Saturday, July 04, 2009

एक मिसाल और

इस में कोई संदेह नहीं कि आजकल बहुत से अन्य क्षेत्रों की तरह मीडिया में भी लड़किओं का वर्चस्व बढ रहा है पर इसके बावजूद अभी भी उन लड़किओं की संख्या कम नही हो पाई जो हालात की आंधी में बह कर मजबूरिओं के सामने घुटने टेक कर गुमनामी की जिंदगी में खो जाती हैं। मुझे अभी भी बहुत से नाम याद हैं । बहुत सी लड़किओं पर मेहनत की गई, उन्हें बहुत कुछ सिखाया गया, कई तरह के प्रैक्टिकल अनुभव कराए गए और जब वे स्वतंत्र तौर पर काम सँभालने की स्थिति में आयीं तो उन्हों ने शादी के बंधन में बंधने और पत्रकारिता को अलविदा कहने की घोषणा कर दी। इस सारी स्थिति से मुझे भी कई बार निराशा हुयी पर कहते हैं कि अमावस कि रात ही नए चाँद को जनम देती है। मुझे कुछ ऐसा ही महसूस हुआ मीनू को देख कर। मीनू गिल्होत्रा शुक्रवार कि सुबह को दूरदर्शन पर एक इंटरव्यू ले रही थी। पंजाब के जाने माने पत्रकार जतिंदर पन्नू से उसकी बात-चीत काफी अच्छी थी। मीनू को देख कर मुझे हैरानी भी हुयी और खुशी भी। हैरानी इस लिए कि जतिंदर पन्नू जैसे विद्वान और तेज़ तरार पत्रकार से सवाल पूछ पाना आम तौर पर आसान नहीं होता और खुशी इस लिए मीनू यह सब काम बहुत ही सहजता से कर रही थी। माँ बन कर भी उसने पत्रकारिता से अपना इश्क कभी कम नहीं होने दिया। मैंने उसे विपरीत हालतों में भी मुस्कराते हुए काम करते पहले भी कई बार नज़दीक से देखा था पर यह मेरी हैरानी कि हद थी। सारे घर के नाश्ते का इंतजाम कर के सुबह सवेरे घर से निकलना और फ़िर ख़ुद ही गाड़ी ड्राईव करके वापिस लुधियाना पहुँचाना आसान नहीं होता। वापिसी के बाद भी वोह आराम नहीं करती बल्कि एक निजी चैनल के लिए रिपोर्टिंग करती है। काफी कुछ उसकी खूबिओं पर लिखा जा सकता है पर फिलहाल इतना ही कहता हूँ कि वोह उन सभी लड़किओं के लिए एक मिसाल जो हालात के सामने घुटने टेक कर करियर और समाज के प्रति अपने बनते कर्तव्य से मुँह मोड़ लेती हैं।