Saturday, August 21, 2010

एक छोटी सी ब्रेक

जब जंग लगती है तो शुरू हो जाता है कभी भी न खत्म होने वाली समस्यायों का एक लम्बा सिलसिला. लोगों के साथ साथ वहां लड़ने गयी सेना को भी बहुत सी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. ऐसी हालत में अगर आम जनता और लोगों का आपसी सम्बन्ध मजबूत न हो तो बात और बिगड़ जाती है. इस लिए लोगों से सम्पर्क बनाना, उनके दुःख जानना, उनकी तकलीफों का पता लगाना, अमेरिकी सेना की उस पलटन के जवानों को भी बहुत आवश्यक लगा जो अफगानिस्तान के ज़बूल क्षेत्र में तायनात हैं.  जब इस पलटन के ये जवान 16 अगस्त 2010 को Mizan चौंकी पहुंचे तो इन जवानों ने थोड़ी सी ब्रेक ली. इस छोटी सी ब्रेक के इन पलों को देखते ही देखते अमेरिकी वायु सेना के Senior Airman Nathanael Callon  ने झट से अपने कैमरे में कैद कर लिया. आपको यह तस्वीर कैसी लगी....अवश्य बताएं...रेक्टर कथूरिया 

28 अगस्त को फिर बुलंद होगी पेड न्यूज़ के खिलाफ आवाज़


ज़रा सोचिये कैसा होगा वह दिन जब अखबारों और चैनलों में आतंकवादियों की तरफ से बड़ी बड़ी खबरें छपेंगी कि सबसे अच्छे हैं हम, हमने जहां जहां भी गोलियां चलायी, बम धमाके किये वे बहुत आवश्यक थे, उनमें मासूम लोग नहीं सभी पापी मारे गए, हमने किसी निर्दोष की हत्या नहीं की, हमने तो पापी का वध किया...., भ्रष्ट तत्वों और तस्करों जैसे समाज विरोधी तत्वों की तरफ से कहा जायेगा कि हमने जो रिश्वत ली वह तो बहुत आवश्यक थी, पैसे का संतुलन बनाये रखने के लिए उठाया गया कदम था, उस पैसे के  बदले हमने देश के राज़ नहीं बेचे, जो कागज़ बरामद हुए वे तो रद्दी के टुकड़े थे, बदबू मार रहे थे हमने उन्हें हटा कर सफाई कर दी है...फिर उस पैसे से हमने धर्मस्थलों में लंगर भी तो लगवाये हैं...देश के साथ हुए सौदों से जो पैसा खाने का इल्जाम हम पर है वह तो हमारी कमिशन थी...पूरी तरह से कानूनी कमाई.....अगर इस तरह की बहुत सी खबरें छपने लगें तो आप हैरान मत होना कि यह क्या हो रहा है. पेड न्यूज़ के चलते यही सब होने वाला है. पैसे खर्चो, कुछ कालम या फिर पेज खरीदो और उनमें छपवा डालो अपनी मर्जी की बातें. अगर पैसे थोड़े ज्यादा खर्चे जाएं तो उसके अंत में छोटा सा शब्द विज्ञापन भी नहीं दिखेगा. यही हालत चैनलों में भी आम हो जाएगी. अगर आप के आसपास सारी  की सारी स्थिति नर्क जैसी भी हुई तो भी खबर आयेगी स्वर्ग से सुंदर इलाका.
पेड न्यूज़ की चर्चा राज्य सभा में भी हुई थी, संगोष्ठियों में भी यह मुद्दा उठा, इसे मीडिया घरानों की काली कमाई भी कहा गया..ऐसा और भी बहुत कुछ कहा सुना गया. इसी बीच 5 अगस्त गुरूवार की रात को राजनीती खेल सत्ता का के विषय पर बहस शुरू करने से पहले मोर्य टीवी के एंकर ने ख़बरों की खरीदो फरोख्त के खिलाफ बाकायदा घोषणा की कि मोर्य टीवी मोर्य टीवी पेड न्यूज़ नहीं दिखायेगा.  अब जागरूक पत्रकारों ने इस विरोध को और भी ज़ोरदार बनाते हुए पेड न्यूज़ के खिलाफ बिगुल बजा दिया है.
फिलहाल जो पत्रकार एंटी पेड न्यूज़ फोरम से जुड़ चुके हैं, उनके नाम इस प्रकार हैं- अमरनाथ तिवारी (द पॉयनियर), अजय कुमार (बिहार टाइम्स डॉट काम), आनंद एस. टी. दास (एशियन एज), अभय कुमार (डेक्कन हेराल्ड), धर्मवीर सिन्हा (आज तक, झारखंड), गंगा प्रसाद (जनसत्ता), हरिवंश (प्रभात ख़बर), मणिकांत ठाकुर (बीबीसी), मनोज चौरसिया (स्टेट्समैन), मुकेश कुमार (मौर्य टीवी), निवेदिता झा (नई दुनिया), प्रियरंजन भारती (राजस्थान पत्रिका), सौम्यजीत बैनर्जी (द हिंदू), संतोष सिंह (इंडियन एक्सप्रेस), संजय सिंह (द ट्रिब्यून), सुजीत झा (आज तक, बिहार), श्रीकांत प्रत्यूष (ज़ी न्यूज़), सुरूर अहमद (स्वतंत्र पत्रकार), शशिधर खान (स्वतंत्र पत्रकार)।



फोरम बिहार, झारखंड और दूसरे राज्यों के पत्रकारों का सहयोग और समर्थन हासिल करने के लिए सीधे संपर्क कर रहा है। इस ख़बर के माध्यम से भी वह समस्त पत्रकारों, पत्रकार संगठनों और मीडिया संस्थानों से अपील करता है कि वे इस मुहिम को मज़बूती प्रदान करने के लिए 28 अगस्त को पटना में जुटें और सामूहिक तौर पर आवाज़ बुलंद करें। पेड न्यूज़ के ख़िलाफ़ इस मुहिम से जुड़ने के लिए या इस बारे में अपने सुझाव देने के लिए कृपया इस पते पर मेल करें- antipaidnews@gmail.com
गौरतलब है कि वर्ष 2009 के अंत में एडीटरज गिल्ड ने भी इसे ख़बरों का काला धंधा बताते हुए इसे रोकने के लिए पहल की थी. अब देखना यह है कि मीडिया पर जनता का भरोसा कायम रहता है या दूसरे क्षेत्रों कि तरह यहां भी आम आदमी को निराशा ही हाथ लगने वाली है...???   -रेक्टर कथूरिया 

Tuesday, August 17, 2010

आध्यात्मिकता अमीरों की ट्रांक्विलाइज़र है

परेशानी, तनाव, क्रोध और उतेजना के वे पल जिनमें कुछ कर गुजरने का जोश भी पैदा होता है, हालात को बदलने के लिए जान की बाज़ी लगाने की हिम्मत भी जन्म लेती है, इन्सान आर या पार की जंग लड़ने का मन बनाता है वे अनमोल पल कभी कभी उस समय मिट्टी में मिल जाते हैं जब इन्सान को कोई बहका लेता है केवल यह कह कर कि यह सब तो किस्मत का खेल है, कर्मों का फल, भगवान की इच्छा, तुम क्या कर सकते हो, तुम्हारा क्या बस चलेगा उस सर्वशक्तिमान के सामने बस बैठो और उसका नाम जपो...! शायद इसी लिए धर्म को  अफीम कहा गया. यही विचार बहुत से अमीरों पर भी उस वक्त असर करता है जब वे अपने ही हाथों हो रहे दूसरों के शोषण को देख कर आत्म ग्लानी से भर उठते हैं, इसे बंद करना चाहते हैं..लेकिन यह विचार उन्हें शक्ति देता है इस पाप कि भावना को भूलाने की और  लूट-खसूट और शोषण के इस सिलसिले को जारी रखने की. पूर्व जन्मों के कर्मों की सज़ा और इनाम के चक्कर में उलझा कर यह अमीरों को भी कभी सही पथ पर नहीं आने देता. कभी भगवान कृष्ण ने भी अगर ऐसा ही सोचा या कहा होता तो आज केवल दुर्योधन का ही नाम होता और अर्जुन तो महाभारत से भी पहले ही कहीं खो गया होता. तब का गीता उपदेश आज भी बहुत अर्थपूर्ण है. लेकिन उसके अर्थों में भी आज नए नए संशय डालने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही. मैं यह सब सोच ही रहा था कि शहीद भगत सिंह जी के अत्यंत निकट पारिवारिक सदस्य प्रोफैसर जगमोहन सिंह जी की तरफ से एक मेल मिली. इस मेल में एक विशेष रचना थी जिसे थोडा और खोजने पर पता चला कि इसे कबाडखाना में भी प्रकाशित किया जा चुका है.  रचना बहुत ही महत्वपूर्ण है, इसलिए इसे आप पढ़िए अवश्य. यहाँ केवल इस ख़ास भाषण के कुछ अंश दिए जा रहे है.जो आपको ले चलेंगे उस हकीकत की ओर जिसे बदलने के लिए आप चल सकेंगे संघर्ष की राह पर :--रेक्टर कथूरिया  
इसकी शुरुयात होती है कुछ इस तरह,  'हमारे समय के बड़े कवि-कहानीकार श्री कुमार अम्बुज ने मेल से यह ज़बरदस्त और ज़रूरी दस्तावेज़ भेजा है. बहुत सारे सवाल खड़े करता जावेद अख़्तर का यह सम्भाषण इत्मीनान से पढ़े जाने की दरकार रखता है. इस के लिए श्री कुमार अम्बुज और डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल का बहुत बहुत आभार." (जावेद अख्तर के इण्डिया टुडे कॉनक्लेव में दिनांक 26 फरवरी, 2005 को ‘स्पिरिचुअलिटी, हलो ऑर होक्स’ सत्र में दिए गए व्याख्यान का डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल द्वारा किया गया हिन्दी अनुवाद)


जावेद साहिब ने याद दिलाया," उसी क्षण मैंने महसूस किया कि एक और खासियत है जो मुझमें और आधुनिक युग के गुरुओं में समान रूप से मौज़ूद है. मैं फिल्मों के लिए काम करता हूं. हममें काफी कुछ एक जैसा है. हम दोनों ही सपने बेचते हैं, हम दोनों ही भ्रम-जाल रचते हैं, हम दोनों ही छवियां निर्मित करते हैं. लेकिन एक फर्क़ भी है. तीन घण्टों के बाद हम कहते हैं – “दी एण्ड, खेल खत्म! अपने यथार्थ में लौट जाइए.” वे ऐसा नहीं करते." 


उन्होंने यह भी कहा,'कोई ताज़्ज़ुब नहीं कि पुणे में एक आश्रम है, मैं भी वहां जाया करता था. मुझे वक्तृत्व कला अच्छी लगती थी. सभा कक्ष के बाहर एक सूचना पट्टिका लगी हुई थी: “अपने जूते और दिमाग बाहर छोड़ कर आएं”.


"आप ज़रा दुनिया का नक्शा उठाइए और ऐसी जगहों को चिह्नित कीजिए जो अत्यधिक धार्मिक हैं -चाहे भारत में या भारत के बाहर- एशिया, लातिन अमरीका, यूरोप.... कहीं भी. आप पाएंगे कि जहां-जहां धर्म का आधिक्य है वहीं-वहीं मानव अधिकारों का अभाव है, दमन है. सब जगह. हमारे मार्क्सवादी मित्र कहा करते थे कि धर्म गरीबों की अफीम है, दमित की कराह है. मैं उस बहस में नहीं पड़ना चाहता. लेकिन आजकल आध्यात्मिकता अवश्य ही अमीरों की ट्रांक्विलाइज़र है."


 "आप जानते हैं कि कामयाबी-नाकामयाबी भी सापेक्ष होती है. कोई रिक्शा वाला अगर फुटपाथ पर जुआ खेले और सौ रुपये जीत जाए तो अपने आप को कामयाब समझने लगेगा, और कोई बड़े व्यावसायिक घराने का व्यक्ति अगर तीन करोड भी कमा ले, लेकिन उसका भाई खरबपति हो, तो वो अपने आप को नाकामयाब समझेगा. तो, यह जो अमीर लेकिन नाकामयाब इंसान है, यह क्या करता है? उसे तलाश होती है एक ऐसे गुरु की जो उससे कहे कि “कौन कहता है कि तुम नाकामयाब हो?"


 और भी लोग हैं. ऐसे जिन्हें यकायक कोई आघात लगता है. किसी का बच्चा चल बसता है, किसी की पत्नी गुज़र जाती है. किसी का पति नहीं रहता. या उनकी सम्पत्ति नष्ट हो जाती है, व्यवसाय खत्म हो जाता है. कुछ न कुछ ऐसा होता है कि उनके मुंह से निकल पड़ता है: “आखिर मेरे ही साथ ऐसा क्यों हुआ?” किससे पूछ सकते हैं ये लोग यह सवाल? ये जाते हैं गुरु के पास. और गुरु इन्हें कहता है कि “यही तो है कर्म. लेकिन एक और दुनिया है जहां मैं तुम्हें ले जा सकता हूं, अगर तुम मेरा अनुगमन करो. वहां कोई पीड़ा नहीं है. वहां मृत्यु नहीं है. वहां है अमरत्व. वहां केवल सुख ही सुख है”. तो इन सारी दुखी आत्माओं से यह गुरु कहता है कि “मेरे पीछे आओ, मैं तुम्हें स्वर्ग में ले चलता हूं जहां कोई कष्ट नहीं है”. आप मुझे क्षमा करें, यह बात निराशाजनक लग सकती है लेकिन सत्य है, कि ऐसा कोई स्वर्ग नहीं है. ज़िन्दगी में हमेशा थोड़ा दर्द रहेगा, कुछ आघात लगेंगे, हार की सम्भावनाएं रहेंगी. लेकिन उन्हें थोड़ा सुकून मिलता है. 


और जिस बात पर मुझे ताज़्ज़ुब होता है, और जिससे मेरी आशंकाओं की पुष्टि भी होती है वह यह कि ये तमाम ज्ञानी लोग, जो कॉस्मिक सत्य, ब्रह्माण्डीय सत्य को जान चुके हैं, इनमें से कोई भी किसी सत्ता की मुखालिफत नहीं करता. इनमें से कोई सत्ता या सुविधा सम्पन्न वर्ग के विरुद्ध अपनी आवाज़ बुलन्द नहीं करता. दान ठीक है, लेकिन वह भी तभी जब कि उसे प्रतिष्ठान और सत्ता की स्वीकृति हो. लेकिन आप मुझे बताइये कि कौन है ऐसा गुरु जो बेचारे दलितों को उन मंदिरों तक ले गया हो जिनके द्वार अब भी उनके लिए बन्द हैं? मैं ऐसे किसी गुरु का नाम जानना चाहता हूं जो आदिवासियों के अधिकारों के लिए ठेकेदारों से लड़ा हो. मुझे आप ऐसे गुरु का नाम बताएं जिसने गुजरात के पीड़ितों के बारे में बात की हो और उनके सहायता शिविरों में गया हो. ये सब भी तो आखिर इंसान हैं. जावेद जी ने बहुत कुछ और भी कहा है जिसे आप तभी जान पायेंगे अगर आप इसे पूरा पढेंगे. पूरा पढने के लिए यहां क्लिक करें. 

Monday, August 16, 2010

मधु गजाधर की कविता मेरा देश चर्चामंच पर

बहुत सी तमन्नाएं होती हैं जो कभी पूरी नहीं होतीं, बहुत से खवाब होते हैं जो बुरी तरह टूट जाते हैं, बहुत सी बातें होतीं हैं जो अनकही रह जातीं हैं...हम सभी की ज़िन्दगी में यह सिलसिला ऐसे ही चलता है. हम जिम्मेदारियों के बोझ तले दब कर मुस्कराहट के मुखौटे पहने हुए कब अपनी बारी आने पर किसी और दुनिया में पहुंच जाते हैं कुछ पता नहीं चलता. मन का यह दर्द रोज़ रोज़ हार जाता है. अंतर आत्मा पर बोझ बनता है लेकिन न कभी टूटता है और न ही अपनी हर को स्वीकार करता है. हर रोज़ जगा लेता है नयी उम्मीद का चिराग. हर सफ़र के बाद लगा लेता है पांवों के छालों पर मरहम और फिर मुस्कराते हुए चल पड़ता है अनदेखी अनजानी मंजिलों की तरफ. ज़िन्दगी के इन रंगों को नज़दीक से देखने और फिर उन्हें शब्दों में पिरो सकने की क्षमता रखने वाली संगीता स्वरुप ( गीत ) ने एक खुशखबरी भेजी है.उन्होंने मधु गजाधर की एक कविता चर्चा मंच में शामिल करने की सूचना दी है. उन्होंने बताया कि मंगलवार 17 अगस्त को आपकी रचना  "मेरा देश ...." इस बार  चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है ....." सभी स्नेहियों से निवेदन है कि वे कृपया वहाँ आ कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ....आपका इंतज़ार रहेगा ..आपकी अभिव्यक्ति ही हमारी प्रेरणा है ... आभार". गौरतलब है कि मधु गजाधर मलेशिया में रहती हैं और वहां के राष्ट्रीय टीवी और रेडियो के लिए कई तरह के कार्यक्रम प्रस्तुत करती हैं. आप भी उनकी रचना को जानें और उस पर अपने अनमोल विचार दें. --रेक्टर कथूरिया 


*संगीता स्वरूप की कवितायें बिखरे मोती पर 

संगीता स्वरुप 
मधु गजाधर 
*उनकी ही कुछ और रचनाएँ गीत...मेरी अनुभूतियां पर भी 

*मधु गजाधर की कविता मेरा देश 

Sunday, August 15, 2010

पंडित राम प्रसाद बिस्मिल की एक यादगारी नज्म

 स्वतन्त्रता दिवस पर विशेष                   पंडित राम प्रसाद बिस्मिल की एक यादगारी नज्म
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है
(ऐ वतन,) करता नहीं क्यूँ दूसरी कुछ बातचीत,
देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफ़िल में है
ऐ शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत, मैं तेरे ऊपर निसार,
अब तेरी हिम्मत का चरचा ग़ैर की महफ़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
विशेष किताब  
वक़्त आने पर बता देंगे तुझे, ए आसमान,
हम अभी से क्या बताएँ क्या हमारे दिल में है
खेँच कर लाई है सब को क़त्ल होने की उमीद,
आशिकों का आज जमघट कूचा-ए-क़ातिल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
है लिए हथियार दुश्मन ताक में बैठा उधर,
और हम तैयार हैं सीना लिए अपना इधर.
ख़ून से खेलेंगे होली अगर वतन मुश्क़िल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
हाथ, जिन में है जूनून, कटते नही तलवार से,
सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से.
और भड़केगा जो शोला सा हमारे दिल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
हम तो घर से ही थे निकले बाँधकर सर पर कफ़न,
जाँ हथेली पर लिए लो बढ चले हैं ये कदम.
ज़िंदगी तो अपनी मॆहमाँ मौत की महफ़िल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
यूँ खड़ा मक़्तल में क़ातिल कह रहा है बार-बार,
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है?
दिल में तूफ़ानों की टोली और नसों में इन्कलाब,
होश दुश्मन के उड़ा देंगे हमें रोको न आज.
दूर रह पाए जो हमसे दम कहाँ मंज़िल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
वो जिस्म भी क्या जिस्म है जिसमे न हो ख़ून-ए-जुनून
क्या लड़े तूफ़ान से जो कश्ती-ए-साहिल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में

سرفروشی کی تمنا اب ہمارے دل میں ہے
سرفروشی کی تمنا اب ہمارے دل میں ہے
دیکھنا ہے زور کتنا بازوئے قاتل میں ہے


ایک سے کرتا نہیں کیوں دوسرا کچھ بات چیت
دیکھتا ھوں میں جسے وہ چپ تیری محفل میں ہے
اے شہید ملک و ملت میں تیرے اوپر نثار
اب تیری ہمت کا چرچہ غیر کی محفل میں ہے
سرفروشی کی تمنا اب ہمارے دل میں ہے


وقت آنے دے بتا دیں گے تجہے اے آسمان
ہم ابھی سے کیا بتائیں کیا ہمارے دل میں ہے
کھینج کر لائی ہے سب کو قتل ہونے کی امید
عاشقوں کا آج جمگھٹ کوچئہ قاتل میں ہے
سرفروشی کی تمنا اب ہمارے دل میں ہے


ہے لئے ہتھیار دشمن تاک میں بیٹھا ادھر
اور ہم تیار ھیں سینہ لئے اپنا ادھر
خون سے کھیلیں گے ہولی گر وطن مشکل میں ہے
سرفروشی کی تمنا اب ہمارے دل میں ہے


ہاتھ جن میں ہو جنون کٹتے نہیں تلوار سے
سر جو اٹھ جاتے ہیں وہ جھکتے نہیں للکا ر سے
اور بھڑکے گا جو شعلہ سا ہمارے دل میں ہے
سرفروشی کی تمنا اب ہمارے دل میں ہے


ہم جو گھر سے نکلے ہی تھے باندہ کے سر پہ کفن
جان ہتھیلی پر لئے لو، لے چلے ہیں یہ قدم
زندگی تو اپنی مہمان موت کی محفل میں ہے
سرفروشی کی تمنا اب ہمارے دل میں ہے


یوں کھڑا مقتل میں قاتل کہہ رہا ہے بار بار
کیا تمناِ شہادت بھی کِسی کے دِل میں ہے
دل میں طوفانوں کی تولی اور نسوں میں انقلاب
ھوش دشمن کے اڑا دیں گے ھمیں روکو نہ آج
دور رہ پائے جو ہم سے دم کہاں منزل میں ہے


وہ جِسم بھی کیا جِسم ہے جس میں نہ ہو خونِ جنون
طوفانوں سے کیا لڑے جو کشتیِ ساحل میں ہے


سرفروشی کی تمنا اب ہمارے دل میں ہے
دیکھنا ہے زور کتنا بازوئے قاتل میں ہے
The Urdu Script was used as a base from here, written by Indian(Now Pakistani) poet 
Sarfaroshi Ki Tamanna
Sarfaroshi ki tamanna ab hamaare dil mein hai
Dekhna hai zor kitna baazu-e-qaatil mein hai
Aye watan, Karta nahin kyun doosree kuch baat-cheet
Dekhta hun main jise woh chup teri mehfil mein hai
Aye shaheed-e-mulk-o-millat main tere oopar nisaar
Ab teri himmat ka charcha gair ki mehfil mein hai
Sarfaroshi ki tamanna ab hamaare dil mein hai
Waqt aanay dey bata denge tujhe aye aasman
Hum abhi se kya batayen kya hamare dil mein hai
Kheench kar layee hai sab ko qatl hone ki ummeed
Aashiqon ka aaj jumghat koocha-e-qaatil mein hai
Sarfaroshi ki tamanna ab hamaare dil mein hai
Hai liye hathiyaar dushman taak mein baitha udhar
Aur hum taiyyaar hain seena liye apna idhar
Khoon se khelenge holi gar vatan muskhil mein hai
Sarfaroshi ki tamanna ab hamaare dil mein hai
Haath jin mein ho junoon katt te nahi talvaar se
Sar jo uth jaate hain voh jhukte nahi lalkaar se
Aur bhadkega jo shola-sa humaare dil mein hai
Sarfaroshi ki tamanna ab hamaare dil mein hai
Hum to ghar se nikle hi the baandhkar sar pe kafan
Jaan hatheli par liye lo barh chale hain ye qadam
Zindagi to apni mehmaan maut ki mehfil mein hai
Sarfaroshi ki tamanna ab hamaare dil mein hai
Yuun khadaa maqtal mein qaatil kah rahaa hai baar baar'Kya tamannaa-e-shahaadat bhi kisee ke dil mein hai
Dil mein tuufaanon ki toli aur nason mein inqilaab
Hosh dushman ke udaa denge humein roko na aaj
Duur reh paaye jo humse dam kahaan manzil mein hai
Sarfaroshi ki tamanna ab hamaare dil mein hai
Wo jism bhi kya jism hai jismein na ho khoon-e-junoon
Toofaanon se kya lade jo kashti-e-saahil mein hai
Chup khade hain aaj saare bhai mere khaamosh hain
Na karo to kuch kaho mazhab mera mushkil mein hai
Sarfaroshi ki tamanna ab hamaare dil mein hai.
Dekhna hai zor kitna baazuay qaatil mein hai.
The poem was used in the 1965 Manoj Kumar movie Shaheed on the life of Bhagat Singh. It was again used (with altered lines) as the lyrics for a song in the 2002 Hindi film The Legend of Bhagat Singh. The poem has also been used in the 2006 film Rang de Basanti. The poem is also referenced in abridged form in the 2009 movie Gulaal by Anurag Kashyap. In the 2009 film Gulaal, the following lines were recited by Piyush Mishra:


सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए कातिल में है


वक़्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमां
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है


ओ रे बिस्मिल काश आते आज तुम हिन्दोस्तां
देखते कि मुल्क सारा यूँ टशन में, थ्रिल में है


आज का लड़का तो कहता हम तो बिस्मिल थक गए
अपनी आज़ादी तो भैया लौंडिया के तिल में है


आज के जलसों में बिस्मिल एक गूंगा गा रहा
और बहरों का वो रेला नाचता महफ़िल में है


हाथ की खादी बनाने का ज़माना लद गया
आज तो चड्डी भी सिलती इंग्लिसों की मिल में है


वक़्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमां
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है


सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए क़ातिल में है.


शहीद राम प्रसाद बिस्मिल पर एक विशेष किताब भी प्रकाशित की गयी डायमंड पाकेट बुक्स की तरफ से. जनवरी 2007 में प्रकाशित की गयी 128 पेजों की इस पुस्तक का परिचय देते हुए लेखक भवन सिंह रना ने बहुत ही भावुक शब्दों में लिखा है
 "स्वतंत्रता संग्राम क्रांतिकारियों का संदर्भ आते ही, जो वीर हमारी स्मृति में कौंध जाते हैं, उनमें रामप्रसाद बिस्मिल का नाम अग्रणी है। मध्य प्रदेश ग्वालियर के माता-पिता की संतान के रूप में बिस्मिल मैनपुरी उत्तर प्रदेश में जन्मे जो संभवत: उनकी ननिहाल था, वह पिता के कठोर अनुशासन में पले बढ़े और उन्होंने अनेकों विद्वानों और साधुजन की संगति पाई, लेकिन अंग्रेज सरकार के प्रति विद्रोह की आग जो उनके सीने में एक बार बैठी, वह दिनों दिन धधकती चली गई। इस आग ने उनके देश प्रेम से ओत-प्रोत कवि को जगाया और उत्तरोत्तर देश के अतिरिक्त शेष सब प्रसंगों से विरक्त होते चले गए। यहां तक कि उनके उद्वेग ने उनके प्राणों के प्रति मोह को भी पीछे छोड़ दिया।" 

 "यह सब जानते हैं कि उन्होंने हंसते हुए फांसी का फंदा गले में यह कहते हुए डाल लिया कि अंग्रेज साम्राज्य का विनाश उनकी अंतिम इच्छा है, लेकिन उनका पूरा जीवन वृत्तांत भी सब जानें और विस्मृत न हो, यह भी बहुत जरूरी है क्योंकि देश हर एक युग में रामप्रसाद बिस्मिल मांग सकता है।"
"विश्वास है यह पुस्तक उस आग को जिलाए रखने में भरपूर समर्थ होगी।" 
नोट :  इस विशेष पुस्तक के कवर की तस्वीर ऊपर दी गयी है.


रामप्रसाद बिस्मिल का अंतिम पत्र

मेरा देश ....

मधु गजाधर 


मित्र Bhopal Mtfc ने भेजा 

हम भारत से बाहर जाकर बसने वाले भारतीय कभी भी मन प्राण से भारत से दूर नहीं हो पाए| हमने हर रूप में भारत को अपने अंदर समाहित किया हुआ है अब वो हमारी वेशभूषा में हो, हमारी भाषा में हो, हमारी भोजन पद्दति में हो हमारे तीज त्योहारों में हो |ये साधारण सी कविता अपने देश से हजारों मील दूर जाकर देश के प्रेम में उभरी है |
मैं मानती हूँ की काव्य के द्रष्टिकोण से कोई भी विशेषता इस में नहीं है पर इस में मेरा देश प्रेम है ... मेरा भारत कोई साधारण देश नहीं है |मैंने लगभग 37  देशों की यात्रा की है |हर देश में मेरी साड़ी , बिंदी और सिन्दूर के आधार पर मेरी पहचान सदा एक भारतीय स्त्री के रूप में हुई ...लोगों ने हर जगह मुझे बहुत मान सम्मान दिया ...वो मान सम्मान मधु के लिए नहीं था ..वो मान सम्मान था मधु की भारतीयता का...वास्तव में मेरे देश के यश मान ने ही मुझे भी मान सम्मानदिलवाया है | आज मेरे देश की आजादी की वर्ष गांठ के शुभ अवसर पर मैं मधु गजाधर मारीशस के इस छोटे से द्वीप से ,जिसे लघु भारत भी कहा जाता है ,भारत और विश्व भर में फैले भारतीय मूल केसमस्त लोगों और भारत के सभी मित्रों को शुभ कामना देती हूँ ...मेरे देश भारत की यश पताका विश्व के गगन मंडल पर सदा गर्व से लहराती रहे, बहुत शीघ्र भारत विश्व की सब से बड़ी शक्ति बन कर उभरे ,हम जहाँ भी रहे अपने भारत से चिपके रहें ...ऐसी मैं मंगल कामना करती हूँ |  --मधु गजाधर 


एक कविता...मेरा देश ....by  Madhu Gujadhur
देश छुट जाता है,
बाहरी रूप से ,
मगर देश नहीं छुटता
अंतर्मन से
क्यों होता है ऐसा
सिर्फ हमारे साथ,
हम भारतीयों के साथ,
कि किस्मत की हवा जहाँ भी ले जाए हमें ,...
धरती का कोई भी कोना हो ,
कैसे भी लोग हों,कोई भी भाषा हो,
हम भारतीय लोग
कुछ न कुछ कर के ,
छुपा कर, चुरा कर ,दबा कर ,
मुठ्ठी में बंद कर के
और कलेजे से लगा कर ,
अपना भारत ,
अपने साथ ले आते है ,
और फिर वो भारत,
दुनिया के कोने कोने में
हमारे साथ फ़ैल जाता है
कभी हिंदी ,पंजाबी,तमिल,तेलुगु ,गुजराती ,मराठी में
बतियाता है ,
तो कभी,
हींग के तडके में ,
रासम के मसाले में ,
आलू मूली के परांठों में ,
खस्ता कचोरियों में ,
अचार के मसालों में
गंधाता है,
और कभी
आरती के सुर में,
सतनाम के जाप में ,
वैदिक मन्त्रों के कर्ण नाद में ,
छट,करवाचौथ,वट सावित्री,
या अन्नंत चौदस की कथा में
गुंजाता है ,
और कहीं
जयपुरी लहरिया में,
तंजोर में कांजीवरम में ,
पंजाब की फुलकारी में ,
बांधनी में या सिल्क में
लहराता है
और हम जीने लगते है अपने ही साथ लाये उस भारत में
देश छुट जाता है ,
पर देश नहीं छुटता,
अंतर्मन से कभी नहीं छुटता
हाँ भारत देश कभी नहीं छुटता..
क्योंकि ...
भारत कोई देश नहीं है ,
भारत कोई जमीन का टुकड़ा नहीं है
भारत भोगोलिक सीमाओं में बंधा
कोई मानचित्र नहीं है ,
भारत तो एक भावना है ,
गहरी भावना ,ऐसी भावना ,
जिसे आप महसूस तो कर सकते हैं
पर व्यक्त नहीं कर सकते ,
क्योंकि
भारत एक आत्मा है ,
भारत साँसें है ,
भारत प्राण है ,
और इसीलिए
देश छुट जाता है ,
पर देश नहीं छुटता ,
अंतर्मन से ,
हाँ भारत देश नहीं छुटता
कभी नहीं छुटता
और इस देश का वासी
जीवन की अंतिम घडी में भी
बस यही मांगता है
उस मालिक से,
अगला जनम मोहे भारत में ही दीजौ.....!