Saturday, June 05, 2010

कभी तो मौसम बदलेगा

बात बहुत पुरानी है। उन दिनों एक पंजाबी गीत बहुत ही लोकप्रिय हुआ था जिसके बोल थे : 
जदों मेरी अर्थी उठा के चलनगे, 
मेरे यार सब हुम हुमा के चलनगे....
अर्थात जब मेरी शवयात्रा चलेगी तो मेरे सभी मित्र तो साथ चलेंगे ही, मेरे दुश्मन भी साथ साथ चलेंगे...अब यह बात अलग है कि वे मुस्कराते हुए चलेंगे. प्रकाश साथी के लिखे हुए इस दर्द भरे गीत को उस वक्त के जानेमाने गायक आसा सिंह मस्ताना ने अपने दिल से गया था और कई बार कई तरह के अंदाज़ में गाया था. अगर आप चाहें तो इस हिट गीत को आज भी सुन सकते हैं केवल यहां क्लिक करके. मुझे इस पुराने गीत की एक बार फिर याद आई मीना शर्मा की एक अंग्रेजी रचना को पढ़ कर. आज मैं बात कर रहा हूँ पंजाब की एक ऐसी बेटी की जिसने बहुत समय पूर्व जन्म तो लिया विदेश में लेकिन आज भी उसका पूरा ध्यान जुड़ा हुआ है पंजाब के साथ. विदेश से आना और फिर पंजाब की माटी को सजदा करना उसका ज़िन्दगी का एक महत्वपूर्ण निशाना रहता है. इस सब के साथ ही पुराने गीतों से लगाव रह रह कर झलकता है उसकी पसंद में और पसंद भी केवल फ़िल्मी गीतों की नहीं...इसमें गज़लें भी शामिल हैं और मधुशाला जैसी कालजयी रचना भी. आजकल न्यूज़ीलैंड में रह रही मीना एक बार फिर इस बात को साबित कर रही है कि दुनिया का शायद ही कोई कोना ऐसा होगा जहां पंजाब के लोगों ने अपने जोशीले और रंगीले खून के साथ अपने पावन प्रेम और श्रम का लोहा न मनवाया हो. मन में दर्द के सैलाबों को समेटे हुए वह अपनी मुस्कराहट में सब कुछ छुपा लेने में बहुत ही कलाकार है. एक दिन मैंने पूछा आपकी ज़िन्दगी में इतनी खुशियाँ और आपकी रचनायों में इतना दर्द....मैं समझा नहीं पाया....जवाब में एक अंग्रेजी का वाक्य बोल कर कहने लगीं.किसी भी पुस्तक को उसका कवर देख कर नहीं जाना जाता. एक बार उनकी किसी तस्वीर पर टिप्पणियाँ करते पाठकों ने फेसबुक उनकी सुन्दरता कि बहुत तारीफ़ की. कुछ टिप्पणियों के बाद मैडम कहने लगीं...ओह  गोड...!!! प्लीज़ बंद करो तारीफ करना...हम कोई जन्नत की हूर नहीं जिसके लिए तारीफों का पुल बांध दिया जाये...!!! दरअसल मन के दर्द को छुपाने अनगिनत प्रयास उसे एक ऐसी आभा प्रदान कर रहे हैं जो हर किसी के नसीब में नहीं होती. लोग उसका मुस्कराता हुआ चेहरा देखते हैं पर उसके पीछे छुपी पीड़ा को कभी नहीं देख पाते. उसकी यह पीड़ा शुरू तो हुई थी उसके व्यक्तिगत जीवन से ही लेकिन अब दर्द का वह बिन्दु समुन्द्रों से भी बड़ा हो गया है. अब अगर कहीं मौसम का कोप नज़र आता है तो उसे चिंता होती है..क्या बनेगा उनका. अगर बच्चों के साथ दुनिया में कहीं भी कुछ गलत होता है तो वह बुलंद आवाज़ में कह उठती है...कब तक होगा यह सब ? नारी जीवन की इस व्यथा और उसके ममतामय भावों को आप इस गीत से भी जान सकते हैं जो उसे बहुत पसंद है. गीत सुनने के बाद  पढ़िए मीना की एक नज्म.

एक छोटी सी कली खिली थी कहीं,
ज्योत चिराग में जली थी कहीं.

मस्त पावन के झूले में डाल के
माली ने उसे पला बड़े प्यार से.

एक दिन आया एक फूलवाला
माली ने कली को उसकी झोली में डाला.

कली से वोह फूल बन गयी,
समझी थी कली उसकी ज़िन्दगी संवर गयी.

कभी मसली गयी कभी कुचली गयी,
फूल कि तो दुनिया ही बदल गयी.

माली की परवरिश का असर था शायद
हर मौसम में फूल खिली रही

अब तो वोह बाग़ न तो माली रहा,
फूल की दुनिया वीरान हो गयी.

इतना जरूर हुआ उस फूल के जीवन में,
उसकी बगिया में तीन कलियाँ खिल गयीं.

सोचा फूल ने कि कभी तो मौसम बदलेगा
कभी तो फूलवाले का दिल पिघलेगा.

आज भी वोह सर्दी और धुप में खड़ी है
उसी फूल वाले के चरणों में पड़ी है.
                                                -----मीना शर्मा 

(नोट:फूल: ज़िन्दगी है, फूलवाला: ज़िन्दगी की परेशानियाँ और माली: हमारे सिद्धांत/ कर्म…..!!!)

अब आखिर में सुनिये उनकी पसंद का एक गीत और बताएं कि आपको यह पोस्ट कैसी लगी..?   --रेक्टर कथूरिया 

6 comments:

वन्दना said...

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति।

काजल कुमार Kajal Kumar said...

अच्छा लगा पढ़कर. शुभकामनाएं.

माधव said...

nice

राकेश कौशिक said...

"किसी भी पुस्तक को उसका कवर देख कर नहीं जाना जाता
.....
सोचा फूल ने कि कभी तो मौसम बदलेगा
कभी तो फूलवाले का दिल पिघलेगा.

आज भी वो सर्दी और धुप में खड़ी है
उसी फूल वाले के चरणों में पड़ी है."

कोमल अहसासों की सटीक प्रस्तुति

bhatiyam said...

Aaapne apni katha acchhi tarah prastut ki hai Meena ji. kintu usme aapne jo pankti likhi hai.."masli gayi- Kuchli gayi" .... kuchh majaa nahi aaya.
Naari keval kuchli aur muchli hi nahi jati...
Anyway, aapne shabdon ka prayog uchit kiya hai

sahaytaa said...

sunder aur prabhavshaalee rachanaa achche shilpiyon kee prastutee ke liye kathuriyaji ko dhanyvaad