Friday, November 04, 2011

पूनम माटिया की कविताओं के संग चलना मुझे अच्छा लगा

पूनम माटिया जैसी ढेर सारी माओं के आँचल की छाँव में "स्वप्न श्रृंगार" करती हैं ये कविताएं-खुर्शीद हयात
किसी भी कवयित्री  की कीर्ती कविता की पोशाक में हो या ग़ज़ल के आवरण में लिपटी हुई   . तभी सार्थक मानी जायेगी , जब आम आदमी कुछ पल के लिए ही सही , उस के माध्यम से , अपने आस पास के मंज़र से रु ब रु हो जाये और उसकी संवेदनाएं उस से जुड़ जाएँ . तेज़ धूप में भी नीम की ठंडी छाँव सा एहसास जब कविता जगा जाये , बर्फ की तरह पिघलती जिंदगी को नया ऐतबार दे जाये ,हमारे ज़हन को बेदार कर जाये ,तब कविता के सायेबाँ में चहलक़दमी करना अच्छा लगता है .
धनक- रंग जिंदगी की पगडण्डी पर, पूनम माटिया की कविताओं के संग चलना मुझे अच्छा लगा , वजह यह रही की इनकी कवितायें बड़ी ख़ामोशी से एक आम आदमी की ख्वाब- ख्वाब निगाहों में एक नया मंजर रख जाती हैं . और फिर  यह मंज़र अलग अलग रंगों के चेहरों से यह कहता दिखाई देता  है ...आगे का रास्ता अभी खुला है , बढे चलो ....!
"यही दस्तूर ऐ ज़माना है 
जो बदल कर हमें दिखाना है 
औरत नहीं मजबूर यहाँ 
आज यही विश्वास जगाना है .."(पूनम )

कवितायें जब पूनम माटिया जैसी ढेर सारी माओं के आँचल की छाँव में "स्वप्न श्रृंगार" करती हैं , किचन से बाहर निकल कर संवरती हैं, निखरती हैं, सावन के मौसम में झुला झूलती हैं, तब सूखते वृक्षों को नया जीवन मिल जाता है, और"पीपल "दूर खड़ा मुस्कुराता रहता है .
मेरे सामने बैठी पूनम माटिया की कवितायेँ बातें कर रही हैं, कवितायेँ जब पाठक से बातें करती हैं ,सौंदर्य -चेतना को कलात्मक स्पर्श के सहारे जगा जाती हैं ,पूनम माटिया आम जिंदगी में,चहल पहल वाली एक ज़िम्मेदार माँ हैं अपनी शबनम की बूंदों जैसी दो प्यारी प्यारी बेटियों की .तो दूसरी तरफ "पति दोस्त" नरेश माटिया की शरीक ऐ सफ़र .जब रिश्ते सच्चे अच्छे दोस्त की तरह हों , जब रिश्ते पाकीजगी की पोशाक में लिपटे हों , तब जिंदगी "रचनाकार '' की दुलारी बन जाती है .
अपनी कविताओं में पूनम माटिया  चहल पहल को दूर रखती हैं ,एक माँ के अन्दर बैठी  कवयित्री की सोच गुफा में जिंदगी की उभरती हुई लहरें आबाद हैं .पूनम के शब्द जब चांदनी पोशाक में बातें करते हैं तब एक अलग समां होता है :-
आजकल ‘उसका’ भी ये आलम है ‘पूनम’
चाँद आसमां में रहता है, मगर 
जिक्र उसका जाने क्यों सरे आम होता 

पूनम का चंचल मन आज भी अपने बचपन की मीठी यादों , गाँव की मिटटी की सोंधी सोंधी खुशबुओं में रचा बसा है :
खुर्शीद हयात 
मन चंचल है हमारा 
बचपन तलाशता रहता है 
गुड्डे गुडिया न सही 
सपनों में चोर सिपाही खेलता रहता है
माँ का आँचल , पापा की ऊँगली 
मिलते नहीं 
अपने बच्चों की हंसी में 
अपनी मुस्कराहट खोजता रहता है 

(स्वप्न श्रृंगार - पृष्ट-१६)
"स्वप्न श्रृंगार "पूनम माटिया का पहला काव्य संग्रह है , अभी इन्हें और निखरना है ,संवरना है , मुझे आशा है ,आने वाले दिनों में हिंदी शायरी के फलक पर वह एक नई इबारत लिखने में कामयाब रहेंगी-खुर्शीद हयात 

3 comments:

poonam,delhi said...

‎Rector Kathuria.......ji aap hamesha ki tarah mera utsaah vardhan kiya ............Khursheed Hayatji ke dwara likhi gayi SWAPN SHRINGAAR kii sameeksha ko पंजाब स्क्रीन mei publish karke aur vo bhi Unki aur meri pics ke saath ............................mai abhaari hoon..

खुर्शीद हयात said...

शुक्रिया रेक्टर जी , बहुत ख़ूबसूरत अंदाज़ में मेरी समीक्षा को " पंजाब स्क्रीन" पर पेश करने के लिए... .मुझे पूनम माटिया के काव्य संसार में चहल कदमी करना मुझे अच्छा लगा , और मैं शब्दों के इशारे पर चलने लगा ..खुर्शीद हयात

.खुर्शीद हयात said...

शुक्रिया , पंजाब स्क्रीन परिवार का , कि इस ने बड़ी खूबसूरती से समीक्षा को पेश किया है ..खुर्शीद हयात