच्चतर शैक्षणिक योग्यता  अथवा पत्रकारिता में डिग्री अथवा डिप्लोमा है, तो यह आपकी अतिरिक्त योग्यता है। हालांकि अब बहुतेरे संचार माध्यम (खास तौर पर इलेक्ट्रानिक मीडिया) पत्रकारिता में डिग्री अथवा डिप्लोमा प्राप्त करने वाले अभ्यर्थियों को पत्रकार  के रूप में नियुक्ति में वरीयता देते हैं किंतु यह कोई सर्वमान्य नियम नहीं है। तथापि पत्रकारिता में अपेक्षित योग्यता किसी मान्यताप्राप्त संस्थान से प्राप्त कर लेना आपके लिए फायदेमंद सिद्ध होगा।
पत्रकारिता को करिअर बनाने वाले युवाओं में कुछ बुनियादी बातों का होना आवश्यक है। उन्हें चुस्त-दुरुस्त, समयबद्ध तथा हर समय क्रियाशील रहना चाहिए। पत्रकारों में प्रगाढ़ आत्मविश्वास का होना आवश्यक माना जाता है। पत्रकारों में समाचार को तथ्यात्मक रूप से प्रस्तुत करने के साथ ही आकर्षक बनाकर उसे पाठकों के समक्ष सुरुचिपूर्ण तरीके से प्रस्तुत करने के भी गुण मौजूद होने चाहिए। पत्रकारों में समाचारों की गहराई में जाकर पैठने, उन्हें विश्लेषित करने, आकर्षक शीर्षक का चयन करने, उपलब्ध स्थान के अनुसार सारपूर्ण अधिकतम सामग्री को समायोजित करने जैसी मूलभूत बातों की समझ भी होनी चाहिए।
आज भारी संख्या में विभिन्न भाषा-भाषी पत्र-पत्रिकाओं में पत्रकारों की नियुक्ति बेहतर सेवा शर्तों के अधीन की जा रही है। दूरदर्शन, रेडियो, इलेक्ट्रोनिक मीडिया के अन्य निजी चैनल विज्ञापन तथा प्रचार-प्रसार विभाग, प्रकाशन विभाग, फिल्म प्रभाग, सूचना तथा प्रसारण मंत्रालय तथा सार्वजनिक व निजी उपक्रम प्रतिष्ठïानों में भी पत्रकारिता अथवा जनसंपर्क में अपेक्षित योग्यता हासिल करने वाले अभ्यर्थियों की नियुक्ति की जाती है। केंद्र सरकार सूचना सेवा के राजपत्रित श्रेणी के पदों की नियुक्ति संघ लोक सेवा आयोग के माध्यम से करती है। राज्य सूचना सेवा के अन्तर्गत आने वाले इस श्रेणी के पदों पर नियुक्तियां प्रांतीय लोक सेवा आयोग के मार्फत की जाती हैं।
पत्रकार तथा समकक्ष पदों पर की जाने वाली प्राय: सभी नियुक्तियों, चाहे वे सार्वजनिक क्षेत्र की हों अथवा निजी क्षेत्र की, समाचारपत्रों के माध्यम से आवेदन-पत्र आमंत्रित कर लिखित परीक्षा अथवा साक्षात्कार के उपरान्त ही भरी जाती हैं।
हालांकि पत्रकारिता करने के लिए अथवा एक सफल फ्री लांसर (स्वतंत्र पत्रकार) बनने के लिए किसी डिग्री की आवश्यकता नहीं है, इसके बिना भी आप अपनी प्रतिभा के बल पर स्वतंत्र पत्रकार बन सकते हैं। समाचार  पत्र-पत्रिकाओं के अनुकूल रचनाएं लिखकर अथवा खबरों का संकलन-प्रेषण कर आमदनी का जरिया बढ़ा सकते हैं। ऐसे कई लेखक-पत्रकार हैं जो स्वतंत्र रूप से लेखन-पत्रकारिता कर अपना जीवनयापन कर रहे हैं। चूंकि आज विशिष्टïता का जमाना है, अतएव लेखकों-पत्रकारों के लिए यह अच्छा होगा कि वे अपनी रुचि, रुझान एवं विषय विशेष में विशेषज्ञता के आधार पर अपने कार्य क्षेत्र का चुनाव करें।
प्राय: पत्रकारिता के क्षेत्र में डिग्री अथवा डिप्लोमा के पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता स्नातक उत्तीर्ण ही निर्धारित रहती है। किसी संस्थान में स्नातक अथवा स्नातकोत्तर परीक्षा में प्राप्त अंकों के आधार पर प्रवेश दिया जाता है तो किसी-किसी संस्थान में प्रवेश परीक्षा तथा साक्षात्कार के माध्यम से प्रवेशार्थियों का चयन किया जाता है। पत्रकारिता की पढ़ाई प्राय: सभी विश्वविद्यालयों में होती है।
पत्रकारिता की शिक्षा निम्रलिखित संस्थानों से भी प्राप्त की जा सकती है :
० इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मॉस कम्युनिकेशन्स
अरुणा आसफ अली मार्ग,
जेएनयू कैम्पस,
नयी दिल्ली-110067
० माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय
ई-8/76, एरिया कालोनी,
भोपाल-462016
पत्रकारिता संस्थान; पंजाब विश्वविद्यालय
चंडीगढ़-160019
*बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय
वाराणसी
*उस्मानिया विश्वविद्यालय
हैदराबाद
*अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय
अलीगढ़
*इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ जर्नलिज्म एंड न्यूज मीडिया 
एचआरबीआर एक्सटेंशन
कल्याणनगर,बंगलौर-560043.

पुलिस अत्याचारों के विरुद्ध

 6 विपक्षी दलों ने बनाई संघर्ष कमेटी
बठिंडा , 18 मई (निस)। पुलिस द्वारा बिना कारण लोगों पर अत्याचार करने के विरोध में 6 विपक्षी दलों ने संयुक्त संघर्ष कमेटी कायम की है। इसमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जिला सचिव बठिंडा जगजीत सिंह जोगा को संयोजक बनाया गया है। संघर्ष कमेटी में भाकपा के अतिरिक्त पीपीपी , सीपीएम , कांग्रेस , अकाली दल पंच प्रधानी व बसपा के दो-दो प्रतिनिधि शामिल किये गये हैं। संयुक्त संघर्ष कमेटी द्वारा आज जिलाधीश को मांग पत्र दिया गया ।
इसमें पीडि़त परिवारों के सदस्य भी शामिल हुयेे। संघर्ष कमेटी ने प्रशासन को न्याय दिलवाने के लिये एक सप्ताह का समय दिया गया है। कमेटी सदस्यों ने चेतावनी दी है कि अगर उन्हें न्याय नहीं मिला तो उसके बाद थाना सदर रामपुरा फूल व थाना रामां का घेराव किया जायेगा। उन्होंने मांग की कि थाना सदर रामपुरा में अमनप्रीत कौर व उसके परिवार के सदस्यों के विरुद्ध दर्ज हत्या का मामला रद्द किया जाये , उसके परिवार के सदस्यों की जमीन, घर, ट्रेक्टर तथा कृषि औजारों पर विरोधियों का कब्जा हटाकर उन्हें वापस दिलवाया जाये , बलविंदर कौर पर अमानवीय अत्याचार करने वाले पुलिस अधिकारियों व कर्मचारियों पर केस दर्ज कर उन्हें मुअत्तल किया जाये, उस पर किये अत्याचारों के कारण शरीर के अंगों को पहुंचे नुक्सान का मुआवजा दिया जाये।    कल इस सम्बंध में भाकपा के जिला कार्यालय बठिंडा में पीपीपी नेता सुखदेव सिंह चहल की अध्यक्षता में बैठक हुई थी  जिसमें भाकपा की तरफ से जगजीत सिंह जोगा, सुरजीत ङ्क्षसह सोही, काका सिंह, हरबंस ङ्क्षसंह, जसवीर कौर , पीपीपी की तरफ से जिला अध्यक्ष सुखदेव ङ्क्षसंह चहल के अतिरिक्त जसपाल सिंह , दर्शन सिंह कोटशमीर, कांग्रेस की तरफ से बूटा सिंह, भूपिन्द्र सिंह गोरा , गुलजार सिंह बालियांवाली, बसपा के महिन्द्र सिंह भट्टी, रणधीर ङ्क्षसंह धीरा , नछतर सिंह, सीपीएम के गुरचरण सिंह चौहान, अकालीदल पंच प्रधानी के माता मलकीत कौर शामिल हुये।
जगजीत सिंह जोगा ने कहाकि संघर्ष कमेटी थाना सदर पुलिस रामुपरा द्वारा एमबीए की छात्रा अमनप्रीत कौर, उसके वृद्ध माता-पिता व पारिवारिक मित्र पर राजनैतिक दबाव अधीन धारा 302 के तहत मामला खारिज करवाने तथा थाना रामां पुलिस द्वारा एक दलित गरीब बेसहारा महिला बलविंदर कौर पर अमानवीय अत्याचार करने के विरोध में इस कमेटी का गठन किया है। (दैनिक ट्रिब्यून से साभार)

Thursday, May 17, 2012

खादी के लिए सब्सिडी

सूक्ष्‍म, लघु और मध्‍यम उद्यम मंत्रालय में सरकार खादी और ग्रामोद्योग  आयोग(केवीआईसी) के माध्‍यम से खादी संस्‍थनों को रियायती कार्यशील पूंजी ऋण उपलब्‍ध कराने के लिए ब्‍याज सब्सिडी पात्रता प्रमाणपत्र(आईएसईसी) की योजना कार्यान्वित कर रही है। आईएसईसी के तहत खादी संस्‍थानों को 4 प्रतिशत ब्‍याज पर ऋण उपलब्‍ध कराया जाता है और बैंक द्वारा प्रभारित वास्‍तविक ब्‍याज दर और 4 प्रतिशत के बीच का अंतर सब्सिडी के रूप में दिया जाता है(और केवीआईसी द्वारा सीधे वित्‍तपोषी बैंक को इसकी पूर्ति की जाती है)।

आरंभ में आईएसईसी के तहत लाभ खादी और ग्रामोद्योग (वीआई) गतिविधियों के लिए उपलब्‍ध थे। 1995-96 में पूर्वीवर्ती ग्रामीण रोजगार सृजन कार्यक्रम(आरईजीपी) के आंरभ होने के साथ मार्जिन मनी सब्सिडी नई ग्रामोद्योग इकाइयों को उपलब्‍ध कराई गर्इ। तब आईएसईसी के तहत लाभ खादी संस्‍थनों को केवल खादी और पोलीवस्‍त्र गतिविधियों के लिए सीमित कर दिए गए और वीआई इकाइयों के लिए लाभ 1995-96 के स्‍तर पर रोक दिए गए और 2011-12 के बाद ये समाप्‍त कर दिए जाने थे। प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम(पीएमईजीपी) के तहत नई वीआई इकाइयों के लिए मार्जिन मनी सब्सिडी अभी भी दी जा रही है। (PIB)
17-मई-2012 20:06 IST
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Tuesday, May 15, 2012

राज्‍य अपने सहकारी अधिनियमों को संशोधित करें: श्री पवार

कृषि और खाद्य प्रसंस्‍करण उद्योग मंत्री श्री शरद पवार ने राज्‍यों का आह्वान किया है कि वह 97वें सं‍विधान (संशोधन) अधिनियम के अनुपालन को सुनिश्चित करते हुए अपने सह‍कारी अधिनियमों में संशोधन करें। श्री पवार सहकारी समितियों के राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन को आज सहां संबोधित कर रहे थे। उन्‍होंने कहा कि देश में सहकारी समितियों के जनतंत्रीय, स्‍वायत्‍ता और व्‍यावसायिक कार्य प्रणाली सुनिश्चित करने हेतु केंद्र सरकार ने इस संवधिान (संशोधन) अधिनियम को लागू किया है । उन्‍होंने कहा कि केंद्र ने सहकारी आंदोलन के विकास के लिए मज़बूत बुनियाद रखने हेतु अनेक प्रयास किए हैं।

श्री पवार ने राज्‍य सरकारों से ज़ोर देकर कहा कि वे अल्‍पकालिक सहकारी ऋण ढांचे के पुनर्निमाण के पैकेज के कार्यान्‍वयन को तेज़ी देने के लिए कार्य करें। जब तक कि किसानों को बैंको के साथ –साथ बैंक सह‍कारी समितियों द्वारा आवश्‍यक ऋण सहायता नहीं मिलेगी तब तक उचित परणिाम नहीं निकल कर आएंगे।

सहकारिता क्षेत्र में लोगों के विश्‍वास का भरोसा फिर से जीतने की आवश्‍यकता पर श्री पवार ने कहा कि चूंकि अनेक सहकारी समितियां गंभीर समस्‍याओं का सामना कर रही हैं इसलिए इस मामले में सुशासन का मुद्दा काफी महत्‍व रखता है।। उन्‍होंने कहा कि कानूनी और नीति सुधारों के जरिए सहकारिता प्रशासन के ढांचे को नया रूप देने की बेहद ज़रूरत है।

श्री पवार ने कहा कि सहकारिताओं ने वर्ष 2011-12 के दौरान करीब 25 करोड़ टन का रिकॉर्ड खाद्यान्‍न उत्‍पादन करके महत्‍वपूर्ण योगदान दिया है। उन्‍होंने कहा कि सहकारिता प्रणाली सबसे मजबूत स्‍तभों में से एक है जिसमें भारत का कृषि और उससे जुड़े क्षेत्र फल-फूल रहे हैं।

पूर्व राष्‍ट्रपति ए पी जे अब्‍दुल कलाम ने अपने भाषण में सहकारी समितियों की उपलब्धियों खासतौर से उर्वरक वितरण, चीनी उत्‍पादन, डेयरी, सहकार समितियां , आवासीय सहकारी समितियों, कृषि ऋण आदि की चर्चा की। उन्‍होंने राष्‍ट्र के विकास और समुदाय को मजबूत बनाने में सहकारी समितियों की सराहना की। साथ ही उन्होंने कहा कि देश में सहकारी समितियों को प्रोत्‍साहित करने की जरूरत है। उन्‍होंने ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ सहकारी ढांचों की संभावनाओं का सुझाव दिया था कि ताकि खाद्यान्‍न, दालों, सब्जियों, फलों और फूलों का उत्‍पादन बढ़ाया जा सके और किसानों की आमदनी बढ़ सके।

कृषि राज्‍य मंत्री श्री हरीश रावत और कृषि विभाग में सचिव श्री पी. के. बसु ने भी सम्‍मेलन को संबोधित किया। (पीआईबी)

बहुत ही उत्साह से देखा गया रेड रिबन एक्सप्रेस को

रेड रिबन एक्सप्रेस जब 15 मई 2012 को तमिलनाडू के ज़िला करूर में पहुंची तो वहां इसे बहुत ही उत्साह से देखा गया।  इस मौके पर जिला कुलेक्टर सुश्री वी शोभना ने भी इस रेलगाड़ी में लगी प्रदर्शनी को विशेष तौर पर देखने के लिए \वक्त  निकला।.(पीआईबी फोटो)   15-May-2012

रेड रिबन एक्सप्रेस क्रूर रेलवे स्टेशन पर

सावधान रह कर स्वस्थ जीवन जीने के गुर समझती रेड रिबन एक्सप्रेस रेलगाड़ी जब 15 मई 2012 को तमिलनाडू के क्रूर रेलवे स्टेशन पर पहुची तो वहां इसे देखने वालों की भीड़ उमड़ पड़ी। स्कूली छात्रछात्रायों ने भी इसे उत्सुकता और उत्साह से देखाइस रेलगाड़ी में लगी प्रदर्शनी का उद्घाटन क्रूर की जिला 
कुलेक्टर वी. शोभना ने किया। इस अवसर पर कई अन्य प्रमुख  व्यक्ति भी मौजूद थे।  पत्र सूचना कार्यालय के कैमरामैन ने इन पलों को अपने कैमरे मैं संजो लिया। (पीआईबी फोटो)

रेड रिबन एक्सप्रेस

रेड रिबन एक्सप्रेस जब 15 मई 2012 को  तमिलनाडू के जिला क्रूर स्टेशन पर पहुंची तो वहां इसका स्वागत  बहुत ही गर्म जोशी से किया गया। क्रूर की जिला कुलेक्टर सुश्री वी शोभना ने इसका उद्घाटन किया। पीआईबी के कैमरामैन ने इन पलों को अपने कैमरे में संजो लिया और अब वे पल फिर इस तस्वीर के ज़रिये 
आपके सामने एक बार फिर जीवंत हो उठे हैं।     . (PIB photo)   

Monday, May 14, 2012

राज्य सभा में बताया सुश्री अम्बिका सोनी ने

देश भर में कुल 275 प्रसारण केन्‍द्र कार्यशील
सूचना और प्रसारण मंत्री श्रीमती अम्बिका सोनी ने आज राज्‍य सभा में एक प्रश्‍न के लिखित उत्‍तर में बताया कि प्रसार भारती ने सूचित किया है कि दिनांक 31 मार्च 2012 तक की स्थिति के अनुसार 67 दूरदर्शन केन्‍द्र (स्‍टूडियो केन्‍द्र) और विभिन्‍न क्षमता के 1415 टीवी ट्रांस्‍मीटर कार्यशील थे। इनमें से, 22 स्‍टूडियो केन्‍द्र और 529 टीवी ट्रांस्‍मीटर जनजातीय क्षेत्रों में अवस्थित हैं। जहां तक आकाशवाणी का संबंध है, दिनांक 31 मार्च, 2012 तक की स्थिति के अनुसार देश भर में कुल 275 प्रसारण केन्‍द्र कार्यशील हैं। इनमें से, आकाशवाणी के 71 प्रसारण केन्‍द्र जनजातीय जिलों के क्षेत्रों में अवस्थित हैं।

मंत्री महोदया ने सदन को यह भी जानकारी दी कि सामान्‍यतया दूरदर्शन केन्‍द्रों, टीवी ट्रांस्‍मीटरों और आकाशवाणी केंन्‍द्रों का कामकाज संतोषजनक है। तथापि, दूरदर्शन नेटवर्क में स्‍टॉफ का भीषण अभाव है और अनेक वर्षों से नई परियोजनाओं की देख-रेख करने के लिए स्‍टॉफ संस्‍वीकृत या भर्ती नहीं किया गया है। पर्याप्‍त स्‍टॉफ की अनुपलब्‍धता के कारण जनजातीय क्षेत्रों के 21 ट्रांस्‍मीटरों सहित 46 अल्‍पशक्ति ट्रांस्‍मीटर आंशिक ट्रांसमिशन का रिले कर रहे हैं और जनजातीय क्षेत्रों के 7 केन्‍द्रों सहित 23 स्‍टूडियो केन्‍द्रों के कार्यकलाप सीमित हैं।

जहां तक आकाशवाणी का संबंध है, जनजातीय जिलों में कार्यशील 71 केन्‍द्रों में से 18 केन्‍द्र जनशक्ति के अभाव के कारण अधिकतम कार्य-निष्‍पादन से कम पर कार्यशील हैं। इसके अतिरिक्‍त, इन 18 केन्‍द्रों में से 11 केन्‍द्रों पर बहुत पुराने ट्रांस्‍मीटर लगे हुए हैं और समय बीतने के साथ उनकी दक्षता में कमी आयी है। (पीआईबी)
14-मई-2012 15:13 IST

पंचायतों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व

पंचायती राज मंत्रालय में राज्य मंत्री श्री वी किशोर चन्द्र देव ने आज लोक सभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में बताया कि पंचायती राज मंत्रालय(एमओपीआर) उपलब्ध सूचनानुसार, पंचायती राज संस्थाओं (पीआरआई'ज) में निर्वाचित महिला प्रतिनिधित्व (ईडब्लयूआर'ज) की भागीदारी की प्रतिशतता में प्रगामी व्यापक वृद्धि रही है। वर्ष 2000, 2008 और 2010 में विभिन्न राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों में निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों की प्रतिशतता बढ़ती जा रही है।मंत्री महोदय ने सदन में यह भी बताया कि पंचायती राय मंत्रालय द्वारा ए.सी.नेल्सन ओआरजी मार्ग के माध्यम से पंचायती राज संस्थाओं में निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों पर एक राष्ट्रव्यापी अध्ययन करवाया गया और अप्रैल 2008 में प्रकाशित किया गया। इस अध्यन रिपोर्ट से निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों की सकारात्मक प्रतिनिधित्व एवं अधिकारिता का संकेत प्राप्त हुआ, जिसमें अन्य बातों के साथ-साथ उनके आत्म सम्मान, आत्मविश्वास और निर्णय लेने की क्षमता में बढ़ोतरी, उनकी संबंधित विभागों और समानांतर निकायों के साथ मेलजोल बढ़ाना, उनके विरूद्ध ज़ेंडर आधारित भेदभाव में कमी आना, उनके द्वारा किए गए कार्यों के लिए समुदाय और उनके समकक्षों से पहचान, ग्राम सभा बैठकों के दौरान मामले उठाने के लिए उनके द्वारा स्वतंत्र महसूस करना, अपने परिवारों में आर्थिक मामलों व अन्य मामलों के संबंध में निर्णय लेने में उनकी बातें अधिक मुखर होना शामिल है। (पीआईबी)

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ई-न्यायालय व्यवस्था की दिशा में बढ़ते कदम

वि‍शेष लेख                                                                                                  --अनूप भटनागर*
               विभिन्न अदालतों में लंबित मुकदमों की बढती संख्या से प्रभावकारी ढंग से निपटने, वादियों उनके अदालती मामलों से जुड़ी आवश्‍यक सूचनाएं तत्परता से उपलब्ध कराने, न्यायाधीशों को कानूनी बिन्दुओं से जुडी न्यायिक-व्यवस्थाएं और आंकड़े सहजता से उपलब्ध कराने तथा समूची न्याय-प्रणाली को गति प्रदान करने के लिए न्यायालयों के कम्प्यूटरीकरण की दिशा में दो दशक पूर्व प्रयास शुरू किए गए थे। न्यायालयों के कम्प्यूटरीकरण का ही नतीजा है कि आज उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के साथ ही कई जिला अदालतों में ई-न्यायालय व्यवस्था भी सफलतापूर्वक काम कर रही है। देश के दूर-दराज इलाकों में रहने वाले लोग अपने किसी भी मुकदमे की प्रगति और स्थिति के बारे में सिर्फ अदालत की वेबसाइट पर एक क्लिक करके ही अपेक्षित जानकारी घर बैठे प्राप्त कर पा रहे हैं।

           ई-न्यायालय के महत्व को महसूस करते हुए जुलाई 2004 में तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश ने न्यायपालिका के कम्प्यूटरीकरण के लिए देशव्यापी नीति तैयार करने के लिए ई-कमेटी के गठन के बारे में केन्द्र सरकार को पत्र लिखा था। केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने दिसंबर 2004 में इस पत्र पर कार्यवाही करते हुए देश के प्रधान न्यायाधीश के महत्वाकांक्षी और न्यायिक व्यवस्था में सुधार के इस दीर्घकालीन प्रस्ताव को मंजूरी दी। विधि एवं न्याय मंत्रालय ने इसके बाद कर्नाटक उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश डॉ. जी. सी. भरूका की अध्यक्षता में ई-कमेटी के गठन की अधिसूचना जारी कर दी थी। केन्द्र सरकार की इस अधिसूचना के साथ ही ई-न्यायालय व्यवस्था की दिशा में काम शुरू हो गया।

           न्यायमूर्ति भरूका की अध्यक्षता वाली ई-कमेटी ने मई, 2005 में भारतीय न्यायपालिका में सूचना और संचार प्रोद्योगिकी लागू करने की योजना के बारे में अपनी रिपोर्ट प्रधान न्यायाधीश को सौंपी जिसमें न्यायपालिका में सूचना और संचार प्रौद्योगिकी लागू करने के प्रारूप को रेखांकित किया गया था। ई-कमेटी की इस रिपोर्ट के आधार पर ही न्यायपालिका में कम्प्यूटरीकरण और सूचना प्रौद्योगिकी लागू करने की देशव्‍यापी योजना तैयार हुई।

           रिपोर्ट में न्यायिक पोर्टल और ई-मेल सेवा, सहजता से इस्तेमाल होने वाले सॉफ्टवेयर उपकरण, न्यायाधीशों और अदालत के प्रशासनिक कर्मचारियों के लिए प्रशिक्षण, सूचना प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल के दौरान आने वाली समस्याओं से निपटने के लिए अदालत परिसर में प्रशिक्षित स्टाफ की उपस्थिति के लिए एक अलग काडर बनाने, उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय परिसरों में मौजूद संरचना को अपग्रेड करने, समूचे रिकॉर्ड  के लिए डिजिटल संग्रह तैयार करने और तमाम लॉ-पुस्तकालयों को कम्प्यूटर-नेटवर्क से जोड़ने जैसे कार्यों को अमली जामा पहनाने की प्रक्रिया शुरू की गई।

           देश की न्यायपालिका के कम्प्यूटरीकरण की दिशा में 1990 से ही प्रयास हो रहे थे। सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों को कम्प्यूटर प्रणाली से परस्पर जोड़ा जा रहा था। लेकिन इन प्रयासों ने 2001 से गति पकड़ी। 2001-03 के दौरान चार महानगरों दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई में सात सौ अदालतों का कम्प्यूटरीकरण किया गया। इसके बाद 2003-04 में राज्यों की राजधानियों और केन्द्र शासित प्रदेशों के 29 शहरों की नौ सौ अदालतों के कम्प्यूटरीकण का कार्य शुरू हुआ।

           न्यायपालिका के कम्प्यूटरीकरण के संतोषजनक नतीजे सामने आने पर मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति ने फरवरी 2007 में अदालतों में लंबित मुकदमों के निपटारे को गति प्रदान करने, मुकदमे के वादियों को सूचना उपलब्ध कराने में पारदर्शिता सुनिश्चित करने और न्यायाधीशों को न्यायिक प्रक्रिया से जुडे आंकडे़ तथा जानकारियां सहजता से उपलब्ध कराने के इरादे से 441.08 करोड़ रूपए की ई-न्यायालय मिशन मोड  परियोजना को मंजूरी दी।

           ई-न्यायालय मिशन मोड परियोजना के अंतर्गत जिला और अधीनस्थ अदालतों का कम्प्यूटरीकरण और उच्चतर न्यायालयों में सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी की आधारीय संरचना को अधिक सुदृढ बनाना था। सरकार ने सितंबर 2010 में इस परियोजना के लिए निर्धारित रकम में संशोधन करके इसे 935 करोड़ रूपए कर दिया था। इस वृद्धि का मकसद  न्यायालय परिसरों और न्यायालयों की संख्या में वृद्धि करना, उत्पादों और सेवाओं की दरों में वृद्धि करना और क्षेत्राधिकार में वृद्धि तथा नई मदों को इसमें शामिल करना था। इसके बाद ई-न्यायालय परियोजना के दायरे में न्यायालय परिसरों की संख्या 2,100 से बढकर 3,069 अर्थात ऐसी अदालतों की संख्या 13,000 से बढकर 14,249 हो गई।

           इस परियोजना के अंतर्गत देश के पहले कागजरहित ई-न्यायालय ने फरवरी 2010 में दिल्ली के कड़कड़डूमा अदालत परिसर में काम करना शुरू किया था। ई-न्यायालय में न्यायाधीश के समक्ष मुकदमों की मोटी फाइलें नहीं बल्कि लैपटॉप होता है।

           सरकार के इन महती प्रयासों के नतीजे अब सामने आने लगे हैं। इस समय उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में ही नहीं बल्कि निचली अदालतों में भी कम्प्यूटरीकरण और सूचना प्रौद्योगिकी लागू करने की महत्वाकांक्षी देशव्‍यापी योजना बेहद असरदार ढंग से काम कर रही है।

           इस परियोजना के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय और देश के 20 उच्च न्यायालयों में कम्प्यूटर्स, प्रिंटर्स, स्कैनर्स, सर्वर, नेटवर्किग उपकरण और नेटवर्क केबलिंग और व्यवधान रहित बिजली आपूर्ति जैसे उपाय करके सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी पर आधारित संरचरना को अपग्रेड किया जा चुका है। इस काम पर अब तक 41.47 करोड रूपए खर्च किये जा चुके हैं। यही नहीं, अब जम्मू कश्‍मीर, गुवाहाटी, राजस्थान और कलकत्ता उच्च न्यायालयों में वीडियो कांफ्रेसिंग सुविधा भी उपलब्ध कराई गई है।

           केन्द्र सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल और न्यायपालिका में प्रशासनिक सुधारों पर निगाह रखने के लिए बनी ई-कमेटी की कमान देश के प्रधान न्यायाधीश के हाथ में सौंपी है। इस समिति में न्यायिक अधिकारियों और सूचना प्रौद्योगिकी के विशेषज्ञों के अलावा अटॉर्नी जनरल और कुछ वरिष्ठ अधिवक्ताओं को भी शामिल किया गया है।

           सरकार ने भारतीय न्यायपालिका में प्रौद्योगिकी की देशव्यापी नीति पर ई-कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर तैयार ई-न्यायालय परियोजना को पांच साल में लागू करने के लिए इसे तीन चरणों में बांटा था। पहले चरण में 854 करोड़ रूपए खर्च करके सभी 2,500 अदालत परिसरों में कम्प्यूटर कक्ष और न्यायिक सेवा केन्द्रों की स्थापना हुई। करीब 15,000 न्यायिक अधिकारियों को लैपटॉप उपलब्ध कराने और तालुका स्तर से लेकर उच्चतम न्यायालय तक सभी अदालतों को डिजिटल इंटरकनेक्टीविटी से जोड़ने और उच्चतम न्यायालय तथा सभी उच्च न्यायालयों में ई-फाइलिंग सुविधा शुरू करने का लक्ष्य रखा गया था। दूसरे चरण में फाइलिंग की प्रक्रिया से लेकर इसके कार्यान्वयन स्तर तक की सारी न्यायिक प्रक्रिया के साथ ही प्रशासनिक गतिविधियों को सूचना और संचार प्रौद्योगिकी के दायरे में लाने तथा तीसरे चरण में अदालतों और सार्वजनिक प्रतिष्ठानों तथा विभागों के बीच सूचना के सहज प्रवाह को सुनिश्चित बनाने का लक्ष्य रखा गया था।

           इस परियोजना के कार्यान्वयन से जहां न्यायिक प्रक्रियाओं को गति प्रदान करने,  मामलों के तेजी से निपटान को सुविधाजनक बनाने मे मदद मिल रही है वहीं मुकदमों की स्थिति, वादियों को मामले पर हुए निर्णय के बारे मे बार के सदस्यों तथा व्यक्तियों को पारदर्शी तरीके से सूचना मिलना संभव हो सका है।

           ई-न्यायालय सेवा के जरिए न्यायालय में मुकदमों के प्रबंधन की प्रक्रिया को आटोमेशन मोड में डाला गया। इस सेवा के दायरे में मुकदमों को फाइल करना, मामलों की जांच पडताल, मामलों का पंजीकरण, मामले का आबंटन, अदालत की कार्यवाही, मामले से संबंधित विस्तृत विवरण, मुकदमे का निष्पादन और स्थानांतरण जैसी जानकारी मुहैया कराई जा रही है। इसी तरह ई-न्यायालय सेवा के तहत न्यायिक आदेश और फैसलों की प्रमाणित प्रति, कोर्ट फीस और इससे जुड़ी दूसरी जानकारियां ऑनलाइन प्राप्त की जा सकती है।

           देश के दूरदराज इलाके में रहने वाले व्यक्ति कही से और कि‍सी भी समय वेब साइट क्लिक करके किसी भी मुकदमे की जानकारी प्राप्त करने में सक्षम हैं। इस परियोजना के तहत पहले उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में और इसके बाद जिला एवं अधीनस्थ अदालतों में ई-फाइलिंग सुविधाजनक होती जा रही है।

           ई-न्यायालय परियोजना के अंतर्गत एक फरवरी 2012 की स्थिति के अनुसार 9,389 अदालतों का कम्प्यूटरीकरण हो चुका है। कुछ अदालतों में मामला दर्ज करने, पंजीकरण, मुकदमों की सूची तैयार करने जैसी सेवाएं भी शुरू हो गई हैं। ई-न्यायालय परियोजना के कार्यान्वयन के लिए एन.आई.सी. को 487.84 करोड़ रूपए उपलब्ध कराए गए हैं।

           न्यायालयों में उच्च गुणवत्ता वाले कम्प्यूटर, प्रिंटर्स, स्कैनर्स, सर्वर, नेटवर्किग उपकरण और नेटवर्क केबलिंग और व्यवधान रहित बिजली आपूर्ति जैसे उपाय करके सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी पर आधारित संरचना को सुदृढ बनाने के सतत् प्रयास चल रहे हैं। इस काम पर  उच्चतम न्यायालय में तीन करोड़ से अधिक रकम खर्च की जा चुकी है जबकि उच्च न्यायालयों में बंबई  उच्च न्यायालय में सबसे अधिक सात करोड़ 53 लाख और सबसे कम एक लाख रूपए पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में खर्च हुए हैं।

           ई-न्यायालय प्रक्रिया का उपयोग करने से पहले इसकी प्रक्रिया को भी समझना जरूरी है। उच्चतम न्यायालय में सिर्फ एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड और व्यक्तिगत रूप से याचिका दायर करने वाले ही ई-फाइलिंग सुविधा का उपयोग कर सकते हैं। इस सुविधा के इस्तेमाल के इच्छुक व्यक्ति या एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड को अपना पता, संपर्क के लिए विवरण तथा ई-मेल का पता देना अनिवार्य है। इस प्रक्रिया को पूरा करने पर ही एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड को लॉग- इन आईडी और व्यक्तिगत रूप से याचिका दायर करने वाले को साइन अप प्रक्रिया से लॉग इन आईडी मिलती है। इस प्रक्रिया के तहत दी जाने वाली कोर्ट फीस का भुगतान सिर्फ क्रेडिट कार्ड से किया जा सकता है। यही प्रक्रिया उच्च न्यायालयों और निचली अदालतें में ई-फाइलिंग के लिए अपनानी होगी।   ***  (पीआईबी)

* स्‍वतंत्र पत्रकार
11-मई-2012 14:22 IST