Saturday, February 25, 2012

पत्रकारि‍ता में उत्‍कृष्‍ट योगदान

अंबि‍का सोनी ने प्रदान कि‍ए तरूण तेजपाल और कुमारी गुंजन शर्मा को पुरस्‍कार
सूचना तथा प्रसारण मंत्री श्रीमति‍अंबि‍का सोनी ने आज पत्रकारि‍ता में उत्‍कृष्‍ट योगदान के लि‍ए पुरस्‍कार प्रदान कि‍ए। यह पुरस्‍कार खोजी पत्रकारि‍ता के लि‍ए तहलका के श्री तरूण तेजपाल और अंग्रेजी पत्रि‍का 'द वीक' की कुमारी गुंजन शर्मा को प्रदान कि‍ए गए।

इस अवसर पर अपने भाषण में श्रीमति‍सोनी ने कहा कि‍वैसे तो वि‍षय नि‍यमन पर लंबे समय से चर्चा की जाती रही है, लेकि‍न इस प्रक्रि‍या की वि‍श्‍वसनीयता और स्‍वीकार्यता की स्‍थापना के लि‍ए उचि‍त समय दि‍या जाना आवश्‍यक है। इस प्रकार के सम्‍मान के संदर्भ में अपने वि‍चार प्रकट करते हुए श्रीमति‍सोनी ने समाचार माध्‍यमों द्वारा समाचारों के प्रकाशन और प्रसारण के तरीकों पर मीडि‍या और सार्वजनि‍क क्षेत्रों में जारी चर्चा की ओर ध्‍यान आकर्षि‍त करते हुए कहा कि‍मीडि‍या द्वारा वि‍भि‍न्‍न आयोजनों के प्रकाशन तथा प्रसारण के तरीकों पर भी चर्चा की जानी चाहि‍ए, उन्‍होंने कहा कि‍प्रसारण पूर्व सतर्कता और नि‍यमन से जुड़े अहम मुद्दों पर भी वि‍चार-वि‍मर्श आवश्‍यक है। उन्‍होंने वि‍श्‍वास जताया कि‍इस तरह की चर्चाओं से कुछ ठोस परि‍णाम सामने आएंगे।
 {पीआईबी}24-फरवरी-2012 21:13 IST

कविता सप्ताह में अलका सैनी का दूसरा दिन

पंजाब स्क्रीन:कविता सप्ताह:दूसरा दिन:अलका सैनी
खंडहर
खंडहर हुआ महल अपने
बोझिल अक्स को
मूक आँखों से रहा निहार
जहाँ थी कभी यौवन
भरे उपवन की बहार,


आज खोखली दीवारों से
झरती रेत की तरह
मनुहार
कीट पतंगों , गले सड़े कीड़ों
का भरा अम्बार
सुगन्धित सीलन भरी मिट्टी

भी देने लगी दुर्गन्ध
ठहरे पानी में जमी काई की
छटपटाहट से तन बीमार,


पाप - पुण्य , आस्था - अनास्था
की सीमा में उलझ
मंदिर की मूर्तियाँ धूल भरे
जालों में झुलस
देवता भी जहाँ करते
थे कभी वास
वहीँ खंडहर हुई सुन्दरता की
कुरूपता में बुझे स्वास,


जहाँ तक थी कभी
सड़क चमकदार
वहाँ अब है संकरी पगडण्डी
खतरें अपार
कौन मुसाफिर जाने का
करेगा दुसाहस ? 

                          -अलका सैनी        ###  

Friday, February 24, 2012

न्यायाधीशों की नियुक्ति

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में तीन न्यायाधीशों की नियुक्ति 
राष्ट्रपति ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 217 की धारा (1) के तहत प्रदत्त अधिकारों का प्रयोग करते हुए पंजाब और हरियाणा के अपर न्यायाधीशों श्री महिन्दर सिंह सुल्लर, श्री रामचंद गु्प्ता और कुमारी रितु बाहरी को पंजाब और हरियाणा न्यायालय में न्यायाधीश के तौर पर नियुक्त किया है। उनकी नियुक्तियां वरिष्ठता के क्रम में और उनके पदभार संभालने की तिथियों से प्रभावी होगी। (पीआईबी)  24-फरवरी-2012 19:21 IST
कर्नाटक उच्च न्यायालय में अपर न्यायाधीश की नियुक्ति 
राष्ट्रपति ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 217 की धारा (1) के तहत प्रदत्त अधिकारों का प्रयोग करते हुए श्रीमती बी.एस. इंद्रकला को दो वर्षों के लिए कर्नाटक उच्च न्यायालय का अपर न्यायाधीश नियुक्त किया है। उनकी यह नियुक्ति न्यायालय में पदभार संभालने की तिथि से प्रभावित होगी। (पीआईबी) 24-फरवरी-2012 19:32 IST ***

''ग्लिमसेज ऑफ इंडियन वुमन हॉकी''

अजय माकन ने किया महिला हॉकी के बारे में पुस्‍तक का विमोचन
युवा मामले और खेल मंत्री श्री अजय माकन ने कल एक सादे समारोह में हॉकी पर एक पुस्‍तक ''ग्लिमसेज ऑफ इंडियन वुमन हॉकी'' का विमोचन किया। पुस्‍तक हॉकी के जानकार श्री के. अरूमुगम ने लिखी है। 

लेखक को बधाई देते हुए श्री माकन ने कहा कि महिला हॉकी के बारे में भारत में काफी कम पुस्‍तकें लिखी गई हैं, ऐसे में उनका कार्य सराहनीय है। खेल मंत्री ने इस बात पर भी जोर दिया कि भारतीय हॉकी को श्री अरूमुगम जैसे कुछ और लोगों की जरूरत है, जो अपने उत्‍साह से हॉकी को आगे बढ़ाएं।

श्री माकन ने कहा कि उनका मंत्रालय मेजर ध्‍यानचंद स्‍टेडियम में हॉकी ''उत्‍कृष्‍टता केन्‍द्र'' स्‍थापित करने की प्रक्रिया में है। उन्‍होंने प्रस्‍तावित केन्‍द्र के बारे में अंतर्राष्‍ट्रीय हॉकी फेडरेशन के अध्‍यक्ष श्री लीन्‍द्रो नेगरे के साथ बातचीत की है। उन्‍होंने महिला और पुरूष दोनों ही हॉकी टीमों को अपनी शुभकामनाएं दी हैं, जो इस समय ओलंपिक क्‍वालीफाइंग मैचों में भाग ले रही हैं।

पुस्‍तक के लेखक श्री अरूमुगम ने कहा कि इस पुस्‍तक में भारतीय महिला हॉकी के इतिहास और 200 से ज्‍यादा खिलाडियों के बारे में विस्‍तृत जानकारी है। पुस्‍तक में कुछ दुर्लभ तस्‍वीरें भी हैं। उन्‍होंने बताया कि इसमें कुछ ऐसे आंकड़े दिये गए हैं, जो अब तक उपलब्‍ध नहीं हैं। [पीआईबी]    24-फरवरी-2012 12:42 IST ******

''ग्लिमसेज ऑफ इंडियन वुमन हॉकी''

अजय माकन ने किया महिला हॉकी के बारे में पुस्‍तक का विमोचन
युवा मामले और खेल मंत्री श्री अजय माकन ने कल एक सादे समारोह में हॉकी पर एक पुस्‍तक ''ग्लिमसेज ऑफ इंडियन वुमन हॉकी'' का विमोचन किया। पुस्‍तक हॉकी के जानकार श्री के. अरूमुगम ने लिखी है। 

लेखक को बधाई देते हुए श्री माकन ने कहा कि महिला हॉकी के बारे में भारत में काफी कम पुस्‍तकें लिखी गई हैं, ऐसे में उनका कार्य सराहनीय है। खेल मंत्री ने इस बात पर भी जोर दिया कि भारतीय हॉकी को श्री अरूमुगम जैसे कुछ और लोगों की जरूरत है, जो अपने उत्‍साह से हॉकी को आगे बढ़ाएं।

श्री माकन ने कहा कि उनका मंत्रालय मेजर ध्‍यानचंद स्‍टेडियम में हॉकी ''उत्‍कृष्‍टता केन्‍द्र'' स्‍थापित करने की प्रक्रिया में है। उन्‍होंने प्रस्‍तावित केन्‍द्र के बारे में अंतर्राष्‍ट्रीय हॉकी फेडरेशन के अध्‍यक्ष श्री लीन्‍द्रो नेगरे के साथ बातचीत की है। उन्‍होंने महिला और पुरूष दोनों ही हॉकी टीमों को अपनी शुभकामनाएं दी हैं, जो इस समय ओलंपिक क्‍वालीफाइंग मैचों में भाग ले रही हैं।

पुस्‍तक के लेखक श्री अरूमुगम ने कहा कि इस पुस्‍तक में भारतीय महिला हॉकी के इतिहास और 200 से ज्‍यादा खिलाडियों के बारे में विस्‍तृत जानकारी है। पुस्‍तक में कुछ दुर्लभ तस्‍वीरें भी हैं। उन्‍होंने बताया कि इसमें कुछ ऐसे आंकड़े दिये गए हैं, जो अब तक उपलब्‍ध नहीं हैं। [पीआईबी]    24-फरवरी-2012 12:42 IST ******

पंजाब स्क्रीन में कविता सप्ताह की शुरूयात

हर रोज़ एक नई कविता:नया प्रयोग:नई पहल:अलका सैनी
                                                                                         चित्र साभार: द ड्रीम्ज़ 
कई बार ऐसा महसूस होता है कि शायर की शायरी आम तौर पर शायर की रचना ही नहीं होती, वह रचना होने के साथ साथ शायर पर हुई एक ऐसी दिव्य इनायत भी होती है जो उसे अमरता प्रदान करती है. कविता जब उतरती है तो वह भी अपना माध्यम तलाश करती है. वह हर किसी पर नहीं उतरती. जोर जबरदस्ती से भी नहीं उतरती. तुकबन्दी करने वालों के हिस्से में तुकबन्दी आती है और शायरी वालों के हिस्से शायरी. यह भी एक नसीब ही होता है की कुछ शायर दरबारी राग में खो जाते हैं और कुछ शायर लोगों के शायर ह जाते हैं और सदिय्प्न तक लोगों के दिलों की धडकनों में जीवित रहते हैं.  कभी कभी शायरी इतनी गहरायी की बात करती है कि सातों समन्दरों की गहराई भी उसके सामने कम लगती है और कभी कभी इतनी ऊंची उड़ान पर कि सातों आसमानों की ऊँचाई को भी मात कर देती है. शायरों की शायरी और पाठकों के दरम्यान अधिक समय और स्थान न लेते हुए एक छोटी सी बात यही की इस बार से पंजाब स्क्रीन में कविता सप्ताह की शुरूयात भी की जा रही है. हर महीने के आखिरी सप्ताह में होगी हर रोज़ किसी किसी न किसी ऐसे शायर की रचना जो समय समय पर वक्त निकाल कर अपनी रचना के ज़रिये पंजाब स्क्रीन को सम्मान देते रहे हैं. इस सप्ताह की शुरूयात हम कर रहे हैं अलका सैनी की कविता से. इस सप्ताह हर रोज़ उनकी एक कविता होगी. चंडीगढ़ में रह रही शायरा अलका सैनी ने सियासत को भी बहुत नज़दीक से देखा है और पत्रकारिता को भी. हिंदी पंजाबी साहित्य को भी और अन्य राज्यों में विकसित गैर हिंदी साहित्य को भी. समाज से दर्द लेकर बदले में मुस्कराहट लौटाना, धोखा खा कर भी कहना कोई बात नहीं और धोखा देने वाले पर फिर विश्वास कर लेना .. अलका सैनी की जीवन शैली का अंग भी है. आपको इस कविता में क्या महसूस हुआ अवश्य बताएं आपके विचारों की इंतज़ार बनी रहेगी. आज पहले दिन प्रस्तुत है एक कविता सपने कल होगी नई कविता.
सपने
कल रात मुझे पता चला
सपनों में भी कविताएं बनती है
सपनों की धुंधली आकृतियाँ
स्मृतियों के कोहरे से बनती है
कल रात उसने मुझे सपनों में घुसकर जगाया
मैं बुदबुदाई और ज़ोर से चिल्लाई

" माँ, मैं झूठ नहीं बोल रही
...... मेरा घर मत तोड़ो"
पास में सोये मोनू ने कहा मम्मी
तभी मेरी जीभ उलट गई
और आवाज धीमी होते होते मैं फिर सो गई


कल ही मुझे पता चला सपनों की
एक दुनिया होती है
जिसमे नायक
खलनायक और साधारण पात्र होते है
लड़ते है ,झगड़ते है
रोते है ,हँसते है
मगर किसी का कुछ नहीं बिगड़ता
सभी अक्षुण्ण


पर असली दुनिया में हाहाकार
शोरगुल आपाधापी
सारी अवस्थाएँ बदलती है
मनोरोग से प्रेमरोग
प्रेमरोग से मृत्युयोग
नेपथ्य बदल जाता है
सारे पात्र झूठे
सारे संवाद खोखले


काश ! सपनों की दुनिया लंबी

                                    --अलका सैनी 

Thursday, February 23, 2012

वर्चुअल लैब परियोजना शुरू

91 वर्चुअल लेबोरेटरीज:नौ विषयों के सैकड़ो प्रयोग
केन्‍द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री श्री कपिल सिब्बल ने आज वर्चुअल लैब की शुरूआत की। इसमें 91 वर्चुअल लेबोरेटरीज हैं, जिसमें विज्ञान एवं इंजीनियरिंग के नौ विषयों के सैकड़ो प्रयोग मौजूद हैं। मंत्रालय के सूचना और संचार प्रौद्योगिकी के जरिये शिक्षा के राष्‍ट्रीय मिशन के अंतर्गत वर्चुअल लैब की मदद से भारत भर में उच्‍च गुणवत्‍ता वाली शिक्षा प्रदान की जा सकती है।
    वर्चुअल लैब का मुख्‍य उद्देश्‍य ग्रेजुएट और अंडर ग्रेजुएट कॉलेज तथा विश्वविद्यालय के छात्रों को उनकी जरूरत के मुताबिक वर्ल्‍ड वाइड वेब, स्‍टैंडर्ड कम्‍प्‍यूटर और इंटरनेट संपर्क का इस्‍तेमाल करते हुए वर्चुअल लैब से प्रयोग करने की क्षमता प्रदान करना है। वर्चुअल लैब देश में कीमती उपकरणों को अन्‍य छात्रों के साथ बांटने की भी इजाजत देता है। यह ग्रामीण इलाकों में छात्रों के लिए बेहत उपयोगी साबित होगी।
    भारत में करीब 300 विभागीय प्रमुखों, प्राध्‍यापकों और 152 संस्‍थानों के कर्मचारियों को प्रशिक्षित किया गया है। 20 से ज्‍याद नोडल केन्‍द्र बनाये गए हैं। वर्चुअल लैब का प्रथम चरण अप्रैल, 2009 में शुरू हुआ था। इस चरण के दौरान करीब 20 लैब तैयार किये गए। इसका मुख्‍य चरण अप्रैल, 2010 में शुरू हुआ। अब तक 80 से ज्‍यादा वर्चुअल लैब तैयार किये जा चुके हैं और देश के विभिन्‍न भागों में इनका ट्रायल चल रहा है।
    परियोजना के अंतर्गत दो तरह के वर्चुअल लैब तैयार किये गए हैं। सिम्‍युलेशन आधारित वर्चुअल लैब में प्रयोग गणितीय इक्‍वेशन का इस्‍तेमाल करते हुए किये जाते हैं। सिम्‍युलेशन हाई एण्‍ड सर्वर पर किये जाते हैं और इसके नतीजे इंटरनेट पर छात्रों को बता दिये जाते हैं।
    रिमोर्ट ट्रिगर्ड वर्चुअल लैब का इस्‍तेमाल करते हुए प्रयोग दूर से किये जाते हैं। इसके नतीजे छात्रों को इंटरनेट पर बता दिये जाते हैं। 
सभी वर्जुअल लैब तक एक साझा वेबसाइट www.vlab.co.in के जरिये पहुंचा जा सकता है।
     यह वर्चुअल लैब उन इंजीनि‍यरिंग कॉलेज छात्रों के बहुत उपयोगी होगी जिनकी पहुंच अच्छी लैब सुविधाओं तक नहीं है। इससे 10वीं कक्षा के जिज्ञासु छात्रों को विभिन्न संस्थानों में उच्चतर शिक्षा, अनुसंधानों के लिए प्रेरित किया जा सकेगा और वह इन विषयों से संबंधित शिक्षण संसाधनों से लाभ उठा सकेंगे।
     वर्तमान में 769 प्रयोगों को सम्मिलित करते हुए 85 वर्चुअल लैबों को विकसित किया जा चुका है। इन वर्चुअल लैबों के ज्ञान को प्रसारित करने के लिए संपूर्ण भारत में प्रशिक्षण और कार्यशालों का आयोजन किया गया है। विभिन्न विषयों और इस ज्ञान के व्यापक प्रसार के लिए वर्चुअल लैबों के विकास के लिए आगामी प्रयास भी जारी रहेंगे।
     वर्चुअल लैबों के विकास के लिए एक समानांतर मंच का भी सृजन किया गया है जो वर्चुअल लैबों की देख-रेख में संकायों की सहायता करेगा। यह मंच बहुत से सहयोगी संस्थानों द्वारा विकसित 825 प्रयोगों की मेजबानी कर चुका है। समानांतर मंच छात्रों की प्रगति की निगरानी के लिए शिक्षकों और संस्थागत सामग्री बदलाव हेतु मदद भी प्रदान करेगा।
     वर्चुअल लैबों में छात्रों की रूचि उत्साहवर्धक रही है। वर्चुअल लैब की साइड पर पिछले छह महीनों में ही 233,570 साइट विजिट और 1,034,443 पेज विजिट किये गये हैं। इसकी साइट पर भारत, अमरीका, मलेशिया, फिलीपींस, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया,कनाडा, जर्मनी, और पाकिस्तान से विजिटर्स प्रतिमाह करीब 100 जीबी का उपयोग करते हैं और 134 देशों के 4500 से ज्यादा यूजर्स ने साइट पर अपना रजिस्ट्रेशन कराया है।{पत्र सूचना कार्यालय}(23-फरवरी-2012 20:46 IST)


वर्चुअल लैबों की सूची के लिए यहां क्लिक करें। 

एक थी मधुबाला

जिसके नाम पर न कोई एवार्ड न कोई सम्मान
अजीब इतिफाक है कि मधुबाला का जन्म हुआ 14 फरवरी, 1933 को दिल्ली में उस दिन; अब जिसे लोग वैलेंटायींनज़ डे कह के प्रेम सताह की शुरूयात करते हैं प्रेम का रास्ता अत्यंत सांकरा और दुर्गम होता है मधुबाला पर फिल्माया वह गीत तो बहुत लोग जोश्से सुनते हैं जब प्यार किया तो दर्नाक्य पर जब प्रेम कि बात सामने आती है तो बहुत से लोग दुबक जाते हैं  शायद वे भूल जाते हैं कि  इसी फिल्म में एक गीत और भी था कवाली के रूप में......तेरी महफिल में किस्मत आजमा कर हम भी देखेंगे. गीत के बाद जब जीत हार का फैसला सुनाया जाता है तो उसे पता चलता है कि उसके हिस्से में तो कांटें आये हैं पर वह घबराती नहीं और कहती है...काँटों को मुरझाने का डर नहीं होता  मधुबाला ने इसे सारी उम्र निभाया भी. इसके बावजूद जमाने ने कुछ कम नहीं की छोटी सी उम्र में ही यादगारी फिल्में देकर जाने वाली मधुबाला को इस दुनिया ने एक भी सम्मान नहीं दिया

उसका निधन हो मगाया उसकी फिल्में बाद में भी चलती रहीं पर सम्मान एक भी तो नहीं. मधुबाला 23 फरवरी, 1969 को यह दुनिया छोड़ गयी  अपने अभिनय में एक आदर्श भारतीय नारी की खूबियों को जीवंत करने वाली मधुबाला का अंदाज़ बस देखते ही बनता था चेहरे द्वारा भावाभियक्ति तथा नज़ाक़त उनकी प्रमुख विशेषता रही उनके अभिनय प्रतिभा,व्यक्तित्व और खूबसूरती को देख कर यही कहा जाता है कि वह भारतीय सिनेमा की अब तक की सबसे महान अभिनेत्री है। वास्तव मे हिन्दी फ़िल्मों के समीक्षक अगर मधुबाला के अभिनय काल को 'स्वर्ण युग' की संज्ञा से सम्मानित करते हैं तो यह एक हकीकत है और 
उन लोगों के मूंह पर एक तमांचा भी जो कहते हैं कि मधुबाला को अभिनय के कारण नहीं खून्सूरती के कारण फिल्में मिलती थीं। मधुबाला, हृदय रोग से पीड़ित थीं इसका पता तो बहुत पहले बचपन में ही चल गया था लेकिन 1950  मे नियमित होने वाले स्वास्थ्य परीक्षण मे इस मामले कि गंभीरता और नाज़ुक स्थिति का भी चल गया था। सब कुछ मालूम होने के बावजूद मधुबाला मुस्कराती रहती. यह उसकी हिम्मत थी कि वह मौत कि आगोश में भी ज़िन्दगी कि बातें कर सकती थी. पर मुस्कराहट के परदे में सब कुछ कब छुपता है. एक दिन जब हालात बदतर हो गये तो ये छुप ना सका। कभी-कभी फ़िल्मो के सेट पर ही उनका तबीयत बुरी तरह खराब हो जाती थी। खून कि उलटी आने पर भी पूरी तरह सहज हो के जी लेना वास्तव में कितना असहज रहा होगा ? स्वस्थ्य बिगड़ चूका था. चिकित्सा के लिये जब वह लंदन गयी तो डाक्टरों ने उनकी सर्जरी करने से मना कर दिया क्योंकि उन्हे डर था कि वो सर्जरी के दौरान मर जायेंगीं। जिन्दगी के अन्तिम 9 साल उन्हे बिस्तर पर ही बिताने पड़े। 23 फ़रवरी 1969 को बीमारी की वजह से हुए ज़बरदस्त हार्ट अटैक के कारण उनका स्वर्गवास हो गया। 
उसके नाम पर बहुत बड़ी बड़ी सफल फिल्मों के नाम हैं, लोग हैं, बैनर हैं पर अवार्ड नहीं है. सम्मान के इस मामले पर उसके चाहने वाले ही एक दिन आगे आकर फिल्म जगत कि इस गलती को सुधरेंगे. (कार्तिक सिंह//फीचर डेस्क)  

Monday, February 20, 2012

नये बाजारों में भारतीय हस्‍तशिल्‍प का निर्यात

चीन हस्‍तशिल्‍प के मामले में देता रहा भारत को कड़ी प्रतिस्‍पर्धा*राकेश कुमार
भारतीय हस्‍तशिल्‍प अब चीन और लैटिन अमरीका जैसे नये बाजारों में पहुंच गया है। इसे पहले भारतीय हस्‍तशिल्‍प यूरोपीय क्षेत्र और उत्‍तरी अमरीकी महादीप जैसे पारंपरिक बाजारों तक ही सीमित था और लैटिन अमरीकी देशों पर विशेष ध्‍यान नहीं दिया जा रहा था।
     चीन हस्‍तशिल्‍प उत्‍पादक क्षेत्र के रूप में दुनियाभर में जाना जाता है और अपने स्‍वदेशी डिजाइन, उत्‍कृष्‍ट कच्‍चे माल के लिए मशहूर है। चीन उत्‍कृष्‍ट दस्‍तकारी के मामले में भी मशहूर है। चीन हस्‍तशिल्‍प के मामले में भारत को कड़ी प्रतिस्‍पर्धा देता रहा है और दुनिया में हस्‍तशिल्‍प के कारोबार में चीन का हिस्‍सा करीब 30 प्रतिशत है।
     हालांकि यह सब जानते हैं कि सभी प्रकार के हस्‍तशिल्‍प की अत्‍यधिक मांग के कारण व्‍यापक रूप से हस्‍तशिल्‍प के उत्‍पादन में चीन में शानदार यंत्रिकरण हुआ है। चीन में ज्‍यादातर हस्‍तशिल्‍प मशीनों से बनाया जाता है और हाथ से शिल्‍पकारी सिर्फ अंतिम रूप देने के लिए ही की जाती है।
     भारतीय हस्‍तशिल्‍प को दुनियाभर में स्‍वदेशी डिजाइन, पारंपरिक विरासत, संस्‍कृति और धार्मिक उदगम तथा डिजाइन की विविधता, उत्‍पादों और भारत के अलग-अलग क्षेत्रों के कच्‍चे माल के आधार पर जाना जाता है। वनस्‍पति रंगों के इस्‍तेमाल से उत्‍कृष्‍ट डिजाइन हस्‍तशिल्‍प भारत की विशेषता रही है। उत्‍कृष्‍ट हस्‍तशिल्‍प के मामले में चीन से मिल रही कड़ी प्रतिस्‍पर्धा के बावजूद भारत विभिन्‍न बाजारों में उच्‍च स्‍तर के हस्‍तशिल्‍प की मांग पूरी कर रहा है।
     एशिया के सबसे बड़े भारतीय हस्तशिल्प और उपहार मेले (आईएचजीएफ) के 33वें संस्करण का शुभारंभ हो रहा है। आईएचजीएफ-स्प्रिंग 2012 में भारत के 28 राज्यों के लगभग 2300 प्रदर्शक हिस्सा लेंगे जो लगभग 950 उत्पाद श्रृंखलाओं स्टाइल कच्चे माल और अवधारणाओं आदि को प्रदर्शित करेंगे। 30 से भी अधिक देशों से खरीदारों के इस मेले में शिरकत करने की संभावना है।

     हालांकि इस मेले में प्रमुख तौर पर घर के सामान, साज-सज्जा की वस्तुएं और उपहार फैशन, आभूषण, बैग, बांस और पर्यावरण अनुकूल उत्पाद, मोमबत्तियों, फर्नीचर आदि को प्रदर्शित किया जाएगा लेकिन पुनर्चक्रित और पर्यावरण अनुकूल वस्तुओं पर अधिक ज़ोर रहेगा।
     मेले का अन्य आकर्षण जम्मू-कश्मीर राज्य द्वारा प्रस्तुत प्रदर्शनी होगी। जम्मू-कश्मीर क्षेत्र अपने परंपरागत हस्तशिल्प और कच्चे माल के लिए जाना जाता है किंतु हाल के समय में नवीन डिजाइनों, नवीन उत्पाद श्रृंखलाओं और नवीन स्टाइलों का भी विकास हुआ है जो न केवल परंपरागत हैं बल्कि अंतर-राष्ट्रीय ज़रुरतों के मुताबिक आधुनिक और समसामयिक भी हैं।
     पिछले कुछ दशकों में एक बड़ा दिलचस्‍प घटनाक्रम सामने आया है, पर वह भारत से चीन में होने वाले हस्‍तशिल्‍प के निर्यात में वृद्धि है।
 वर्ष 2008-09 में भारत में चीन को 4  अरब 18 करोड़ 33 लाख रूपये का हस्‍तशिल्‍प निर्यात किया था। उसके बाद हस्‍तशिल्‍प निर्यात में स्थिर रूप से वृद्धि हुई और 2010-11 के दौरान 9 अरब 45 करोड़ 72 लाख रूपये के हस्‍तशिल्‍प का निर्यात हुआ। पिछले तीन वर्षों के दौरान ही हस्‍तशिलप निर्यात में 94.07 प्रतिशत वृद्धि हुई, जो न सिर्फ बहुत महत्‍वपूर्ण है, बल्कि इस बात का संकेत भी है कि भारतीय हस्‍तशिल्‍प चीन में स्‍थाई पहुंच बनाने में सफल रहा है।
     वर्ष 2009-10 के दौरान भारत में चीन में जो हस्‍तशिल्‍प उत्‍पाद निर्यात किए, उनमें मेटलक्राफ्ट, वुड क्राफ्ट, हाथ से कढ़ाई किए गए वस्‍त्र और स्‍कार्फ, फैशन, आभूषण और एसेसरीज, शॉल के साथ-साथ कसीदाकारी और क्रोसिए से बनी वस्‍तुएं शामिल हैं। जरी और जरी के सामान तथा हाथ की कढ़ाई किए गए वस्‍त्र और स्‍कार्फ के निर्यात में 2009-10 की तुलना में 2010-11 के मामूली गिरावट आई, लेकिन मेटल क्राफ्ट उत्‍पादों में अभुतपूर्व 991 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई। वुड क्राफ्ट के निर्यात में 116 प्रतिशत वृद्धि देखी गई। उन्‍होंने कहा कि जरी और जरी के सामान में गिरावट के कारणों का अध्‍ययन किया जा रहा है। उन्‍होंने कहा कि हालांकि चीन में भारत के हस्‍तशिल्‍प के निर्यात में कुल मिलाकर हुई वृद्धि से यह स्‍पष्‍ट रूप से स्‍थापित होता है कि चीन अब भारतीय हस्‍तशिल्‍प उत्‍पादों का बड़ा खरीदार बनकर उभरा है।
     भारत को नये बाजार और नये क्षेत्र विकसित करने चाहिए तथा लैटिन अमरीकी क्षेत्रों पर विशेष ध्‍यान दिया गया है। सरकार ने इन क्षेत्रों में निर्यात गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए एमएआई कार्यक्रम के तहत विशेष योजना शुरू की है तथा ईपीसीएच ने इस योजना का पूरा फायदा उठाया है और लैटिन अमरीकी क्षेत्र के महत्‍वपूर्ण क्षेत्रों में भारतीय हस्‍तशिल्‍प का प्रचार-प्रसार और बढ़ावा देने के लिए आक्रामक कार्यक्रम शुरू किया है। कुछ वर्ष पहले शुरू हुए परिषद के प्रयासों के अच्‍छे परिणाम मिलने शुरू हो गए हैं।
     लैटिन अमरीकी क्षेत्र के महत्‍वपूर्ण क्षेत्रों में अर्जेन्‍टीना, ब्राजील, चिल्‍ली, को‍लम्बिया, मैक्सिको, पनामा, पेरू, उरूग्‍वे और वेनेजुएला है। ईपीसीएच का पहला प्रयास वेनेजुएला में कारकस में लोक शिल्‍प महोत्‍सव का आयोजन था, जो आम के दैनिक इस्‍तेमाल में आने वाले भारतीय हस्‍तशिल्‍प उत्‍पादों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए आयोजित किया गया। इस महोत्‍सव में बिजनेस प्रतिनिधियों और अन्‍य पड़ौसी देशों ने भी शिरकत की।
     वर्ष 2010-11 के लिए निर्यात के विशलेषण से लैटिन अमरीकी क्षेत्र में हस्‍तशिल्‍प के कुल निर्यात में 31 प्रतिशत वृद्धि देखी गई। कोलम्बिया में 63.75, मैक्सिको में 54.20, अर्जेन्‍टीना में 50, वेनेजुएला में 43.50 और चिल्‍ली में 28 प्रतिशत वृद्धि देखी गई।
     2008-09 में तीन अरब 56 करोड़ 52 लाख रूपये के हस्‍तशिल्‍प का निर्यात किया गया, जो 2009-10 में तीन अरब 70 करोड़ 15 लाख रूपये तक पहुंच गया। 2010-11 में चार अरब 84 करोड़ 48 लाख रूपये के हस्‍तशिल्‍प का निर्यात हुआ। [पीआईबी]  
17-फरवरी-2012 19:17 IST 
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* लेखक हस्‍तशिल्‍प निर्यात संवर्धन परिषद के कार्यकारी निदेशक है।

शिवरात्रि: नशामुक्ति का संकल्प लेकर पूजा-अचना कीजिए

शिव की पूजा                                                                                       बोधि वृषा
शब्द ‘शिव’ का अथ है ’शुभ‘ शंकर का अथ होता है, कल्याण करने वाले निश्चित रूप से उसे प्रसत्र करने के लिए मनुष्य को उनके अनुरूप ही बनना पड़ेगा
’शिवो भूत्वा शिवं यजेत‘ अथात् शिव बनकर ही शिव की पूजा करें धम ग्रंथों में शिव के स्वरूप की प्रलयंकारी रूद्र के रूप में स्तुति की गयी है शंकर के ललाट पर स्थित चंद्र, शीतलता और संतुलन का प्रतीक है यह विश्व कल्याण का प्रतीक और सुंदरता का पयाय है, जो निश्चित ही ’शिवम्‘ से ’सुंदरम्‘ को चरिताथ करता है सिर पर बहती गंगा शिव के मस्तिष्क में अविरल प्रवाहित पवित्रता का प्रतीक है.
आज विवेकहीनता के कारण मानव दुखी है भगवान शिव का तीसरा नेत्र विवेक का प्रतीक है जिसके खुलते ही कामदेव नष्ट हुआ था अथात् विवेक से कामनाओं को विनष्ट करके ही शांति प्राप्त की जा सकती है उनके गले में सर्पो की माला दुष्टों को भी गले लगाने की षामता तथा कानों में बिच्छू, बर के कुंडल कटु एवं कठोर शब्द सहने के परिचायक हैं मृगछाल निरथक वस्तुओं का सदुपयोग करना और मुंडों की माला जीवन की अंतिम अवस्था की वास्तविकता को दशाती है भस्म लेपन, शरीर की अंतिम परिणति को दशाता है 

भगवान शिव के अंतस का यह तत्वज्ञान शरीर की नश्वरता और आत्मा की अमरता की ओर संकेत करता है शिव को नील कंठेश्वर कहते हैं पुराणों में समुद्र मंथन की कथा आती है समुद्र से नाना प्रकार के रत्न निकले, जिसको देवताओं ने अपनी इच्छानुसार हथिया लिया अमृत देवता पी गये समुद्र से जहर निकला तो सारे देवी-देवता भाग खड़े हुए जहर की भीषण ह्लवाला से सारा विश्व जलने लगा, तब शिव आगे ब़ढे और कालकूट प्रलयंकर बन गये और नीलकंठ देवाधिदेव महादेव कहलाने लगे हमारे कुछ धामिक कहे जाने वाले व्यक्तियों ने शिव पूजा के साथ नशे की परिपाटी जोड़ रखी है लेकिन आश्चय है कि जो शिव- ’हमरे जान सदा शिव जोगी, अज अनव़ढ अकाम अभोगी‘ जैसा विराट पवित्र व्यक्तित्व है, उसने पता नहीं नशा कब किया होगा भांग, धतूरा, चिलम-गांजा जैसे घातक नशे करना मानवता पर कलंक है, अत: शंकर भक्त को ऐसी बुराइयों से दूर रहकर शिव के चरणों में बेल पत्र ही समपित करना चाहिए बेल के तीन पत्र हमारे लोभ, मोह, अहंकार को मिटाने में समथ है नशेबाजी धीमी आत्महत्या है इस व्यक्तिगत और सामाजिक बुराइ से बचकर नशा निवारण के संकल्पों को उभारना ही शंकर की सच्ची आराधना है शंकर के सच्चे वीरभद्र बनने की आवश्यकता है वीरता अभद्र न हो, तो संसार के प्रत्येक व्यक्ति को न्याय मिल सकता है आज शिवरात्रि है, नशामुक्ति का संकल्प लेकर उनकी पूजा-अचना कीजिए - पंडित श्रीराम शमा आचाय.(प्रभात खबर से साभार)