Saturday, October 30, 2010

दमा दम मस्त कलंदर......

मुझे याद है उस दिन मैं बहुत उदास था. परेशानियाँ थीं कि कम होने का नाम ही नहीं ले रहीं थीं. रात हुई तो सोने की कोशिश की पर ऐसे में नींद कहां आती है.  सुबह होने को आ रही थी.  तीसरा पहर खत्म हुआ तो मैंने कम्पयूटर आन किया. सोचा किसी नयी बात से ध्यान चिंता की तरफ से हट जायेगा. मेल चैक की बहुत से नए पत्र थे पर उनमें कोई ख़ास नयी बात नहीं थी. फेसबुक खोली सोचा कोई नया संदेश मिलेगा या नया दोस्त. इतने में ही चैट बाक्स पर दस्तक हुई. देखा तो एक जाने पहचाने मित्र थे. 
औपचारिक दुआ सलाम के तुरंत बाद उन्होंने एक लिंक भेजा. लिंक पर क्लिक किया तो बहुत ही सुरीली आवाज़ थी. अध्यात्म का रंग और संगीत की सुरें मिलीं तो एक तो बस मस्ती ही मस्ती थी.
  दमा दम मस्त कलंदर सुन कर लगा कहीं कोई चिंता नहीं, कहीं कोई निराशा नहीं. पर यह मस्ती होश पूर्ण थी. एक स्कून से भरी हुई. एक नयी ऊर्जा की बरसात करती हुई. यह सुरीली आवाज़ थी डाक्टर ममता जोशी की. 
वही ममता जोशी जो सोने दा कंगना गा कर सब को सम्मोहित कर लेती है. वही ममता जोशी जो आज भी हीर गाती है तो मस्त कर देती है. वही ममता  जिसने सूरजकुंड के क्राफ्ट मेले पर भी अपनी आवाज़ का जादू बिखेरा था. लगता है कि ममता जोशी  के पास संगीत का वरदान उसकी जन्मों जन्मों की साधना के कारण ही सम्भव हो सका. शायद यही वजह है कि उसे केवल चार बरस की बाल उम्र में ही विशेष सम्मान मिल गया था और वह भी मुख्य मन्त्री बेअंत सिंह के हाथों.
सम्मानों का यह सिलसिला चला तो ऐसा चला कि अब तक जारी है. देश विदेश के अनेक सम्मान उसके नाम हो चुके हैंसूफीवाद एक ऐसी धारा है जो बहुत तेज़ी से मकबूल हुई. मजहबों की जंजीरों और दीवारों को तोड़ कर यह लोगों के दिलों में उतर गयी. सूफी गायन की परम्परा आज भी मकबूल है. इसके आयोजन आज भी बहुत बड़े पैमाने पर किये और पसंद किये जाते हैं.  सूफी गायन में पुरुषों  का वर्चस्व तोड़ने वाली ममता जोशी पंजाब और हरियाणा के साथ साथ देश और विदेश में भी अपनी अलग पहचान बना चुकी है. जब वह गाती है अल्लाह हू अल्लाह हू तो सारे माहौल में यही गूँज सुनाई देने लगती है. उसकी उम्र बहुत छोटी है लेकिन वह 1947 के बटवारे का दर्द ऐसे ब्यान करती है जैसे  वह आज भी उसी दर्द से गुज़र रही हो. दिल्ली तड़फदी ते विलक्दा लाहौर वेखिया.... लंदन  और कनेडा में भी अपने सूफियाना अंदाज़ की धांक जमा चुकी ममता जोशी यूं तो चंडीगढ़ के राजकीय कालेज में संगीत की लेक्चरार हैं...पर वास्तव में वह संगीत साधना में रमी एक ऐसी साधका है जो अपने मानव जीवन को संगीत, संगीत और बस संगीत के लिए ही जी रही है. चेतन मोहन जोशी  के साथ मिल कर उनके संगीत सुरों में और भी जादू आ गया है.  --रेक्टर कथूरिया 

Wednesday, October 27, 2010

अरुंधति रॉय के खिलाफ दर्ज मामले पर सुनवाई 22 नवम्बर को

अरुंधति राये के खिलाफ कारवाई की अशंकायो के बढ़ते ही वैब मीडिया में इसके विरोध का स्वर भी तेज़ी से मुखर होने लगा है. विरोध और समर्थन की रेखा इस बार कुछ और गहरी हुई है. दोनों तरफ अपने अपने तर्क हैं जिनके साथ समर्थन करने वाले भी और उनका विरोध करने वाले भी कुछ और खुल कर सामने  आये हैं.इस तरह लगता है कि कलम का युद्ध प्रचंड होने की तैयारी में है. इसकी चचा करने से अच्छा होगा कि अरुंधति के ब्यान को एक बार पढ़ लिया जाए. अरुंधति रॉय का वह बयान कुछ इस तरह है:मैं यह श्रीनगर, कश्मीर से लिख रही हूँ. आज सुबह के अख़बारों ने लिखा है कि मैं कश्मीर पर आयोजित एक आमसभा में कही गयी अपनी बातों के लिए देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार हो सकती हूँ. मैंने वह कहा जो यहाँ दसियों लाख लोग रोज कह रहे हैं. मैंने वही कहा जो दूसरे लेखक सालों से लिखते और कहते आये हैं. मेरे भाषणों को पढने की ज़हमत उठानेवाले यह देखेंगे कि मैंने बुनियादी तौर पर इंसाफ की मांग की है. मैंने कश्मीरी लोगों के लिए इंसाफ के बारे में कहा है जो दुनिया के सबसे क्रूर फौजी कब्ज़े में रह रहे हैं, उन कश्मीरी पंडितों के लिए, जो आपने घरों से उजाड़ दिए जाने की त्रासदी में जी रहे हैं, उन दलित सैनिकों के लिए, कूड़े के ढेर पर बनी कब्रों को मैंने कुड्डालोर में उनके गांवों में देखा, भारत के उन गरीबों के लिए जो इस कब्ज़े की कीमत चुकाते हैं और एक बनते जा रहे पुलिस राज के आतंक में जीना सीख रहे हैं.
कल मैं शोपियां गयी थी- दक्षिणी कश्मीर के सेबों के उस शहर में जो पिछले साल 47 दिनों तक आसिया और नीलोफर के बर्बर बलात्कार और हत्या के विरोध में बंद रहा था. इन दोनों युवतियों की लाशें उनके घरों के पास की एक पतली सी धारा में पाई गयी थी और उनके हत्यारे अब भी क़ानून से बहार हैं. मैं नीलोफर के पति और आसिया के भाई शकील से मिली. मैं वेदना और गुस्से से पागल उन लोगों के साथ एक घेरे में बैठी जो भारत से इंसाफ पाने की उम्मीद को खो चुके हैं, और अब यकीन रखते हैं कि आज़ादी उनकी अकेली उम्मीद है. मैं पत्थर फेंकनेवाले उन नौजवानों से मिली जिनकी आँखों में गोली मारी गयी थी. मैंने एक नौजवान के साथ सफ़र किया, जिसने मुझे बताया कि अनंतनाग जिले के उसके तीन किशोर दोस्त हिरासत में लिए गए और पत्थर फेंकने की सजा के तौर पर उनके नाखून उखाड़ लिए गए.
अख़बारों में कुछ लोगों ने मुझ पर नफ़रत फ़ैलाने और भारत को तोड़ने का आरोप लगाया है. इसके उलट, मैंने जो कहा है उसके पीछे प्यार और गर्व की भावना है. इसके पीछे यह इच्छा है कि लोग मारे न जाएँ, उनका बलात्कार न हो, उन्हें कैद न किया जाये और उन्हें खुद को भारतीय कहने पर मज़बूर करने के लिए उनके नाखून न उखाड़े जाएँ. यह एक ऐसे समाज में रहने की चाहत से पैदा हुआ है जो इंसाफ के लिए जद्दोजहद कर रहा हो. तरस आता है उस देश पर जो लेखकों की आत्मा की आवाज़ को खामोश करता है. तरस आता है उस देश पर जो इंसाफ की मांग करनेवालों को जेल भेजना चाहता है जबकि सांप्रदायिक हत्यारे, जनसंहारों के अपराधी, कार्पोरेट घोटालेबाज, लुटेरे, बलात्कारी और गरीबों के शिकारी खुले घूम रहे हैं....( 26 अक्टूबर 2010 ) हाशिया ब्लॉग पर प्रकाशित इस ब्यान को यहाँ हाशिया से साभार हू-ब-हू दिया गया है. आप इसे अंग्रेजी में भी पढ़ सकते हैं केवल यहां क्लिक करके
अरुंधति राये के विरोध में भी काफी कुछ कहा गया है लेकिन अरुंधति के तर्क की गरिमा कहीं भी कम नहीं हो पाई. विरोध के स्वर उनके आस पास भी नहीं पहुंच पाते. इसी बेच बहुत ही तीखे तेवर लिए हुए एक और लेख सामने आया है भूपेन सिंह का.   भूपेन सिंह सहारा समय, ज़े न्यूज़ और स्टार न्यूज़ में लम्बे समय तक नौकरी कर चुके हैं. आजकल पूरी तरह अध्यापन से जुड़े हैं पर  कुछ अखबारों के लिए भी नियमत तौर पर  लिखते हैं. उन्हों ने अब साफ़ आफ कहा है कि राष्ट्र अंतिम सत्य नहीं इस लिए अरुंधति को सुनो. प्रस्तुत है उनका लेख ज्यूं का त्यूं, जिसे हम मोहल्ला लाइव से साभार यहां प्रकाशित कर रहे हैं.: 
लेखिका अरुधंती रॉय पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलाने के लिए गृह मंत्रालय ने पुलिस को हरी झंडी दे दी है। अब हो सकता है कि अरुंधती पर मुकदमा दर्ज हो जाए और उन्हें पकड़कर जेल में डाल दिया जाए। गृह मंत्रालय इस मामले में जिस तरह सक्रिय हुआ है, उससे लगता है कि हमारा लोकतंत्र लगातार असहमति की आवाजों को दबाने में अपना बड़प्पन समझ रहा है और राष्ट्र को बचाने के नाम पर अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश लगा रहा है।
अरुंधती को कश्मीर की आजादी का समर्थन करने की वजह से देशद्रोही ठहराने की कोशिश की जा रही है। इसी महीने की इक्कीस तारीख को उन्होंने दिल्ली के मंडी हाउस में कश्मीरी नेता सैयद अली शाह गिलानी के साथ आजादी : द ऑनली वे(आजादी : एक ही रास्ता) नाम के एक सेमिनार में कश्मीरी लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन किया था। वे अपने इस पक्ष को पहले भी कई बार सार्जनिक कर चुकी हैं। गौरतलब है कि अरुंधती किसी भी आजादी का अंध समर्थन नहीं करती हैं बल्कि वे कश्मीरियों का समर्थन करती हुईं न्याय के सार्वभौमिक सिद्धांतों की याद दिलाती हैं। वे कश्मीर की आजादी की बात कर रहे लोगों को सचेत करती हैं कि जो आजादी अपनी जनता को न्याय नहीं दिला सकती, उसका कोई मतलब नहीं। इस तरह अरुंधती तमाम तरह की गैरबराबरी से मुंह मोड़कर राष्ट्रीय एकता की वकालत करने वाली सरकार के साथ ही कश्मीर को इस्लामी राष्ट्र बनाने की ख्वाहिश रखने वालों की तरफ से भी ‘गलत’ समझ लिये जाने के खतरों को उठाती हुई न्याय के पक्ष में बोलती हैं।
उस दिन सेमिनार में अरुंधती के बाद जब हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नेता सैयद अली शाह गिलानी को बोलने के लिए बुलाया गया तो कश्मीर की आजादी की मांग करते हुए वे इस बात का यकीन दिलाने की कोशिश करते दिखे कि आजाद कश्मीर में हर किसी को न्याय मिलेगा। लेकिन उनके भाषण के निहितार्थों से लगा कि वे किस तरह के न्याय के पक्षधर हैं। उनकी तरफ से कश्मीर को इस्लामी कानून पर चलाने की मंशा आत्मनिर्णय के अधिकार के पक्ष में वहां मौजूद बहुत से लोगों को हजम नहीं हुई। गिलानी का भाषण भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की बहसों की याद दिलाने वाला था, जिसमें कुछ लोग जैसे-तैसे सिर्फ आजादी हालिस करना चाहते थे, जबकि भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी तब भी सवाल उठा रहे थे कि उन्हें ऐसी आजादी नहीं चाहिए जिसमें गोरे अंग्रेज चले जाएं और काले अंग्रेज सत्ता पर बैठ जाएं। अफसोस की बात है कि कश्मीर में आजादी की बात करने वालों में भगत सिंह जैसे धर्मनिरपेक्ष और न्यायप्रिय लोग बहुत कम नजर आते हैं। ऐसे हालात में अरुंधती भगत सिंह की उसी परंपरा को याद दिलाती हैं।
अरुंधती की बातों का अलग विश्लेषण किया जाए तो वे राष्ट्र को किसी कट्टरपंथी नजरिये से देखने के बजाय उसे मानवाधिकार और न्याय से जोड़कर देखती हैं। समाजशास्त्रीय व्याख्याओं को ध्यान में रखते हुए राष्ट्र कोई अंतिम सत्य नहीं है। राष्ट्र हमेशा इंसानी कल्पनाओं की उपज होता है। उसे गढ़ते वक्त एक भाषा, नृजातीयता और संस्कृति को आधार बनाया जाता है और हमेशा एक तरह की समरूपता तलाशी जाती है या निर्मित करने की कोशिश की जाती है। अक्सर समाज का सबसे ताकतवर तबका ही ‘राष्ट्र’ की कल्पना करता है, जबकि दो जून की रोटी के लिए लड़ रहे गरीब इंसान के लिए ‘राष्ट्र’ के कोई मायने नहीं होते। उसे राष्ट्र की प्रभुत्ववादी परिभाषाओं को मानने के लिए हमेशा मजबूर किया जाता है। हमारे विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम राष्ट्रीयता पर इस तरह के विमर्शों से भरे पड़े हैं। तो क्या सरकार आने वाले दिनों में उन सभी विचारों पर भी प्रतिबंध लगाने जा रही हैं? या राष्ट्र की एक रेखीय परिभाषा को मानने के लिए विद्यार्थियों और प्राध्यापकों को मजबूर करने जा रही है? विवेक पर प्रतिबंध लगाने का ये उपक्रम सिर्फ फासीवाद की तरफ ही ले जा सकता है।
अरुंधती लगातार शोषित जनता के सवालों को उठाते हुए सत्ता के खिलाफ खड़ा होने का साहस दिखाती रही हैं। न्याय के दृष्टिकोण से वैश्वीकरण विरोधी आंदोलन, नर्मदा बचाओ आंदोलन, माओवादी आंदोलन और कश्मीरी आंदोलन समेत वैकल्पिक राजनीति की बात करने वाले कई आंदोलनों के साथ उनकी सहानुभूति रही हैं। वो एक पब्लिक इंटलेक्चुअल की तरह निर्भीकता से सही और न्यायसंगत बात के पक्ष में खड़े होने का साहस दिखाती रही हैं। जाहिर है कि सत्ताधारी वर्ग को हमेशा उनकी बातों से दिक्कत होती है। लेकिन सरकारों को इस बात को इस बात को समझना पड़ेगा कि कलाकारों और बुद्धिजीवियों से किस तरह बर्ताव किया जाना चाहिए। वे व्यवहार में न सही विचारों के लोकतंत्र को तो कम से कम स्वीकार कर लें।
अरुंधती ने उनके खिलाफ हो रही बयानबाजियों पर टिप्पणी की है कि ऐसे राष्ट्र पर तरस आता है, जो न्याय मांगने पर जेल में डाल देता है। जबकि वहां सांप्रदायिक कत्लेआम मचाने वाले, कॉर्पोरेट घोटालेबाज, लुटेरे, बलात्कारी और शोषक मुक्त होकर घूमते हैं। वे कश्मीर में सरकारी या गैर सरकारी हिंसा और दमन के शिकार सभी लोगों से सहानुभूति दिखाती हैं। यही वजह है कि वे वहां से भगाये गये हिंदुओं पर हुए अन्याय को भी स्वीकारती हैं और इससे मुंह चुराने की वजाय इसे एक त्रासदी बताती हैं। इन सारी बातों को ध्यान में रखते हुए इस साहसी लेखिका को सलाखों के पीछे डालने की धमकी देना कुछ भी हो लोकतांत्रिक तो नहीं हो सकता।
हमारे शासकों को ध्यान रखना चाहिए कि न्यायप्रिय बुद्धिजीवियों के साथ किस तरह का व्यवहार किया जाए। इस सिलसिले में फ्रांसीसी राष्ट्रपति चार्ल्स द गॉल और नोबल पुरस्कार ठुकराने वाले लेखक और विचारक ज्यां पॉल सार्त्र से जुड़ा एक वाकया गौरतलब हो सकता है। तब अल्जीरिया फ्रांस का उपनिवेश हुआ करता था। सार्त्र खुलेआम अल्जीरिया की आजादी के पक्ष में उतर आये। कट्टर राष्ट्रवादी ताकतों ने देशभर में उनके खिलाफ माहौल बनाया। उन्हें गिरफ्तार कर जेल के डालने की मांग दोहरायी तब द गॉल ने कहा कि सार्त्र वॉल्तेयर की तरह हैं और फ्रांस वाल्तेयर को गिरफ्तार नहीं कर सकता। यानी दे गाल जैसा शासक जानता था कि न्यायप्रिय बुद्धिजीवियों और कलाकारों के साथ समाज में किस तरह बर्ताव किया जाए। क्या दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का घमंड पालने वाले हमारे शासक इस वाकये से कुछ सबक लेंगे। इसी बीच द गाड आफ मॉल थिंग्स की रचेयता और इसी रचना पर  बुकर पुरस्कार विजेता लेखिका अरुंधति रॉय के खिलाफ रांची में दर्ज मामला मंगलवार को न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत में स्थानांतरित कर दिया गया। मामले पर 22 नवम्बर को सुनवाई होगी। 
मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी विजय कुमार ने दोनों मामलों को न्यायिक दंडाधिकारी अमित शेखरी के पास न्यायिक जांच के लिए भेज दिया।

मीडिया कभी नहीं बताता कि आखिर अरुंधति के पास कौन सा जादू है ?

जानी मानी लेखिका अरुंधति राये को लेकर  विवाद फिर गरमाया जा रहा है. अरुंधति की कवरेज को लेकर मीडिया का कुछ हिसा अगर खामोश है तो दूसरा हिस्सा बार बार चिल्ला रहा है कि आखिर अभी तक अरुंधति पर देशद्रोह का मामला दर्ज क्यूं नहीं हुआ. मीडिया के इस हिस्से ने कानूनी विशेषज्ञों की राये भी सब के सामने रखी है कि अरुंधति के कौन कौन से शब्दों पर कौन सा मामला दर्ज हो सकता है और कहां कहां पर हो सकता है. कभी अरुंधति के पुतले जलाये जाने की खबर दिखा दिखा कर, कभी उसे माओवादी बता बता कर, कभी उसे अलगाववादी बता कर एक विशेष "जनमत" बनाने में जुटा मीडिया कभी नहीं बताता कि आखिर अरुंधति के पास कौन सा जादू है ? उसकी सभायों में लोग दूर दूर से चल कर क्यूं पहुंचते हैं? उसकी बातों को देव-वाणी की तरह क्यूं सुनते हैं....? बहुत से सवाल हैं जिनका जवाब भी मीडिया के पास है लेकिन वह उन्हें जनता के सामने लाना ही नहीं चाहता.  मीडिया के इस हिस्से की कुछ अपनी मजबूरियां हैं जिन्हें कभी राष्ट्रवाद का नाम दिया जाता है और कभी शांति और अहिंसा का.  मीडिया की भूमिका पर, मीडिया की आज़ादी पर जनतंत्र ने अरुंधति से ही बात की. सवाल समरेंद्र ने किया  भारत में मीडिया की आज़ादी को आप किस तरह देखती हैं? क्या मीडिया सच में आज़ाद है? 
जवाब में अरुंधति राये ने जो कहा वह भी ज़रा गौर से पढ़ि भारत में बहुत अलग-अलग किस्म का मीडिया हैं। ये जिसे हम कॉरपोरेट मीडिया कहते हैं वो किसी भी तरह आज़ाद नहीं है। हमको मालूम है कि ये सारे जो टीवी चैनल हैं और न्यूज़पेपर हैं उनका 90 फीसदी रेवेन्यू कॉरपोरेट से आता है। तो वो आज़ाद कैसे रह सकते हैं। हम इस चक्कर में पड़ जाते हैं कि आदमी अच्छे नहीं हैं, लेकिन सच्ची बात तो ये है कि उसका ढांचा ही ऐसा है कि वो आज़ाद नहीं रह सकते। अगर उन्होंने किसी भी कॉरपोरेट के ख़िलाफ़ लिखा जैसे टाटा या रिलायंस के ख़िलाफ़ तो अचानक उनकी एडवर्टाइजिंग रेवेन्यू कम हो जाएगी। न्यूज़ पेपर या चैनल चलाना ही मुश्किल हो जाएगा। एक तरह से पूरा जो निजीकरण और कॉरपोरेटाइजेशन हो रहा है। पानी का, हेल्थ का एग्रीकल्चर का .. एक तरह से हमारी ज़िंदगी का पूरा कंट्रोल कॉरपोरेट्स के हाथ में जा रहा है। एक तरह से मीडिया का कंट्रोल भी उनके हाथ में है। जो मीडिया का मौलिक काम है वो इस ढांचे में नहीं हो सकता। ऐसी बहुत सी बातें अरुंधति राये ने कही हैं जो सोचने को मजबूर करती हैं. इन सभी बातों को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करिए. 
हाल ही में जब अरुंधति ने एक सभा में साफ़ साफ कहा कि समाज से तो नक्सली जुड़े हुए हैं, लेकिन सरकार आजादी के बाद से आज तक नहीं जुड़ सकी। जुड़ी होती तो माओवाद पैदा ही नहीं होता। इस बात ने सभी को अंदर तक हिला दिया, सोचने पर मजबूर कर दिया. विकास के दावों की पोल खोलते हुए अरुंधति ने कहा," विकास और नरसंहार का क्या कोई रिश्ता है? अरुधंती ने कहा औपनिवेशिक युग में विकास के लिए नरसंहार होते रहे हैं। यह रिश्ता बहुत पुराना है। जो भी आज विकसित देश बने हैं, वे अपने पीछे नरसंहार छोड़ आए हैं। लैटिन अमेरिका, दक्षिण अफ्रिका आदि देशों में विकास के लिए बड़े पैमाने पर नरसंहार किए गए। अपने देश में भी सरकार विकास के लिए आदिवासियों का नरसंहार कर रही है। आपरेशन ग्रीन हंट इसीलिए चलाया जा रहा है। इसके जरिए सरकार आदिवासियों की जमीन अधिग्रहण कर कारपोरेट कंपनियों को देना चाहती है। वे धरती के गर्भ में छिपे बाक्साइट को कंपनियों के हवाले करना चाहते हैं। इससे किसका विकास होगा? देश का? नहीं। इससे कंपनियां मालामाल हो जाएंगी, हो रही हैं। सरकार के हाथों कुछ नहीं आएगा। रॉय ने कहा, देश में नई स्थिति है। अब अपने देश में ही आदिवासी क्षेत्रों में नई कालोनियां बनाई जा रही हैं। यह आंतरिक उपनिवेशवाद है।" इसे पूरा पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.
अरुंधति  की चर्चा अब मुंबई, रांची या दिल्ली में ही नहीं, पंजाब में भी है. उसकी बात अब हिंदी या अंग्रेजी में ही नहीं पंजाबी में भी है, टीवी या अखबारों में ही नहीं इंटरनैट और फेसबुक पर भी है.  फेसबुक पर पंजाबी पाठक इसे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. अगर आप भी इस मुद्दे पर कुछ कहना चाहते हैं तो आपके विचारों की इंतज़ार हमें भी है.   --रेक्टर कथूरिया 

Sunday, October 24, 2010

डाक्टर एच. एल. लोबो की स्मृति में किया गया संगोष्ठी का आयोजन

अपने पैरों पर खड़ा होना बहुत पुरानी चुनौती है, अपने पैरों पर बिना किसी कष्ट के खड़ा हुए बिना ज़िन्दगी सम्मान और मज़े से जीना बहुत ही मुश्किल हो जाता है. इसका अर्थ चाहे बहुत से दूसरे क्षेत्रों से है लेकिन यह हकीकत शरीर के मामले में भी इसी तरह लागू होती है लेकिन जिस्म के मामले में अगर घुटने ही जवाब दे जाएं तो बेचारे पैर अकेले क्या कर सकते हैं.ज्यूं ज्यूं उम्र बढ़ती है घुटनों का दर्द भी तेज़ी से बढ़ने लगता है. इस दर्द के साथ ही शुरू हो जाता है बहुत सी दूसरी परेशानियों का सिलिसला. खान पान और रहन सहन की जीवन शैली अगर संतुलित न रहे तो यह दर्द एक गंभीर समस्या बन कर सामने आता. इस दर्द से निजात दिलाने के लिए आप्रेशन कितना सफल रहते हैं और कितना असफल इसकी चर्चा लुधियाना के क्रिश्चियन मेडिकल कालेज और अस्पताल में हुई एक संगोष्ठी में भी हुई. इस संगोष्ठी का आयोजन डाक्टर एच. एल. लोबो की स्मृति में किया गया था. 
फोटो सौजन्य :Orthop Washington
डाक्टर लोबो एक जानेमाने आर्थो सर्जन थे. वह सी एम सी लुधियाना में प्रोफैसर के तौर पर 1969 में आये. यहां विभागीय प्रमुख भी रहे. वर्ष 1971 से 1982 तक वह कालेज के प्रिंसीपल भी रहे. उनके मार्गदर्शन में यह सब बहुत ही कुशलता से चल रहा था कि अचानक ही 1983 में उनका देहांत हो गया. उनके स्नेह से सराबोर रहे उनके छात्रों ने उनके सम्मान में एक व्याखान माला का सिलसिला शुरू किया जिसे हर वर्ष आयोजित किहा जाता है. इस बार डाक्टर लोबो की स्मृति में इस तरह के 28वें सेमीनार का आयोजन हुआ शनिवार 23 अक्टूबर 2010 को. गौरतलब है कि इसका आयोजन डा. लोबो मेमोरिअल ट्रस्ट और सी एम सी लुधियाना के आर्थो विभाग की तरफ से मिलजुल कर किया जाता है. ट्रस्ट के प्रधान एस आर वडेरा और सचिव डाक्टर एम के महाजन ने कहा के इसका आयोजन पिछले 27 बरसों से लगातार जारी है.
इस मौके पर घुटनों के दर्द और इस दर्द से निजात पाने के लिए अपनाये जा रहे उपायों की चर्चा भी बहुत ही व्यापक स्तर पर हुई. आर्थो के जानेमाने वरिष्ठ सर्जन और टेक्सास टेक यूनिवर्सिटी अमेरिका के आर्थो विभाग के असोसिएट प्रोफेसर रह चुके डाक्टर सी वी अनंता कृष्णन इस मौके पर मुख्य मेहमान थे जबकि चंडीगढ़ से आये GMCH के निर्देशक प्रिंसिपल डा. राज  बहादुर वशिष्ठ अतिथि थे. CMCH के आर्थो विभाग के प्रमुख डा. बोबी जॉन  ने कहा की घुटनों की रवीज़न सर्जरी आज के समय की मुख्य आवशयकता है. सी एम सी एच के ही आर्थो विभाग के असोसिएट प्रमुख डा. अनुपम महाजन ने कहा कि अब घुटने बदलने कि प्रक्रिया को समाज भी स्वीकार करने लगा है. इस अवसर पर कई अन्य प्रमुख विशेषज्ञ भी मौजूद थे.                                                                          --रेक्टर कथूरिया