Saturday, August 14, 2010

गीत चोरी के मामले में सरताज को नोटिस जारी

चोरी गीतों की सीडी का कवर 
जानेमाने पंजाबी गायक सतिंदर सरताज ने गीत चोरी के एक मामले में माफ़ी मांग ली है. इस आश्य का एक पत्र शुक्रवार को लुधियाना में की गयी एक प्रैस कान्फ्रंस में जारी किया गया. पंजाबी और अंग्रेजी में जारी इस पत्र पर न तो कोई तारीख डाली गयी है, न ही इसे जारी करने वाले किसी व्यक्ति या संगठन और न ही कोई हस्ताक्षर. इसी बीच सरताज को कानूनी नोटिस भी जारी कर दिया गया है.गौरतलब है कि सतिन्द्र सरताज अपने कार्यक्रमों के सिलसले में दो दिन से लुधियाना में हैं. लुधियाना के मास्टर तारा सिंह  कालेज में एक शानदार प्रोग्राम देने के बाद अब सरताज का अगला प्रोग्राम स्वतन्त्रता दिवस के मौके पर ह्र्शीला रेसोर्ट में हो रहा है. इस गायक ने कुछ और शायरों के साथ फिरोजपुर  के एक पंजाबी शायर तरलोक जज की एक गज़ल के कुछ शेयर भी गाये थे लेकिन इस गायन के दौरान न तो शायर का नाम लिया गया और न ही शायर को किसी किस्म की कोई जानकारी दी gayi. जब मामला गरमाया तो सरताज ने कहा की एक बार मेरा विदेश टूर पूरा होने दो. शायर की सहमती मिलते ही वह उसी रात की फलाईट से विदेश रवाना हो गए. वहां अपने कार्यक्रमों के मौके पर भी उन्होंने अपने विशेष दूत भेज कर शायर को मनाया कि विदेश से लौटते ही वह इस मामले को सुलझा कर शायर की नाराज़गी को दूर कर देंगें. लेकिन अब वापिस आने के बाद जिस तरह का माफीनामा अचानक ही जारी किया गया उसे शायर तरलोक जज ने एक मज़ाक बताया है और इस पर अपनी सख्त प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा की यह ढीठताई की हद है. इसी बीच सतिंदर सरताज को कानूनी नोटिस भी भेज दिया गया है. इसकी औपचारिक जानकारी डाक्टर सुशील रहेजा ने फेसबुक पर भी आम कर दी है.अब देखना होगा कि आम जनता और न्याय किसका पक्ष लेते हैं.....?    --रेक्टर कथूरिया 





Friday, August 13, 2010

भारत के खिलाफ अब नयी साज़िश....?

भारत सरकार ने ब्रिटिश वैज्ञानिकों की रिसर्च पर आश्चर्य जताया है कि सुपरबग को उन्हों ने भारत से जोड़ दिया है. सरकार ने कहा है कि वह चेतावनी पर एक जवाब तैयार कर रही है. गौरतलब है कि सुपरबग  का कोई इलाज तक भी नहीं बताया गया है.  आप इस पूरी खबर को पढ़ सकते हैं डी डब्ल्यू  पर क्लिक करके. इसी बीच भाजपा के वरिष्ठ नेता एस एस अहलूवालिया ने गुरूवार को कहा कि सुपरबग विदेशी कम्पनियों की तरफ से फैलाई जा रही दहशत हो सकती है. सरकार को संक्रमणों और इलाज के लिए अवश्यक एंटीबायोटिक दवायों का एक रिकार्ड रखना चाहिए. रिपोर्ट के समय को लेकर भी संदेह है क्यूंकि वह ऐसे समय पर सामने आई है जब भारत चिकत्सा पर्यटन के क्षेत्र में बहुत ही तेज़ी से वैश्विक ताकत के रूप में उभर रहा है. कांग्रेस की जयंती नटराज ने भी रिपोर्ट को भारत के खिलाफ दुष्प्रचार बताया. इस पूरी खबर को आप पढ़ सकते हैं पत्रिका में केवल यहां क्लिक करके. इसी मुद्दे को खास खबर ने भी महत्वपूरण जगह दी है.  पत्रकार अंशु सिंह ने भी इस सारे मामले पर काफी विस्तार से लिखा है. वह कहती हैं ब्रिटिश वैज्ञानिकों के हवाले से कहती हैं कि यह सुपरबग आस्ट्रेलिया, कनाडा, हालैंड, अमेरिका और स्वीडन के नागरिकों में भी पाया गया है. इस जीन की उपस्थिति से निमोनिया होने कि आशंका. निमोनिया का इलाज आम तौर पर साधारण एंटीबायोटिक से हो सकता है लेकिन एनएमडी-1 कि वजह से कोई एंटीबायोटिक  काम ही नहीं करता. अगर समय रहते इस पर काबू नहीं पाया गया तो तो स्वास्थ्य के सम्बन्ध में यह  दुनिया की सबसे बड़ी परेशानी होगी. जानेमाने पत्रकार आलोक तोमर की देखरेख में चलने वाले डेट लाइन इंडिया में इसे विस्तार से प्रकाशित किया गया है जिसे आप पढ़ सकते हैं लिंक पर क्लिक करके. बीबीसी की हिंदी सेवा ने भी भारत के पक्ष को महत्वपूरण ढंग से उठाते हुए हवाला दिया है कि स्वास्थ्य मंत्रालय ने इसे भारत के खिलाफ एक दुष्प्रचार बताया है. पूरी खबर आप पढ़ सकते हैं केवल यहां क्लिक करके.यदि आपके पास भी इस सम्बन्ध में कोई ख़ास जानकारी हो तो उसे हमारे साथ भी अवश्य साँझा करें.--रेक्टर कथूरिया 

Thursday, August 12, 2010

खुशखबरी लुधियाना में हिंदी शोध केंद्र खुलने की

हिंदी फिल्मों को अपने गीतों से अमीर और यादगारी बनाने वाले साहिर लुधियानवी की बात चलती है तो याद आती है लुधियाना की जहां आज भी मौजूद है वह कालेज जहां साहिर ने अपनी शिक्षा ली थी. साहिर की निकटता को महसूस करने वाली वे दीवारें आज भी हैं. लगता है वे आज भी चुपके से साहिर के गीत गुनगुनाती हैं. वह पूरे का पूरा माहौल आज भी साहिर की बात करता है. अब जुड़ा है उसी कालेज से एक और गौरव. आज सबसे पहले हम बात करते हैं उस नए गौरव की जो हिंदी प्रेमियों के लिए एक खुशख़बरी भी है. एक ऐसी खुशखबरी जिसकी चर्चा...जिसकी धूम विदेशों तक भी बहुत ही तेज़ी से पहुंची है. हिंदी विकास के क्षेत्र में एक नया मील पत्थर साबित होने वाली इस इस बात का पता मुझे सब से पहले मिला इंग्लैण्ड में रह रही डाक्टर कविता से. हिंदी और साहित्य की साधना में मग्न डाक्टर कविता ने मुझे एक लिंक भेजा जो एक जानीमानी अंग्रेजी अख़बार से था. खबर यह थी कि अब लडकों का सतीश चन्द्र धवन राजकीय कालेज राज्य का पहला ऐसा कालज बन गया है जहाँ हिंदी में डाक्टरेट करने के लिए पंजाब यूनिवर्सिटी का शोध केंद्र खुल गया है.इसका उदघाटन हाल ही में किया गया है लेकिन इस मकसद के लिए पांच शोध छात्र पहले से ही मौजूद हैं. हिंदी विभाग के प्रमुख और पंजाब यूनिवर्सिटी के सिंडिकेट मेम्बर मुकेश अरोड़ा ने मीडिया को बताया कि इस के प्रयास वास्तव में तभी जोरशोर से शुरू हो गए थे जब 2007 में पंजाब यूनिवर्सिटी सैनिट ने एक प्रस्ताव पारित किया था कि अगर कोई कालेज डाक्टरेट प्रोग्राम के लिए इच्छा रखता हो तो उसे पंजाब यूनिवर्सिटी से खोज केंद्र की स्वीकृति लेनी चाहिए. इस प्रस्ताव के बाद नवम्बर-2009 में कालेज ने बाकायदा इस स्वीकृति के लिए आवेदन भी किया. हिंदी सहित्य और शोध से जुड़े साधकों की साधना रंग लायी. एस सी वैद्य के नेतृत्व वाली उच्च स्तरीय कमेटी ने जनवरी 2010 में इसकी बाकायदा स्वीकृति भी प्रदान कर दी. कालेज में तो पूरा ख़ुशी का माहौल है ही कालेज से बाहर भी हिंदी साहित्य प्रेमी बहुत खुश हैं. गौरतलब है कि इस कालेज में हिंदी विभाग शुरू हुआ था 14 सितम्बर 1953 को केवल 6 छात्रों के साथ. तब से लेकर आज तक कभी भी इस विभाग ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा. इस समय कालेज में इस विभाग को चलाने वालों में डाक्टर मुकेश अरोड़ा भी हैं, डाक्टर हरदीप सिंह भी, सतीश कान्त भी, डाक्टर राजिन्द्र जैन भी और सुश्री सुनन्दा भी.इस शोध केंद्र के खुल जाने से हिंदी छात्रों को बहुत फायदा होगा. इस कालेज ने बहुत महान लोग पैदा किये हैं अगर आपके पास भी इस कालेज की या फिर अपने कालेज की कोई ऐसी याद बची हो तो हमें अवश्य भेजें.---रेक्टर कथूरिया.

Wednesday, August 11, 2010

यदि उड़ने की तमन्ना हो तो आकाश खुद बुलाता है--रजनी नैय्यर मल्होत्रा

परिवार पंजाबी लेकिन इलाका पूरी तरह गैर पंजाबी. जी मैं बात कर रहा हूं झारखंड के पलामू जिले में रहने वाले एक पंजाबी परिवार में जन्मी रजनी की.हुआ यह कि इस पंजाबन मुटियार ने हिंदी में भी मुहारत हासिल कर ली. तीन बहनों और एक भाई में सबसे बड़ी रजनी. पहली सन्तान को जो लाड प्यार मिलता है वह उसे सारे का सारे मिला बिना किसी कंजूसी के. उसके ख्यालों में एक उड़ान आ गयी. वह स्कूल की उम्र में ही कविता लिखने लगी. कुछ सहेलियों को वे कवितायें अच्छी लगीं तो उन्होंने कहा कविता लिखने का यह सिलसिला कभी बंद न करना. यह शायद पहला पुरस्कार था जो उसे अपनी कविता की वजह से मिला. वह अपनी क्लास के साथ स्कूल में भी लोकप्रिय हो गयी थी. पर घर के इस लाड प्यार ने उसे मनमानी करने वाली जिद्दी भी बना दिया. जरा सा विरोध या इनकार वह सहन नहीं कर पाति थी. एक तो भावुकता और दूसरा गुस्सा. पर रजनी ने दोनों में सामजंस्य बैठा लिया था. पर ज़िन्दगी कहां है इतनी सीधी और सपाट,  कब चलती है यह किसी के भी साथ उसकी मर्जी के मुताबिक.... ? इन्सान कुछ और सोचता है, योजना कुछ और बनाता है लेकिन सामने कुछ और ही आता है. इसे अब भगवान की मर्जी ही कहा जा सकता है कि पढ़ाई लिखाई की उम्र में ही  उसकी शादी हो गयी. उस वक्त उसकी उम्र थी केवल 19 वर्ष और उसने इंटर पास की थी. शादी के बाद जिम्मेदारियों की जो आंधियां चलती हैं उनके सामने कविता और पढ़ाई तो दूर की बात है ज़िन्दगी का संतुलन बैठा पाना भी कभी कभी असम्भव सा लगने लगता है लेकिन रजनी ने यह सब भी कर दिखाया. उसने बाकी की पढाई ससुराल में आकर शुरू कर दी. स्नातक इतिहास में वह टोपर रही. बी एड और कम्प्यूटर में बी सी ऐ करने के बाद अब इग्नोयू से स्नातकोतर कर रही है. उसका मानना है कि अगर कोई भी नारी अपनी लगन की शमा को बुझने न दे और साथ ही वक्त की कीमत को भी हमेशां याद रखे तो उसकी मेहनत के सामने पूरी दुनिया झुकेगी, परिवार के साथ पूरा समाज उसका साथ देगा.  वह कहती है यदि उड़ने की तमन्ना ज़ोरदार हो तो फिर आकाश खुद बुलाता है. वह याद दिलाती है...मुश्किल नहीं है कुछ भी अगर ठान लीजिये....बस हर काम मेहनत के साथ लगन भी मांगता है समय की कीमत भी.  अब ज़रा एक रंग उसके काव्य का...:


मंजिलें उनको हैं मिलती,
जिनके सपनों में जान होती है,
पंख से कुछ नहीं होता,
हौसलों से उड़ान होती है,
कोशिशें अगर कि दिल से,
अच्छी अंजाम होती है,
थककर वो बैठ जाते है,
जिनकी कोशिशें नाकाम होती हैं|

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चलने की कर तू शुरू ,मंजिल की तलाश में,
राह का क्या है ,वो खुद ही बन जायेगा,
मानती हूँ,ठोकर भी आते हैं राह में,
तू बन जमीं किसी के वास्ते ,
कोई तेरा आसमां बन जायेगा. 

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कौन है जो ज़िन्दगी से मजबूर नहीं,
कौन है जो मंजिल से दूर नहीं,
गुनाह तो सभी करते हैं,
मेरी नजर में खुदा भी बेकसूर नहीं|

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बहुत रंग हैं जीवन के,
जिसमे गम का रंग गहरा है,
खुशियों के सांचे पर तो,
ग़मों का ही पहरा है,
भागते हैं हम गम से,
पर गम से ही जीवन रुपहला है,
बहुत रंग हैं जीवन के,
जिसमे गम का रंग गहरा है|

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माँगा तो क्या माँगा जो अपने लिए माँगा,
दूसरे के आंसू से अपना दामन भींगे,
सच्ची दुआ तो इसे ही कहते हैं|

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आप उसके एक ब्लॉग पर यहां क्लिक करके जा सकते हैं, दूसरे पर यहां क्लिक करके, तीसरे पर यहां क्लिक करके और चौथे पर यहां क्लिक करके.आपको यह प्रस्तुति कैसी लगी अवश्य बताएं.    --रेक्टर कथूरिया 

CRY ने आमंत्रित किये आवेदन

CRY अर्थात चाइल्ड राइट्स एंड यू नाम की जानीमानी संस्था ने इस बार भी अपनी फैलोशिप को घोषणा कर दी है.इसके तहत देश भर से दस आवेदकों को चुना जायेगा.अनुदान राशी होगी 50 हजार रूपये से लेकर एक लाख रूपये तक. मूल विचार, गैर परम्परागत नजरियों और रचनात्मक  तरीकों की खोज को प्रोत्साहन देने की मकसद से से शुरू किये गए इस प्रोजेक्ट की अंतिम तारीख है चार सितम्बर 2010. अगर आप इसका विवरण हिंदी में पढ़ना चाहें तो इसे जनोक्ति ने बहुत ही सुंदर तरीके से प्रकाशित किया है जिसे आप पढ़ सकते हैं बस यहां चटखा लगा कर. यदि आप इसे मूल अंग्रेजी में सीधे पढ़ना चाहते हैं तो आप यहां चटखा लगायें. आपको इन दोनों लिंक्स पर इसकी पूरी जानकारी मिलेगी जिसे आप खुद भी उपयोग में लायें और दूसरों को भी बताएं.  --रेक्टर कथूरिया 

ज़ख्मों को साफ़ करते सैनिक हाथ

जब कोलम्बिया के एक गांव बाहिया मलागा में 3 अगस्त 2010 को अमेरिकी नौसेना ने अपना शिविर बनाया तो वहां भी कम्युनिटी रिलेशंस प्रोजेक्ट पहल के आधार पर शुरू किया गया. गौरतलब है कि इस संयुक्त सेनिक अभ्यास में कोलम्बिया के साथ साथ अर्जनटाईना, ब्राजील,मैक्सिको, पेरू, यूनाईटिड स्टेटस आफ पेरू के सेनिक दस्ते भी भाग ले रहे हैं.इस मौके पर स्थानय लोगों से अपना राबता और मजबूत करने के मकसद से उनके दुःख दर्द बांटे जाते हैं. इसी भावना के अंतर्गत अमेरिकी नौसेना अस्पताल का Corpsman 3rd Class Lee McGraw एक कोलम्बियन बच्चे के जख्मों को साफ़ कर रहा है.अमेरिकी रक्षा विभाग के प्रथम दर्जे के जनसंचार विशेषज्ञ Brien Aho ने अपने कैमरे मैं उतार लिया.आपको यह तस्वीर कैसी लगी....अवश्य बताएं. अगर आपके पास भी अपनी खींची हुई कोई तस्वीर हो जो कुछ खास पलों कि याद दिलाने वाली हो तो उसे अवश्य भेजें. --रेक्टर कथूरिया 

प्रेम की गंगा बहाते चलो

जंग कोई भी हो, जंग का मैदान कोई भी हो...हर बार सब से  ज्यादा नुक्सान और पीड़ा झेलनी पढ़ती है औरतों को. इस पीड़ा को अगर कोई सब से ज्यादा समझ सकता है तो वह औरत ही है जो दूसरी औरत का दुःख दर्द समझ सकती है. शायद इसी भावना से कुछ महिलाएं भी फौजी वर्दी में वहां पहुंच गयीं हैं जहां गोली और बम अब एक आम बात बन चुकी है. अफगानिस्तान की जंग के मैदान में कुछ बहादुर औरतें भी हैं. सेना की वर्दी पहने हुए ये औरतें जहां गोलियों और बमों का सामना करने को तैयार हैं वहीँ पर ये औरतें वहां के लोगों ख़ास तौर पर वहां की महिलायों के दिलों में भी स्थान बना रहीं हैं. दायें खड़ी  U.S. Marine Corps Cpl. Mary Walls अपनी नियमत गश्त के दौरान कुछ महिलायों से उनके दुःख दर्द जानने की कोशिश कर रही है. फीमेल इंगेजमेंट टीम को वहां की स्थानय महिलायों से अच्छे अन्तरंग सम्बन्ध बनाने के लिए विशेष तौर पर नियुक्त किया गया है. फीमेल इंगेजमेंट टीम इन औरतों को स्वास्थय के गुर भी सिखाती हैं और उन्हें आवश्यक साधन भी सप्लाई करती हैं. इसी तरह की एक मीटिंग में जब दोनों तरफ की महिलायों में दोस्ती के लिए कुछ वार्तालाप शुरू हुआ तो अमेरिकी रक्षा विभाग के Cpl. Lindsay L. Sayres ने तुरंत इन पलों को अपने कैमरे में कैद कर लिया. प्रथम बटालियन, दूसरी मैरीन रेजिमेंट के सदस्यों की यह तस्वीर 2 अगस्त 2010 को अफगानिस्तान के Musa Qa'leh, इलाके में खींची गयी.अगर आप ने भी अपने आसपास ऐसा ही कुछ देखा है तो उन पलों की तस्वीर हमें भेजिए हम उसे आपके नाम के साथ प्रकाशित करेंगे. आपको यह तस्वीर कैसी लगी. यह भी अवश्य बताएं.  --रेक्टर कथूरिया  

Tuesday, August 10, 2010

आज हर रोज़ कटती हैं 50 हजार गायें.....

आये दिन ‘गो-वध बन्द हो’ का नारा लगता है। धर्माचार्यों के अनशन और लाखों रूपये के चन्दे इसी के नाम पर होते हैं। इन सबका परिणाम केवल इतना निकला है कि यदि सन् 1942 में 17,000 गायें नित्य दिन कटती थीं तो आज उनकी संख्या 50,000 तक पहुंच चुकी है। विचारणीय है कि क्या गाय हमारा धर्म है ?क्या इसके समर्थन में हमारे पूर्वजों ने वेद, गीता और रामचरितमानस-जैसे आर्षग्रन्थों में कुछ कहा है ? यदि नहीं कहा तो यह एक धोखा है। इससे हम सबको सतर्क हो जाना चाहिए।
गाय को धर्म मानने का दुष्परिणाम समूचे भारत को भोगना पड़ा है। गाय की ओट से निशाना लेकर मुट्ठीभर तुर्कों ने वीर राजपूतों को उनके ही देश में हरा दिया। अंग्रेजों ने हिन्दू और मुसलामानों में फूट डालने के लिए इसी गाय को साधन बनाया। स्वतंत्र भारत के साम्प्रदायिक दंगों के पीछे गाय कहीं-न-कहीं अवश्य रहती है। इस पागलपन के पीछे अवधारणा यह है कि गाय हमारा धर्म है, किन्तु क्या आप इसके समर्थन में प्रमाण दे सकते हैं?इस सवाल को उठाने कि हिम्मत दिखाई है स्वामी अड़गड़ानन्द ने जिन्हें एक सिद्ध और क्रांतिकारी संत की ख्याति प्राप्त है.इन विचारों को विस्फोट डाट कॉम ने भी प्रमुखता से प्रकाशित किया है और भोपाल रिपोर्टर ने भी.आप इस ख़ास लेख को पूरा पढ़ने के लिए इन दोनों में से किसी भी एक लिंक पर चटखा लगा सकते हैं. हालांकि सवामी अड़गड़ानन्द भी अपने विचारों के लिए बहुत लोकप्रिय हैं. बड़े बड़े लोग उनके दर्शन करने आते हैं.लेकिन गौमाता की अवधारणा भी बहुत पुरानी है. गीता प्रैस की जानीमानी पत्रिका कल्याण ने 1946 में प्रकाशित एक विशेष लेख में स्पष्ट कहा गया था कि आज का भौतिक विज्ञान गौवंश कि उस सुक्ष्मातिसुक्ष्म धर्मोत्कृष्ट उपयोगिता का पता ही नहीं लगा सकता. गौ रक्षा यहां हमेशां ही एक भावुक मुद्दा रहा है.गौरतलब है कि 1760 में राबर्ट क्लीव ने कोलकाता में पहला कसाईखाना खोला था..स्वतन्त्रता के समय 300 से कुछ अधिक थीं लेकिन अब यह गिनती हजारों में है. आप इस मुद्दे पर क्या सोचते हैं...? अपने विचार हमें अवश्य भेजें....!  --रेक्टर कथूरिया  

वह दिन वह करिश्मा

"....अचानक किसी ने बहुत बेरहमी से मेरे दायें कंधे को बुरी तरह से झकझोरा | मुझे बहुत क्रोध आया ...क्या तरीका है...कौन है ये अशिष्ट व्यक्ति| मैंने सोचा जरूर  कोई जानकार है मैं तुरंत उठ कर बैठ गयी ...और मेरे आशचर्य का ठिकाना न रहा जब मैंने देखा कि वहां तो कोई भी नहीं है| ये क्या हुआ..अभी किसी ने इतनी बेदर्दी से झकझोरा है ,अभी तक  उन उँगलियों को मैं अपने कंधे पर महसूस कर रही हूँ ..और यहाँ तो दूर दूर तक कोई नहीं है  क्या हुआ कौन था..." इस तरह के सभी सवालों के जवाब आपको मिलेंगे इस सच्ची कहानी में जिसे पंजाब स्क्रीन के लिए विशेष तौर पर भेजा है मरीशियस से मधु गजाधर ने.इस रचना पर आप सभी के विचारों की इंतज़ार रहेगी...रेक्टर कथूरिया 
जीवन में कभी कभी कुछ ऐसी चमत्कारिक घटनाएं घटित होती हैं जो इंसान को ये सोचने पर मजबूर कर देती हैं कि हाँ ईश्वर है ..और वो अपने भक्तों की मदद के  लिए आता है ..वो सन्देश देता है ...वो आगाह करता है ...और वो सदा हमारे साथ हैहाँ ये और बात है कि हम  कभी अपनी अज्ञानता और कभी अपने अहंकार के चलते उसे पहचान नहीं पाते | ऐसी ही कुछ घटनाएं मेरे जीवन  में भी घटित हुई हैं 
 आज तक संसार का कोई विज्ञान इस प्रकार की चमत्कारिक घटनाओं की तह में नहीं पहुच पाया है | लोग कहते हैं कि यदि कुछ चमत्कारिक अनुभव जीवन में प्राप्त हो तो उसे कभी किसी को बताना नहीं चाहिए...सिर्फ अपने तक सीमित रखना चाहिए| वर्ना इन चमत्कारों  का असर नहीं रहता ...या भविष्य में फिर आप के जीवन में ऐसे चमत्कार नहीं होंगे| 
 लेकिन मुझे लगता है कि ये एक बहुत ही छोटी सोच है | मेरे अनुसार यदि कुछ भी ऐसा घटित हो तो उसे अवश्य लोगों के साथ बाँटना चाहिए. इस से ना सिर्फ लोगों की ईश्वर में आस्था बढ़ेगी वरन ये उस मालिक के चरणों में हमारा श्रद्धामय नमन भी होगा जिस ने कठिन वक्त में आकर हमारी  रक्षा  की | इसी विशवास के आधार पर आज मैं आप के समक्ष अपने जीवन की एक  ऐसी सच्ची घटना  प्रस्तुत कर रही हूँ जिन्हें याद कर कर  मैं आज भी सिहर जाती हूँ , आज भी मेरी आँखें भर आती है ..आज भी मैं उस मालिक के समक्ष करोड़ों धन्यवाद समर्पित करती हूँ |
         बात उस वक्त की है जब मेरा बड़ा बेटा केवल तीन वर्ष का और बेटी दो वर्ष की थी | सभी और बच्चों की भांति ये दोनों  बहुत ही प्यारे नन्हे मासूम बच्चे थे हम लोग भारत में छुट्टियाँ बिता कर  लौटे थे  और अभी कुछ दिन और मेरे पति छुट्टियों पर थे इसी बीच  इन के एक मित्र अपनी इंग्लिश पत्नी जिनी के साथ हमसे मिलने के लिए आये | उन दिनों मारीशस में सर्दियों का मौसम था |और समुद्र के किनारे मौसम कुछ गरम होता है | 
 इस लिए बातों बातों में प्रोग्राम बना समुन्द्र के किनारे जाने का  जैसे ही हम लोग वहां पहुचे मेरे पति देव उन के मित्र और उन की विदेशी पत्नी तुरंत स्वीमिंग सूट पहन कर पानी में उतरने के लिए तैयार हो गए मुझे तैरना  पसंद नहीं है इस लिए मैं तो चटाई डाल कर उस सुनहरे रेत पर बैठ गयी जिनी ने मुझ से  पूछा  बच्चों को समुंदर में ले जाने के लिए तो मेरे बेटे ने मना कर दिया लेकिन मेरी बेटी गीतांजली तुरंत उस के साथ पानी में खेलने जाने को तैयार हो गयी हालाँकि  एक बार मेरे मन में आया कि उसे ना जाने दूं पर एक तो जिनी उसे बहुत प्यार करती थी दूसरे मेरे पति देव भी साथ थे इस लिए मैंने रोका नहीं |
         उन लोगों को कुछ देर तो मैंने पानी में तैरते  देखा ,जिनी मेरी बेटी को बहुत प्यार से गोद में लेकर पानी में खिला रही थी | मेरा बेटा भानु मेरे नजदीक बैठ कर रेत से घरोंदा बनाने की कोशिश में लगा हुआ था | सब तरफ से निशचिंत होकर मैं उस मीठी मीठी धूप में पेट के बल चटाई पर लेट गयी अभी मुझे लेटे हुए दस मिनिट भी नहीं हुए होंगे..मुझे अच्छी तरह से याद है की मैं सोयी नहीं थी बस लेटी हुयी थी, समुन्द्र की लहरों से उत्पन्न शोर को सुन रही थी | अचानक किसी ने बहुत बेरहमी से मेरे दायें कंधे को बुरी तरह से झकझोरा | मुझे बहुत क्रोध आया ...क्या तरीका है...कौन है ये अशिष्ट व्यक्ति| मैंने सोचा जरूर  कोई जानकार है मैं तुरंत उठ कर बैठ गयी ...और मेरे आशचर्य का ठिकाना न रहा जब मैंने देख कि वहां तो कोई भी नहीं है| ये क्या हुआ..अभी किसी ने इतनी बेदर्दी से झकझोरा है ,अभी तक  उन उँगलियों को मैं अपने कंधे पर महसूस कर रही हूँ ..और यहाँ तो दूर दूर तक कोई नहीं है  क्या हुआ कौन था  और यदि कोई था तो अब कहाँ गया ..यहाँ तो दूर दूर तक सुनसान है ..आसपास कोई पेड़ भी नहीं जो मैं ये सोचूँ की कोई पेड़ के पीछे न छिप गया हो ..मैं इस असमंजस की अवस्था में थी मैंने अपने बेटे से भी पूछा जो अब तक वहीं रेत का घरोंदा बनाने में लगा हुआ था 
" अभी यहाँ कोई आया था बेटा?"
'नहीं मम्मा ..कोई नहीं आया "
मैं कुछ परेशान सी थी ,सोच रही थी ये सब क्या हो रहा है...
फिर मैंने सोच चलो जाकर अपनी बेटी को देखती हूँ .
जैसे ही मैं समुन्द्र के किनारे पहुची मेरी तो जान ही निकल गयी |मेरी नन्ही सी बेटी पानी में डूब रही थी...पानी के ऊपर उस के सुनहरे घुंघराले  बाल ही नज़र  आ रहे थे |मैं भूल गयी कि मुझे तैरना नहीं आता...मैं चिल्लाते हुए " बचाओ..बचाओ...अरे कोई मेरी बेटी को बचाओ चीखते हुए मैं खुद पानी में उतर गयी .|
तभी मेरे चीखने की आवाज सुन कर मेरे पति जल्दी से तैरते हुए आये ..जल्दी से उन्होंने नन्ही सी बेटी को डूबने से बचाया ..गोद में लिए उसे पानी से बाहर निकले |
तब तक मेरी बेटी बेहोश हो चुकी थी और उस के पेट में बहुत पानी भी चला गया था ..लेकिन उस की साँसे चल रही थी | जिनी मेरी बेटी को छोड़ कर खुद तैरते हुए  दूर निकल गयी थी | भूल तो मेरी ही थी मुझे अपनी बेटी को किसी के साथ ऐसे छोड़ना ही नहीं चाहिए था...मेरे मन में संशय आया भी था कि उसे रोक लूं  पर मैं दबा गयी | 
हम लोग जल्दी से उसे लेकर क्लिनिक भागे..जहाँ डाक्टर्स ने उसे तुरंत प्राथमिक चिकित्सा दी ,ओक्सिजन दी बहुत भाग दौड़ कर मेरी बेटी को खतरे से बचा लिया|
इस सब में लगभग पांच घंटे लग गए इन पांच घंटों में मैं ना जाने कितनी बार मरी | आंसू थे कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे |
जब वो खतरे से बाहर हुई तो डाक्टर्स ने कहा की यदि और थोड़ी देर हो गयी होती तो हम कुछ नहीं कर सकते थे |सुन कर मैं कांप गयी तब ही मेरे पतिदेव बोले वो तो अचानक मधु वहां आ गयी वर्ना तो....वर्ना तो....
अब मुझे ख्याल आया ..कि अरे मैं खुद कहाँ आई. थी ... वो तो किसी ने झकझोर कर मुझे उठा कर वहां भेजा था...कौन था वो ...किसकी उँगलियों ने पकड़ कर झकझोरा था मुझे ? वो मेरा परमात्मा था ..वो मेरा मालिक था ..हां मैं मूर्ख उसे पहचान भी ना सकी. 
हाय रे .. ,मेरी बच्ची तो मौत के मुंह में जा रही थी मेरे मालिक ने आकर उसे मौत से बचाया और मैं पैर पकड़ कर धन्यवाद भी न दे सकी...मेरे भगवान् खुद चल कर आये और मैं पहचान भी ना सकी|
और तब मैं फूट फूट कर रोने लगी ..सब ने समझाया कि अरे अब तो बेटी खतरे से बाहर है अब रोओं नहीं ...
तब मैंने रो रो कर बताया कि मेरे साथ क्या हुआ था ..कैसे मैं झकझोर कर उठा कर भेजी गयी |उस वक्त सब की आँखे भर आई|
आज मेरी बेटी एक बहुत सफल मेकेनिकल  इंजीनियर है ...बहुत बड़ी कंपनी में काम कर रही है लेकिन मैं आज भी उस हादसे को भुला नहीं पाती हूँ...आज भी मैं उस घडी को याद कर के काँप जाती हूँ ..वो द्रश्य आज भी मेरी आँखों के सामने है  |मैं उस अद्रश्य शक्ति को करोड़ों नमन करती हूँ ...बारम्बार धन्यवाद देती हूँ और यही प्रार्थना करती हूँ कि जैसे विपत्ति की घडी में आकर आपने मेरी बच्ची की जान बचाई वैसे ही मालिक दुनिया  की हर माँ की ऐसे ही मदद करना और आप सभी पाठकों से यही प्रार्थना करती हूँ कि उस मालिक पर अपना विशवास बनाये रखना | बड़ा दयालु है ..हम सब का पालनहार है वो |   ------मधु गजाधर 


मां.....!


डूब जाना ही गर इश्क की तहजीब है तो या रब,
मुझे डूबने में लुत्फ़ की तौफीक फरमा दे...! 


कविता कार्यशाला