Wednesday, February 02, 2011

तेरी जुदाई


बात इन्टरनैट की चले तो अचानक ही दिल-ओ-दिमाग में बहुत कुछ आने लगता है।  आम दुनिया की तरह बहुत सी खतरनाक और गलत बातें यहां भी होती हैं जिनकी वजह से कई बार पूरे का पूरा माहौल ही संशय पूर्ण सा लगने लगता है. लेकिन कुछ हिम्मतवर लोग यहाँ भी हैं जो इस अन्धकार को चीरते हुए आगे बढ़ रहे हैं. इस अँधेरे में भी जो लोग कोई न कोई मशाल उठा कर कला और कविता जैसी यादगारी बातें कर रहे हैं, एक नया इतिहास रच रहे हैं उनमें एक नाम पूनम मटिया का भी है.वही पूनम जिसे मिलने के लिए इंटरनैट की दुनिया के मित्र भी दूर दूर से विशेष तौर पर मिलने जाते हैं. पूनम जैसे कलाकारों ने दूर दूर बैठे लोगों को भी एक परिवार की तरह जोड़ दिया है. स्वार्थ और गला काट प्रतियोगिता के इस युग में यह किसी करिश्मे से कम नहीं है. दिलचस्प बात है इस नए स्वस्थ माहौल की रचना में पूनम के पति नरेश मटिया भी पूरी तरह सहयोग करते हैं.आपने पूनम मटिया की कवितायों का रंग पंजाब स्क्रीन में कहीं पहले भी देखा है आइये इस बार देखते हैं पूनम मटिया की कुछ कवितायों का एक नया रंग. --रेक्टर कथूरिया  
 भुलाओ न इतना 
खींचों न रबर इतना कि टूट जाए
दुखाओ न दिल इतना कि दर्द फिर सह न पाए
भुलाओ न किसी को ऐसे कि वो रूठ जाए
ढील न दो पतंग को इतनी कि कट ही जाए
झूले झुलाओ ऐसे कि ‘हिंडोला’आगे तो जाए
पर लौट के फिर अपने पास ही आये

तेरी जुदाई 
पत्थर दिल हो गए हैं हम
नहीं आती मौत भी आसानी से
तेरी जुदाई इम्तिहान लेती है
हर सांस पर इक उम्र तमाम होती है'
कश-म-कश
निशब्द ,निस्तेज ,निरीह सी
पाँव कुछ बंधे-बंधे से, पर
हस्त-उँगलियों में अजीब सी थिरकन
दिमाग कुछ अशांत और
दिल में कुछ उथल-पुथल
आँखें पथराई सी ,पर
निहारती ‘पथ’ किसी का
अजीब कश-म-कश,जैसे कोई भंवर
अजनबी ,अनजान सी तलाशती
‘मंजिल’ छुपी धुंधलके में किसी
आईना 

ये आइना भी अजीब होता है 

असलियत दिखाता है
बड़ा बेदर्द है
आजकल पहले सा दोस्त नहीं
जाने क्यों दुश्मनी निभाता है.

खुद पर यकीन 
इन्तेजार में उम्र यूँही तमाम न कीजिये 
सवालों के हल भी ढूँढ ही लीजिए 
नाम जो लबों तक आया है 
उस शख्स को अपनी ख्वाबगाह में जगह दीजिए 
क्योंकर शको-शुबहा करता है ए-दिल 
अल्लाह को सजदा कीजिये 
और खुद पर यंकी कीजिए 
जमाल-ए-हुस्न 
आजकल ‘उसका’ भी ये आलम है ‘पूनम’
चाँद आसमां में रहता है, मगर
जिक्र उसका जाने क्यों सरे आम होता है
रोशन होते हैं चिराग उसके नाम से
जमाल से उसके चुंधिया जाती हैं नज़रें
हर गुलशन का ‘वही’ गुलफाम होता है
झील सी गहरी उसकी आँखों में नहा कर
खुद चाँद भी ज़लवा-फरोश होता है...

आपको पूनम मटिया की कवितायों का यह रंग कैसा लगा अवश्य बताएं.आपके विचारों की इंतज़ार बनी रहेगी.तस्वीरों की कविता तस्वीरों पर क्लिक करके बड़ी की जा सकती है.-रेक्टर कथूरिया  

2 comments:

poonam,delhi said...

Rector ji .............i m so very delighted and thankful that u hav realy put me in lime light .................shukriya ji ......
Aap ne sirf meri kavtaaon ko hi nahi ..........mujhe aur naresh dono ko hi ujaagar kiya hai ............aur page layout bhi achha lag raha hai ........thnx again

Parveen said...

Rector ji....vakai poonam ji isi sammana ki hakdaar hain.....unki lekhni mein kashish hai....jo akrshit karti hai...aap punjab screen mein unhen sthan de rahe hain...ye badi khushi ki baat hai....thanks